भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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एकादशीको अगर कोई मरा तो कहते हैं कि एकादशी हड़ही है। कनक जैसे-जैसे दग्ध किया जाता है, वैसे-वैसे उसका मूल्य बढ़ता है, वह चमकता है, निखरता है। वैसे ही भक्त अधिकाधिक निखरता है। अतएव भक्तोंको कष्ट, विपत्तियाँ आती हैं, पर वे धैर्यपुरःसर आगे ही बढ़ते हैं। पहली स्थिति यह कि 'भूतानि विष्णुः', सर्व विष्णुमय है। फिर 'अहं विष्णुः' की भावनाका दार्ढ्य सम्पादित होता है। तब प्रह्लादका पैर जिस क्षण समुद्रमें पड़ता, आसमुद्र भूमण्डल डगमग करने लगता। यह भावना- महिमासे विष्णुभावापत्ति है। इसी तरह छान्दोग्यमें 'भूमैवाधस्तात्' इत्यादिसे सर्वत्र सर्व दिशाओंमें भूमा पूर्णतम पुरुषोत्तमको बतलाकर 'अहमेव सर्वतः' ऐसा बतलाया है। श्रीवल्लभाचार्य भी इसे मानते हैं, पर कहते हैं कि यह संचारी भाव है। कुछ देरके लिये प्रेमोन्मादमें आता है। रासपंचाध्यायीमें व्रजांगना कहती हैं—'कृष्णोऽहं पश्यत गतिम्।' (श्रीमद्भा० १०।३०।१९) सखि ! मैं श्यामसुन्दर ही हूँ। उधर वृषभानुनन्दिनीकी स्थिति—'मधुरिपुरहमिति भावन- शीला।' सखी कृष्णसे सन्देश कहती है कि आपकी प्रियतमा आपकी प्रतीक्षा करती-करती 'श्रीकृष्ण हम ही हैं', यह भावना करती है। प्रेम और ज्ञानका अन्तिम भाव एक ही है। श्रीकृष्णने—मक्खन चुरानेवाले लालाने 'दासोऽहम्', 'दासोऽहम्' का जप करनेवाले, भावना करनेवाले, भक्तोंका 'दा' चुरा लिया। बच गया 'सोऽहम्', यह प्रेममार्गसे वेदान्तमार्ग अलग है। शृंगाररसमें नायक-नायिका परस्परभावापन्न होते हैं। वैसे ही श्रीकृष्ण और व्रजांगना वृषभानुनन्दिनीमें परस्पराभावापत्ति हो गयी। अतः जो किसीके भोग्य नहीं, उनके भोग्य हो जानेके कारण उस सर्वाभोग्या अधरसुधाकी प्राप्ति व्रजांगनाओंको हुई। भगवद्धाम वृन्दावनकी अद्भुत शोभा 'वृन्दारण्यं स्वपदरमणम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।५)—वृन्दारण्य कैसा? 'स्वपदरमणम्।' 'स्वपदं वैकुण्ठधाम तस्मादपि रमणम्। किंवा स्वपदेन (स्वस्य पदमधिष्ठानं) रमणम्।' वैकुण्ठ दो प्रकारके—१. भौमवैकुण्ठ, २. परमवैकुण्ठ। वृन्दारण्य भौमवैकुण्ठ है। वह परमवैकुण्ठसे भी रमण है। वैकुण्ठवासी यहाँ आये तो वह भी यहाँ आया। जहाँ भगवान् जाते हैं, वहाँ उनका धाम भी पधारता है। इसी अभिप्रायसे सुमित्रा लक्ष्मणलालसे कहती हैं— 'अयोध्यामटवीं विद्धि।' गोस्वामीजी कहते हैं— 'अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥' (रा०च०मा० २।७४।३) इससे यह बात निकलती है कि जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ वैकुण्ठ। भावुकोंका हृदय भी वैकुण्ठ है। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका वृन्दारण्य कहाँ? व्रजांगनाओंके हृदयमें। वहाँ जो प्रेमसुधातरंगिणी बही एवं यमुना, उनके उन्नत विशाल वक्षोज गोवर्धनादि पर्वत, रोमपंक्ति वन—इसी तरह सर्वभावोंका सम्पादन होता है। सजातीय-विजातीय-भेदरहित श्रीकृष्ण परब्रह्मका प्राकट्य कहाँ? महावाक्यजन्य परब्रह्मा- काराकारित मानसिक वृत्तिपर। जैसे सूर्यकान्तपर अग्निरूपमें सूर्यका प्राकट्य होता है, वैसे निर्वृत्तिक अन्तःकरणकी जो परब्रह्माकाराकारित वृत्ति है, उसीपर ब्रह्मका प्राकट्य होता है। भक्तहृदय कैसा? अति निर्मल, स्निग्ध, पवित्र, भगवदाकाराकारितवृत्तिमान्। भूमिसे लेकर क्रमशः सर्वोपरि अव्यक्त और उसके ऊपर भगवान्। यही अव्यक्त शेष है। 'शिष्यते यः स शेषः', कार्योंके कारणोंमें लय होनेके बाद कारण ही शेष रहता है। वह अव्यक्त मायावच्छिन्न चैतन्य महाकारण सहस्रफणायुक्त है। उसीपर श्रीमन्नारायण शयन करते हैं। वही महाकारणातीत, कार्यकारणातीत परब्रह्म है। भागवतमें कहा है—'अव्याकृत- मनन्ताख्यम्' (१२।११।१३) वही प्रकृतिविशिष्ट चैतन्य अनन्त भगवदधिष्ठान आसन है। भगवदाकारा- कारित, स्वच्छ, स्निग्ध मनोवृत्तिपर सगुण, साकार ब्रह्मका प्राकट्य है। जहाँ भगवान् हैं, वहाँ इसको जाना पड़ेगा, क्योंकि उसके बिना रामका प्राकट्य नहीं होगा। अतएव भक्तहृदय ही अवध और भक्तहृदय