भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

१०६ भक्तिसुधा कहा कि हम भक्तद्रोहीका रक्षण नहीं कर सकते। आगे ब्रह्मा, शिवका भी यही जवाब हुआ। आखिर दुर्वासा श्रीभगवान् महाविष्णुके पास गये। तब भगवान् कहते हैं कि आपका रक्षण करना तो ठीक ही है, पर क्या करूँ? मैं स्वतन्त्र नहीं। स्वतन्त्र अगर होता तो अवश्यमेव आपका रक्षण करता। मैं भक्तपरतन्त्र हूँ। कारण, मेरा व्रत है कि—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) हमारे भक्त इतने तन्मय हो जाते हैं कि वे मुझसे अतिरिक्त कुछ जानते ही नहीं। तब फिर मैं भी उनसे अतिरिक्त क्या जानूँ?' इसीको लेकर यह आया कि पहले भक्तमें अत्यन्त परतन्त्र्य, भगवान्‌में स्वातन्त्र्य; पीछे 'ये यथा' के अनुसार भक्तमें स्वातन्त्र्य और भगवान्‌में परतन्त्र्य होता है। 'ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभर छाछ पै नाच नचावैं॥' बड़े-बड़े देवाधिदेव जिनका ध्यान करते हैं, 'भीरपि यद्विभेति', उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके दोनों श्रीहस्त अपने एक हाथमें पकड़कर नन्दरानी एक हाथसे छड़ी दिखायें और भगवान् भी उस छड़ीसे डरें, यही परतन्त्र्य है। इससे स्पष्ट है कि पहले भगवान्‌में स्वातन्त्र्य, फिर भक्तमें स्वातन्त्र्य; पहले भगवत्सम्मिलनके लिये भक्त लालायित, फिर भक्तसम्मिलनके लिये भगवान् लालायित। परमभक्त मधुसूदन सरस्वतीने वृन्दावनमें जाकर भगवत्साक्षात्कारके लिये 'गोपालसहस्रनाम' के चार पुरश्चरण किये, पर उनको साक्षात्कार न हुआ, फिर काशीमें आये और यहाँपर श्रीकालभैरवका अनुष्ठान किया। उस अनुष्ठानपर श्रीभैरव प्रसन्न हुए। कहा—वर माँगो। इसपर मधुसूदन सरस्वतीने कृष्णसाक्षात्कार ही माँगा। भैरव कहते हैं कि वृन्दावन जाओ और वहाँ 'गोपालसहस्रनाम' का पुरश्चरण करो। मधुसूदन कहते हैं कि मैंने तो वहाँपर चार पुरश्चरण किये, पर साक्षात्कार नहीं हुआ। इसपर श्रीकालभैरवने पापोंके चार पहाड़ दिखलाये और कहा कि उन पुरश्चरणोंसे ये नष्ट हुए, अबकी बार साक्षात्कार होगा। मधुसूदन सरस्वती पुनः वृन्दावन गये, 'गोपालसहस्रनाम' का अनुष्ठान किया और तब भगवान्‌का प्राकट्य हुआ। जब श्रीश्यामसुन्दर सामने आकर खड़े हुए तो मधुसूदन सरस्वतीने चट अपना मुँह फेर लिया। जिधर-जिधर श्यामसुन्दर जाकर खड़े हों, उधर-उधरसे मधुसूदन अपना मुँह फेर लें। आखिर श्रीकृष्णचन्द्रने ही उन्हें मनाना शुरू किया। कहाँ यह स्थिति कि वह श्रीकृष्णके लिये लालायित और कहाँ यह कि अब श्रीकृष्ण ही उन्हें मनाते हैं। महास्वातन्त्र्यके पूर्व परतन्त्र्य अपेक्षित है। अगर स्वतन्त्रता चाहते हो तो उसका कुछ त्याग भी करो। हम वेद, शास्त्र, माता, पिता, धर्म-कर्मोंसे भी स्वतन्त्रता चाहते हैं, पर यह स्वतन्त्रता तो परतन्त्रताके घोर गर्तमें गिरानेवाली है। बालक माता, पिता, अध्यापकोंके परतन्त्र न हों तो वे उच्छृंखल होंगे। फिर जन्म-जन्मके लिये घोर अनर्थमय कंटकाकीर्ण गर्तमें पड़ेंगे। कोई भी राष्ट्र स्वतन्त्रतारक्षाके लिये सैनिक-संगठन करना चाहे तो वह सेनापतिके अत्यन्त परतन्त्र हो। अगर सेना उसकी आज्ञाका उल्लंघन करे तो विजय, स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो सकती। अतः परम सिद्धान्त यह है कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भक्तके परतन्त्र होते हैं। जिनके भृकुटिविलाससे सबको नचानेवाली माया जिनके सामने नाचे, वे स्वयं नाचते हैं—'तद्वशो दारुयन्त्रवत्।' (श्रीमद्भा० १०।११।७) परमानन्दमूर्ति श्रीकृष्ण कठपुतलीके समान व्रजांगनाओंके परतन्त्र हो गये। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता १८।६१) सर्वभूतोंके हृदयमें स्थित होकर भगवान् काठकी पुतलीके समान सबको नचाते हैं और वे ही फिर प्रेम-परतन्त्र होकर भक्तोंके खिलौने बन जाते हैं। भक्तमें भगवद्भावापत्ति, भगवान्‌में भक्तभावापत्ति— इसीका नाम परस्परभावापन्नता है। यह रसोद्रेक, आनन्दोद्रेकमें होता है। अतएव श्रीकृष्णमें