भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 120

११० भक्तिसुधा माता नन्दरानी यशोदा और बाबा नन्दराय तो अपने प्रभु कहते—'नहीं, गौ हमारी इष्टदेवी हैं। यदि ललनको एक क्षणके लिये भी अपनेसे वियुक्त होने निरावरण चरणसे ये जायेंगी तो हम कैसे पादत्राण देना नहीं चाहते थे। फणीको जैसे मणिसे लोकोत्तर धारण करें ? पशुपालन ही हमारा इष्टदेवताराधन है।' अनुराग होता है, वैसे नन्दराजको। हमारे ललन आराधनमें यही प्रकार होता है। दिलीप भी जब गोचारणके लिये जायँ, यह वियोग कैसे सहन हो ? नन्दिनीके साथ उसकी सेवा करने वनमें गये, तब इसी रात्रिमें जब व्रजगेहिनी अपने ललनको अंकमें लेकर तरह-से गये। सोती तो बीच-बीचमें जागती, बार-बार अपने ललनको स्थितः स्थितामुच्चलितः प्रयातां स्पर्श करती। जैसे किसी महारंकको चिन्तामणि मिले निषेदुषीमासनबन्धधीरः । और वह उसे बार-बार सम्हाले, वैसे ही व्रजेन्द्रगेहिनीका जलाभिलाषी जलमाददानां प्रभुमें अद्भुत अनुराग था, जिससे वह बार-बार चुम्बन छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् ॥ करती, मस्तक सूँघती। वही श्रीकृष्ण गोवत्सचारणके (रघुवंश २।६) लिये जानेको मचले। फिर तो यह श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने तो धर्मसंस्थापनार्थ नटखटकी मचल। मैया कहती—'न जाओ लाला!' अवतार लिया है—'यदा यदा हि धर्मस्य' (गीता लाला कहते—'नहीं मैया, मैं तो जाऊँगा। यह ४।७) ऐसा भगवान्‌का ही वचन है। स्वयं आचरणद्वारा गोचारणरूप अपना स्वधर्म है। उसका पालन करना धर्म स्थित होता है। इसीलिये गोचारणद्वारा स्वधर्म- ही चाहिये।' आखिर जब श्यामसुन्दर न माने तो स्थापन किया। भगवान् गौओंकी खूब सेवा करते हुए कहा—'अच्छा लाला, ठीक मुहूर्त मिले तो जाना। मैं चलते हैं। इसीलिये निरावरण-चरण चले। अतएव गर्गमहाराजसे पूछूँगी।' भगवान्‌की इच्छा होनेपर क्या वृन्दारण्यको साक्षात् चरणस्पर्श हुआ, इतरोंको परम्परया। देर! उसी समय श्रीगर्गाचार्यजी आ गये। प्रभुको देख, अन्य किसी धामको भी कृष्णके निरावरण चरणोंका पूछा—'आज क्यों लाला मचला हुआ है?' नन्दरानीने स्पर्श नहीं हुआ। इसीलिये जो अन्यत्र सेव्या श्रीलक्ष्मी, कहा—'महाराज! लाला कहता है, मैं गोचारणके वह भी यहाँपर सेविका होकर रहती है एवं चरणसम्बद्ध लिये वृन्दावन जाऊँगा, सो आप मुहूर्त बताओ।' वृन्दावनके सम्बन्धसे ही समस्त भूमिने अपनेको गर्गाचार्यने भी पत्रा देखकर बतलाया—'ठीक तो है। सौभाग्यशालिनी समझा। इसलिये कि प्रभु हमारेमें ही यह गोपाष्टमी बड़ा अच्छा दिन है। उसी दिन मुहूर्त हैं, भूमि गर्वीली हो गयी। करो।' गर्गाचार्यका वचन सुनकर श्रीकृष्णचन्द्र परम ब्रजांगनाओंने भूमिको देखकर पूछा कि 'हे प्रसन्न हुए। गोपाष्टमी आयी। उस दिन विधि- धरित्री, तुमने कौन-सा तप किया कि श्रीकृष्णचन्द्र विधानपूर्वक गोपूजन हुआ। अम्बाने श्रीकृष्णसे गौओंको परमानन्दकन्दके निरावरण चरणोंका तुम्हें स्पर्श हुआ!' साष्टांग प्रणाम कराया। प्रभु अपने अम्बा, बाबाको किं ते तपः क्षिति कृतं बत केशवाङ्घ्रि- प्रणामकर वृन्दारण्य पधारने निकले। अब अम्बा बार- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । बार गोपालोंको समझाती, कहती कि 'देखो, हमारे अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा लालाकी रक्षा करना; उसे अकेले कहीं न जाने देना।' आहो वराहवपुषः परिम्भणेन ॥ श्रीकृष्णका श्रीहस्तारविन्द गोपालोंके हाथमें देती। हे सखि धरित्रि! कौन योग, कौन-सी आराधना इस तरह कहते-कहते मैया-बाबा साथ-साथ चलते तुमने की, जिससे तुम्हें श्यामसुन्दर केशवके श्रीचरणोंका हैं, यह देख श्यामसुन्दर कहते हैं—'मैया, जाऊँगा स्पर्श हुआ ? बताओ तो हम भी वही करें। यदि मैया।' बाबाने कहा—'लाला पादत्राण तो पहनो!' तुम्हारी तपस्या जान लें तो युग-युगमें वही करें कि