भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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ही आप भूषित हैं, यह स्वाभाविक शृंगार है। नन्दरानीसे किया हुआ शृंगार, उसके बाद ग्वालबालों द्वारा वनमें किया हुआ शृंगार वही 'बर्हापीडम्'। 'बिभ्रत्'—बर्हमय आपीडको धारण किये हुए, आपीड शिरोभूषण मयूरपिच्छसे निर्मित अद्भुत मुकुटको धारण किये हुए। नाचते हुए मयूरसे ही जो मयूरपिच्छ निःसृत होता है, उसे बर्ह कहते हैं, उसीसे यह बना, मयूरको जब आनन्दोल्लास होता है, तब वह नृत्य करता है। घनगर्जनसे मेघश्यामकी अद्भुत घटाका निरीक्षण करते मन्द-मन्द गर्जनसे रसोल्लास रसोद्बोधनके साथ जब वह नृत्य करता है, तभी वह पिच्छ गिरता है, उसको धारणकर उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसको और उद्बोधित किया, यह उद्दीपन कोटिमें आ गया, उसको अपने भूषणमें धारणकर भगवान्ने रसोल्लास व्यक्त किया, यहाँ जितनी- जितनी उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मामें रसकी अभिव्यक्ति होगी, उतनी ही भावुकोंमें रसोल्लास होगा। जब भक्त यह जानते हैं कि भगवान् मिलनेके लिये उत्कण्ठित हैं, तब तो उनकी उत्कण्ठाका पारावार नहीं रह जाता, इसीको और बढ़ानेके लिये भगवान्ने पिच्छ धारण किया। 'राधाप्रियमयूरस्य पत्रं राधेक्षणप्रभम्।' जिस मयूरके चन्द्रकको भगवान्ने आभूषण बनाया, वह श्रीवृषभानुनन्दिनीके निकुंजका है, श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दके श्रीअंगके समान उस मयूरके कण्ठकी श्यामलत्ता थी, इसीलिये श्रीकृष्णचन्द्रका स्मारक होनेके कारण श्रीवृषभानुनन्दिनी उस मयूरको अपने पास रखती हैं और उसीका पिच्छ भगवान् धारण करते हैं। इस पिच्छका चन्द्रक श्रीवृषभानुनन्दिनीके नयनके समान है, इसलिये भगवान्ने वह भूषण शिरोधार्य किया, भक्तकी सम्बन्धित वस्तुको भगवान् अपना शिरोभूषण बनाते हैं अथवा यह कि श्रीराधाके शीर्षजूट जूड़ाके सदृश यह पिच्छ, अतः राधाके अलंकार जूटके सदृश होनेके कारण भगवान्ने इसे अपना भूषण बनाया। साथ ही अगले प्रसंगमें तीन भाव दिखाये हैं, अत्यन्त, सरस नूतन अरुणवर्णका आम्रपल्लव होनेसे उसको भी प्रभुने अपने भूषणमें धारण किया, उसकी अरुणिमासे राग दिखाया, यह उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूप अंगी है और सब अंग हैं तो उससे इस स्वरूपमें रजःकृत एक रागजन्य विक्षेप सूचित किया और पिच्छकी जो श्यामलत्ता है, उससे लिलक्षयिषित तमसे गाढ़ आसक्ति दिखायी, सरस अरुण पल्लवसे राग दिखाया। रसमें यह सब राग हो रहा है, वैसे तो रागमें रस है, यहाँ तो उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें राग, आसक्ति व्यसन हो रहा है, तात्पर्य यह कि भक्त रसस्वरूप श्रीभगवान्में राग आसक्ति व्यसन प्राप्त करना चाहते हैं अर्थात् जहाँ उस तरहका राग-आसक्ति व्यसन भक्त करता है, वैसे ही आगे श्रीभगवान् भक्तमें राग-आसक्ति व्यसन करते हैं, जैसे श्रीवृषभानुनन्दिनीका, व्रजांगनाओंका श्रीकृष्ण- परमानन्दकन्द मनमोहन श्यामसुन्दरमें राग-आसक्ति व्यसन, वैसे ही श्रीभगवान्का श्रीवृषभानुनन्दिनीमें, व्रजांगनाओंमें राग-आसक्ति व्यसन। पहले भक्तका भगवान्में, फिर भगवान्का भक्तमें, जैसे बताया वृषभानुनन्दिनीके हृदयकी वस्तु श्रीकृष्णचन्द्र, वैसे ही श्रीश्यामसुन्दरके हृदयकी वस्तु वृषभानुनन्दिनी। कहा जा चुका है कि यह लौकिकवत् प्राकृतवत् व्यक्त हो, मगर है वह अलौकिक। रस-रसालम्बन-रसाश्रय तीन-तीन जातिके होते हैं, यहाँ एक ही है। परमरसामृतसिन्धुके ये तीन विकास हैं। श्रीकृष्णचन्द्र और वृषभानुनन्दिनी परस्परके हृदय हैं, जैसे श्रीकृष्णचन्द्रके स्वरूपसे श्रीवृषभानुनन्दिनीका हृदयगत उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस मूर्त हुआ, वैसे श्रीवृषभानुनन्दिनीके स्वरूपसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- कन्दका हृदयगत उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस मूर्त हुआ, अतः दोनों उभयात्मक हैं, इस दृष्टिसे दोनों ओर इस स्वरूपमें रसाभिव्यक्ति हुई, जैसे वीर रसमें वीर रसका, करुण रसमें करुण रसका संचार, वैसे उभयविध शृंगाररसात्मामें रसाभिव्यक्ति, यही कहा— 'बर्हापीडं नटवरवपुः।'