भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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वेणुगीत १०९ ही वृन्दारण्य। उसके सब जगह प्रकट करनेमें कठिनाई है, मेहनत है। पर वह है व्यापक। जैसे नेत्र जिसे कहते हैं वह नेत्रगोलक और उसके भीतर अतीन्द्रिय इन्द्रिय है, वैसे वृन्दारण्य गोलक और उसमें मुख्य वृन्दारण्य। वहाँ लौकिकताका भान दोषवश होता है। भगवान् तो अपने-आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। वह शेष केवल अव्यक्त जडांश नहीं, किंतु अव्यक्तांशपर चेतनांश होता है। वृन्दारण्यादि सर्व अद्भुत, अनन्त, परमानन्दसिन्धुमेंसे ही विकसित हैं। उसमें भी उसके भी ऊपर भगवत्स्वरूप वृन्दावन अलग है। वृन्दारण्य अव्यक्त रूप है। उसमें रसरूप वृन्दारण्य है और स्वस्वरूपभूत वृन्दारण्यमें ही भगवान्‌का रमण हुआ। ‘स्वपदरमणं, स्वपदादपि रमणम्'—वैकुण्ठसे भी रमण। व्रजांगना कहती हैं— 'जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१) हे श्यामसुन्दर, आपके मंगलमय जन्मसे व्रज अत्यन्त सुशोभित हो उठा। 'वैकुण्ठात् सर्वस्मादपि लोकात् अधिकं जयति।' कैसे? लक्ष्मी वृन्दावनमें सदा सेवा करती है, वैकुण्ठमें सेव्या है। व्रजमें लक्ष्मी श्रीजीके चरणारविन्दरजके स्पर्शके लिये लालायित हैं। 'यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपः।' (श्रीमद्भा० १०।१६।३६) यमुनाघाट बिल्ववनमें लक्ष्मी तपस्या करती है। इस प्रकार वह यहाँपर सेविका है। ऐसे 'स्वपदभ्यां रमणम्।' जहाँपर श्रीचरणारविन्द पाषाणोंपर अंकित हैं। पाषाणपर खड़े होकर किये वंशीनिनादसे वह कोमल हो जानेसे भगवत्पद वहाँपर अंकित हो उठा। ऐसे वृन्दारण्यमें भगवान् पधारे। वृन्दारण्य स्वयं सुशोभित है ही, पर प्रभुके श्रीचरणारविन्दोंसे अंकित होनेके कारण वह अधिक सुशोभित हुआ। अथवा 'स्वपदं रमणं रतिजनकं यस्य तत्' भगवान्‌के श्रीचरणारविन्दोंसे रमण, रति, आनन्द प्राप्त होता है जिसको, ऐसा वृन्दावन। अर्थात् प्रभुके श्रीचरणोंके स्पर्शमें वृन्दारण्यको अद्भुत, लोकोत्तर आनन्द प्राप्त होता है। भगवान्‌का चरण ही आनन्दमय मंगलमय है। इसलिये जिसको भी स्पर्श हो, उसीको आनन्द होगा ही, पर विशेषरूपसे जो सरस हैं, उनको अधिकाधिक आनन्द होता है। अतः वृन्दारण्यको अधिक आनन्द-रमण हुआ। वृन्दारण्य सरस है, आर्द्र है। तभी भगवान्‌के श्रीपद वहाँ अंकित होते हैं। यदि बहुत-सा श्रवण भी कर लिया, पर हृदय आर्द्र-सरस न हो तो प्रभुके पद अंकित नहीं हो सकते। कठोर लाक्षापर अंक सुस्थिर नहीं होता। अग्निके सम्बन्धसे लाख द्रुत होनेपर अंक (मुहर) वहाँ सुस्थिर होगा। इसी रीतिसे हृदय यदि आर्द्र है, तभी भगवान्‌के मंगलमय चरण अंकित होंगे। कठोर हृदयमें जब कभी प्रसंगवश अभिव्यक्त होनेपर भी सुस्थिर अंकित न हो सकेंगे। प्रसंगवश खल भी उत्तमोत्तम वार्तालाप प्रसंगमें रहते हैं, मगर वे उसमें स्थिर नहीं होते। वहाँ मालूम होनेवाला रस रसाभास है। अतएव हृदय द्रुत करनेका प्रयत्न करें तो प्रभुमें स्थायी रति हो। इसलिये वृन्दारण्य द्रुत होनेसे वहाँ श्रीचरण अंकित होते हैं और उसको रमण-आनन्द-रति प्राप्त होती है। यह तो वृन्दारण्यका अद्भुत भाग्य है कि वहाँ भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके निरावरण चरण हैं। यह भाग्य आजतक किसीको प्राप्त नहीं हुआ। द्वारकामें भगवान्‌का निवास था, वहाँ वे थे राजाधिराज। राजाधिराजके निरावरण चरणोंका स्पर्श भूमिको कैसे हो सकता है? तभी तो मथुराको भी मथुरानाथके चरणोंका स्पर्श नहीं। उसे यह सौभाग्य ही नहीं है। यह वृन्दारण्यको ही सौभाग्य है; क्योंकि यहाँपर गोचारणरूप स्वधर्मपालनार्थ प्रभु निरावरण चरण ही पधारे। भगवान्‌के चरणस्पर्शसे वृन्दावनकी भूमि सौभाग्यशालिनी हो गयी 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में कथा है कि एक बार श्रीकृष्णचन्द्र गोचारणार्थ वन जानेको मचल पड़े। प्रभुने कहा—'मैया, मैं तो गोचारणके लिये जाऊँगा।