भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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कल्पकल्पान्तरमें कभी-न-कभी वह चरण हमें प्राप्त हो। धरित्रीने पूछा—तुमने हमारे इस सौभाग्यकी कल्पना कैसे की? व्रजांगनाने कहा—श्रीश्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनके श्रीचरणारविन्दके स्पर्शसे होनेवाला उत्सव हम देख रही हैं। आनन्दोद्रेकसे आह्लादमें रोमांच होता है। कार्यसे ही कारणका अनुमान किया जाता है। यह चरणस्पर्शका ही फल है कि तुम्हारे रोएँ खड़े हो रहे हैं। भूमिपर जो वृक्ष, लता, तरु, गुल्म, औषधियाँ, दूर्वाएँ हैं, वही रोमांच है। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दके चरणसंस्पर्शसे ही ऐसा आनन्द हो सकता है। धरित्रीने कहा—यह रोमांचरूप लतादि क्या आजहीके हैं? नहीं, ये तो कितने ही दिनोंके हैं। व्रजांगनाओंने कहा—अबके नहीं; न सही। जब भगवान् वामनने अपने चरणोंसे तीनों लोकको नापा था, उस समय उन मंगलमय चरणारविन्दोंके स्पर्शसे यह रोमावली उद्गत हुई होगी। आखिर कारण क्या? कुछ भी कहो, उनके चरणस्पर्शके बिना यह रोमांच नहीं हो सकता। ऐसा आह्लाद अन्यत्र कहीं नहीं होता। धरित्रीने फिर कहा—नहीं, ये और पहलेके हैं। क्या वामनावतारके पहले वृक्ष- लतादि रोमांचित नहीं थे? व्रजांगनाओंने कहा— 'आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) सखि, तबके भले हो-न-हों, पर जब हमारे प्रियतम प्राणधनने वराहावतार लेकर रसातलसे तुम्हारा उद्धार करते समय परिरम्भण किया, उस समयसे यह रोमावली होगी। यह रोमोद्गम ब्राह्मीरस-संस्पर्शसे ही हो सकता है। इसलिये अब नहीं तो वामनावतारमें, तब नहीं तो वाराहावतारमें ही सही। सखि धरित्रि ! छिपाओ मत, बतलाओ, बतलाओ, हम भी तुम्हारी ही तरह तपस्या करें। इसी कारण वृन्दारण्यके संस्पर्शसे सब भूमि रोमांचित हो गयी। भूमि अपने सौभाग्यपर गर्वीली होकर इठलाती है। जैसे 'बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई ॥', वही बात यहाँ भूमिके पक्षमें भी है। विन्ध्याचलके एक देश चित्रकूटका श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रने चरणसे स्पर्श किया। वहाँपर तपस्वीवेशसे भगवान्ने निवास किया। इतनेसे ही विन्ध्यने बड़ाई पायी। एक दिन देवर्षि नारद उसके यहाँ पधारे। कहा—तुम तो बहुत पुराने हो, लेकिन सब लोग मेरुको बड़ा समझते हैं। यह कुछ अटपट-सी बात मालूम होती है। विन्ध्यने सोचा—मेरुकी सूर्य प्रदक्षिणा करते हैं, इसीसे उसे लोग बड़ा समझते हैं तो वही बन्द कर दिया जाय। बस, विन्ध्य बढ़ने लगे। सूर्यभगवान्‌का मार्ग बन्द हो गया। सब धर्म, कर्म, उपासना, अग्निहोत्रानुष्ठान बन्द हो गये। सूर्योदय हो नहीं तो कुछ हो कैसे ? तब सब देवता, ऋषि संत्रस्त होकर अगस्त्यऋषिकी प्रार्थना करने काशीमें आये। ऋषिकी प्रार्थनाकर उन्हींको भेजा। विन्ध्यपर्वत अगस्त्यका शिष्य था। उन्हें देखकर उसने खर्वरूप धारण किया, प्रणाम किया। अगस्त्य प्रसन्न होकर बोले—'जबतक मैं उधरसे नहीं लौटता, तबतक ऐसे ही पड़े रहो। अगस्त्य दक्षिण समुद्रपर चले गये और विन्ध्य जैसा-का-तैसा पड़ा रहा। फिर श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रने जब चित्रकूटपर निवास किया, तब विन्ध्यने पुनः बिना श्रम उत्कर्ष पाया। उसके शत्रु भी उसकी महिमा गाने लगे। तात्पर्य यह कि भगवान्‌के मंगलमय श्रीचरणोंके स्पर्शसे वृन्दारण्य ही नहीं, समस्त भूमण्डल सौभाग्ययुक्त हुआ।' किंवा 'स्वपदयोः रमणं रतिजनकं—स्वपद- रमणम्।' भगवान्‌के मंगलमय श्रीचरणारविन्दोंको आनन्द देनेवाला। अर्थात् अतिरम्य भूमि, सुकोमल वालुका, श्यामल-श्वेत दूर्वाएँ एवं अद्भुत, अभिनव पत्र, पुष्प, पल्लवोंसे वृन्दारण्यभूमि सुशोभित है। जहाँ श्रीकृष्णके चरणारविन्द जायँ, वहाँ कठोरता न मालूम पड़े, अतः वृन्दारण्यने अपनेको सजा रखा। प्रभुचरणोंमें कहीं आघात न लगे। ऐसे वृन्दारण्यधाममें भगवान् पधारे। जहाँ-जहाँ प्रभुके श्रीचरणारविन्दका विन्यास होता है, वहाँ-वहाँ वृन्दारण्य अपने हृदयकमलको विकसित करता है। भगवान्‌के चरणारविन्द वृन्दारण्यके