भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 778 में से

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साक्षीसे ही होना चाहिये। इसलिये बुद्धिका पूर्णतम पुरुषोत्तमाकाराकारित होना, यही स्वाभाविक सफलता है। दुर्दैव यह है कि वह जगदाकाराकारित हो रही है। जीवोंको बुद्धि मिली है भगवत्प्राप्तिके लिये, सांसारिक निर्णयोंके लिये नहीं। इसलिये इसकी परम सफलता इसीमें है कि भगवत्सम्बन्ध सुस्थिर हो, वहाँ भगवदभिव्यक्ति हो। यह प्रभुकी महान् कृपा है कि दैत्य-सम्बन्ध छुड़ाकर उस दैत्यभोग्या वृन्दाको भगवद्भोग्या बनायें। यही स्थिति संसारमें भी है। बुद्धियोंपर शैतानका अधिकार है या भगवान्‌का ? साधारण बुद्धि शैतानभोग्या हो गयी है, तभी तो वह पाप, ताप, दम्भोंमें लगायी जाती है। उसका फल ही है नाना योनियोंमें भटकते रहना। वास्तवमें घट उत्पन्न होते ही आकाशसे परिपूरित हो जाता है; जल, दुग्ध या मृत्तिकासे पीछे परिपूरित होता है। इसी तरह बुद्धि उत्पन्न होते ही आकाशोपम परमात्मासे ही भरपूर हुई, इसमें प्रपंच जो भरा है वह आगन्तुक है। तथापि बुद्धि इस प्रपंचकी पतिव्रता हो गयी है। एक क्षणके लिये भी उसमेंसे प्रपंच नहीं निकलता। यही बुद्धिका दृश्यमें राग, प्रीति, पातिव्रत्य हठ हो गया। अब पूर्णतम, पुरुषोत्तम ही कृपा करें, हठात् यदि दैत्यसम्बन्ध छुड़ायें तभी कुछ हो, वह स्वयं तो निवृत्त होती नहीं। इसी बुद्धिके बलसे ही यह दैत्य संसारमें अनेक अनर्थ बढ़ा रहा है। कौन इस दैत्यका वध करे ? सब देवाधिदेव परेशान हैं। जब प्रभु बलात् इस दैत्यके संसर्गको छुड़ायें, नकली पातिव्रत्य बिगाड़ें तभी कल्याण हो। असली पति भगवान् ही हैं; क्योंकि शुरूमें वह बुद्धि भगवदाकाराकारित होकर पीछे सर्वाकाराकारित होती है। यही कथा वहाँ हुई। गोलोकनिवासिनी वृन्दाको शाप हुआ। जालन्धर भी गोलोकनिवासी गोप था, वह दैत्य हुआ, उसकी यह पत्नी हुई। उसका यह सम्बन्ध आगन्तुक था, इसलिये रुद्रादिके लाचार होनेपर छलसे दैत्य सम्बन्ध छुड़ाकर स्वकीयाको स्वीकार किया गया। ऐसे ही इस बुद्धिका शैतानसे संसर्ग छुड़ाकर प्रभु अपना संसर्ग स्थापित करें, बुद्धिके सर्वाकारको छुड़ाकर उसमें अपना आकार स्थापित करें, तभी तो आनन्द होगा, स्वातन्त्र्य होगा। उस वृन्दाका अरण्य ही वृन्दारण्य है। अथवा— 'वृन्दायाः वनं यौवनं वृन्दावनम्।' वृन्दाका यह यौवन है अर्थात् यह वृन्दावन वृन्दाका देदीप्यमान स्वरूप ही है। वृन्दाकी स्थिति है, हर स्थितिमें श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंसे सुशोभित होना। जहाँ प्रभु शालग्राममें विराजमान हों, वहाँ वह तुलसीरूपमें सेवा करती है। जब प्रियतम, प्राणधन, पूर्णतम, पुरुषोत्तम- रूपमें प्रभुने व्रजमें अवतार लिया, तब वह यहाँ वृन्दावनमें प्रकट हुई। यहाँ जो यमुना है, वह वृन्दाके हृदयकी प्रेमानन्दरससरिता, जो तरु हैं वे रोमांच और भूमि ही देह है। इसलिये व्रजांगनाएँ ईर्ष्या करती हैं कि सखि ! देखो, मनमोहन श्यामसुन्दर वृन्दारण्यमें पधारे हैं। यहाँ सब विपरीत-ही-विपरीत हो रहा है। हमारी अधरसुधाका वे कितना दुरुपयोग करते हैं। सखि ! जड़, सच्छिद्र शुष्क बाँसके छिद्रोंमें उसे भरते हैं। हम चाहती हैं, हमारे हृदयमें उनके चरणारविन्द स्थापित हों, पर नहीं, वे वृन्दारण्यमें प्रथम पधारे। अथवा 'स्वपदरमणं स्वस्याः आत्मीयायाः वृषभानुनन्दिन्याः पदैः रमणम्।' अर्थात् श्रीवृषभानु- नन्दिनीके मंगलमय चरणारविन्दोंसे सुशोभित वृन्दारण्यमें श्रीकृष्ण पधारे। रासलीलादिमें वृषभानुनन्दिनीका आगमन वहाँ होता है, इसलिये उनके चरणोंसे भूषित अरण्यमें पधारे। उद्दीपनविशेष सिद्ध हुआ। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी अन्तरंग प्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनीके चरणसे अंकित वृन्दारण्य देखकर प्रसन्नता हुई। इसलिये कहा गया 'प्राविशत्' अर्थात् वृन्दारण्यमें प्रविष्ट हुए। क्या करते हुए प्रवेश किया ? 'रन्ध्रान् वेणोरधर- सुधया पूरयन्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) यहाँ 'वेणोः' पुंस्त्व सूचित किया। वेणु पुमान् है अर्थात् पुमान् वेणुके छिद्रोंमें अधरसुधाको पूरित करते हुए भगवान् पधारे। दूसरी दृष्टि यह है कि वेणुछिद्रोंमें