भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत १०३ तो कहते हैं कि जितना भी विश्व है, वह— ‘आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभि- संविशन्ति।’ (तैत्तिरीय० ३।६) इस सिद्धान्तके अनुसार आनन्दस्वरूप ही है। यह तो जैसे किसीको अमृतसिन्धुमें क्षारसिन्धुकी भ्रान्ति हो, वैसे ही अचिन्त्य, अनन्त, परमानन्दसिन्धुमें भवसिन्धुकी भ्रान्ति होती है—‘आनँद-सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥’ (विनय-पत्रिका १३६।२) ‘आनन्दसिन्धुके बर्फकी तू पुतली है, तेरे भीतर- बाहर सर्वत्र आनन्द भरपूर है।’ इस तरह सबका असली स्वरूप आनन्द ही है, पर वह अव्यक्त है, श्रुति कहती है—‘तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी।’ (तैत्तिरीय० २।१) वस्तुतः काष्ठ, अग्नि भी पृथक्-पृथक् वस्तु नहीं है। आत्मासे ही आकाश, उससे वायु, वायुसे तेज उत्पन्न हुआ। तेजसे ही जल, उससे पृथ्वी, उसीसे काष्ठादि। और यह सिद्धान्त है कि कारणसे भिन्न कार्य नहीं। फिर तो जैसे मिट्टीसे उत्पन्न घट मिट्टीसे पृथक् नहीं, वैसे ही तेजसे उत्पन्न जल तेजसे पृथक् नहीं, जलसे उत्पन्न पृथ्वी और उससे उत्पन्न काष्ठ भी अग्नि या तेजसे भिन्न नहीं। इस तरह काष्ठ, अग्निका भी वास्तविक भेद नहीं रहता। तथापि काष्ठ तेजका आवरक होता है। कार्यसे कारणस्वरूपका आवरण होता ही है एवं सर्व तत्त्वोंकी आनन्दस्वरूपता आवृत है, जहाँ माधुर्यसारसर्वस्व सुमधुर अधरसुधाके वेणुगीतपीयूषका आस्वादन प्राप्त होता है, वहाँ उस व्यक्त आनन्दस्वरूपसे आनन्द व्यक्त होता है, वहीं आत्मरति श्रीकृष्णका रमण भी होता है। यह लचर दलीलकी बात नहीं, शुद्ध भित्तिपर स्थित सिद्धान्त है। अगर कोई समझना चाहता है तो समझ ले। तात्पर्य यह कि श्रीकृष्णका रमण आत्मामें है, अनात्मामें नहीं। भगवान्के गुणगणोंके श्रवणसे अन्तःकरणमें भगवान्का प्राकट्य अभिव्यक्ति कई तरहसे होती है। जिन्हें वंशीगीत सुननेको नहीं मिला, उन जीवोंको ‘प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण स्वानां भावसरोरुहम्’ (श्रीमद्भा० २।८।५)-के अनुसार भगवान्की मंगलमयी कथासुधाके श्रवणसे स्वाभाविक आनन्दरूपता व्यक्त होती है। सर्वत्र इसीलिये श्रवण ही मुख्य कहा है। ‘मद्गुण- श्रुतिमात्रेण’ (श्रीमद्भा० ३।२९।११), ‘द्रुतस्य भगवद्धर्मात् धारावाहिकतां गता’, ‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः’ (बृहदारण्यक० २।४।५)। इत्यादिसे श्रवणका माहात्म्य स्पष्ट है। भगवान्के गुणगणोंके श्रवणसे अन्तःकरणमें भगवान्का प्राकट्य होता है। गुणचरित्र-श्रवणद्वारा भगवान्के स्नेहसे द्रवीभूत चित्तवृत्तिका भगवान्की ओर अखण्ड प्रवाह ही भक्ति है। श्रवणसे भगवान् अवश्य भक्तके हृदयमें व्यक्त होते हैं, परंतु श्रवण भी उसी तरहका हो। उच्चकोटिके परमहंस भावुक अपने हृदयमें भगवत्तत्त्वका अनुभव करते हुए ‘भावना’ से उसका परिवर्धन करते हैं। जैसे कहींका थोड़ा स्रोत बहुत जगहके झरनेसे बड़ा होता है, वैसे जो कोई भावुक पूर्णरूपसे श्रवण, मनन, निदिध्यासनोंसे भगवत्तत्त्वका हृदयमें साक्षात्कार, अवगाहन, चिन्तन किया करते हैं, वहाँ वही रस सर्वत्र अन्तःकरण, प्राण, रोम-रोममें भरपूर होता है। कहीं किसी तरहसे उसका उद्गार कथासुधारूपमें निकला, तब वह प्राकृत कथा नहीं, भगवत्तत्त्व ही उस रूपसे व्यक्त होता है। प्रसिद्ध है कि महर्षि वाल्मीकिका शोक ही श्लोक रूपमें व्यक्त हुआ— ‘शोकः श्लोकत्वमागतः’॥ (वा०रा० १।२।४०) महर्षि अपने शिष्य भरद्वाजको लेकर तमसातीरपर आये। वहाँ क्रौंच-क्रौंची विहार कर रहे थे। इतनेमें किसी व्याधने क्रौंचको बाण मारा। वह मर गया और क्रौंची करुण-विलाप करने लगी। महर्षिका हृदय करुणारससागरसे भरपूर था। आश्रममें जानकीजी पधारी थीं, लोकापवादभयसे श्रीमदरामजीने उन्हें