भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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११२ भक्तिसुधा हृदयपर ही विन्यस्त होते हैं। व्रजांगनाएँ इसका बड़ा संताप करती हैं कि प्रभुके चरण अत्यन्त सुकोमल हैं, उन्हें वृन्दारण्यके दूर्वा, कुश-कण्टक गड़ते होंगे। अलौकिक प्रतीति चाहिये ही। व्रजांगनाओंको यह बात सदा खटकती ही रहती है कि श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें कण्टकादि कहीं गड़ न जायँ— यत्तै सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।१९) हे श्यामसुन्दर, व्रजेन्द्रनन्दन, मनमोहन! आपके श्रीचरण सुजात, सद्योजात, सुकोमल कमलसे भी शतकोटिगुणित कोमल हैं। उनको अपने हृदयपर हम ताप-पापशान्त्यर्थ धारण करती हैं, पर संकुचित होती हैं कि चरण सुकोमल हैं, हमारे हृदय कठोर हैं, अतः कठोर हृदयके सम्पर्कसे चरणोंमें कहीं आघात न लगे। इसलिये भयभीत होकर कर्कश हृदयपर—वक्षोजपर मनमोहन श्रीकृष्णके चरणारविन्द धारण करती हैं, उसीसे आप अटवीका अटन करते हैं, वनमें विहरण करते हैं! क्या वहाँ वृन्दारण्यके जो दूर्वा, लता-गुल्म, तृण, अंकुर, कण्टक हैं, उनसे आपके सुकोमल चरण व्यथित नहीं होते? हा! क्या कहें, श्रीश्यामसुन्दरको इतना कष्ट और हम अभी भी जीवित हैं! इसी भावसे उनकी निष्कामता प्रकट होती है। यहाँ स्वसुखसुखित्व नहीं, तत्सुखसुखित्व है। इससे श्यामसुन्दरके सुखमें सुखिनी होना कहा गया। पिता जब अपने बालकका मुख चुम्बन करने लगता है, तब बालकको उसकी दाढ़ी-मूँछें गड़ती हैं, बालकको वे अच्छी नहीं लगतीं, वह रोता है, पर पिता अपने रसमें बालकके रोनेकी परवाह नहीं करता। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' यही सिद्धान्त है। पत्नी, पति, पुत्र इत्यादि उनके लिये प्यारे नहीं, अपने लिये प्यारे लगते हैं—'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) पिता बालककी तरफ ध्यान नहीं रखता, चुम्बनकी बौछार लगा देता है। रागका होना स्वाभाविक था, व्रजांगनाएँ चरणोंका पूर्ण आलिंगन करतीं, किन्तु उनका हृदय डरता है कि प्रभुचरण कोमल-से-कोमल हैं और हमारा हृदयप्रदेश अतिकठोर है। यहाँपर चरणोंको पीड़ा होगी, यही ध्यान है। अपने सुखपर ध्यान नहीं। प्राप्त यही था कि चरणोंका गाढ़ आलिंगन करतीं, परंतु वे रागोद्रेकको दबा देती हैं। जो कुछ हो, उन्हें अपनी परवाह नहीं है। यह भाव कहीं साधारण कामिनीमें हो सकता है? इसलिये कहा है कि 'प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्' गोपांगनाओंको काम नहीं था, किंतु उनका प्रेम ही काम शब्दसे प्रख्यात हुआ था। इस दृष्टिसे व्रजांगनाएँ कहती हैं कि श्रीचरणोंको कष्ट होते हुए देखकर भी क्या हम जीवित रह सकती हैं? हाँ! हमारे जीवनका कारण यह है कि ब्रह्माने शरीर-निर्माणकर हमें प्रदान किया, पर आयु आपके हाथ दी, नहीं तो अबतक कभीकी मर जातीं, किंतु आपके दर्शनकी लालसासे ये नेत्र मरने नहीं देते। 'भवानेव आयुर्यासां तासां भवदायुषाम्।' यह व्रजांगनाओंकी भावना है। वास्तवमें वृन्दावन नीरस नहीं, क्योंकि 'स भगवान् कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिम्नि' के अनुसार यह उनका स्वरूप ही है। वृन्दारण्यको मनमोहनके चरणकी कोमलता, चरणकी सरसताका ध्यान था। इसलिये वह चरणोंके नीचे अपना हृदयकमल विकसित करता था। वैसे तो उनके चरणस्पर्शसे महान् कठोरोंकी कठोरता भी दूर होती है। वज्र भी मक्खनके सदृश सुकोमल हो जाता है। जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी॥ (रा०च०मा० २।२६२।८) सिंहिनीको भी पुत्रमें राग होता है, पर सर्पिणीको नहीं। इसीसे इसको निर्दय, पुत्रभक्षिका, पुत्रादिनी कहते हैं। डाइनको भी पुत्रमें राग होता है, पर इसको नहीं। परंतु ऐसी सर्पिणी एवं वृश्चिकी भी भगवान्‌के चरणोंका दर्शनकर अपने सहज तामस भाव तथा