भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत ९९ हैं— 'नहि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति'। एक सच्चिदानन्द परमात्माको छोड़कर सभी सान्त हैं भगवान्की रति आत्मामें, श्रीवृषभानुनन्दिनीमें और 'प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि'। (गीता श्रीव्रजांगनाओंमें है। सब उन्हींके रूप हैं। 'स १३।१९) समझो कि लीलारसविशेषके लिये निखिल भगवान् कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिम्नीति होवाच।' रसामृतसिन्धु, पूर्णतम, पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्र अन्तिम सर्वाधार अपने-आपहीमें स्थित होता है। परमानन्दकन्दने अपने-आपको ही सर्वस्वरूपमें विकसित पृथिवीका आधार जल, जलका तेज, तेजका वायु, किया, अतएव शुद्ध रसमय लीलामें प्राकृतता नहीं है। वायुका आकाश, उसका तन्मात्र, उसका अहंकार, यदि यह कहो कि आकर्षण नहीं—तो लीला कैसे? उसका महत्तत्व, उसका अव्यक्त प्रकृति, उसका तो प्रभु एक वैष्णवी मोहिनी मायासे सबोंके स्वरूपोंको सत्त्व; अब उसका आधार क्या? वह तो स्वयं आवृत—मोहित कर देते हैं। अतः निखिल रसामृतमूर्ति निराधार अपने-आपहीमें स्थित है। इसलिये श्रीकृष्णचन्द्र होते हुए भी वे अपने-आपको भूल जाते हैं। इसी परमानन्दकन्द सर्वत्र आपहीमें व्यक्त हुए। इस दृष्टिसे तरह श्रीवृषभानुनन्दिनी, व्रजांगना इत्यादि भी अपनेको आत्मरति बने, परंतु जब सब ही रसस्वरूप आत्मरति भूल जाते हैं। यदि स्वयं तृप्त हैं तो दूसरेकी स्पृहा हैं तो किसी एकको दूसरी ओर आकर्षण, प्रेम, कैसी? किंतु इस वैष्णवी मोहिनी मायासे यशोदामाता आसक्ति, व्यसन कैसे? क्योंकि जैसे श्रीकृष्णचन्द्र प्रभुके मुखारविन्दमें चराचर विश्वको देखती हुई भी, परमानन्दकन्द स्वरूपमें रमण करनेवाले हैं, वैसे ही अपनेको भूल गयीं, वैसे ही यहाँ भी सब अपने वृषभानुनन्दिनी और व्रजांगना आदि भी हैं। अर्थात् स्वरूपको भूल गये। यदि कोई कहे कि रुचिसे परस्पराकर्षण नहीं होगा, यदि आकर्षण नहीं तो अपनेको भुलाना कैसे? तो लोग जैसे भंग पीकर नानाविध विलास क्यों? एकमें अनेकत्व क्यों? अपनेको अपनी रुचिसे मोहित करते हैं। यह क्यों? 'एकोऽहं बहु स्याम्' यह क्यों? इसका उत्तर केवल विस्मृतिके लिये। विस्मृतिमें भी स्वाद है, रस है, यदि यही कि लीलारसास्वादनार्थ। वह स्वेच्छामूलक हो। अर्थात् जैसे प्राकृत मानव भगवान्के जन्म-कर्म बन्धनकारक नहीं हैं भंगादि मादक आसवोंद्वारा स्वरूपविस्मृतिपुरःसर लीलामें अब प्रश्न यह होता है कि आत्माराम, आप्तकाम, प्रवृत्त होता है, वैसे ही वैष्णवी मायासे भगवान् भी पूर्णतम, पुरुषोत्तमको लीलारसास्वादन कैसे? बात लीलामें प्रवृत्त होते हैं एवं यह स्पष्ट है कि इस ठीक है, पर यह तो आपत्ति सभी मतोंमें है। तब फिर मंगलमयी रसकी लीलासे, उसके मनन, निदिध्यासनसे किसलिये कहते हैं 'आप्तकामस्य का स्पृहा' और प्राणियोंका परम कल्याण है। जन्म, कर्म तो सबके कैसे फिर सब प्रपंच सम्भव है? अब पहला उत्तर ही हैं और प्राणियोंके जन्म-कर्म बन्धनकारक भी यह—जो सर्वमतसिद्ध भी है कि आप्तकाम भगवान्को होते हैं, मगर भगवान्के जन्म-कर्म बन्धन नहीं। अपना प्रयोजन तो कुछ नहीं, पर अनादिबद्ध जीवोंके जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। लिये प्रभु जगन्निर्माण करते हैं, एकमें अनेकता करते त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ हैं। यदि कहो 'न रहे बाँस न बजे बाँसुरी', यह (गीता ४।९) बात निरर्थक है, अनादिकालसे एकमें अनेकता व्यक्त श्रीभगवान् और जीवके जन्म-कर्म क्या बराबर है, जीवभाव नया नहीं है। जैसे जबसे आकाश है, हैं? जीवके जन्म-कर्म सुनते-देखते कल्प-कल्पान्तर तबसे ही उसमें श्यामलता भ्रान्ति है, वैसे ही अनादि बीत गये, अब भगवान्के जन्म-कर्म सुनने चाहिये। जीव हैं, अनादि प्रकृति है, किंतु अनादि रहनेपर भी उसीके द्वारा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी प्राप्ति सान्त हैं (यथा प्रागभाव)। अद्वैत मत यही है कि होगी। श्रीकृष्णके जन्म-कर्मके श्रवणसे प्राणियोंके