भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मणद्वारा त्याग दिया था। जब लक्ष्मणको रथपर विह्वल देखा तो जनकनन्दिनीने पूछा—लक्ष्मण! आपकी यह दशा किसलिये ? इसपर लक्ष्मणने जो कहा, उसे सुनकर जनकनन्दिनी मूर्च्छित हो गयीं। उन्हें वहीं छोड़कर लक्ष्मण अयोध्या चले गये। वाल्मीकिने शिष्योंद्वारा सुनकर जनकनन्दिनीसे वृत्तान्त पूछा। अनन्तर उनका सान्त्वनकर ऋषिपत्नियोंके संरक्षणमें उन्हें रखा। वहाँ यथाकाल उनके दो पुत्र हुए। रामवियोगमें जनकनन्दिनीके क्रन्दनसे जो अद्भुत कारुण्यरससागर हृदयमें लहरा रहा था, वही क्रौंची- विलापसे उमड़ पड़ा। मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥ (वा०रा० १।२।१५) यह बुद्धिपूर्वक लिखा गया श्लोक नहीं, शोक ही श्लोक बन गया है। कोई भी कोई बात समझके साथ कहे, वह उद्गार नहीं। रसमें उफान आ जाता है। वह उच्छलित हो उठता है। संकुचित दिव्यपात्रमें भरपूर रस वायुके हलचलसे या किसी अन्य कारणसे उच्छलित हो उठे, वह उद्गार है। इसीसे भावुक श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मंगलमय, परम पवित्र चरित्रका हृदयमें अवगाहन करते हैं, वहीं कहीं प्रश्नवशात् लीलासुधारससार परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान् जब निकलते हैं तो कथासुधारूपमें। यही व्यक्त अग्नि है। भावुकोंके मुखपंकजसे विनिःसृत श्रीकृष्ण-कथासुधा श्रोत्रोंद्वारा भक्तहृदयमें गयी तो वहाँ भी कृष्णस्वरूप व्यक्त हो उठता है। 'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यम्' (गीता १३।१७)-के अनुसार वैसे तो सब भगवान् हैं ही, पर अव्यक्त रहते हैं। जिसको वे व्यक्त हैं, उसके मुखपद्मसे कथासुधारूपमें जहाँ गये, वहाँपर भी व्यक्त हो जाते हैं। बस फिर जहाँ ही श्रीकृष्णकी आत्मा व्यक्त होती है, वहीं आत्माराम श्रीकृष्णका रमण होता है। श्रीकृष्णके रमणके पश्चात् भावुकोंका भी कृष्णमें रमण होता है। तात्पर्य यही कि आनन्दस्वरूप कृष्णसे सारा विश्व ही उत्पन्न है। अतः सभी कृष्णकी आत्मा हैं। किसी तरह भी जहाँ अव्यक्त आत्मा व्यक्त हुई, वहीं कृष्णका रमण होता है। विशेषतः व्रजांगनाओंको तो परम्परासे नहीं, साक्षात् श्रीकृष्णके ही मुखचन्द्रकी अधरसुधारूप श्रीकृष्णकी आत्मरूपा वृषभानुनन्दिनी श्रीवेणुगीतरूपमें प्राप्त हुई, अतः उनकी अव्यक्त रसरूपता-आत्मरूपता सुतरां व्यक्त हो उठी। अतः सब व्रजांगनाएँ वृषभानुनन्दिनी- स्वरूपा हो गयीं और श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके अधरमें रहनेवाली अधरसुधा व्रजांगनाओंके अधरमें आयी। उसका सम्भोग श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दने किया, अतः वह भगवद्भोग्या सुधा है। अब व्रजांगनाओंका रमण श्रीकृष्णमें होगा। 'छान्दोग्योपनिषद्' में कहा कि जीवात्मा नाना प्रकारके कर्मोंको करके चान्द्रमस लोकमें चन्द्रस्वरूप धारण करते हैं और वे चन्द्रभावापन्न होकर देवताओंके अन्न—भोग्य हो जाते हैं। तो कर्म क्या देवताओंके खानेकी सामग्री होनेके लिये किया जाता है ? नहीं, यहाँ अन्नका अर्थ सम्भोगसाधन है। जैसे राजाओंकी सभाके सभ्य (सदस्य) राजाके मनबहलावके लिये होनेके कारण उनके उपकरण समझे जाते हैं, वैसे ही जीव भी इन्द्रसभाके सभ्य होकर उनकी आनन्द- सामग्री होंगे। यही उनकी भोग्यता है। इस रीतिसे समस्त जीवजगत् परमात्माका आराधनकर उनका यश-विस्तीर्ण करता है, इसलिये वह परमात्माका भोग्य है। भगवान् तो वास्तवमें आप्तकाम, आत्माराम हैं, फिर भी भक्तोंके लिये स्वरूप धारण करते हैं। भक्तोंके मनमें भी वैसी ही उत्कण्ठा रहती है। वे भगवान्के पीताम्बर, भगवान्के चन्दन, भगवान्के मस्तकपर विराजित मुकुट-किरीट, भगवान्के श्रीअंगपर शोभायमान गुंजा, श्रीकण्ठमें वैजयन्ती, वन्यस्तबक- पुष्पमयी माला होकर उनकी सेवा करना चाहते हैं। इन्द्रादिक निष्काम नहीं हैं। भगवान् निष्काम हैं। केवल लोगोंके लिये वे सकाम हो जाते हैं। इस तरह जीवोंका भगवद्भोगसाधन बनना जीवोंकी भोग्यता है।