भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजन्म-कर्म छूटते हैं, प्राणियोंके जन्म-कर्म श्रवणसे जन्म-कर्मकी परम्परा बढ़ती है। अतः वह भगवान्की लीला ही थी, पर वह अप्राकृत थी। स्वाभाविक आसक्तिके लिये लौकिक रूपमें कही गयी है। संसारकी आकांक्षा, वांछा, आशा, तृष्णा और श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके सम्मिलनकी आकांक्षा, वांछा, आशा, तृष्णा क्या बराबर हैं? नहीं, दोनोंमें आकाश- पातालका अन्तर है। वह आशा पिशाची है। यह आशा कल्पलता है। इसलिये यह निर्विवाद है कि पूर्णतम, पुरुषोत्तम, निखिलरसामृतमूर्ति, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने अपने-आपको सर्वरूपमें व्यक्त किया। फिर भी लीलारसकी आसक्तिके लिये यहाँ स्वरूपानन्दका विस्मरण अपेक्षित है। इस तरह भगवत्स्वरूप होते हुए भी इन देवोंका विस्मृतिके कारण सुधाकी ओर आकर्षण उत्पन्न है। उनके प्रेमनिरोधके अनुकूल यह देवभोग्या सुधा है। व्रजांगनाएँ, जो श्रीकृष्णचन्द्रके अमृतमय मुखचन्द्रकी अधरसुधाके भोगनेयोग्य हैं, परंतु व्रजस्थ हैं, वे कैसे भोगें? इसलिये वेणुछिद्रोंमें प्रवेश कराके गीतरूपसे निरावरण कर्णकुहरोंद्वारा उनके हृदयमें पहुँचाना है, जिसे वे अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राण, रोम-रोममें अनुभव करके आन्तररमण प्राप्त करेंगी। भगवद्भोग्या अधरसुधा इसलिये प्रयुक्त है, जिससे सर्वाभोग्या अधरसुधाके अनुभवकी योग्यता प्राप्त हो। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके अमृतमय मुखसे निर्गत जो वेणुगीतपीयूष है, उसको निरावरण कर्णकुहरोंद्वारा पानकर अन्तःकरणमें उसे भावनासे परिवर्तित करती हुई व्रजांगना फिर उसीको उद्गाररूपमें वर्णन करती है। वही अधरसुधा व्रजांगनाओंके अधरपल्लवमें आती है, इसीसे अधरपल्लव पवित्र हो जाता है। अपवित्र मुखसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके अधरपल्लवमें रहनेवाली सर्वभोग्या अधरसुधाका सम्भोग नहीं हो सकता। अतः जब वे वेणुगीतपीयूषका श्रोत्रसे आस्वादन करेंगी और भावनापरिवर्धन-उद्गार- वर्णनसे मुख पवित्र होगा, तभी वह सर्वाभोग्या अधरसुधाके लिये अधिकारसम्पन्न होंगी।
प्रथम भगवान्का भक्तमें रमण, अनन्तर भक्तका भगवान्में रमण पहले भगवान् भक्तमें रमण करते हैं, तब भक्त भगवान्में रमण करनेके अधिकारी होते हैं। यदि श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मुखपंकजसे वेणुगीत- पीयूषद्वारा व्रजांगनाओंके मुखपंकजका अधरपल्लव शुद्ध हो लेगा, तब श्रीव्रजांगनाएँ भगवद्रमणयोग्य होंगी। सम्प्रयोगात्मक शृंगारमें श्रीकृष्ण भी व्रजांगनाओंके पवित्र अधरपल्लवमें अधरसुधाका सम्भोग करेंगे। इस तरह व्रजांगनाओंके अधरपल्लवमें स्थित सुधा भगवद्भोग्या सुधा है। व्रजांगनाओंके अधरपल्लवमें रहनेवाली सुधा भी श्रीकृष्णकी ही अधरसुधा है; क्योंकि भगवान्के अधरमें रहनेवाली भगवद्भोग्या अधरसुधा ही वेणुछिद्रोंमें प्रविष्ट होकर, गीतपीयूष- रूपमें व्यक्त होकर व्रजांगनाओंके श्रोत्र, अन्तःकरण, अन्तरात्मामें भरपूर हो, अधरपल्लवमें वर्णनव्याजसे प्राप्त होकर सम्प्रयोगकालमें भगवद्भोग्या हुई थी। भगवान्के अधरमें रहकर वह भगवद्भोग्या नहीं हो सकती थी, इस प्रकार हो गयी। 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च' यहाँ भी श्रीका अर्थ श्रीवृषभानुनन्दिनी है। वैसे तो श्री शब्दका प्रयोग लक्ष्मीमें भी होता है, पर जहाँ श्री तथा लक्ष्मीका पृथक् पठन है, वहाँ श्रीका अर्थ लक्ष्मी क्यों किया जाय? 'लक्ष्मी' अर्थमें 'श्रयते हरिः या सा श्रीः, श्रयते सेवते (श्रिञ् सेवायाम्)' ऐसे अर्थ हैं, किंतु यहाँ 'श्रीयते सर्वैर्गुणैर्या सा,' ऐसा कर्ममें प्रत्यय। जो समस्त गुणगणोंसे, अद्भुत सौन्दर्य, सौरस्य, सौगन्ध्य इत्यादिसे सेवित हो, वह श्री। यह सेविका श्री नहीं, सेव्या श्री है अर्थात् सकल गुण-गण मूर्तिमान् होकर जिसकी सेवा करें, वह श्रीवृषभानुनन्दिनी श्री हैं। जितनी भी अनन्तकोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत सौरस्य, सौगन्ध्य, सौन्दर्य, मार्दव, माधुर्यादि गुणोंकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी महाशक्तियाँ हैं, वे मूर्तिमती होकर राधाकी सेवामें उपस्थित हैं। इसीलिये गोलोकधाममें मूर्तिमती शोभादि गोपांगनाएँ राधाजीकी सेवामें उपस्थित हैं। अब