भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 103

वेणुगीत ९३ भगवान्द्वारा कानोंमें कर्णिकार-धारण अब 'बिभ्रत्' बर्हापीडसे अलग, 'कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रत्' कानोंमें कनेलके फूलोंको धारण किये। 'कर्णयोः' द्विवचन, 'कर्णिकारम्' एकवचन, अतः उसमें भी द्वित्वकी कल्पना कोई करते हैं, अथवा कभी वाममें, कभी दक्षिणमें। एतावता रसवैदग्धी विशेष कहा। इसमें भावुक कहते हैं—भगवान्के दो कर्ण रसके उद्भावक हैं, कानोंमें रसानुभावक रसोद्बोधक पुष्प धारण करनेसे रसको उद्वेलित किया। किंवा द्विविध शृंगारके अनुभावक दोनों कर्ण। संप्रयोग कालमें हास-रास-विलासमिश्रित वचनोंसे उस रसकी पुष्टि विप्रयोगकालमें भी वेणूदूतद्वारा जब भक्तोंको भगवान् आहूत करते हैं, तब श्रोत्रोंका ही काम है, अथवा एकान्तमें भक्त जब भगवान्का चिन्तन करते हैं—'तच्चिन्तनं तत्कथनम्' उससे भावनापरिपाककी महिमासे इन श्रोत्रोंद्वारा ही दूरस्थ व्रजांगनाओंके आर्तिविलाप भगवान्को अनुभूत होते हैं, एवं च इसमें मुख्य जो कान उनको भूषित किया अर्थात् कभी सम्प्रयोग शृंगारका पोषण, कभी विप्रयोग शृंगारका पोषण भगवान्ने किया और लोग कहते हैं कर्णिकार अर्थात् कनेल नहीं, पीतवर्णका उत्पलाकार पुष्प, उसका स्वभाव है सूर्याभिमुख रहना, जिधर सूर्य जाय, उधर ही वह जाय, कर्णिकार पुष्पके इस स्वभावको जानकर उसको आपने धारण किया। भगवान् सूचित करते हैं कि हमारे प्रेमी जिधर मुँह करते हैं, वैसे मैं भी उन्हें अभिमुख होता हूँ, एतावता जिधर भक्तगण उधर ही उभयविध शृंगाररस उन्मुख, इसीलिये उनको धारणकर यही दिखलाया। पीताम्बरधारणका रहस्य 'बिभ्रद् वासः कनककपिशम्'—भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द कनकवर्ण पीताम्बर धारण किये हुए पधारे। यह इसलिये कि रस आवृत रहे। उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द हैं, वह रस अगर निरावरण हो जाय तो रसाभास हो जायगा, निरावरणरस रसाभास कहा जाता है, इसलिये उसे आवृत रखना चाहिये। यह रस उच्छलित रस है, उद्बोधित रस है, शृंगाररसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र भगवान्ने मयूरपिच्छमय मुकुटको धारणकर सूचित किया, रसोल्लासमें ही मयूरका चन्द्रक गिरता है, इसीलिये उसका धारण रसोल्लासका लक्षण है, ऐसा उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस यदि आवृत न हो तो रसाभास हो जाय, अतः 'कनककपिशं वासो बिभ्रत्' रस आवृत रहनेसे ही रस है, वैसे भी उत्कण्ठाविशेष बढ़ानेके लिये रस आवृत ही रहना चाहिये। श्रीवृन्दारण्यधाममें श्रीबिहारीजीके मन्दिरमें बार-बार, क्षण-क्षणपर परदा होता है; क्योंकि ऐसेमें ही उत्कण्ठा बनी रहती है, निरावरण निर्विघ्न रसमें उत्कण्ठाकी कमी होती है, वास्तवमें रस तो आस्वादनसे घटता नहीं, फिर भी लौकिक रीतिसे अलौकिक रसका आस्वादन प्रभु दे रहे हैं। अति सुन्दरी परम रमणीया नायिका भी मुखचन्द्रपर घूँघट रखती है, अतः उद्बुद्ध उभयविध शृंगारात्मा भगवान्ने कनककपिश पीताम्बरसे अपनेको आवृत किया। अर्थात् भक्तोंको श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मिलनेमें जो रुकावट— आवरण है, वह माया है, माया ही निरावरणरूपसे प्रभुको देखने नहीं देती। वैसे ही गोपांगनाओंको निरावरण उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके दर्शनमें बाधक पीताम्बर है। श्रीवल्लभाचार्य भी पीताम्बरको माया ही मानते हैं। भगवान् भी कहते हैं—'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७। २५) इसीलिये सबको भगवत्तत्त्वका अनुभव नहीं होता, अगर हो तो वह केवल भगवत्कृपासे ही। केवल पीताम्बर वस्त्र नहीं, अपितु तप्तकांचनके सदृश सुवर्णवर्णाम्बर क्यों? सुवर्ण मोहक है, बड़े-बड़े ईमानदारोंका ईमान डुबानेवाला सुवर्ण ही होता है। अतः सुवर्णवर्ण पीताम्बर व्यामोहक कनकतुल्या माया। जो इस कनकके व्यामोहको उल्लंघन करे, वही उस आवरणसे आवृत ब्रह्मको देख सकता है। यदि कनकके आवरणमें फँसा तो रसात्मा ब्रह्मको क्या देखेगा!