भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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व्रजांगनाभावापत्ति और व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णभावापत्ति कही गयी। वृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्ण हो गयीं और श्रीकृष्ण वृषभानुनन्दिनी हो गये—यह भावनाकी महिमा है। औरोंकी भावना अभिनिवेश, अभिमान अदृढ़ और भगवान्‌का तथा वृषभानुनन्दिनीका अभिमान सुदृढ़ है। जब रसोद्रेकमें विपरीत रतिका संचार हुआ, वृषभानुनन्दिनीका श्रीकृष्णमें अभिमानपुरःसर प्रवेश हुआ, तब वृषभानुनन्दिनीमें भी श्रीकृष्णका अभिमान- पुरःसर प्रवेश हुआ। इसीलिये कहा जाता है कि— 'शिवस्य हृदयं विष्णुः विष्णोश्च हृदयं शिवः।' दोनों परस्पर अन्तरात्मा हैं। शिव संहारक और विष्णु पालक देवता हैं। संहारमें तमोगुणप्राधान्य और पालनमें सत्त्वगुणप्राधान्य होता है। सत्त्व स्वच्छ, शुभ्र प्रकाशात्मक तथा तम आवरणात्मक, काला है। अतः शंकरको कृष्ण होना चाहिये और विष्णुको शुक्ल, पर यहाँ तो सब उलटा ही है। क्यों? परस्पर सुदृढ़ उपास्योपासकभावसे परस्परका रंग परस्परमें आया। कारण—'सेवक स्वामि सखा सिय पी के।' (रा०च०मा० १।१५।४) शिव भगवान्‌के सेवक भी, स्वामी भी, सखा भी, अतः स्वच्छ, सत्त्वमय विष्णुकी भावनाकी महिमासे शिव शुक्ल हो गये, भावनाकी ही महिमासे विष्णु श्यामल हो गये। ऐसे ही देखें तो संकीर्णताको अवकाश नहीं। कहीं-कहीं तो ऐसा भी लिखा है कि श्रीशंकर ही श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं; क्योंकि दोनों परस्पर अन्तरात्मा ही हैं न ! जैसे रुद्ररूपा वंशी मानी गयी, वैसे ही कहीं श्रीकृष्णको कालका अवतार माना है। प्रकृतमें यह आया कि साधारण शृंगारमें भावना अभिमानमात्र है। यहाँ तो स्वरूपपरिवर्तन भी है। यहाँ वृन्दावन्य, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द, वृषभानुनन्दिनी, व्रजांगनाएँ, एतत् समवेत मंगलमयी लीलाभूमि उस अचिन्त्य, अनन्त, अद्भुत, प्रेमानन्दरससिन्धुमें क्षण-क्षण आविर्भूत- तिरोभूत होते रहते हैं, उन्मज्जन-निमज्जन करते रहते हैं। उस स्थितिमें कभी श्रीकृष्ण वृषभानुनन्दिनीके रूपमें, कभी वृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्णके रूपमें प्रकट होती हैं। यही कहा 'उभयोभयभावात्मा।' आया यह कि साधारण नायकमें उत्कट रस ही व्यक्त नहीं हो सकता, पर निखिलरसामृतमूर्ति उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्ण तो रसस्वरूप ही हैं। इनके सम्पर्कसे इतना उत्कट, अद्भुत, अनन्तरस उद्भूत हो गया कि परस्पर भावापत्ति हो गयी। यह श्रीकृष्ण पूर्णतम, पुरुषोत्तम स्वयं भोक्ता ही हैं, भोग्य नहीं, व्रजांगना स्वयं स्त्री, भोग्या। अतएव उनके भोक्ता श्रीकृष्ण भोग्य नहीं हो सकते। उनके ही क्या, दूसरे पुरुषोंके भी भोग्य वे नहीं हो सकते। पुरुष पुरुषोंके भोग्य नहीं होते। पारतन्त्र्य लक्षण स्त्रीत्व ही सबमें हैं, अतः सब भोग्य ही हैं। तो क्या स्वयं श्रीकृष्ण ही अपना भोग करें? नहीं। यह इस रीतिके विरुद्ध है। अब अधरपल्लवकी सर्वाभोग्या सुधा किसकी भोग्या ? देवभोग्या खग, मृग, पशु, तरु, लता, गुल्मादिकोंको, भगवद्भोग्या श्रोत्रद्वारा व्रजांगनाओंको, अब सर्वाभोग्याका भोक्ता कौन ? यह तब भोग्य हो कि जब भगवान् भोग्य हों। यह कैसे हो ? उनका भोक्ता तो कोई भी नहीं हो सकता। इसलिये कहा कि जब भगवद्भोग्या अधरसुधा व्रजांगनाओंमें सर्वत्र भरपूर हुई और व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णका रमण हुआ, उन्होंने उस भगवद्भोग्या अधरसुधाका संभोग किया, तब लोकोत्तररसोद्रेकसे व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णभावापत्ति और श्रीकृष्णमें व्रजांगनाभावापत्ति हुई। उस समय श्रीकृष्ण भोग्य हुए। इसलिये सर्वाभोग्या अधरसुधाका भोग व्रजांगनाओंको प्राप्त हुआ। सारांश यह कि साधारण स्थितिमें जो अधरसुधा किसीको भोग्य नहीं, वह सर्वाभोग्या है। जहाँ श्रीकृष्णने रमण किया, वहाँ विपरीत भावापत्ति हुई। भक्तोंमें इसके अनेक उदाहरण हैं। 'विष्णुपुराण' में प्रह्लादका प्रसंग बड़ा ही सुन्दर वर्णित है। प्रह्लादके अंगमें शिला बाँधकर उसे समुद्रमें फेंक दिया गया। जितनी उसको अधिक यातना हुई, उतनी उसकी विष्णुप्रीति अधिक बढ़ी। यहाँ तो कुछ विघ्नबाधा हुई कि कहते हैं—भजन हमारे कुलमें सहता नहीं।