भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलिये। उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा यदि हृदयस्थ वस्तु फिर सर्वेन्द्रिय ग्राह्य नहीं, पर वही हृदयस्थ वस्तु वृन्दारण्यधामस्थ हुई। हृदयस्थ ही पहले कैसे ? तो शुरूसे ही उसका धारण-पोषण श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने ही किया, 'आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।३३) व्रजांगना कहती है—'हे श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन, आपके सम्मिलनकी आशाको शुरूसे ही धारण किया, पोषण किया, उस आशा-कल्पलताका बीज व्रजांगनाओंके स्निग्ध हृदय-क्षेत्रमें आरोपण किया, रूखड़ पथरीले बालुकामय क्षेत्रमें यह आशा कल्पलता अंकुरित न होगी, अर्थात् भगवत्सम्मिलनकी आशा- कल्पलता हृदयमें बोयी जाय, वह अंकुरित हो, पुष्पित-फलित हो।' प्रत्याशित वस्तुका सम्मिलन ही उसकी सफलता—यह भगवत्कृपासे भावुक हृदयमें प्रकट होती है। व्रजांगनाओंके हृदयमें भगवत्सम्मिलनकी आशाको भी उन्होंने ही बोया, पोषण किया, यहाँ वह पुष्पित हो गयी, उसी फूलकी सुगन्धि वेणुगीतद्वारा निकलेगी। भाव यह कि श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रने ही श्रीवृषभानुनन्दिनीके, श्रीव्रजांगनाओंके हृदयमें स्वसम्मिलनकी उत्कण्ठाको, आशाको बोया और वही शृंगाररसका स्वरूप है। जब कभी वह आशाकल्पलतांकुर मुरझाने लगता है तो व्रजांगना अपने अश्रुबिन्दुसे उसे सींचना चाहती हैं, जबकि श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके वियोगानलरूप वाडवाग्निसे वह दग्ध होने लगता है, तब वही श्रीकृष्णचरणारविन्द-परागरूप कज्जलको आँखोंमें लगाती हैं, श्रीकृष्णपादपंकजपरागसे यह अग्नि प्रशान्त होती है। इस शृंगाररसका धारण-पोषण श्रीकृष्णचन्द्रने ही किया, यहाँपर भी हृदयस्थ उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक शृंगाररसको मूर्त होनेके लिये धारण और पोषण किया। भगवान्द्वारा मयूरपिच्छ-धारण अब भूषणका वर्णन—बर्हापीड— बर्हमय आपीड, वैजयन्ती, कर्णिकार, पीताम्बर यह सब भूषण है, स्वरूप केवल 'नटवरवपु' यदि नटवत् वरवत् वपुका ऊपरवाला अर्थ करें तो शोभा और भूषण आ जाता है, नट ही विचित्र वेश-वसनसे अपनेको सजाता है अर्थात् वैसा अर्थ लेनेसे वैसे वपुका बोधन है, किंतु इसके अलावा नटपदसे वरपदसे विप्रयोग-सम्प्रयोगात्मक शृंगार कहा गया तो भगवान्का उद्बुद्ध उभयविध शृंगारात्मक रसस्वरूप आता है। भगवान्के तीन शृंगार हैं, 'भूषिता अप्यभूषणम्।' श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द गोपाल बलरामके साथ जब भवनसे निकलते तो उसके पहले ही माता उबटन लगाकर अभ्यंग करनेके बाद नानाविध विचित्र दिव्य अलंकारोंसे भूषित करके गोचारणके लिये वृन्दारण्यमें भेजती, फिर वनमें आते तो ग्वालबाल वनकी सामग्रियोंसे भूषित, कर्णिकारसे आभूषित करते, गुंजाकी परमसुन्दर माला पहनाते, उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसका निर्यासरूप आनन्द-सुधासिन्धुका मन्थनकर यह अद्भुत सारतम तत्त्व विनिःसृत हुआ, इस प्रकार पूर्णानुराग-रससारसिन्धुसे प्रभुके सर्वांगका निर्माण हुआ, स्वरूपके प्रादुर्भाव होनेपर उबटन, अभ्यंग, अनुलेपन, स्नान वगैरह हुए। पहले उद्वर्तन हुआ। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में लिखा है कि 'उद्वर्त्तितमिव सौरभ्येण' अन्योंको, सौरभ्यके लिये उबटन, यहाँ भगवान्के स्वरूपको तो सौरभ्यसे ही उबटन, अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत जो सौरभसारसर्वस्व वही आपके लिये उबटन 'अभ्यक्तमिव स्नेहेन' अन्यत्र लोगोंमें स्नानसे मधुरिमा व्यक्त की जाती है, यहाँ तो भगवद्विषयक भावुकोंके स्नेहसे भगवान्के श्रीअंगका अभ्यंग हुआ। अनन्तब्रह्माण्डगत माधुर्य-बिन्दुके उद्गमस्थान माधुर्यसिन्धुके सारसे आपको स्नान कराया गया, श्रीकृष्णचन्द्रकी मंगलमयी मूर्तिका स्नान माधुर्यामृतसारसर्वस्वसे, 'मार्जितमिव लावण्येन' मुक्ताफल मध्यकी चमकको लावण्य कहते हैं, उस लावण्यसारसर्वस्वसे ही मार्जन। अब अनुलेपन 'अनुलिप्तमिव सौन्दर्येण' अन्यत्र अनुलेपनसे सौन्दर्य, यहाँ सौन्दर्यसारसर्वस्व ही अनुलेपन। 'भूषितमिव त्रैलोक्यलक्ष्म्या' अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत लक्ष्मीसे