भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ भक्तिसुधा रमणके लिये किसीकी अपेक्षा नहीं करते, उनके ध्येय, आराध्यदेव श्रीप्रभु अनात्मरति कैसे होंगे? जहाँ-जहाँ इनका प्राकट्य नहीं, वहाँ श्रीकृष्णका रमण भी नहीं। प्राणिमात्रके लिये अपेक्षित यही है कि वह ब्रह्म-संस्पर्श, ब्रह्मरस-सम्भोगका प्रयत्न करे। यही जीवनकी सफलता है। यहाँके षड्रस भोगते-भोगते कल्पकल्पान्तर बीत गये, अतः प्रत्येक उस ब्राह्मारस, स्पर्शके लिये लालायित हो, यही ठीक है। जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए विधाता॥ (रा०च०मा० १।२०४।२) भगवान्का आत्माभिरमण जिसका मन इनके लिये उत्कण्ठित न होता हो, वह प्राणी नहीं। अस्तु, यह हो तब श्रीकृष्ण सबमें रमण करें। प्रथम ब्रह्म जीवमें रमण करे, फिर जीव ब्रह्ममें। व्रजांगनाओंमें कोई ऋषिरूपा थी, कोई अग्निरूपा, कोई साधनसिद्धा, कोई नित्यसिद्धा, कोई जनकपुरनिवासिनी। उन सबोंमें प्रथम श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका रमण हो, फिर उनका श्रीकृष्णमें। यहाँपर दोनोंके रमणमें भेद है, पर प्रश्न यह है कि भगवान् भक्तमें रमण कैसे करें? वे तो आप्तकाम, आत्माराम हैं, परंतु श्रीवृषभानुनन्दिनी तो उनकी आत्मा ही हैं। क्या आनन्दसुधासिन्धुसे उसका माधुर्य पृथक् है? इसलिये श्रीकृष्णकी आत्मा ही वृषभानुनन्दिनी हैं। उनका रमण उन्हींमें है, फिर व्रजांगनामें कैसे रमण करें? इसका उत्तर यह है कि जहाँ श्रीकृष्णचन्द्रकी आत्माका संचार है, वहीं उनका रमण—इसीलिये व्रजांगनाओंमें पहले श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने आत्माका संचार किया। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दसिन्धुकी माधुर्यसारसर्वस्वभूता अधरसुधा वृषभानुनन्दिनी ही हैं। वेणुगीतद्वारा वे ही भगवद्भोग्या सुधाके रूपमें व्रजांगनाओंके श्रोत्रोंद्वारा उनके अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राण, इन्द्रियों एवं रोम-रोममें परिपूर्ण हो गयीं। अतएव व्रजांगना भी वृषभानुनन्दिनीरूप होकर कृष्णकी आत्मा ही होंगी, अब उनमें रमण भी श्रीकृष्णका आत्मामें ही रमण है। क्या उनमें आत्माका मुलम्मा हुआ? नहीं, उसके केवल संसर्गसे उनमें तन्मयता हो गयी। यदि माधुर्यसारसर्वस्व ऊपर-का-ऊपर ही रहता तो मुलम्मा कहा जाता। यहाँ तो भगवान्ने अपनी अधरसुधाको वेणुके द्वारा उनके हृदयमें भरकर भावनासे परिवर्धितकर सर्वत्र स्वरूपमें भरपूरकर तन्मय कर दिया। सूर्यका प्रतिबिम्ब जलपर पड़ता है, दर्पणपर पड़ता है, काष्ठपर नहीं, दीवारपर नहीं, पर दीवारको यदि जलसे तर कर दें तो दीवारपर भी प्रतिबिम्ब पड़ेगा। आत्माका प्रतिबिम्ब अन्तःकरणपर पड़ता है, घटपर नहीं, पर चक्षुद्वारा जब अन्तःकरण घटाकाराकारित हो, तब घटपर भी पड़ता है, जैसे जलमय दीवारपर सूर्य-प्रतिबिम्ब। इसी तरह जैसा सूर्य-प्रतिबिम्ब मुख्य रूपसे जलपर पड़ता है, दीवारपर जलसंसर्गसे ही पड़ता है, वैसे ही श्रीकृष्णका मुख्य रमण वृषभानुनन्दिनीमें और अन्यत्र वृषभानुनन्दिनीके संसर्गसे होता है। माधुर्यसारसर्वस्व अधरसुधाके संचारसे सर्वत्र संसर्ग होनेके कारण भगवान्का सर्वत्र रमण होता है, सिद्धान्त यह है कि एक पूर्णतम पुरुषोत्तम रसस्वरूप परम तत्त्व अपने-आप ही श्रीकृष्णरूपमें, वृषभानुनन्दिनीके रूपमें प्रकट है, वही व्रजांगनाओंके रूपमें लीलाभूमिके रूपमें भी प्रकट है, पर मोहिनी शक्तिसे सब आवृत रहा, किंतु जिसका जो रूप है, वह व्यक्त हो ही जाता है। व्यक्त अग्निवाले काष्ठके सम्बन्धसे जैसे अव्यक्त अग्निवाले काष्ठमें भी अग्निकी अभिव्यक्ति हो जाती है, उसी तरह व्यक्त आत्मस्वरूपवाली वस्तुके सम्बन्धसे अव्यक्त आत्मस्वरूपवाली वस्तुमें भी आत्माका प्राकट्य हो जाता है। वास्तवमें व्रजांगनाएँ भी रसस्वरूपा हैं; किंतु उनमें माधुर्यस्वरूप अव्यक्त था। उससे जब वृषभानुनन्दिनीके व्यक्त स्वरूपका सम्बन्ध हुआ, तब वह व्यक्त हो गया। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- कन्दकी अधरसुधा व्यक्त माधुर्यसारसर्वस्व है। उसके सम्बन्धसे व्रजांगनामें भी वह व्यक्त हो गया। हम