भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीक्ष्ण विषको छोड़ देते हैं, निर्विष, शान्त, सात्त्विक हो जाते हैं। फिर वृन्दारण्यके दूर्वा, लता, कण्टक कोमल हो जायँ, इसमें आश्चर्य ही क्या? वह तो वस्तु ही ऐसी है। 'वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) वृन्दाके आख्यानका रहस्य भगवान्के चरणोंको आनन्द देनेवाला, व्रजांगनाओंको 'घबड़ाओ मत ! प्रभुके चरणोंको कष्ट नहीं होगा'—ऐसा आश्वासन देनेवाला जो वृन्दारण्य धाम, उसमें गोपवृन्दोंके संग गीतकीर्ति भगवान् पधारे। यह वृन्दाका अरण्य है। वृन्दा याने तुलसी। पहले जो वृन्दा जालन्धर दैत्यकी पत्नी थी, उसका अरण्य। तात्पर्य यह कि जो दैत्यभोग्या वृन्दा थी, वह अब भगवदीया—भगवान्की वस्तु हो गयी। यह वृन्दा—तुलसी लक्ष्मी, वृषभानुनन्दिनीकी तरह गोलोक- धाममें रहनेवाली भगवदीया दिव्य महाशक्ति थी, किंतु किसी प्रकारके दुर्दैवसे भगवान्की महाशक्ति भगवद्भोग्या होती हुई भी दैत्यभोग्या हो गयी और महाराजनी हुई। अरुचिपुरःसर जालन्धर दैत्यके प्रति रागिणी हो उठी। फिर पूर्णतम, पुरुषोत्तम, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने अपनी अनुकम्पा-विशेषसे दैत्यका वधकर वृन्दाको स्वीकार किया। कथा ऐसी है कि— जालन्धरसे श्रीशिवका संग्राम हो रहा था। उसकी पत्नी पतिव्रता वृन्दा थी। जबतक उसका पातिव्रत्य भंग न हो, तबतक जालन्धरका वध नहीं हो सकता था। इसलिये श्रीमहाविष्णुने जालन्धरका वेश धारण किया और वृन्दाके घरमें जाकर जब उसका पातिव्रत्य भंग किया, तब वह दैत्य मरा। यह ऊपरी भाव जरा टेढ़ा है। लोग कहेंगे कि श्रीमहाविष्णुने ऐसा कैसे किया ? परंतु अन्तरंग भाव कुछ और है। धर्माधर्मके विचारमें उनका गौरव-लाघव देखा जाता है। जालन्धर स्वयं पातिव्रत्य नहीं मानता था, वेदोक्त मर्यादाको विघटित करता था। फिर जो सर्वधार्मिक मर्यादाओंका व्यापादक है, वह पातिव्रत्य क्या जानता? ऐसे सर्वधर्मनाशक जालन्धरका नाश करनेके लिये किंचित् धर्म-व्यत्यय भी करना हो तो वह सह्य है। एक सत्यसे दस हजार गो-ब्राह्मणोंका वध होता हो तो उससे क्या लाभ ? वहाँ तो झूठ ही बोले। वहाँ सत्यभाषण मिथ्याधर्म है। यदि हमारे सत्यसे अपरिमित धर्मकी हानि होती हो तो उसकी महिमा नहीं है। अर्जुनकी प्रतिज्ञा थी कि हमारे गाण्डीव धनुषकी जो निन्दा करेगा उसका सिर उतार लूँगा। एक बार प्रसंग ऐसा आया कि कर्णसे युद्धमें विह्वल हुए धर्मराजने ही गाण्डीवकी निन्दा कर दी। सुनकर अर्जुनने सोचा—मैं क्षत्रिय हूँ, मेरी प्रतिज्ञा सुदृढ़ है। युधिष्ठिरको मारनेके लिये अर्जुनने तलवार निकाल ली। भगवान् श्रीकृष्ण बीचमें पड़े और अर्जुनसे कहा—'अरे ! तू धर्म जानता भी है ? परमाराध्य ज्येष्ठ भ्राता धर्मराज क्या तेरे वध्य हैं ? प्रतिज्ञापालनके लिये उनको 'युष्मत्' शब्दसे सम्बोधित कर—यही बड़ोंका वध है।' अर्जुन समझ गया, उसने धर्मराजके लिये 'तुम', 'तुम' शब्दका कई बार प्रयोग किया। इतनेसे युधिष्ठिर उद्विग्न हो गये। यह देखकर अर्जुन कहने लगा—'अब मैं आत्महत्या करूँगा, मैंने धर्मराजके लिये 'त्वं' पदका प्रयोग किया।' कृष्णने कहा— 'पागल है, तू अपनी बड़ाई-आत्मश्लाघा कर, यही अपना वध है। फिर अपनी बड़ाई अर्जुनने खूब गायी। इस तरह भगवान्ने चातुर्यसे पाण्डवोंकी नैयाको पार लगाया। इसीलिये कहा है कि 'कैवर्तकः केशवः'। अतः धर्माधर्मका गौरव-लाघव सोचना चाहिये। यदि सर्वधर्मका शत्रु जालन्धर अन्य उपायोंसे नहीं मरता, तब एक धर्मको विघटितकर अनन्त धर्मका संगठन करना नैतिक ही है।' दूसरी दृष्टिसे देखें तो वास्तवमें वहाँ पातिव्रत्य भंग ही नहीं हुआ, क्योंकि विष्णु वृन्दाके परम पति थे। वस्तुतः पातिव्रत्य धर्मसे भी विष्णुसम्बन्धको ही तो प्राप्त करना है। सारांश यह निकला कि पहले वृन्दा भगवदीया ही थी, गोलोक-धाम-निवासिनी थी, दुर्दैववशात् जालन्धरभोग्या हो गयी थी। यह वृन्दा प्राणियोंकी बुद्धि है, वास्तवमें इसका सम्बन्ध मुख्य