भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैं? मुक्तोंका स्वरूपसे निष्कासन ही पुष्टिमार्गीय मुक्ति है। भागवतके अनुसार 'मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥' (श्रीमद्भा० २।१०।६) अर्थात् काल्पनिक, औपाधिक रूप छोड़कर पारमार्थिक भगवद्रूपमें लीन होना। पारमार्थिक रूप अखण्ड, अनन्त, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, स्वप्रकाशात्मक है, यह अद्वैतियोंकी मुक्ति है। कोई कहते हैं—जीवका निजी रूप गोपांगनाभाव है। उसे छोड़कर जो सांसारिक स्त्रीत्व-पुंस्त्वमें आया, उसको छोड़कर पूर्वभावमें जाना ही मुक्ति है। दूसरे कहते हैं—जीव स्वभावसे ही श्रीभगवान्का नित्यदास है। जहाँ दूसरे भाव आये कि वह भाव बिगड़ा, उन्हें छोड़कर— श्रीभगवान् हमारे स्वामी, हम उनके दास, इस रूपकी प्राप्ति मुक्ति है। किंतु यहाँकी मुक्ति, जीवकी मुक्तित्वसे मुक्ति है अर्थात् जीवको मुक्ततासे छुट्टी मिले। एक कथा है कि एक बार श्रीदेवर्षि नारद प्रफुल्लित अद्भुत आमोदमय वृन्दारण्यमें पधारे। वहाँपर जब उन्होंने श्रीवृषभानुनन्दिनी तथा व्रजांगनाओंके दिव्य प्रेममय हास-रास-विलास-विलासित भावोंका अनुभव किया तो रोने लगे। नारदको रोते देख व्रजरमणियोंने पूछा कि ऐसे आनन्द-समुद्रमें अवगाहन करनेके समय रोते क्यों हो? नारदने कहा—हम रोते उनके लिये हैं, जो मुक्त हो गये हैं। जो बन्धनमें हैं, उनको तो सम्भव है कि यह रस मिल सके। उनको श्रीवृषभानुनन्दिनी तथा श्रीकृष्ण परमानन्दके ऐसे अद्भुत प्रेमरसमय शृंगारका दर्शन हो सकेगा, मगर मुक्तोंको तो बिलकुल ही असम्भव है। इसी भावनासे कहते हैं कि वेदान्तियोंकी मुक्ति पाषाणकल्प है, किंतु उसके निरूपणका यह अवसर नहीं। आश्रय—ऊपर कहे हुए मुक्तोंको भगवल्लीलो- पयोगी दिव्य देहादिकोंका प्रदान करना, पूर्णतम पुरुषोत्तमलीन जीवोंका निष्कासन करनेपर उन मुक्तिमुक्तोंको लीलापरिकरोपयोगी बनाना आश्रय है, इसीको प्रत्यापत्ति कहते हैं, इसके अनुसार वह जीव वृन्दावनमें गुल्म, लता, पाषाण, वृक्ष हुए। मुक्त, मुनीन्द्र, अमलात्मा, महात्मा, परमहंस ही आकर सर्वरूपमें प्रकट हो गये हैं, इन्हींकी भोग्या सुधा देवभोग्या है। 'द्योतनात्मकत्वात्, प्रकाशात्मकत्वात्, श्रीकृष्णस्वरूपत्वात् देवाः, किं वा दीव्यन्तीति देवाः।' श्रीकृष्णचन्द्रसे क्रीड़ाके लिये जो आये, वे देव हैं। दिव् धातु तो बड़ा ही व्यापक अर्थ रखता है। 'दिवुक्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोद- मदस्वप्नकान्तिगतिषु'। ये देव पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्रके साथ लीला-परिकर होनेके लिये प्रादुर्भूत हुए। इनको भी प्रेमनिरोध हुआ। ये श्रीप्रभुके प्रेममें संसार- विस्मरणपूर्वक मनसे उनमें लीन हो गये। एक स्थिति तो यह कि 'वृन्दावनं परित्यज्य पदमेकं न गच्छति' तब तो ठीक ही है, पर जब भगवान् गये, तब तरु- गुल्म वगैरह शुष्क क्यों न हो गये? कारण यह कि बहिर्मुख नहीं, इनकी भावना यह है कि श्रीकृष्णचन्द्र कहीं गये ही नहीं। अगर वे प्रभुका वहाँ अभाव समझते तो मुरझाते, रोते, जल जाते, अतः प्रेमनिरोधसम्पन्न लता, तरु-गुल्म, खग-मृगोंमें देवभोग्या अधरसुधाका संचार हुआ। भगवान्के मुखचन्द्रसे निःसृत जिस वेणुनादामृतका वृक्ष-लता, खग-मृग, पशु आस्वादन करते हैं, वह देवभोग्या अधरसुधा है। यह सुधा है श्रोत्रपेया, मुखपेया नहीं, इस सुमधुर अधरसुधाका सम्भोग श्रोत्रोंद्वारा ही होता है। रसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रकी मंगलमयी लीला भी रसस्वरूप है एक बात यहाँ समझनी चाहिये कि वास्तवमें रसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी मंगलमयी लीला भी रसस्वरूप ही है। उनके लीलापरिकर भी रसस्वरूप हैं और लीलाभूमि भी रसस्वरूप है। भगवान् तो वास्तवमें आत्मरति हैं। जब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके भक्त आत्मरति हैं, उनको रमण करनेके लिये स्त्री, पुत्र, धन इत्यादि अनात्मसामग्री अपेक्षित नहीं है, तब उनके ध्येय पूर्णतम, पुरुषोत्तम, भगवान् आत्माराम, आप्तकाम आत्मामें रमण करेंगे, इसमें संशय ही क्या? वह अपने-आपमें रमण करते