भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत १०१ वृषभानुनन्दिनीकी सुन्दरताकी कल्पना कौन करे? सोचते हैं कि भगवान् किसका ध्यान करते हैं? इतनेमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत सौन्दर्यबिन्दुका उद्गम- भगवान्का ध्यान खुला, युधिष्ठिर पूछते हैं- 'आप स्थान जो सौन्दर्यसिन्धु है, उसकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी अभी किसका ध्यान करते थे, भगवन्!' भगवान्ने श्रीवृषभानुनन्दिनीकी सेवामें रहती हैं। भगवान् श्यामसुन्दर, कहा- 'इस समय भीष्म शरशय्यापर पड़े हुए हमारा व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी तो ध्यान कर रहे थे। हमारा भी व्रत है कि 'ये यथा माधुर्याधिष्ठात्री स्वयं वृषभानुनन्दिनी ही हैं। अनन्तकोटि मां प्रपद्यन्ते' इसलिये हम भी उन्हींके ध्यानमें ब्रह्माण्डान्तर्गत जो मार्दव है, उसकी अधिष्ठात्री देवी तन्मनस्क रहे।' अस्तु, इन पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभुकी महालक्ष्मीके चरण इतने कोमल हैं कि कोमल-से- माधुर्याधिष्ठात्री देवता राधा हैं, उन्हींके ध्यानमें कोमल कमलकी पँखुड़ीके गड़नेका डर रहता है। भगवान् रहे, उन्हींका जप भी करते रहे। वंशीमें भी इतनी मृदुलता जिसके चरणोंमें है, उस महालक्ष्मीके वही बजाते थे 'ताहि श्याम वंशीमें गावत।' हस्तारविन्द कितने कोमल होंगे, कुछ ठिकाना नहीं। शुकको भी पढ़ाते थे कि 'वत्स पठ धाराधरवपुः ऐसी जो महालक्ष्मी हैं, वे अपने सुकोमल श्रीहस्तोंसे श्रीमन्नारायणोऽवतु।' इस व्याजसे धाराधरवपुमें वृषभानुनन्दिनीके श्रीचरणोंको स्पर्श करनेमें सकुचाती 'धाराधारा' कहनेसे राधाका नाम लेते थे। 'मरा मरा' हैं कि कोमल चरणोंमें कहीं आघात न लग जाय। कहनेसे वाल्मीकि भी राममें परिनिष्ठित हो गये। ऐसा ऐसे ही क्षमाधिष्ठात्री, दयाधिष्ठात्री, शोभाधिष्ठात्री, उलटा क्यों? इसलिये कि अगर अम्बा नन्दरानीके करुणाधिष्ठात्री शक्तियाँ सर्वगुणगणोंसहित निरन्तर सामने स्त्रीका नाम लें तो वह क्या समझेंगी? अतः श्रीवृषभानुनन्दिनीका सेवन करती हैं। प्रकट नहीं लेते। वैसे अम्बा व्रजगेहिनी नन्दरानी कोई भावुक तो कहते हैं कि 'श्रीयते हरिणाऽपि समझे कि हमारा लाला बड़ा भक्त है, स्नानकर या सा श्रीः।' जैसे भक्त भगवान्को भजते हैं, वैसे भगवान्का नाम जपा करता है। तात्पर्य यह कि ही भगवान् भक्तको। ठीक ही है, भगवान् स्वयं कहते 'श्रीयते श्रीकृष्णोऽपि या सा श्रीः।' वह श्री हैं— 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्'। जहाँ नहीं, वहाँ श्रीकृष्णका रमण नहीं। वही श्रीराधा (गीता ४।१०) माधुर्याधिष्ठात्री शक्ति, माधुर्यसारसर्वस्व श्रीकृष्णचन्द्रके यदि श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- अमृतमय मुखचन्द्रमें अधरसुधाके रूपमें विराजमान कन्दको भजती हैं तो वैसे ही भक्तभजनानुविधायी हैं। इसलिये जब अधरसुधाको वंशीके छिद्रमें निक्षिप्तकर भगवान् भी वृषभानुनन्दिनीको कैसे न भजें? व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाया तो वही अधरसुधा 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में एक कथा है- व्रजांगनाओंके मुखपंकजमें आयी। वह स्वरूप उनके एक समय श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द अपने अन्तरात्मामें, अन्तःकरणमें, प्राणोंमें, रोम-रोममें आ शुकको पढ़ाते थे, साथ-साथ श्रीराधाका ध्यान भी गया। वही वृषभानुनन्दिनी हैं। अतः वहाँ श्रीका यानी कर रहे थे। आखिर किसीका ध्यान तो करना ही वृषभानुनन्दिनीका संचार है और जहाँ उनका संचार चाहिये। भक्त भगवान्का ध्यान करते हैं तो भगवान् है, वहीं श्रीकृष्ण परमानन्दका रमण होता है। पूर्णतम, भक्तका करेंगे ही। उसी ध्यानानन्दमें महाराजके पुरुषोत्तम भगवान् अपनी ही माधुर्याधिष्ठात्री शक्तिका नयनोंसे अश्रु बह रहा था। श्रीअंगमें पुलकावली हो आस्वादन करते हैं। फूलोंमें स्वयं अगर घ्राणशक्ति हो गयी थी। भारतकी कथा है कि भगवान् भीष्मजीका तो वे जैसा आघ्राण करेंगे, वैसे ही यह रमण है। यह ध्यान कर रहे थे, उसी समय धर्मराज युधिष्ठिर पहुँचे आया कि भगवान् आत्मरति हैं। ठीक ही है, जिनका और भगवान्को ध्यान करते देख चकित हो गये। ध्यान करनेवाले अमलात्मा परमहंस मुनीन्द्र अपने