भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसी तरह भगवान् भी जीवके भोग्य हो जाते हैं, यह बात अलग है। यह समझो कि इन सब सामग्रीसे— भगवद्भोग्या अधरसुधाके संचारसे—भगवदात्मभूता माधुर्यसारसर्वस्व श्रीवृषभानुनन्दिनीका संचार होगा, तब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका रमण होगा। पहले जीवमें भगवान्का भोग्यत्व होकर उसमें भगवान्का रमण होता है, फिर भगवान् जीवके भोग्य होते हैं और उनमें जीवका रमण होता है। प्रथम श्रीकृष्णका व्रजांगनामें रमण, फिर व्रजांगनाका श्रीकृष्णमें रमण। भोग्य परतन्त्र होता है, भोक्ता स्वतन्त्र। व्रजांगनाओंमें— जीवोंमें पारतन्त्र्य, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें स्वातन्त्र्य। स्वाधीन (कृष्णाधीन) जो जीव—व्रजांगनाएँ हैं, उनमें श्रीकृष्ण रमण करेंगे। जहाँ जीवात्मा— व्रजांगनाएँ भगवान्में रमण करते हैं, वहाँ जीवात्मा— व्रजांगनाएँ भोक्ता और भगवान् भोग्य, व्रजांगनामें स्वातन्त्र्य और श्रीकृष्णमें पारतन्त्र्य, यह उलटा होगा। मगर बात यह बहुत ऊँची है। यह दार्शनिक दृष्टि है। भगवान् पूर्ण स्वतन्त्र भक्त पूर्ण परतन्त्र यहाँ शृंगाररसका प्राधान्य है। सम्प्रयोग विप्रयोगात्मक शृंगाररसात्माकी यह लीला है। शृंगाररसमें यह स्थिति रहती है कि नायिका भोग्या होती है और नायक भोक्ता। इसको साधारणी स्थिति कहते हैं। असाधारणी स्थितिमें नायक नायिकाभावापन्न तथा नायिका नायकभावापन्न हो जाती हैं। लौकिक शृंगारमें तो सब आरोप-ही-आरोप हैं, तत्त्वतः कुछ नहीं। रसोद्रेकमें एक प्रकारका अभिमान हो जाता है। उस स्थितिमें विपरीत रति होती है, किंतु यहाँ केवल अभिमान ही नहीं, वस्तुतः नायक नायिकाभावापन्न तथा नायिका नायकभावापन्न हुई हैं। स्वातन्त्र्य ही पुंस्त्व है और पारतन्त्र्य ही स्त्रीत्व। पुमान् एक पूर्णतम पुरुषोत्तम ही हैं। निरंकुशता, पूर्ण स्वातन्त्र्य केवल उन्हींमें है। तद्व्यतिरिक्त जीवोंमें आधिपारतन्त्र्य, व्याधिपारतन्त्र्य, जरापारतन्त्र्य, मरणपारतन्त्र्य—अनेकविध पारतन्त्र्य—बन्धन हैं। जितने-जितने अंशमें पारतन्त्र्य मिटता गया, उतने अंशमें स्त्रीत्व भी मिटा। जितने- जितने अंशमें स्वातन्त्र्यका उदय हुआ, उतने-उतने अंशमें पुंस्त्वका भी उदय हुआ। अविद्या, कामकर्मादि जरादि, किसी प्रकारका भी पारत