भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
साक्षीसे ही होना चाहिये। इसलिये बुद्धिका पूर्णतम पुरुषोत्तमाकाराकारित होना, यही स्वाभाविक सफलता है। दुर्दैव यह है कि वह जगदाकाराकारित हो रही है। जीवोंको बुद्धि मिली है भगवत्प्राप्तिके लिये, सांसारिक निर्णयोंके लिये नहीं। इसलिये इसकी परम सफलता इसीमें है कि भगवत्सम्बन्ध सुस्थिर हो, वहाँ भगवदभिव्यक्ति हो। यह प्रभुकी महान् कृपा है कि दैत्य-सम्बन्ध छुड़ाकर उस दैत्यभोग्या वृन्दाको भगवद्भोग्या बनायें। यही स्थिति संसारमें भी है। बुद्धियोंपर शैतानका अधिकार है या भगवान्का ? साधारण बुद्धि शैतानभोग्या हो गयी है, तभी तो वह पाप, ताप, दम्भोंमें लगायी जाती है। उसका फल ही है नाना योनियोंमें भटकते रहना। वास्तवमें घट उत्पन्न होते ही आकाशसे परिपूरित हो जाता है; जल, दुग्ध या मृत्तिकासे पीछे परिपूरित होता है। इसी तरह बुद्धि उत्पन्न होते ही आकाशोपम परमात्मासे ही भरपूर हुई, इसमें प्रपंच जो भरा है वह आगन्तुक है। तथापि बुद्धि इस प्रपंचकी पतिव्रता हो गयी है। एक क्षणके लिये भी उसमेंसे प्रपंच नहीं निकलता। यही बुद्धिका दृश्यमें राग, प्रीति, पातिव्रत्य हठ हो गया। अब पूर्णतम, पुरुषोत्तम ही कृपा करें, हठात् यदि दैत्यसम्बन्ध छुड़ायें तभी कुछ हो, वह स्वयं तो निवृत्त होती नहीं। इसी बुद्धिके बलसे ही यह दैत्य संसारमें अनेक अनर्थ बढ़ा रहा है। कौन इस दैत्यका वध करे ? सब देवाधिदेव परेशान हैं। जब प्रभु बलात् इस दैत्यके संसर्गको छुड़ायें, नकली पातिव्रत्य बिगाड़ें तभी कल्याण हो। असली पति भगवान् ही हैं; क्योंकि शुरूमें वह बुद्धि भगवदाकाराकारित होकर पीछे सर्वाकाराकारित होती है। यही कथा वहाँ हुई। गोलोकनिवासिनी वृन्दाको शाप हुआ। जालन्धर भी गोलोकनिवासी गोप था, वह दैत्य हुआ, उसकी यह पत्नी हुई। उसका यह सम्बन्ध आगन्तुक था, इसलिये रुद्रादिके लाचार होनेपर छलसे दैत्य सम्बन्ध छुड़ाकर स्वकीयाको स्वीकार किया गया। ऐसे ही इस बुद्धिका शैतानसे संसर्ग छुड़ाकर प्रभु अपना संसर्ग स्थापित करें, बुद्धिके सर्वाकारको छुड़ाकर उसमें अपना आकार स्थापित करें, तभी तो आनन्द होगा, स्वातन्त्र्य होगा। उस वृन्दाका अरण्य ही वृन्दारण्य है। अथवा— 'वृन्दायाः वनं यौवनं वृन्दावनम्।' वृन्दाका यह यौवन है अर्थात् यह वृन्दावन वृन्दाका देदीप्यमान स्वरूप ही है। वृन्दाकी स्थिति है, हर स्थितिमें श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंसे सुशोभित होना। जहाँ प्रभु शालग्राममें विराजमान हों, वहाँ वह तुलसीरूपमें सेवा करती है। जब प्रियतम, प्राणधन, पूर्णतम, पुरुषोत्तम- रूपमें प्रभुने व्रजमें अवतार लिया, तब वह यहाँ वृन्दावनमें प्रकट हुई। यहाँ जो यमुना है, वह वृन्दाके हृदयकी प्रेमानन्दरससरिता, जो तरु हैं वे रोमांच और भूमि ही देह है। इसलिये व्रजांगनाएँ ईर्ष्या करती हैं कि सखि ! देखो, मनमोहन श्यामसुन्दर वृन्दारण्यमें पधारे हैं। यहाँ सब विपरीत-ही-विपरीत हो रहा है। हमारी अधरसुधाका वे कितना दुरुपयोग करते हैं। सखि ! जड़, सच्छिद्र शुष्क बाँसके छिद्रोंमें उसे भरते हैं। हम चाहती हैं, हमारे हृदयमें उनके चरणारविन्द स्थापित हों, पर नहीं, वे वृन्दारण्यमें प्रथम पधारे। अथवा 'स्वपदरमणं स्वस्याः आत्मीयायाः वृषभानुनन्दिन्याः पदैः रमणम्।' अर्थात् श्रीवृषभानु- नन्दिनीके मंगलमय चरणारविन्दोंसे सुशोभित वृन्दारण्यमें श्रीकृष्ण पधारे। रासलीलादिमें वृषभानुनन्दिनीका आगमन वहाँ होता है, इसलिये उनके चरणोंसे भूषित अरण्यमें पधारे। उद्दीपनविशेष सिद्ध हुआ। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी अन्तरंग प्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनीके चरणसे अंकित वृन्दारण्य देखकर प्रसन्नता हुई। इसलिये कहा गया 'प्राविशत्' अर्थात् वृन्दारण्यमें प्रविष्ट हुए। क्या करते हुए प्रवेश किया ? 'रन्ध्रान् वेणोरधर- सुधया पूरयन्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) यहाँ 'वेणोः' पुंस्त्व सूचित किया। वेणु पुमान् है अर्थात् पुमान् वेणुके छिद्रोंमें अधरसुधाको पूरित करते हुए भगवान् पधारे। दूसरी दृष्टि यह है कि वेणुछिद्रोंमें
अधरसुधाका सन्निवेशकर, भगवद्भोग्या अधरसुधाको व्रजांगनाओंमें और देवभोग्याको खगादिकोंमें पहुँचाना है। इसके लिये वेणु केवल पात्र ही है। अधर- सुधाका रस वेणुको नहीं मिलता, इसीका उपपादन है। जब भगवान्के अधरसुधासे पाषाण भी द्रवित हुए, तब वेणु क्यों न सुधरी ? उसमें हरापन क्यों न आया ? वह ज्यों-का-त्यों क्यों रहा ? इसका कारण यही है कि वह केवल पात्रमात्र रही, उसको कुछ मिला नहीं। अन्य दृष्टिसे कहें तो वेणु बड़ी चतुर भगवान्की प्रिय सखी है। वह वेणुरूपमें अपने- आपको छिपाकर पुमान्रूपमें अभिव्यक्त होकर श्यामसुन्दरके अधरपर विराजित होकर उसकी मधुर सुधाका पान करती है। वह इसलिये वेणु बनी कि कोई उससे ईर्ष्या न करे, कोई न जाने कि यह श्यामसुन्दरका रसास्वादन करती है, नहीं तो कोई उसे चुरा लेगा। वृषभानुनन्दिनीने तो कई बार उसको चुराया भी था। अतः वह वंशी सग्रन्थि एवं शुष्क होकर रहती है; क्योंकि वह चतुरा है। ऊँची कोटिके रसिक अपने रसको प्रकट नहीं करते। रोयेंगे तो भी भीतर-ही-भीतर, बाहर नहीं। इस तरह वेणु बड़े धैर्यसे रसास्वादन करती हुई भी अपनेको शुष्क बनाये रखती है। सोचती है कि यदि मुझमें हरे-हरे पल्लव निकल आये तो श्यामसुन्दर हमें छोड़ देंगे। कहेंगे कि यह हमारे कामकी नहीं रही। जिस रसाभिव्यक्तिमें श्यामसुन्दर उसे छोड़ दें, वह रस किस कामका ? माना कि यदि वेणु श्यामसुन्दरके अमृतमय मुखचन्द्रपर आसीन होकर अधरसुधारसास्वादनसे प्रफुल्लित हो गयी, तब तो वह बजेगी ही नहीं। अधर-पल्लवपर लिटाना, सुधाका स्वाद देना, यह सब तबतक ही, जबतक वह सरस न हो। इसलिये वह अपनेको सरस नहीं होने देती। जहाँ परम्परासे अधरसुधास्वादनसे पाषाण द्रुत हो गये, नदियाँ स्तब्ध एवं रोमांचित हो गयीं, वहाँ साक्षात् आस्वादन लेनेवाली वेणु सरस क्यों न हो ? इस चातुर्यका पता गोपियोंको लग गया। इसीलिये व्रजांगनाएँ आगे कहती हैं—‘गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।९) सखि! इस वेणुने कौन पुण्य किया है? कहीं ऐसा भी है—एक अवसरमें श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन जब श्रीराधाके गुणगानमें व्यग्र थे, उस समय भगवान्के मुखपंकजसे सरस्वती प्रकट हो गयी। जब उसने अनन्तकोटि कन्दर्पदर्पदलनपटीयान् स्वरूपको देखा, तब मुग्ध हो गयी और आलिंगन चाहा। श्रीकृष्णचन्द्रने कहा—'यदि मुझसे ऐसा परिरम्भण चाहती हो तो वृन्दावनमें वेणुरूपसे प्रकट हो।' जब वहाँ जाकर उसने घोर तप किया, बड़ी- बड़ी यातनाएँ सहन कीं, काटी गयी, छीली गयी, तपाकर सीधी की गयी, उसमें छिद्र किये गये, तब वह श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मुखचन्द्रपर विराजमान हुई। अब प्रभु उसको अपने अधरपर्यंकपर लिटाकर, मुकुटका छत्र धरकर, कुण्डलोंसे आरतीकर, अधरसुधाका भोग लगाकर, अपने कोमल अंगुलिदलोंसे उसका पादसंवाहन करते हैं। उसपर बड़े प्रसन्न हैं। इस प्रकार वेणुको सुधारससे पूरित करते हुए भगवान् श्रीवृन्दावनधाममें पधारे। इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम्। श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।६) वेणुछिद्रोंमें प्रविष्ट होकर भगवान्की अधरसुधा ही ‘बर्हापीडं' इस श्लोकके रूपमें व्यक्त हुई। इसमें उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस है। जब कहा कि— 'नाशकन् स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप ॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।४) अर्थात् स्मरवेगसे विक्षिप्तमनस्क होनेसे व्रजांगनाएँ उसके वर्णनमें असमर्थ हुईं। जब 'नाशकन्', वर्णन न कर सकीं, तब यह वर्णन कैसा ? इसका समाधान यह है कि परम अन्तरंग वक्ता श्रीशुक प्रायः व्रजांगनाओंमें तन्मय होकर लीलाका वर्णन करते हैं। इसलिये जिस समय वे जिस लीलाका वर्णन करते थे, उस समय उस रसमें तन्मय हो जाते थे। इसलिये जब श्रीव्रजांगनाएँ श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मुखचन्द्रसे निर्गत वेणुरव—वेणुनादको श्रवण करतीं, तब उसके
११६ भक्तिसुधा वर्णनमें प्रयत्नशील होतीं। किंतु वेणुनाद महा-मोहनमन्त्र है, उससे वे मूर्च्छित हो जातीं। कथंचित् भगवत्कृपासे लब्धावस्थिति होकर पुनः वेणुगीत सुनती हैं। नाद तो नादमात्र है, गीतमें कुछ अर्थ होता है। अतः वेणुगीतार्थ श्रीकृष्ण व्रजांगनाओंके हृदयमें, अन्तःकरणमें, अन्तरात्मामें अभिव्यक्त होते हैं। फिर वे वर्णनकी चेष्टा करतीं और पुनः स्मरणसे मूर्च्छित होती हैं। पहले वेणुनादसे मूर्च्छित, फिर उसके उद्गमस्थान श्रीकृष्णचन्द्रके स्मरणसे मूर्च्छित, फिर गीतार्थानुभवसे मोहित होती हैं। अन्तमें जब वर्णन करना चाहतीं तो विक्षिप्तमनस्का होकर न कर सकतीं। उनकी इस अशक्तिको देखकर तन्मयावस्थाप्राप्त शुक ही स्वयं वर्णन करते हैं। इसमें हेतु यह कि यहाँ यह शुकवाक्य है। यदि गोपियोंका वर्णित होता तो 'गोप्य ऊचुः', ऐसा लिखते। वैसा न होनेसे स्पष्ट है कि लीलारसभावापन्न होकर गोपांगनाभावापन्न श्रीशुक स्वयं कहते हैं- 'इति वेणुरवं राजन्', दूसरा भाव यह है कि राजाको सम्बोधितकर शुकदेव कहते हैं कि व्रजांगनाओंके मनमें क्षोभ क्यों हुआ ? श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दका यादृश स्वरूप अभिव्यक्त होकर क्षोभकारक हुआ, वह है- 'बर्हापीडं' इत्यादि। ऐसे उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूपका हृदयमें अनुभव करनेसे उनका हृदय स्मरवेगसे क्षुब्ध हुआ। अतः कहा गया है- 'यादृशं स्वरूपं मनःक्षोभकरं जातं तादृशमाह- बर्हापीडमिति।' इसीलिये भावुक कहते हैं कि श्रीशुक अन्तर्लीला-निविष्ट हैं, साक्षात् श्रीवृषभानुनन्दिनीके नित्यनिकुंजमें रहनेवाले हैं। उन्हींका यह अवतारविशेष है, जिनको श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्णका नाम पढ़ाती हैं और श्रीकृष्ण भी जिनको वृषभानुनन्दिनीका नाम पढ़ाते हैं। अतः ये लीलारसका प्रत्यक्ष आस्वादन करते हुए वर्णन करते थे। फिर भी उन्होंने अधिकारानुसार ही गुप्त शब्दोंमें वर्णन किया- 'इति वेणुरवम्।' यहाँ 'र' से अग्निबीज विप्रयोगात्मक शृंगार और 'व' से अमृतबीज संयोगात्मक शृंगार विवक्षित है। वह 'सर्वभूतमनोहरम्' है। श्रीजीवगोस्वामी कहते हैं कि यहाँ भूतपदसे चेतनाचेतन, स्थावर- जंगम सब लेना और मनोहर पदकी लक्षणा विकारकारी अर्थमें करनी चाहिये। वेणुरव-श्रवणका प्रभाव इस वेणुरवने सर्वप्राणिमात्र, चेतनाचेतनोंमें विकार उत्पन्न कर दिया। कहा है कि 'अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणाम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) जो गतिमान् थे, वे निश्चल हो गये, यमुनाका प्रवाह रुक गया, पर्वत-पाषाण द्रवित होकर बह चले। इसलिये यह मनोहर पद विकारकारीमें पर्यवसायी है। अतः स्थावर-जंगम सब क्षुब्ध हो उठे- 'श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वाः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।६) अन्य जगह क्षोभ तो हुआ ही, पर अधिक श्रीव्रजांगनाओंमें हुआ। वहाँ उसने अपना अत्यन्त पराक्रम व्यक्त किया। जहाँ चेतनाचेतनोंतक क्षोभ पहुँचा, फिर व्रजके लोगोंकी क्या कही जाय ? एक तो सबके मनको हरनेवाला, फिर जो प्रेमका प्रधानस्थान, वहाँ उसके प्रभावका कहना ही क्या है ? भक्ति वृद्धा होकर सर्वत्र घूमती हुई जहाँ आकर युवती हो गयी, जो भक्तिका परम दिव्य क्षेत्र है—चाहे ऊपरसे वह भले ही नीरस भूमि मालूम हो, पर अन्तरंग रूपसे अत्यन्त स्निग्ध और सरस है, उस व्रजके मनुष्य, उनमें भी स्त्रियाँ, जिनका हृदय अत्यन्त कोमल होता है और उनमें भी श्रीव्रजांगनाएँ, जिन्होंने उस मनोहर वेणुरवका श्रवण किया; उन कान्तभाववती और सख्यभाववती सौभाग्यवतियोंपर उसका विशेष प्रभाव पड़ा। किनपर प्रभाव पड़ा ? सबपर— 'सर्वाः।' इस पदसे नित्या, साधनसिद्धा आदि पूर्णतम, पुरुषोत्तम, परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण नित्य हैं, उनकी माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी नित्या तथा उसकी अंशभूता व्रजांगनाएँ भी 'नित्या' हैं। सदा गोलोकधाममें परमानन्दकन्द भगवान् विराजते हैं। वहीं श्रीवृषभानुनन्दिनी और वहीं अन्तरंगा अंशभूता व्रजांगनाएँ भी विराजती हैं। साधनसिद्धामें दो भेद हैं—श्रुतिरूपा और ऋषिरूपा। यह कहा गया है कि 'अद्यापि यत्पदरजः
श्रुतिमृग्यमेव।' अर्थात् आजतक श्रुतियाँ पररसामृतमूर्ति भगवान्को ढूँढ़ रही हैं। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते इनको जब मूर्तिमान् प्रभु प्राप्त हुए और उनके अद्भुत गुणगणोंपर प्रसन्न हुए, तब उन्होंने ब्राह्मरसस्पर्शकी इच्छा प्रकट की। प्रभुने उनको ब्रजमें आनेको कहा। वे ही साधनसिद्धा हैं। वे भी नित्या ही हैं; क्योंकि ब्रह्ममें ही श्रुतियोंका निरन्तर रमण होता है। निष्कर्ष यह है कि 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) समस्त वेद उस पूर्णतम पुरुषोत्तमका ही प्रतिपादन करते हैं। इस सिद्धान्तानुसार सर्व श्रुतियोंका तात्पर्य परमेश्वरमें ही है, वहीं उनका रमण है। इन श्रुतियोंमें दो भेद हैं—एक अनूढ़ा, दूसरी ऊढ़ा। उसमें अनूढ़ा कन्या वे हैं, जिन्होंने श्रीकृष्णप्राप्तिके लिये कात्यायनी-पूजन किया। दूसरी हैं ऊढ़ा—उनमें भिन्न-भिन्न पतियोंकी ममतामात्र थी। वास्तवमें तो यही था कि जिस समय ब्रह्माने वत्सगोपालादिकोंका हरण किया था और प्रभु स्वयं ही एक वर्षतक सब कुछ बने थे; उस समय सब गोप-कुमारियोंके विवाह ऊपरी दृष्टिसे दूसरे गोपोंके साथ हुए, परंतु वस्तुतः सबके विवाह प्रभुसे ही हुए थे; क्योंकि श्रीकृष्ण ही उस समय सब गोपरूपमें विराजमान थे। इसलिये लोकदृष्ट्या वह अन्यविवाहिता होती हुई भी प्रभुकी ही स्वकीया थीं। उनमें परकीयात्वका केवल आरोपमात्र था। इसलिये कहा गया है—'न जातु व्रजदेवीनां पतिभिः सह सङ्गमः' व्रजांगनाएँ कभी भी प्राकृत पतियोंसे संगत नहीं हुईं, अपितु प्रभु ही उनके सर्वस्व थे, यही बात 'श्रुतिरूपा' में भी है। कई श्रुतियाँ साक्षात् प्रभुमें तात्पर्य रखती हैं, जैसे 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इत्यादि। कई परम्परया अग्नि, यम और वरुण आदिकी स्तुतिद्वारा प्रभुके साथ सम्बन्ध रखती हैं। जिन श्रुतियोंका जो अर्थ होता है, उनके साथ उनका सम्बन्ध है, यही प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव सम्बन्ध भी कहा जाता है। रामायणमें कहा है— 'गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद....॥' (रा०च०मा० १।१८) कहा जाता है कि वाणी और अर्थका भेद वास्तवमें भेद नहीं है। गिरा और अर्थका सम्बन्ध पति-पत्नी सम्बन्ध है। अर्थ पति और गिरा पत्नी है। 'कदाचनस्तरीरसि' यह श्रुति इन्द्रस्ताविका होनेसे इन्द्रपत्नी है। जिसका जो प्रतिपाद्य है, वही उसका पति है। वैसे ही जिनका साक्षात् परमात्मा ही अर्थ है, अन्य अर्थ नहीं, उनके साक्षात् पति परमात्मा ही हैं। जिनका आपाततः अर्थ अन्य है, परंतु महातात्पर्य ब्रह्ममें है—अवान्तर तात्पर्य इन्द्रादिमें और महातात्पर्य ब्रह्मप्रकाशनमें है, ऐसी भी श्रुतियाँ हैं। इसलिये एक श्रुति ऐसी है, जिसका मुख्य पति परमात्मा ही है। जैसे 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि। यही प्रभुकी स्वकीया हैं और जो इन्द्रादिका प्रतिपादन करती हुई प्रभुमें पर्यवसित होती हैं, उनके अवान्तर पति इन्द्रादि और मुख्य पति प्रभु ब्रह्म हैं। ऐसी परिस्थितिमें कहा कि 'कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम्॥' (श्रीमद्भा० १०।८७।१५) अर्थात् कोई कहीं भी पैर रखे, आखिर वह पृथ्वीपर ही है। इस प्रकार सब तत्त्व परम्परासे ब्रह्महीमें हैं। कटक, मुकुट, कुण्डलादि क्या सुवर्ण नहीं हैं? समुद्रकी लाखों तरंगें समुद्रहीसे हैं, परमात्मासे बने इन्द्रादि सब परमात्मा ही हैं। मीमांसक जातिमें शक्ति मानते हैं, वह 'त्व' प्रत्ययवेद्या है। जैसे घटत्व अर्थात् घटका भाव, घटरूपमें परिणत मृत्तिका एवं मृत्तिकात्वका अर्थ जल, जलत्वका तेज, तेजत्वका वायु, वायुत्वका आकाश, आकाशका अहंतत्त्व, उसका महत्तत्त्व, उसका अव्यक्त और उसका सत्तत्त्वमें पर्यवसान होता है। इसलिये सबका अर्थ वही है। 'सा सत्ता सा महानात्मा तामाहुस्त्वतलादयः'। अतः जितनी जातियाँ हैं, सबका पर्यवसान ब्रह्ममें ही है। सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद्वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) अर्थात् सब वस्तुओंका भावार्थ—स्वकारणमें
१९८ भक्तिसुधा पर्यवसित होता है, उसका भी सत्तामें और वही सत्ता शुद्ध याथात्म्य ब्रह्म है, फिर श्रुतियोंका अर्थ ब्रह्ममें पर्यवसित हो—इसमें क्या आश्चर्य? आखिर शब्द कहेंगे किसको? प्रपंचको, वह तो परब्रह्म ही है। अतः जो कुछ भी करे सबका पर्यवसान सत्तामें ही होता है और वही परब्रह्म है। फिर भी उनका अवान्तर अर्थ, वह और वह, विभिन्न पदार्थ ही हैं। घटका साक्षात् अर्थ कंबुग्रीवादिमान् व्यक्ति है। किंतु जब गम्भीरतासे विचार करें, तब उसका अर्थ ब्रह्म ही होता है। असली रूप वही है, नकली रूप अलग- अलग हैं। इसलिये व्रजांगनाओंके नकली ममताके आस्पद विभिन्न गोप थे, परन्तु उनसे व्रजांगनाओंका संगम नहीं हुआ था। जब व्रजांगनाएँ श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दके साथ रासलीला कर रही थीं, तब व्रजमें ब्राह्मी रात्रि प्रकट हुई। उस रासलीलाकी दिव्य शोभाको देखकर चन्द्र मध्याकाशमें स्थगित हो गया—‘विस्मितः शशाङ्कः’। छः मासकी रात्रि थी, घरमें सब गोपोंको अपनी-अपनी दाराएँ अपने-अपने पास मिलीं— ‘मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥’ (श्रीमद्भा० १०।३३।३८) एतावता यह सिद्ध हुआ कि ये व्रजांगनाएँ श्रीकृष्णकी स्वकीया थीं। जब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके संग विहार करती थीं, तब भी उनका मायामय स्वरूप सब गोपोंके पास था। इसीलिये कहा—‘न जातु’। तो बात यही आयी—‘व्रजदेवीनां पतिभिः सह संगमः’ कि जिन श्रुतियोंका अवान्तर तात्पर्य इन्द्रादिकोंमें है, वे परकीया और जिनका साक्षात् प्रभुमें है, वे स्वकीया हैं। इनमें भी तटस्था, प्रौढ़ा, मुग्धा इत्यादि बहुत भेद हैं। कोई निषेधमुखेन, कोई विधिमुखेन प्रभुमें पर्यवसित होती हैं। इस तरह अवान्तर अर्थ भी तबतक आदरणीय है, जबतक महातात्पर्यका ज्ञान नहीं होता। लोकमें भी गौण पति एवं मुख्य पति होते हैं। राजादि गौण पति और असली पति पूर्णतम पुरुषोत्तम परमात्मा हैं। जबतक उनकी प्राप्ति नहीं हुई, तबतक अवान्तर पतिका अनुसरण अपेक्षित ही है। जल ब्रह्म और तरंग जीव हैं।—‘सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥’ (रा०च०मा० ७।१११।६) जैसे वारिमें वीचि, वैसे पूर्णतम पुरुषोत्तममें जीवभाव है। इनमें एक तरंगका दूसरे तरंगोंके साथ सम्बन्ध गौण है। जलके साथ मुख्य, सुस्थिर, स्थायी सम्बन्ध है। परंतु अन्तर्मुखता न होनेके कारण अपने असली सम्बन्धपर दृष्टि नहीं जाती। यदि तरंग जलका अपलाप करे तो स्वयं कैसे रहेगा? वैसे ही जीव ब्रह्मका खण्डन करेगा तो स्वयं रहेगा कैसे? वास्तवमें वह ब्रह्म ही है, परंतु अन्तर्मुख न होनेके कारण ब्रह्मको नहीं देखता—‘आनँद- सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥’ (विनय-पत्रिका १३६।२) असलीको भूलकर नकलीको देखता है। हम जीव नकली सम्बन्धी दारादिकोंसे सम्बन्ध जोड़ेंगे, पर असली सम्बन्धी ब्रह्मसे नहीं। सब कुछ करेंगे नकलीके लिये, पर एक तरंगका दूसरी तरंगसे सम्बन्ध कितने दिन? एक-न-एक दिन वियोग होगा ही। जीवका जीवसे सम्बन्ध आगन्तुक है। अतएव क्षणभंगुर है। इसीलिये सबके परमपति श्रीपूर्णतम पुरुषोत्तम ही सबके मुख्य पति हैं। रास-प्रसंगमें जब प्रभुने व्रजांगनाओंसे लौट जानेके लिये कहा, तब उन्होंने कृष्णसे एक कहानी कही और पूछा—‘एक साध्वी स्त्री थी। एक बार जब उसके पति विदेश गये, तब वह पतिदेवकी मूर्ति बनाकर पूजा करती थी। एक दिन ऐसा अवसर आया कि वह मूर्तिकी पूजा कर रही थी, इतनेमें पतिदेव आ गये और स्त्रीसे कहा— किवाड़ा खोलो।’ अब प्रश्न है कि वह किवाड़ा खोले या मूर्तिकी ही पूजा करती बैठे? प्रभुने कहा— ‘असली पतिका स्वागत करना चाहिये।’ व्रजांगनाओंने कहा—हमारा भी उत्तर हो गया। तात्पर्य यह है कि शालग्रामका विष्णुबुद्धिसे पूजन, वैसे ही प्राकृत पतियोंका परमपति-बुद्धिसे पूजन
वेणुगीत ९९१
करना चाहिये। इसीलिये कन्यादानमें कहते हैं— ‘विष्णुरूपाय वराय लक्ष्मीरूपां कन्यां सम्प्रददे।’ अतः जगत्की सब हलचलें पूर्णतम पुरुषोत्तमकी ओर हैं। जबतक वह प्राप्त नहीं होता, तबतक गति बनी ही रहेगी। इसलिये सब श्रुतियोंका महातात्पर्य ब्रह्महीमें निर्धारित है। इस तरह स्वकीया, परकीया, मुग्धा, प्रौढ़ा, कान्तभाववती, सख्यभाववती, श्रुतिरूपा और मुनिरूपा—सब व्रजांगनाएँ वेणुरवका श्रवणकर उसका वर्णन करती हुई, आनन्दोन्मादमें तन्मयतावशात् एक दूसरीको ही श्रीकृष्ण समझकर परिरम्भण करने लगीं। प्रेमोन्मादमें श्रीकृष्ण ही उन्हें सर्वत्र दीखने लगे अथवा यों कहिये कि वर्णन करती हुई स्वबुद्ध्यारूढ़ प्रभुकी मंगलमय मूर्तिका परिरम्भण करने लगीं। वेणुरवमें भगवान्का स्वरूप तथा उनकी लीला प्रतिष्ठित है वेणुरवमें ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका स्वरूप और उनकी मंगलमयी लीला है। अतः उसके वर्णनमें प्रभुका वर्णन है। पहले तो श्रीकृष्ण ही रसामृतमूर्ति हैं। उनमें भी साधनता और साध्यता दोनों हैं। श्रीहस्त और श्रीचरणारविन्दादि अन्यान्य अंगोंमें साध्यता है और साधनता भी, किंतु आनन्द केवल साध्य ही है, सब उसीके लिये है, पर वह किसीके लिये नहीं। यही ब्रह्मका लक्षण है। अतः दोनों एक ही हैं। शब्दादि सब पदार्थ आनन्दके लिये हैं, वैसे ही आत्माके लिये भी हैं—‘आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।’ (बृहदारण्यक० २।४।५) जैसे आनन्द निरतिशय, निरुपाधिक और परप्रेमास्पद है, वैसे आत्मा भी निरतिशय, निरुपाधिक, परप्रेमास्पद है। जिसमें कभी प्रेम हो और कभी नहीं, वह अपरप्रेमास्पद है। जो ऐसा नहीं, वह परप्रेमास्पद है। औपाधिक ‘अपर’ और स्वाभाविक ‘पर’ है। औपाधिक उपाधिके अधीन होता है और स्वाभाविक उपाधिके अधीन नहीं होता। वह मिटता नहीं। संसारके सब प्रेम औपाधिक हैं, जैसे स्त्री-पुत्रादि प्रेम। इतना ही क्यों, संसारमें देवतापर भी जब वह अनुकूल होता है, तभी प्रेम होता है। मन्त्रोंमें भी कोई अरिमन्त्र, कोई मध्यम मन्त्र है। जिससे अनुकूल फल नहीं होता, वह अरिमन्त्र है। इसी विचारसे कहा है कि जब समान तत्त्व और समान साधक मिलें, तब मन्त्रसिद्धि ठीक होती है। आजकल तो यह सब विचार ही नहीं है। शास्त्र कहते हैं—पहले ठीक विचार कर लो, फिर मन्त्र लेना। अस्तु, सारांश यह कि जब देवता भी आत्मानुकूल हों, तब उनमें प्रेम होता है। देखा जाता है कि शैव विष्णुद्वेष और वैष्णव शिवद्वेष करते हैं। वास्तवमें पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभु एक ही हैं, पर व्यर्थ उनमें द्वेषास्पदता, रागास्पदताकी कल्पना करते हैं। रामभक्तोंको रामायणमें जो मिठास प्रतीत होता है, वह इतर ग्रन्थोंमें नहीं। वृन्दावनमें तो कृष्णमें भी भेद मानते हैं, एक बायें मुकुटवाले श्रीकृष्ण, दूसरे दायें मुकुटवाले श्रीकृष्ण। वास्तवमें बाये-दायेंमें भी कुछ रहस्य, कुछ भाव अवश्य है। वेणुगीतप्रसंगमें बायें मुकुटवाले ही श्रीकृष्ण हैं। ‘वामबाहुकृतवामकपोलः’ (श्रीमद्भा० १०।३५।२) श्रीभगवान्की ललित मूर्तिमें मुकुट बायीं ओर ही झुकता है। कहते हैं जहाँ वामांगमें श्रीवृषभानुनन्दिनी विराजमान हैं, वहाँ श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण परमानन्दका वामांगमें ही झुकाव है। जैसे उनका झुकाव, वैसे उनके भूषणोंका भी झुकाव है। इसलिये उस परिस्थितिमें मुकुटका बायीं ओर झुकाव स्वाभाविक है। जहाँपर श्रीकृष्ण और बलराम, वहाँपर दक्षिणमें और जहाँ नन्दबाबा दक्षिणमें और वाममें श्रीनन्दरानी, मध्यमें बलराम नन्दरायके पास, श्रीकृष्ण यशोदाके पास, उस समय मुकुटका दायें बलरामकी ओर झुकाव होता है। यही वास्तवमें रहस्य है। यह झगड़ा आखिर जब कचहरीमें गया तो जजने कहा—मुकुटको सीधा रखो। अस्तु, मूल विषय यह था कि आनन्द निरतिशय, निरुपम, परप्रेमास्पद है और अन्य
औपाधिक सातिशय हैं। आनन्द और आत्मा एक ही बात। आनन्दसे जैसे कभी शत्रुता नहीं होती वैसे ही आत्मासे भी कभी शत्रुता नहीं होती। सर्वद्रोह हो सकता है, पर आत्मद्रोह नहीं होता। श्रीकृष्ण निखिलरसामृतमूर्ति, आनन्दसारसर्वस्व हैं। वे साध्य-ही-साध्य हैं, साधन नहीं, अतः परप्रेमास्पद हैं। इनमें भी कुछ भावुक तारतम्य करते हैं और कहते हैं कि उनमें भी केवल अमृतमय मुखचन्द्रकी सुधा ही साध्य है, वह किसीकी साधन नहीं। पर भावुक कहते हैं कि उसमें भी देवभोग्या अधरसुधा, भगवद्भोग्या अधरसुधाका साधन और वह भी सर्वभोग्या अधरसुधाका साधन है। परस्पर भावापत्तिपूर्वक वह सर्वभोग्या अधरसुधाका साध्यमात्र है, वह किसीका साधन नहीं है। वह रससे अभिव्यक्त होती है। अतः प्राधान्यात् यहाँ रववर्णन किया गया है। उसमें श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द और उनकी नित्य लीला भी निहित है, इसलिये 'इति वेणुरवं राजन्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।६) इस वेणुरवमें अमृतत्वका उपालम्भ होता है, जिससे ब्रह्मा, शुक, सनकादि भी मोहित होते हैं— 'शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः.... कश्मलं ययुरनिश्चिततत्त्वाः॥' (श्रीमद्भा० १०।३५।१५) इस रवका प्राधान्य इसीलिये है कि उससे पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभु प्रकट होते हैं। वैसे तो प्रभु सर्वत्र हैं ही; पर जब व्यंजक नहीं तब क्या? इसलिये भावुक व्यंग्य भगवान्से भी अधिक व्यंजक नामको बड़ा मानते हैं। अरबोंकी सम्पत्ति घरमें भरी हो, पर वह विदित नहीं तो उसका क्या उपयोग? घरवाला हल ही चलाता रहेगा। 'नाम' यह खजानेका बीजक है। पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम प्रभु 'निधि' हैं और 'नाम' उसका बीजक है। यही कहा है— नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥ (रा०च०मा० १।२३।८) इस नामबीजकद्वारा प्रयत्न करनेपर प्रभु प्रकट होते हैं कहा है कि—'कहउँ नामु बड़ राम तें', (रा०च०मा० १।२३) 'राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥' (रा०च०मा० १।२४।३) नाम मूल-चिकित्सा है और राम पल्लव-चिकित्सा। राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥ नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥ (रा०च०मा० १।२५।३-४) श्रीरामने भालु-बन्दरोंको लेकर प्राकृत शतयोजन समुद्र पार किया, किंतु नाम लेनेसे अपार भवसिन्धु ही सूख जाता है। अतः नाम सबसे बड़ा है। वेदान्त कहते हैं कि वाक्य-श्रवणसे तत्त्वसाक्षात्कार होता है। भक्त भी भगवत्साक्षात्कारका मूल श्रवण ही मानते हैं। निर्गुण-साक्षात्कारको भी श्रवणकी ही अपेक्षा है। व्रजांगनाओंको भी उद्बुद्ध उभयविधि शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णके लिये वेणुरव ही अपेक्षित है। इसलिये वह मूल वेणुरवको पकड़ती हैं कि उसी रवसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द व्यक्त होंगे। जैसे हृदयमें प्रथममें ही विराजमान निर्गुण परब्रह्म तत्त्वका श्रवण-मनन-निदिध्यासनद्वारा महावाक्यसे ही साक्षात्कार होता है, उसी तरह सगुण-साकार सच्चिदानन्द परब्रह्मका भी साक्षात्कार उन चरित्रों एवं गुणगणोंके श्रवणसे होता है। चरित्रश्रवणसे प्रथम चरित्रनायक भगवान्का मानसरूप प्रकट होता है, उसी मानसी भगवदीय प्रतिमाका ध्यान करते-करते ही माया-जवनिकाके अपसारणसे, जिससे कि भगवान् आवृत होते हैं, उस भगवान्का दिव्य रूप प्रकट होता है। इस तरह शब्दसे ही भगवान्का प्राकट्य होता है, फिर जहाँ भगवच्चरित्रों और भगवन्नामोंसे भगवान्का प्राकट्य होता है, तब साक्षात् भगवान्के मुखचन्द्रसे निर्गत वेणुगीतपीयूषके पानसे भगवान्का प्राकट्य होना स्वाभाविक है। शब्द प्रकाशक और अर्थ प्रकाश्य होता है। शब्दब्रह्मरूपमें व्यक्त भगवदधरसुधासे भगवान्का प्राकट्य होना स्वाभाविक है।
वेणुगीत १२१ वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण परस्पर अन्तरात्मा हैं उस वेणुरवका ही वर्णन करती हुई व्रजांगनाएँ परस्पर अभिरमण करती हैं। इस रवद्वारा सदानन्दरूप ही हृदयमें व्यक्त होता है। कृष्ण पदका अर्थ ही सदानन्द है। कहा है—'कृषिर्भूवाचकः शब्दः णश्च निर्वृतिवाचकः।' कृष् धातुका अर्थ भू— सत्ता और 'ण' का अर्थ निवृति—आनन्द है। तथा च 'सत्ता—आनन्द' यह कृष्ण पदका अर्थ है। 'तमालश्यामलत्विट् यशोदास्तनन्धय' इसका अर्थ कोई श्रीकृष्ण ही कहते हैं, इसमें भी विरोध नहीं है। उसमें भी सत्ता और आनन्द दोनोंका ऐक्य है। स्वयंप्रकाश सत्तारूप आनन्द, आनन्दरूप सत्ता दोनों एक ही बात है। सत्तारूपा श्रीवृषभानुनन्दिनी एवं आनन्दरूप श्रीकृष्ण हैं। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द और श्रीवृषभानुनन्दिनी वैसे ही अभिन्न हैं, जैसे सत्ता और आनन्द। यदि आनन्द सत्ता न हो तो सत्ता बिना आनन्द असत् हो जाय। फिर जो असत् है, वह आनन्द कैसे ? वैसे ही आनन्दसे वियुक्त शुद्ध सत्ता नहीं है। जड़ोंकी सत्ता दूषित, सविशेष सप्रपंच है, किंतु शुद्ध सत्ता निरुपद्रव, निर्विशेष आनन्दरूप ही है और सब विनश्वर सत्ता है। यों तो वैषयिक आनन्द भी विनश्वर है, अतः सदानन्द कहाँ ? आनन्द, सत्ता दोनों परस्पर विशेषण हैं। वह आनन्द अबाध्य है, जगदानन्द बाध्य, इसीलिये वह श्रीकृष्णका स्वरूप वास्तविक सद्रूप एवं आनन्दरूप है, जो अत्यन्त अबाध्य नित्य स्वप्रकाश है। उसके साथ जब सत् लगा, तब सांसारिकसे विलक्षणता, नित्यता आयी एवं सत्में आनन्द न लगाते तो प्रापंचिक सत्ता आती। अतः सत् और आनन्द दोनोंको लगाया। यह सत् और आनन्द परस्पर वियुक्त कभी नहीं होते, इसलिये वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण परस्पर अन्तरात्मा हैं। एक तो यह कि जैसे जलमें तरंग, वैसे परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णमें व्रजांगना, जैसे चन्द्रमामें चन्द्रिका, जैसे भानुसे प्रभाका, वैसा उनका अविघटित स्वाभाविक सम्बन्ध है, किंतु इससे भी अन्तरंग यह सम्बन्ध है, जैसे अमृतमें मधुरिमा एवं जहाँ परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण, वहाँ उनकी माधुर्याधिष्ठात्री वृषभानुनन्दिनी। अमृतसे मधुरिमाको अलग किया, फिर अमृतत्व ही क्या ? वेदान्ती गुण-गुणीका तादात्म्य मानते हैं। इसलिये सत्ता-आनन्दरूप वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण दोनों एक ही हैं। एक ही सदानन्दरूप भगवान् गौरतेज-श्यामतेजरूपमें—राधा-माधव उभय रूपमें प्रकट हुए। इसी दृष्टिसे कहते हैं कि श्रीकृष्णका आन्तरस्वरूप वृषभानुनन्दिनी तथा बाह्यस्वरूप पुमान् है तथा वृषभानुनन्दिनीका आन्तरस्वरूप पुमान् और बाह्यस्वरूप वृषभानुनन्दिनी है। हितहरिवंश-सम्प्रदायमें कहा है कि गौरश्याम शीशियोंमें श्यामगौर रस भरा हो, वैसे ये दोनों हैं। दोनों शीशी भी एक जातिकी ही हैं। गौर शीशी श्यामहृदयकी वस्तु है और श्याम शीशी गौर-हृदयकी वस्तु है। गौरमें श्यामरस एवं श्याममें गौररस भरा है। इस तरह परस्पर श्रीकृष्ण और वृषभानुनन्दिनी परस्पर हृदयकी वस्तु हैं, दोनोंमें परम अन्तरंगता है। इसलिये कहा है कि 'उभयोभयभावात्मा' हैं। इस प्रकार वह परमतत्त्व भरपूर होकर वेणुरवद्वारा व्यक्त होता है। इसलिये उसका वर्णन करती हुई व्रजांगनाएँ श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका परिरम्भण करती हुई अनुरागकी महिमासे परस्परका परिरम्भण करने लगीं अथवा श्रीकृष्ण-साक्षात्कारसे रमण करने लगीं। इन्द्रियवानोंकी यही लालसा कि प्रभु इन्द्रियग्राह्य होकर प्राप्त हों गोप्य ऊचुः— अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननु विवेशयतोर्वयस्यैः। वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।७) श्रीधराचार्यके मतमें 'गोप्य ऊचुः' नहीं है, इसलिये 'अनुवर्णनेनाहुः-अक्षण्वतामिति' ऐसा
उन्होंने लिखा है। 'गोप्यः' का अर्थ सनातन गोस्वामी 'गोपयन्ति श्यामसुन्दरमिति गोप्यः' करते हैं। व्रजांगनाएँ अपने श्यामसुन्दरको छिपाती हैं, इसलिये कि कोई उन्हें जान न जाय। व्रजांगनाएँ कहती हैं—हे सखियो! नेत्रवानोंका, नेत्रधारियोंका यही फल है। क्या? जल्दी नहीं कहते बना, प्रेमभारसे विवश हो गयीं, अतः सहसा हृद्गत तत्त्व निर्देष्टुं अशक्य हो गया। वह निकलता ही नहीं, सखि! क्या? वह इस समय उनका हृदय ही जानता है। यहाँ 'अक्षण्वतां' से 'सर्वेन्द्रियवतां' यह अर्थ करना चाहिये। इन्द्रियवानोंका और उनकी इन्द्रियोंका यही फल है। 'आवृत्तचक्षुः' माने केवल आँखोंको मींचकर ही दर्शन न होगा, अपितु चक्षुपलक्षित सर्वेन्द्रियोंका निग्रह आवश्यक है। यहाँ भी व्रजांगनाएँ कहती हैं—हे सखि! सर्वेन्द्रियवानोंका यही फल है, केवल चक्षुष्मानोंका नहीं। क्या? तब कहते हैं कि वे जो परमरसामृतमूर्ति व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द हैं, उनके मंगलमय अंगोंके सौरस्यादिका आस्वादन करना। नहीं तो फिर निर्गुण, निराकार परब्रह्म तो इन्द्रियानुपभोग्य है। 'यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह।' (तैत्तिरीय० २।४) इन्द्रियाँ तो विफल हुईं न? बुद्धिग्राह्य होनेपर भी क्या हुआ? महावाक्यजन्य तदाकाराकारित अन्तःकरणवृत्तिसे स्पर्श किया, निर्वृत्तिक अन्तःकरणको भी स्पर्श न मिलेगा। फिर भी मान लो कि उसको मिला, पर इन्द्रियोंको तो नहीं मिला। ठीक स्पर्श जीवात्माको— सर्वोपाधिविनिर्मुक्तको मिलेगा। इसीलिये कहती है कि सखि! इन्द्रियवानोंके इन्द्रिय होनेकी सफलता मनमोहन श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके अमृतमय मुखचन्द्रका इन नयनोंसे दर्शन, भुजाओंसे परिरम्भण, घ्राणोंसे उनके सौरभका अवघ्राण, रसनासे प्रियतम प्रधानके अमृतमय मुखचन्द्रकी सुमधुर अधरसुधा-पान करनेको मिले। सर्वेन्द्रियद्वारा सम्भोगयोग्य सबके परम प्रेमास्पद केवल बुद्धिग्राह्य हों, यह सह्य नहीं, किंतु सर्व रोम- रोम भी उतावले हो उठेंगे। भले ही कैवल्यकी कोई स्थिति हो, जहाँ इन्द्रियोंका रोना-धोना कुछ नहीं, परंतु यदि वह स्थिति न हो तो पूर्ण आस्वादन सभीको हो; क्योंकि कोई भी तत्त्व भगवद् विप्रयोगमें हो, उस सत्तारूपसे भी वियुक्त होना, असत्, स्फूर्तिविहीन, निस्फूर्ति, नीरस हो जाना कौन चाहेगा? कौन अपनेको स्फूर्तिविहीन, नीरस, सत्ताविहीन होना चाहेगा? कहा है—'लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः' परमप्रेमीका लक्षण यही है कि जो प्रियतमके वियोगमें रह न सके। 'त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१५) एक लव, निमेषमें भी युग, कल्प, महाकल्प हों। 'गोपीनां परमानन्द आसीद् गोविन्द- दर्शने। क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत्॥' (श्रीमद्भा० १०।१९।१६) व्रजांगनाओंको श्याम- सुन्दरके दर्शनमें महाकल्प भी क्षणके समान और वियोगमें क्षण भी कल्पके समान बीतता था, यही तीव्रताप है। इतना ही नहीं, बल्कि वियोगमें रह ही न सके? यही उत्कट प्रेम है। जलसे वियुक्त कहीं तरंग रह सकेगी? यह शुद्ध प्रेमका लक्षण है कि प्रियके वियोगमें न रह सके। सत्से वियुक्त होनेसे असत् हो जाता है। श्रीकृष्ण परमानन्द रसस्वरूपके वियोगमें नीरसता, निस्फूर्तिता हो जाती है। इस प्रकार जब सभी श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दके अनन्य प्रेमी हैं, तब इन्द्रियोंको ईर्ष्या होती है कि जो श्रीकृष्ण प्रभु प्रकट हैं, हाय! हम उनसे वंचित हैं। वे रोती हैं—'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूः' (कठ० २।१।१)। जो ध्यानमें श्रीकृष्णका अनुभव करते हैं, उनके नेत्रादि इन्द्रियाँ तड़फड़ाती रहती हैं, लालायित रहती हैं, अतः एक कहती है—'अक्षण्वतां फलमिदम्'। दूसरी कहती है—'न परं विदामः परं किञ्चित्' तो यह कुछ है ही नहीं। परंतु 'वयं तु न विदामः' हम तो नहीं जानतीं। हमें खण्डन-मण्डनसे क्या मतलब? किसीके लिये भले ही परमात्मा हों, पर हमारे तो श्यामसुन्दर हैं। भावुक कहते हैं—श्यामसुन्दर चाहे जैसे हों, प्रियतम
प्राणधन हमसे द्वेष करते हों या करुणा करते हों, पर हमारे ज्ञेय, ध्येय सब कुछ वे ही हैं। यह शर्त नहीं कि यदि वह प्रेम करें, तभी हम उनसे प्रेम करें। यह तो व्यापार हुआ। सौन्दर्यकी शर्त भी नहीं, वह व्यभिचारिणी भक्ति होगी। अटल भक्तिके माने यही है कि चाहे जो जैसा हो, अपनी वस्तुओंमें निरतिशय प्रीति होती है। वही ठीक है। अतः वह खण्डन-मण्डन नहीं करतीं। वह तो कहती है कि 'अन्ये अन्यञ्जानन्तु नाम वयं तु न विदामः' अर्थात् मोक्षादि अन्य फलोंको भले ही कोई जानते हों, परंतु हम नहीं जानतीं। मान लिया कैवल्य हुआ, किंतु वह सर्वेन्द्रियग्राह्य नहीं है। इसलिये इन्द्रियवानोंकी लालसा यही है कि वह श्रीकृष्ण प्रभु सर्वेन्द्रियग्राह्य होकर प्राप्त हों। व्रजांगनाएँ कहती हैं—सखि! 'वयं उपनिषद्रूपाः' हम उपनिषद्रूपा हैं। यदि हम न जानेंगी तो दूसरा कौन जानेगा ? फल तो श्रुति ही कहती है। फिर वेदविहीन नये फलको कोई जानते हों तो जानें। अर्थात् वेदप्रामाण्यवाले सारभूत फल-निर्णयमें उपनिषदोंको ही प्रमाण मानते हैं, इसलिये यह फल है, दूसरा नहीं। इससे भी ऊँची बात यह है कि ब्रह्मदेव कहते हैं—'एषां तु भाग्यमहिमा' इन व्रजांगनाओंके— घोष-निवासियोंके अनन्त अद्भुत भाग्यकी महिमा, हम उसे क्या गायें? हम तो अपनेको कृतार्थ समझते हैं। हम कौन ? ग्यारह इन्द्रियोंके अधिष्ठात्री देवता। जो व्रजांगनाजन आपके उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक परमरसामृतमूर्ति आपके आनन्दका साक्षात्कार करते हैं, उनकी महिमा तो अलौकिक है। हम इन्द्रियोंकी अधिष्ठात्री देवता अपनेको अत्यन्त भाग्यवान् समझते हैं। यह क्यों ? इसलिये कि जब व्रजांगना अपने हृषीक-चषकोंसे आपके श्रीअंगोंके सौन्दर्यामृतसुधाका पान करती हैं, तब उनकी अधिष्ठात्री देवता होनेसे हमारा परम्परासे हृषीक-चषकोंसे सम्बन्ध होता है, व्रजांगनाएँ अपने हृषीक-चषक इन्द्रियपानपात्रोंसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दके सौन्दर्यमाधुर्य-सौगन्ध्यामृतका पान करती हैं। इसलिये मुख्य पात्र व्रजांगनाएँ हैं। पानका साधन इन्द्रियपानपात्र है। जैसे नेत्रपानपात्रद्वारा आपके अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्यामृतका, घ्राणपानपात्रद्वारा सौगन्ध्यामृतका, श्रोत्रपानपात्रद्वारा वेणुगीत तथा अमृत वचनोंका, रसपानपात्रद्वारा अमृतमय मुखचन्द्रकी सुमधुर अधरसुधाका पान करना। यहाँ व्रजांगनाएँ पानकर्त्री हैं। इन्द्रियरूप पानपात्रका सम्बन्ध रससे कहा है—'दर्वी पाकरसं यथा।' यहाँ ब्रह्मा कहते हैं कि हम तो चषक भी नहीं हैं। इन्द्रिय भी करण हैं, जब उनको भी रससम्भोग नहीं, तब उन इन्द्रियोंके अधिष्ठाता हम देवताओंको वह रससम्भोग कहाँ ? व्रजांगनाएँ श्रोत्रद्वारा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके वचनसुधाका पान करती हैं, उसमें ये इन्द्रियाँ दोना हैं। पानपात्रको क्या स्वाद आयेगा ? कटोरा क्या स्वाद ले ? तथापि उस रसको छूनेवाला एक चषक भी अपनेको कृतकृत्य मानता है और हम तो परम्परा भी अपनेको कृतार्थ मानते हैं। फिर इन्द्रियाँ और उनसे भी अधिक व्रजांगनाएँ कितनी भाग्यवती हैं। हम इतना ही अपना भाग्य समझते हैं कि हम जिन इन्द्रियोंके देवता हैं, उनके द्वारा व्रजांगनाएँ प्रभुके सौन्दर्य-सौगन्ध्यादिका पान करती हैं, इसलिये 'एषां तु भाग्यमहिमाच्युत तावदास्ताम्।' (श्रीमद्भा० १०।१४।३३) जहाँ ब्रह्मादि देव ऐसा परम्परा कहते हैं, वहाँ व्रजांगनाएँ क्यों न कहें कि 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः'। सखि ! हमारा- तुम्हारा संवाद है। सम्मति है कि नहीं? कहती हैं 'इदं' यानी उस समय जो स्वरूप प्रस्फुरित होता था, जिसका 'बर्हापीडं नटवरवपुः' से वर्णन किया गया है, वही वृन्दावनविहारी यहाँ 'इदं' से कहे गये हैं। व्रजमें व्रजांगनाओंको श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- कन्दका दर्शन होता ही है, फिर वे अत्यन्त आर्त क्यों ? तो कहती हैं कि यद्यपि व्रजस्थ श्रीकृष्णका दर्शन तो करती ही हैं, तथापि अन्यान्य स्वरूपोंमें। इस समयका विशेष दर्शन है। 'इदं इति बुद्धिस्थत्वादिदमानिर्देशः' अर्थात् द्वारकावासी,
१२४ भक्तिसुधा मथुरावासी, व्रजवासी सब भले ही एक हों, परंतु मनमोहनका यह ‘नटवरवपु’ है। इन व्रजेशसुत नन्दरायसुवन श्रीकृष्ण और बलरामको गौओंको वृन्दावनमें निवेश कराते हुए जिसने देखा, उसीकी इन्द्रियोंकी सफलता है। बलराम यद्यपि व्रजेशसुत नहीं तथापि ‘पालितपुत्रत्वात्’ यह आरोप है। कोई-कोई वसुदेवको भी व्रजेश कहते हैं, पर वह खींचा-तानी है। नन्दरायके पुत्र ललन—कृष्ण और वसुदेवके बलराम, मगर व्रज यही समझता था कि दोनों व्रजेशनन्दन ही हैं। इसलिये ‘व्रजेशसुतयोः’ यहाँ द्विवचन कहा गया है। ‘वक्त्रम्’ यह एकवचन एकवद् भावसे हो सकता है, पर इसमें सरसता नहीं है। व्रजांगनाओंके मनमें तो मनमोहन श्रीकृष्णका ही अमृतमय मुखचन्द्र था। तब फिर ‘व्रजेशसुतयोः’ क्यों ? इसलिये कहते हैं—‘अनुवेणुजुष्टम्’। यह श्रीबलरामके मुखका व्यावर्तन है। व्रजेशसुत बलराम और श्रीकृष्ण, दोनोंमें जो वेणुजुष्ट है, उसके सौन्दर्य- माधुर्य-सुधाका पान किया। इनके मनमें सिवा श्रीकृष्णके दूसरी बात ही नहीं है अथवा—जबतक उनको होश-हवास था, तबतक अपनेको संभाला। कोई कुछ कहेंगे कि कुछ गड़बड़ी है क्या? ‘गुप्त प्रेम सखि सदा दुरैये’ इसलिये कहा—‘हम तो दोनोंकी बात कर रही हैं अर्थात् सँभालकर द्विवचन दिया। ‘व्रजेश’ इसलिये कहा कि हम व्रजमें बसती हैं तो उनके लड़केकी प्रशंसा करनी ही चाहिये। यहाँतक तो ठीक, पर आगे सँभाले सँभल न सकीं। प्रभुका मुखचन्द्र सम्मुख आया, वह तो व्रजांगनाओंके हृदयके पूर्णानुराग-रससार-सरोवरसे निकलनेवाला ही है। जैसे तूफानसे सागर उद्वेलित हो उठता है, उसी प्रकार व्रजांगनाओंको हुआ और वे अपने भावोंको सँभाल न सकीं। यहाँ वल्लभाचार्य कहते हैं—जिन्हें भगवान्ने आधिदैविक देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि इत्यादि प्रदान किया है, उनके लिये यही परम फल है कि कृष्णचन्द्रके सौंदर्यादिका आस्वादन करें। जैसे कोई कमलनेत्र पुरुष सदा अन्धकारहीमें स्थित रहे तो उसके नेत्रोंका होना ही निरर्थक है, वैसे ही भगवान्ने कृपाकर आधिदैविक देहादिको प्रदान किया है, उनसे यदि प्रभुकी सुधाका आस्वादन न किया तो वे विफल हैं। हाँ, यह हो सकता है कि किंचित् काल अन्धकारमें स्थिति हो, पर सर्वदा हो तो नेत्रोंका होना-न-होना बराबर ही हो जायगा। इस स्थितिको वल्लभाचार्य ‘सर्वात्मभाव’ कहते हैं अर्थात् देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकारादि विस्मरणपूर्वक सर्वत्र श्यामसुन्दरका ही दर्शन होना। इस अवस्थामें निजी अस्तित्व पृथक् नहीं रहता, इसलिये स्वपार्थक्येन श्रीकृष्ण प्रभुका भी भान नहीं होता। इसीलिये उनके सुधास्वादनका भी भान नहीं रहता, किंतु इसे कदाचित्क, यानी संचारी भाव कहते हैं। यह भाव (सर्वात्मभाव) विशेषकर विप्रयोगमें मानते हैं। इसीको आन्तररमण भी कहते हैं अर्थात् बाह्यसंप्रयोग न होनेपर भी आन्तरसंप्रयोग होता ही है। इसकी भी बड़ी महिमा गायी गयी है। कहते हैं— ‘संगमविरहविकल्पे वरमिह विरहो न संगमस्तस्य’। संगम और विरह, इनमें प्रियतमका विरह ही अच्छा है; क्योंकि संगममें प्रियतम एक ही हैं, विरहमें निखिल विश्व ही प्रियतम हो जाता है। जिधर दृष्टि जाय, उधर प्रियतम-ही-प्रियतम दिखलायी पड़ते हैं। फिर भी इस भावको सार्वदिक् मानें तो गड़बड़ हो जाय, इसलिये ही कमलनेत्र पुरुषकी उपमा दी। प्रभुके अधरसुधाका आस्वादन यही परम फल है। ध्यान लगानेकी रीति ध्यानाभ्यासी लोग अन्तमें सर्वविस्मरण चाहते हैं। ‘विष्णुपुराण’, ‘भागवतादि’ में जहाँ ध्यान कहा है, वहाँ सांग, सपरिवार, सर्वभूषणादिसहितका ध्यान है, किंतु मन तो महाचंचल बेताल है। उसका एक जगह होना ही कठिन है, अतः मन प्रभुके भूषणोंका ही चिन्तन करे। मन अनेक विषयोंमें क्यों न स्थित हो, पर वह अनेकता प्रभुके स्वरूपमें ही हो। वहाँसे उसको अलग न जाने देना। बस, ध्यानकी यही सीमा
है। चंचल बन्दरको पद्मासनपर बैठकर निर्विकल्प समाधि कैसे लगे ? तो उसके लिये यह उपाय करो— पहले एक बगीचेसे यह बाहर न जाय। फिर एक ही वृक्षपर, फिर एक ही शाखापर बैठा रहेगा। मन बन्दरसे भी अधिक चंचल है। क्षणमें स्वर्गसे नरकतक दौड़ लगाता है। इसको पहले आलम्बन दो। भक्तगाथा, श्रीकृष्णकी लीला आलम्बन है। फिर मूर्तिमें ही रहे। इस प्रकार विषय-संचार सीमित किया जाय। जितना अधिकाधिक विषयचिन्तन, उतनी ही चंचलता अधिकाधिक। जितनी श्रीकृष्णचिन्तनमें संलग्नता, उतनी स्थिरता अधिक।—‘मामनुस्मरतश्चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥’ (श्रीमद्भा० ११।१४।२७) मक्षिकाकी सन्तान दुर्गन्धित वस्तुपर बैठती है, चन्दनपर नहीं। भावुक कहते हैं कि प्रथम श्रीकृष्णके सर्वांगका भूषणसहित ध्यान, फिर श्रीअंगोंका, फिर केवल मन्दहासयुक्त मुखचन्द्रका ही ध्यान करना चाहिये— ‘तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा।’ (गीता ६।१२) यदि सुस्मित मुखचन्द्रमें मन एकाग्र हुआ तो फिर कुछ चिन्तन न करे। अन्तमें मुखचन्द्रका चिन्तन होते-होते और अलौकिक सौन्दर्य, माधुर्य सुधास्वादनमें मन स्तब्ध हो जाता है, विभोर-विह्वल हो जाता है, वाग्- गद्गदा होती है, चित्त द्रवता है, सर्वेन्द्रियोंको निश्चेष्टता प्राप्त हो जाती है। ‘प्रेम भरा मन’ श्रीभरत-राम-संमिलनके अवसरपर भरतके प्रेमरूपीरसमें सराबोर हो गया, मन निज गतिसे रहित हो गया। उस समय न किसीने कुछ कहा, न पूछा, कहा—‘मन बुधि चित अह्मिति बिसराई॥’ (रा०च०मा० २।२४१।२) इससे बढ़कर निर्विकल्प समाधि कहाँ? चारों अन्तःकरण निश्चल हो गये। इस प्रेमामृतसिन्धुमें जब प्रेमीका उन्मज्जन-निमज्जन होता है, तब फिर सर्व विस्मरण हो जाता है। कहा है— यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) इसीलिये ‘भागवत’ तृतीयस्कन्धमें कपिल- देवहूति-संवादमें परब्रह्मका उपदेशकर सगुण साकारका ध्यान बतलाया है। पहले श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दके सर्व आभूषणोंका चिन्तन करे। कहा है—‘तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते॥’ (श्रीमद्भा० ३।२८।३४) एवं भगवान्के स्वरूपमें उस मनको आसक्तकर सर्व विश्वसे हटा ले। अन्तमें प्रेमोन्मादमें ऐसा होता है कि दूसरोंका ध्यान दूर रहा, ध्येयस्वरूप भी छूट जाता है। किंतु प्रेमी यह नहीं चाहते कि हमारे मनको भगवान् भूल जायँ, क्योंकि वह मुमुक्षुके लिये है। भक्त मुमुक्षु नहीं होता, वह ब्रह्मलोकान्त विरक्त होकर प्रभुके मुखचन्द्रका दर्शन ही चाहता है। कहा है— न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) सर्वात्मभाववाले भक्तको चाहे श्रीकृष्णके मुखचन्द्रके दर्शनमें क्षणिक सर्वविस्मृतिपुरःसर सर्वत्र प्रभुका ही भान हो जाय, पर सर्वदाके लिये यह इष्ट नहीं मानते। वह चाहते हैं कि सावधानीसे प्रभुकी सेवा करें। इसी भावको लेकर कहा है—‘अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।’ यहाँ यद्यपि ‘चन्द्र’ पद नहीं दिया तथापि आगेके ‘पीतम्’ से ज्ञात होता है कि ‘चन्द्रमुख’ यदि चन्द्र न हो तो पेय कैसे हो? ‘पिबत भागवतं रसमालयम्’ (श्रीमद्भा० १।१।३) यहाँ निगमकल्पतरुसे विगलित रसमय फल पीनेके लिये कहा है। कहते हैं फल तो चोष्य होता है, पेय नहीं। उसमें बकला, गुठली होती है, अतः कहा ‘रसम्’ अर्थात् ‘रसवत्’ (‘गुणवचनान्मत्तुप्’)। आम्रफल रसवान् होता है, उसमें भी कुछ त्याज्य होता ही है। यहाँ रसात्मकता कही, इसीलिये कि यहाँ कुछ छोड़नेकी चीज है ही नहीं। इसी अर्थसे यहाँ ‘पीओ’ कहा है। जिन्होंने श्रीकृष्णचन्द्रके वक्त्रका पान किया। इससे मुखचन्द्रका ग्रहण होता है। चकोरी जैसे अमृतमय चन्द्रमाकी चन्द्रिकाका पान करती है, वैसे ही व्रजांगनाएँ श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र
१२६ भक्तिसुधा परमानन्दकन्दके अमृतमय मुखचन्द्रके सौरस्य- सौगन्ध्यादिसमन्वित सुमधुर अधरसुधा-चन्द्रिकाका पान करती हैं। इसलिये यह प्राकृत वक्त्र नहीं, पूर्णानुरागरससारसागराविर्भूत चन्द्रमा है। इसीलिये वह निपान करनेयोग्य है। ऐसा जिन्होंने पान किया; उन्हींके नेत्रोंका साफल्य है। अथवा यह कि सखि! जिन्होंने नेत्रोंद्वारा अनुरागपुरःसर श्रीकृष्णचन्द्र व्रजेन्द्रनन्दनके मुखचन्द्रका दर्शन किया, वे परम सौभाग्यशाली हैं। उनमें भी वे जिन्होंने सर्वाभोग्या अधरसुधाका पान किया। यह एक प्रेमार्त्तिजन्य व्याकुलता है, अतृप्ति है। उसके कारण जो अपनी सर्वस्व निजी, नित्यप्राप्त वस्तु है, उसमें भी दुर्लभताकी प्रतीति होती है। कहती है— सखि! मनमोहनके मुखचन्द्रका दर्शन करनेवाले कई तरहके हैं। भगवान्के अन्यान्य अवतारोंके मुखचन्द्रका दर्शन करनेवाले, द्वारकास्थ, मथुरास्थ, व्रजस्थ- मुखचन्द्रके दर्शन करनेवाले हम तो इस समयका, जबकि वे अपने सखाओंद्वारा वनमें निवेशन करनेवाले हैं, तब उनका दर्शन करती हैं। जिन्होंने ‘जुष्टं’ प्रीति-अनुराग-स्नेहपुरःसर ‘पौनःपुन्येन अभ्यसन’ किया, उनका साफल्य है। फिर जिन्होंने सर्वभोग्या अधरसुधाका पान किया, उनका क्या पूछना ? व्रजांगनाओंका उपालम्भनयुक्त मनोभाव ‘पशून्नु’—व्रजांगनाएँ गौओंको जब अपने दर्शनमें विघ्न समझतीं, तब उन्हें पशु कहने लगती हैं। कहती हैं, उनका दर्शन हमें परम दुर्लभ है। जहाँ क्षण भी कल्पकोटिशत, वहाँ सम्पूर्ण दिवस कैसा बीतता होगा? निर्निमेष नयनोंसे श्रीकृष्णचन्द्रके आगमनकी प्रतीक्षा करती रहती हैं। जब श्रीकृष्ण पधारते हैं, तब धूलि उड़ती देख पानी भरनेके व्याजसे झरोखोंमेंसे धूलिमें ही टकटकी लगाती हैं कि श्रीकृष्ण आते हैं। कहीं विलम्ब होता तो ब्रह्मा, रुद्रको कोसतीं कि जब श्यामसुन्दर आते हैं, तब ऋष्यादि उन्हें वन्दन करते हैं। अतः उन्हें आनेमें देर लग जाती है—‘वन्द्यमानचरणः पथि वृद्धैः।’ (श्रीमद्भा० १०।३५।२२) यदि ब्रह्मादि वन्दन करते हैं, तब व्रजांगनाओंको बड़ा खलता है कि देखो सखि! पहले तो उनके आनेमें देर और फिर ये अमर बीचमें आये। इसी समय जब प्रभु सखाओं और गौओंकी ओटमें हो जाते हैं, तब गौओंको ‘पशु’ कहती हैं। जो हृदय न पहिचाने, वह पशु है। सखि! इनको हमारे हृदयका क्या पता? हमें विप्रयोगमें कितना कष्ट होता है! यदि इनको हमारी पीड़ा मालूम होती तो ये आड़ न हो जातीं। इसलिये गौको पशु कहा। इन्हींके लिये हमारा नित्य विप्रयोग होता है। ज्ञानदृष्टिसे पशु हैं ब्रह्मनिष्ठ— ‘सर्वानविशेषेण पश्यतीति पशुः’। ये सब अमर ब्रह्मनिष्ठ गोरूपमें श्रीकृष्णका दर्शन करने आये हैं। साथ-साथ विधाताको भी कोसती हैं कि ‘जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम्॥’ (श्रीमद्भा० १०।३१।१५) जब सायंकालको श्रीकृष्ण आते हैं और हमारे नैन दर्शनमें संलग्न होते हैं, तब पलकें पड़ती हैं। यह बड़ा विघ्न है। इन पलकोंको बनानेवाला जड़ था। यदि रसिक होता तो पलकें न बनाता। यह उसने बड़ी गलती की है। श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं—व्रजांगनाएँ परस्पर कहती हैं—सखियो! आपलोग विधाताके दिये हुए नेत्र, श्रोत्र, त्वक्, मन, बुद्धि आदिको विफल कर रही हो। इसलिये धैर्य-लज्जाको जलांजलि देकर श्रीवृन्दावनमें श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके अमृतमय मुखचन्द्रका दर्शन करके नेत्रादिको सफल करो— ‘यैर्दृष्टं स्पृष्टं निपीतं तेषामेव इन्द्रियसाफल्यम्।’ यदि इन श्रोत्रोंसे श्यामसुन्दरके वचनामृतका पान नहीं किया तो बधिर होना ही अच्छा। यदि इन नयनोंसे मनमोहनका विलोकन नहीं होता तो विलोचन न होना ही ठीक है। तभी तो जिन भावुकोंको स्वप्नमें भी इस रसका आस्वादन हुआ, उन्हें अन्य दर्शनादि सुहाते नहीं। कहा है—‘लखी जिन लाल की मुसकान, तिनहीं बिसरी सुध-बुध सबही।’ सुनते हैं कि एक बार सूरदासजी दर्शनके लिये वृन्दावनमें पहुँचे। वहाँ प्रभुको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कुएँमें गिर पड़े। इतनेमें जिसको
ढूँढ़ते थे, वही आया—श्यामसुन्दर मनमोहन पधारे। अपनी विशाल भुजाओंसे उन्हें बाहर निकाला। भगवान्की मंगलमय भुजाओंका अमृतमय सुस्पर्श प्राप्त होते ही विदित हो गया कि यह प्राकृत वस्तु नहीं, ब्राह्मस्पर्श है। अहा! हा सूरदासजीका शरीर रोमांचित हो उठा। सूर आनन्दोद्रेकमें डूब गये। इतनेमें भगवान् कहते हैं—'अब हम जाते हैं।' सूरने कहा— 'कैसे जाओगे?' और पकड़ लिया। भगवान्ने हाथ छुड़ा लिया। सूर कहते हैं—'अच्छा, 'हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते ।।' हे श्यामसुन्दर! हाथ छुड़ाकर भाग रहे हो! नाथ मैं जीव हूँ, आप अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक हो। इसलिये आश्चर्य नहीं। हम तब जानें, जब आप हृदयसे निकलें!' 'प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः' जैसे द्रवीभूत लाक्षामें जो रंग पड़े, वह स्थायी हो जाता है, निकाले निकलता नहीं। रंग चाहे कितनी ही कोशिश करे कि मैं लाहसे निकल जाऊँ या लाह चाहे जितनी कोशिश करे कि मैं रंगको निकाल दूँ तो नहीं निकाल सकते। दोनों लाचार हैं। एवं भक्तके चित्तमेंसे भगवान् निकलना चाहें या भक्त भगवान्को निकालना चाहे तो हो नहीं सकता। ऐसी विलक्षण परतन्त्रता दोनोंमें हो जाती है। सारांश, प्रभु ऐसे भक्त-परतन्त्र हैं। वे सूरके पास लौट आये। सूरने कहा—'प्रभो! अपने मुखचन्द्रका दर्शन तो दीजिये'। सूरदासको प्रभुके श्रीअंगका संस्पर्श तो मिला ही था। भगवान्ने दर्शन दिये, सूरदास कृतार्थ हो गये। जब प्रभु विदा होने लगे, तब सूरदास कहते हैं—'नाथ! अब नेत्रोंको ले जाइये! जिन नेत्रोंसे आपका दर्शन हुआ, उनसे क्या अब यह तुच्छ जगत् देखा जायगा?' 'अनुरक्तकटाक्षमोक्षम्'—कहा कि लज्जासे कैसे देख सकोगी? पहले तो श्रीकृष्णका दर्शन ही दुर्लभ, फिर जड़ विधाताकृत पलकें, फिर लज्जा, तब दर्शन इनमेंसे हो कैसे? तब कहा—'सखि! उनका मुखचन्द्र ऐसा है कि 'अनुरक्तकटाक्षमोक्षम्।' चलो तो, जैसे ही उनके मुखचन्द्रका दर्शन करोगी, वे अपने भ्रुकुटीकामकोदण्डको तानकर, शरसंधानकर, कटाक्षोंकी वर्षाकर हृदय, बुद्धि, मनका हरणकर शुद्ध भावोंकी स्थापना करेंगे। लज्जादिको जलांजलि देनी होगी। जैसे सानुराग कटाक्षोंका मोक्ष होता है, वैसे ही श्रीकृष्णके अमृतमय मुखचन्द्रको देखोगी। शुद्ध रसास्वादन होगा।' कोई इस श्लोकका भाव ऐसा कहते हैं—किसी व्रजांगनाने श्रीकृष्ण मनमोहनका वृन्दारण्यमें जाते समय दर्शन किया था और जबतक धूलि दीख रही थी, तबतक निर्निमेष अतृप्त एकटक दृष्टिसे निहार रही थी, पर जब धूलि भी गयी तो चित्रलिखित-सी बैठी हुई श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दकी अलौकिक झाँकी देखती रही। उस समय वेणुगीत सुना। एकदम स्मृति आयी। आँखें झिलमिलायीं तो दूसरी कहती है—सखि! नेत्र क्यों नहीं खोलती ? कहा—'अक्षण्वतां फलमिदम्'— सखि! श्यामसुन्दरका दर्शन ही परम फल था। वह इस समय दीख नहीं रहा है, फिर किसलिये नेत्र खोलें ? अथवा आँख मीचे हुए श्रीकृष्ण-ध्यानमें निमग्न व्रजांगनाको देखकर दूसरी पूछती—'ऐसा क्यों?' कहा—'सखि! यह तो जो विशेष विह्वलता, दुर्दशा, मूर्च्छा, दीनता है—यह नेत्रवालोंका फल है। यदि नेत्र न होते, प्रभुके मनमोहनके मुखचन्द्रका दर्शन न होता तो यह दुर्दशा न होती।' कहा—'सखि! क्या फल है? आपने अनुभव किया?' 'नहीं!' 'वयं सुविदाम एव'—हमने तो दूरसे अनुभव किया। जिन्होंने सम्यक् पान किया, वही जाने सखि! आसक्तिकी महिमासे गोपांगनाओंको श्रीकृष्ण-बलरामके मनोहरभाव- युक्त दर्शनकी अनुभूति चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्ज- मालानुपृक्तपरिधानविचित्रवेषौ । मध्ये विरेजतुरलं पशुपालगोष्ठ्यां रङ्गे यथा नटवरौ क्व च गायमानौ ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।८)
१२८ भक्तिसुधा
'हे सखि! वृन्दावनमें श्रीकृष्ण कैसे हैं?' (इन व्रजांगनाओंको आसक्तिकी महिमासे वहीं घरपर बैठे- बैठे श्रीकृष्णका दर्शन हो रहा है) सुकोमल नवीन हरे-हरे, लाल-लाल आम्रपल्लव श्रीकृष्ण और बलरामके अंगोंके भूषण हैं। मुकुट, कुण्डल, हार, अंगद, कंकण, कांची, नूपुर इत्यादि रत्नमय भूषण हैं ही, किंतु इनके अतिरिक्त यह वेश सुकोमल, देदीप्यमान, अरुण, सरस आम्रपल्लवको धारण किया है और मयूरपिच्छसे बनी हुई कलिकाएँ धारण की हैं, उन कलिकाओंका मण्डलमय मुकुट विशाल भालपर विराजमान है। यह प्राकृतिक श्रृंगार है। मोरमुकुटके संनिधानमें ही सजावटके साथ बर्हमय अर्थात् मयूरपिच्छके बने हुए गुच्छे हैं। उत्पल तथा अब्ज अर्थात् रात्रिविकासी तथा दिवसविकासी दो प्रकारके कमलोंकी माला शोभती है। ऊपरसे दामिनीद्युतिविनिन्दक अद्भुत पीताम्बरसे श्रीअंग आवृत है। यही परिधान अर्थात् नीलाम्बर-पीताम्बरसे विचित्र मनोरम वेशवाले वे श्रीकृष्ण-बलराम दोनों वृन्दावनके पशुपालगोष्ठीमें नटवर वेश धारण किये विराजमान हैं। कदाचित् गायन और नृत्य भी करते हैं। यहाँ इसी श्लोकके आगे वेणुचर्चा है। इससे यह कहना है कि वह उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक श्रीकृष्ण नटवर वेश धारण किये हुए गोपाल वेशमें रसका अभिनय करते हुए विराजमान हैं। ऐसे सरस उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके दर्शनका यही अवसर है। चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्जादि धारणसे रसात्मक स्वरूप विचित्र हो गया अर्थात् परमानन्द रसामृतमूर्ति पूर्णतम पुरुषोत्तममें विचित्रता आ गयी। स्वयं रसात्मामें यह तीन-चार बातें—१. आम्रपल्लव, २. बर्हस्तबक, ३. उत्पलाब्जमाला और ४. पीताम्बर विशेष हैं। स्थायीभाव, व्यभिचारिभाव, अनुभाव—ये तीन भाव होते हैं। चूतप्रवालसे उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूपमें शृंगाररसका स्थायीभाव प्रदर्शित किया। सरस सुकोमल अरुण आम्रपल्लवसे सरसता, अरुणिमा, राग सूचित है, कोमलता सूचित है।
लौकिक दृष्टिसे व्रजांगनाओंके हृदयमें यह रूप व्यक्त करना है। उनके हृदयमें यदि निर्विशेष स्वरूप व्यक्त हो तो उनके सर्वेन्द्रियोंके साफल्यकी आशा नहीं है। 'बर्हस्तबक' से व्यभिचारीभाव दिखलाया। एक रस धर्मी होता है और एक रस होता है धर्म। प्रभुका मंगलमय श्रीअंग रसधर्मी है। उसमें सरस आम्रपल्लव- धारणसे रस स्थापित किया एवं रसात्मा श्रीकृष्णमें रसका संचार हुआ। भावुक रसके लोभी होते हैं, यह तो ठीक है, पर यहाँ तो रस भी इसका लोभी हो रहा है। संचारीभाव (व्यभिचारीभाव) बर्हस्तबकसे कैसे? तो इसका भाव यह है कि मयूरमें रसाक्रान्ति कदाचित्क है। नील नीरदके दर्शनसे जब उसमें रसोल्लास होता है, तब वह नृत्य करता है और उसी समय उसके पिच्छ गिरते हैं। ऐसा मयूरपिच्छ धारणकर संचारीभाव दिखलाया। रसको उत्पन्नकर ये भाव अस्तंगत हो जाते हैं, सदा नहीं रहते। विभाव दो तरहके होते हैं—आलम्बनविभाव और उद्दीपनविभाव। रसका आलम्बन (विषय) आलम्बनविभाव है। व्रजांगनाओंके लिये रसालम्बन श्रीकृष्ण हैं अर्थात् वही आलम्बनविभाव हैं। जिन-जिन भावोंसे प्रियतममें भाव अधिक हो, वह वेणु, मलयनिल, चन्द्रादि उद्दीपनविभाव हैं। ये तीनों (आलम्बन-उद्दीपनविभाव और अनुभाव) रसानुभव करानेवाले होते हैं। इनमें उत्पलाब्जमालासे अनुभाव दिखाया गया है। उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें समस्त रसानुभवकी सामग्री है। व्रजांगनाएँ निर्विशेष समझकर उद्विग्न हो जायँ, इसलिये विचित्र सरस होकर श्रीकृष्णका प्राकट्य हुआ है अथवा आम्रपल्लवसे रजोगुण सूचित किया। उसकी सरसतासे सानुरागता तथा अरुणिमासे राग। सत्त्वगुण स्वच्छ होता है, तमोगुण श्यामल तथा रजोगुण लाल। यद्यपि निर्गुण, निराकार, परमात्मामें सत्त्व, रज, तम—ये तीनों गुण नहीं हैं, वे प्राकृतमें होते हैं। किंतु यहाँपर ध्यान रखना चाहिये कि रागमात्र-सूचनके लिये रजोगुण-सूचन है। अप्राकृत अलौकिकमें भी सत्त्व, रज, तम हैं। तभी
वेणुगीत १२९
श्रीवल्लभाचार्य ब्रजांगनाओंमें सात्विकी, राजसी, तामसी ऐसे तीन भेद करते हैं। उन प्रत्येकमें भी त्रिविध हैं और एक निर्गुण। इस प्रकार दस तरहकी व्रजांगना बतलाते हैं। 'गोपीगीत' में सबकी उक्तियाँ अलग- अलग दिखलायी हैं। 'रासपञ्चाध्यायी' को उन्होंने तामस प्रकरण कहा है। तात्पर्य यह है कि प्राकृत विषय दूषणसे दूषित है। जहाँ लीला है, वहाँ अवष्टम्भात्मक तम, चांचल्यात्मक रज और प्रकाशात्मक सत्त्वकी अपेक्षा है ही। वह लीला चाहे प्राकृत हो या अप्राकृत। किंतु यहाँ लीला है अप्राकृत, अलौकिक। अतः इसमें भी तीनों दिखलाया है। सरस आम्रपल्लव धारणकर अरुणिमा, राग, प्रेम सूचित किया है। यह उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्ण व्रजांगना वृषभानुनन्दिनीके प्रति सराग हैं, यह सूचित किया जाता है; क्योंकि वे उदासीन हैं, ऐसा किसीको विभ्रम न हो। यदि उनमें राग न हो तो निराशा हो जाय। उदासीन हों तो वृषभानुनन्दिनी, ब्रजांगनाएँ प्रभुको अपना रसालम्बन कैसे बनायें? रसालम्बन नीराग, नीरस, हृदयशून्य थोड़े ही होता है। इसीलिये उदासीनता, निराकारताका संगोपन करनेके लिये आम्रपल्लव धारणकर सरसता तथा सापेक्ष्य सूचित किया है। इस लीलामें निरपेक्षता छिपायी जाती है, सापेक्षता प्रकट की जाती है। नहीं तो क्षीरसागर जिसकी राजधानी है, वह क्षीरकी चोरी कैसे करे? इसलिये सब गुण ऐश्वर्यमायादि छिपाये जाते हैं। बर्हस्तबक-धारणसे तमोगुण सूचित किया है। वह अवष्टम्भात्मक है। अवष्टम्भका अर्थ है रुकावट। इससे आसक्ति सूचित होती है। आसक्ति तमोगुणका कार्य है। जैसे कोई दुराग्रही दुरभिनिवेशवशात् विषयसेवनसे हटाये नहीं हटता। यह आसक्तिका स्वरूप है। तत्सूचक श्यामल मयूर-पिच्छके गुच्छाओंसे निर्मित मुकुट धारणकर वृषभानुनन्दिनी-विषयिणी आसक्ति व्यक्त की। कहा कि 'मैं उदासीन नीरस नहीं, मैं तो नित्य निकुंजेश्वरी वृषभानुनन्दिनीस्वरूपासक्त श्रीकृष्ण हूँ।' ऊँची दृष्टिसे यह भगवान्की भक्तिमें आसक्ति है। भक्त कहते हैं—'प्रभु जब उदासीन, स्तब्ध हैं, तब हमारी रक्षाका ध्यान कैसे रखेंगे!' यह आसक्तिभाव विशेषकर वृषभानुनन्दिनीमें ही बनता है। वे वृषभानुनन्दिनीके आसक्तिका-अनुकम्पाका पात्र ही बनना चाहते हैं। कहते हैं कि वृषभानुनन्दिनीके वसनपवनसे श्रीकृष्णचन्द्र अपनेको कृतार्थ मानते हैं। उत्पलाब्जमाला (रात्रिविकासी-दिवसविकासी कमल- माला)-धारणसे सत्त्व सूचन करते हैं। पहलेसे रागका, दूसरेसे गाढ़ासक्तिका तथा तीसरेसे व्यसनका सूचन है अर्थात् वृषभानुनन्दिनीके मुखचन्द्रके दर्शन- चिन्तनका-भक्तानुसन्धानका व्यसन सूचित करनेके लिये उत्पल तथा सौरभसे स्थिर वासना विवक्षित है। ऐसा उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द एवं वृषभानुनन्दिनी-विषयक राग- आसक्ति-व्यसनयुक्त तत्त्व व्यक्त हुआ। यही भक्तोंके कामका है। नीरस, निर्विकार नहीं। यह रसधर्मी श्रीकृष्णका स्वरूप व्यक्त है अथवा इससे रसरूप सौगन्ध्य व्यक्त है। सरस आम्रपल्लवसे सरसता, बर्हस्तबकसे रूप और उत्पलाब्जमालासे सौगन्ध्य सूचित है। यदि 'रसे रसानङ्गीकरात्' इस मतके अनुसार ब्रह्म नीरूपादि हो तो भावुकोंके किस कामका? रूप-रसादियुक्त होनेसे सर्वाभोग्या अधरसुधाकी लालसावाली ब्रजांगनाओंकी, रूपभोगियोंकी और सौगन्ध्यभोगियोंकी भी उसमें प्रवृत्ति होगी, यह दिखलाना है। ऐसा यह रसात्मक रूप सर्वथा छिपानेकी चीज है, इसलिये पीताम्बरसे वह ढका हुआ है अर्थात् कपटचातुर्यसे राग, आसक्ति, व्यसन छिपाना है। यहाँपर भाववृक्षका राग बीज, आसक्ति कलिका तथा व्यसन फूल कहा है अर्थात् श्यामसुन्दरकी सुमधुर अधरसुधापानसे व्रजांगनाओंके सस्नेह सरस हृदयमें श्रीकृष्ण प्रभुने वंशीद्वारा भावबीज बोया। बीज भी किन्हीं देशोंमें बाँससे बोया जाता है। इसलिये वह बाँसके वंशीसे ही बोया। बोते ही वह अंकुरित हुआ, उसमें आसक्तिरूपी कली लगी। कलीमें भी रूप, रस, सौरभ रहते हैं, पर छिपे रहते
हैं, इसके बाद जब व्यसन हुआ, तब वह फूल उठा। जब पुष्प विकसित हुआ, तब रूप, रस और सौरभ व्यक्त हुए। इस प्रकार व्यसनावस्था (संसारका व्यसन नहीं, वह तो घोर नरकका मूल है) ही भावुक जीवनको सुखमय बना देती है। बिना दर्शन, परिरम्भण, अधरामृतपानके न रहा जाय—यह राग, आसक्ति, व्यसन है। यह महाभाग्यकी बात है। कोई बर्ह अलग लेते हैं और स्तबक अलग लेते हैं। बर्ह यानी मयूरपिच्छ तथा स्तबक यानी फूलोंके गुच्छे। उत्पलाब्जमालासे यह दिखलाया कि विकसित उत्पलमें ही पूर्ण रूपसे रस, रूप, सौरभ होते हैं। रस, रूप, सौरभ कलिकामें भी होते हैं, पर वह अविकसित हो तो कैसे मालूम पड़ें। इसलिये उत्पल-अब्ज दोनों लिया। कारण यह है कि रात्रिविकासी दिवसमें अविकसित रहता है और दिवसविकासी रात्रिमें अविकसित रहता है। यदि एक ही प्रकार हो तो नैरन्तर्येण उनकी प्रतिष्ठा नहीं हो सकती है। एक कानमें कर्णिकार, दूसरेमें उत्पल और दक्षिण हस्तमें अब्ज (नीला कमल) है अर्थात् पहला स्वरूप जो 'बर्हापीडं नटवरवपुः' द्वारा वर्णित किया था। उसी स्वरूपका इसमें वर्णन है। और भी कुछ- कुछ सामग्री है, इतना ही भेद है। श्रीवल्लभाचार्य कहते हैं—यहाँ तीनोंसे रज, तम, सत्त्व बोधित है अर्थात् आम्रपल्लवसे रज, मयूरपिच्छसे तम और उत्पलाब्जमालासे सत्त्वका सूचन है। इसलिये इनके ही विशेष आकारसे आविर्भूत नव रसोंका सूचन भी है एवं उद्बुद्ध उभयविध श्रृंगाररसात्म श्रीकृष्णचन्द्र नवरस सम्मिलित हैं, अतएव तत्कृत वैचित्र्य भी है। यही बात 'विचित्रवेषौ' से दिखलायी। कह सकते हैं कि तब तो यहाँ विरोध प्रतीत होता है। वहाँ कहा था कि केवल रस ही नाट्यमें व्यक्त होता है। संप्रयोगमें रसधर्मसहित रसधर्मी व्यक्त होता है। 'नटवरवपुः' में यही कहा है। 'नट' से विप्रयोगात्मक शृंगार और 'वर' (दूल्हा)-से सम्प्रयोगात्मक शृंगार कहा था तो नटवत् जहाँ केवल रस है, रसधर्मी नहीं; क्योंकि जहाँ सामग्रीसहित रस प्रकट है, वहीं धर्मसहित रस धर्मी है। यहाँ सामग्रीरहित नटकी तरह अभिनयद्वारा सब आरोपित-ही-आरोपित होते हैं, सामग्री बिना रसकी जहाँ व्यंजना होती है, वहाँ केवल रस होता है, परंतु जहाँ वर (दूल्हा) प्रत्यग्र भोक्ता है, वहाँ तो सर्वनायक-नायिका स्पष्ट है, सामग्री भी प्रत्यक्ष है। अतः वहाँ धर्मसहित धर्मोंका प्राकट्य है। अब यहाँ आम्रपल्लवसे स्थायीभाव, मयूरपिच्छसे व्यभिचारीभाव और उत्पलाब्जमालासे अनुभाव दिखलाया। उनमें राग, आसक्ति, व्यसन कहा। उन्हें भाववृक्षका अंकुर, कलिका, फूल बतलाया। उसमें रूप, रस, सौरभका विकास कहा। व्यसनद्वारा निरन्तर भोग कहा, जिसमें श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका पूर्णरूपेण आस्वादन बतलाया। जब उत्पलाब्ज विकसित है, तभी उसका रूप, रस और सौरभ स्थिर है। फिर श्रीकृष्ण सम्भोगका व्यसन हुआ। 'अहोरात्रं वासना स्यात्' यहाँ व्यसनकी निरन्तरता है और वही व्यसन भी है। जो छूट जाय वह व्यसन नहीं, जिसके बिना रहा न जाय, वही तो व्यसन है। वेद-शास्त्रादिके प्रयत्न करनेपर भी जो न छूटे, वह व्यसन है। उसीके आच्छादनके लिये, उसीको छिपानेके लिये परिधान बतलाया। तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण परमानन्द रागवान्, आसक्तिमान और व्यसनवान् होकर व्यक्त हैं एवं वे रसधर्मी हुए। अब विप्रयोग न रहा, सम्प्रयोग हुआ। यही संदेह है, इसपर कहते हैं कि यह भी अभिनय ही है। यद्यपि एक दृष्टि ऐसी है कि वहाँ वनसुन्दरी आधिदैविकी शक्तियोंको पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका सम्प्रयोग रस ही प्राप्त है, वहाँ प्रभुके प्रत्यक्ष रमण करनेसे, पर व्रजांगनाओंके लिये विप्रयोग ही है। सामग्री होते हुए भी नट अभिनयद्वारा सामग्री व्यक्त करता है। वैसे सम्प्रयोग न होनेपर भी आरोपादिद्वारा उसका प्राकट्य है। अभिनय कहीं शब्दोंद्वारा, कहीं कायिक व्यापारद्वारा और कहीं विभिन्न सामग्री-धारणद्वारा होता है। यहाँ प्रभुका सरस-शृंगारात्मक स्वरूप व्रजांगनाओंमें व्यक्तकर उन्हें
आन्तर रमण कराना है। बाह्य रमणमें जितनी सामग्री होती है, उतनी ही आन्तर रमणमें भी अपेक्षित है। अन्तर केवल यह है कि बाह्य सम्बन्ध नहीं होता, इस समय गोपालगोष्ठीके नटवर वेशका व्रजांगनाएँ आसक्तिवशात् अनुभव कर रही हैं। यहाँ सभा गोपालोंकी है, पर यह अभिनय उन्हींके लिये नहीं, व्रजांगनाओंके लिये भी है। एवं विशेषणविशिष्ट स्वरूपका अमृतमय, मुख-चन्द्रनिर्गत वेणुगीतद्वारा व्रजांगनाएँ अनुभव कर रही हैं। तात्पर्य यह है कि विप्रयोगात्मक ही शृंगार व्रजांगनाओंके लिये है। और जगह और नटोंद्वारा जो भावना सामाजिकोंद्वारा होती है, वह अभिनिवेशमात्र है, मनोराज्यमात्र है, किंतु यहाँपर तो इनकी भावना फलपर्यवसायिनी है। भावुकोंकी भावना मनोराज्य नहीं होती। वह जैसी भावना करते हैं, वैसी वस्तु हो जाती है। कहा है कि 'यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय॥' (श्रीमद्भा० ३।९।११) अर्थात् भावुकोंकी जैसी भावना होती है, वैसा ही प्रभु स्वरूप बनाते हैं। इस दृष्टिसे इस अभिनयद्वारा भी श्रीव्रजस्थिता व्रजांगनाओंमें जो भाव व्यक्त होंगे, वे सच्चे ही होंगे। यहाँ यद्यपि केवल 'वर' ही कह सकते थे, पर विप्रयोग मर्यादा-रक्षणार्थ 'नट' भी कहा। अभिनयसामग्रीसहित आधिदैविक शक्तियोंमें सम्प्रयोग और व्रजांगनाओंमें विप्रयोग उत्पन्न करते हुए प्रभु नटकी तरह नटवर वेशसे सभी भावोंको व्यक्त करते हैं। इसका अनुभव करती हुई व्रजांगना कहती है— सखि ! विधाताके दिये हुए लोचनोंको अर्थात् अंग- प्रत्यंगको सफल करो। इतने सुन्दर दर्शन ब्रजमें न होंगे। पशुओं, गोपालोंकी भीड़में मनमोहन व्रजेन्द्रनन्दन जब ब्रजसे वृन्दावनमें जाते हैं, तब दर्शन निर्विघ्न नहीं होता। पशु, लज्जा, पलकें, गोपालवधू इनका व्यवधान हो जाता है। सखि ! निकुंजमें छिपकर श्यामसुन्दरका दर्शन करेंगे। यहाँ वैसा संवाद, नृत्य, गायन नहीं हो सकता—'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।' यहाँ व्रजेशसुत इसलिये कहा कि यदि श्वश्रू, ननन्दा कान दें तो दें, हम क्या अनुचित कहती हैं ? जड़, चेतन, पशु जब सब ही व्रजराजकुमारके अमृतमय मुखचन्द्रके दर्शनाभिलाषुक हैं, वे प्राणिमात्रके परप्रेमास्पद हैं, तब कुछ चिन्ता नहीं। सखि! चलो 'गायमानौ गायेन मानः सत्कारः ययोः तौ' नटका लोग सम्मान करते हैं, पर सर्वस्व नहीं देते। यहाँ प्रभुके लोकोत्तर गायनमें गोपाल सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। 'गायेन मानः अहङ्कारः ययोः' प्रभु कहते हैं—आओ, तुममें है कोई ऐसा गायन करनेवाला। इस प्रकार अभिनय तीन प्रकारका दिखलाया—१. परमसात्त्विक, २. नृत्यद्वारा तामस और ३. गायनद्वारा राजस। ऐसे श्रीकृष्ण-बलराम 'मध्ये विरेजतुः'। गोपांगनाओं द्वारा वेणु आदिके प्रति ईर्ष्याभाव गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणु- दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्। भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं हृदिन्यो हृष्यत्त्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्याः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।९) व्रजांगनाएँ कहती हैं—सखि! इन गोपालोंकी सौभाग्य-महिमा कौन कहे, वे परम अन्तरंग हैं। सखि! वे तो श्यामसुन्दरके सखा गोपालगण श्यामसुन्दरके मुखचन्द्रका दर्शन करते हैं, परिरम्भण भी करते हैं और खेल खेलते हैं। उनकी महिमा अचिन्त्य है। वह सौभाग्य हमें कहाँ? वैसी स्वतन्त्रता हमें कहाँ? पर सखि! देखो, यह जो नीरस दारुमय वेणु है, इसका सौभाग्य तो देखो! सनातन गोस्वामी कहते हैं कि यहाँ महाभावकी स्फूर्ति है। उससे व्रजांगनाओंको श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी मंगलमयी मूर्तिके सर्व
१३२ भक्तिसुधा
अतः मिथ्या कल्पना उस रसमय भक्तिरसामृत- सिन्धुकी लहरी है। यहाँ मूर्च्छामरण-अपस्मार रस है। संसारके लिये जो विपत्ति है, वही यहाँकी सम्पत्ति है। प्रियतम प्राणधन श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके विप्रयोगजन्य तीव्र तापमें व्रजांगनाओंकी मूर्च्छा यहाँ रस-रूप है। संसारकी तृष्णा तृष्णा है, आशा दुराशा पिशाची है। भगवान्के चरणारविन्दकी आशा कल्पलता है। यहाँकी ईर्ष्या मिथ्याकल्पना रसमयी है। इसलिये वेणुको शुष्क काष्ठ कहना रस है। सनातन गोस्वामी कहते हैं—वंशीमें शुष्कता, नीरसता, सच्छिद्रता, सग्रन्थिताके आरोपमें भगवान्को रस आता है, वेणु भी प्रसन्न होती है। व्रजांगना कहती है—सखि! यदि श्यामसुन्दर मनमोहन किसीसे न मिलते तो कोई संताप न होता, पर अपने संगी गोपालबालकोंको प्रभु निर्भरपरिरम्भण करते हैं, इसलिये ईर्ष्या होती है। सखि! यह कुण्डलस्थ मकरी निःशंक होकर श्रीकृष्णचन्द्रके मुखचन्द्रका चुम्बन करती है, माला श्यामसुन्दरके वक्षःस्थलपर बिहरती है, इन जड़ वस्तुओंको—अनधिकारी जड़ोंको—परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णचन्द्रका संस्पर्शादि सब कुछ प्राप्त है, हम हतभागिनियोंको नहीं। अस्तु, गोपालोंका कथंचित् सोढव्य है। यह वंशी जड़, देखो! शुष्क, काष्ठ, निःसार, पोला, सच्छिद्र, सग्रन्थि, नीरस, वेणु, वंशी इसने कौन पुण्य किया, कौन तप-जप-ध्यान किया, जिससे इसको यह अलौकिक परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। सखि! यदि यह विदित हो तो हम भी वही तपस्या करके बाँसकी वंशी बनें। गोपांगना-जन्ममें कृतार्थता—सफलता नहीं प्राप्त है। सखि! यह साधन दुरूह है; क्योंकि अपने तो उपनिषद्रूपा हैं— वेदऋचा हैं। जितना भी पुण्यकर्म जप-तप है, सब वेदोंसे ही प्रकाशित होता है तो सखि! इसने कौन- सा अद्भुत कर्म किया, जो हमें भी दुर्ज्ञेय है, जिसका अनुष्ठानकर इसने यह सौभाग्य प्राप्त किया। ‘दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्।’ ‘वेणुः’ ऐसा पुंस्त्वका निर्देशकयह सूचित किया कि पूर्णतम पुरुषोत्तमरूपमें प्रकट भगवान्का सम्भोग गोपांगना-भावापन्न ही करेंगे। यह तो पुमान् है, यह भगवान्का सम्भोग कैसे करे? यह अनधिकारी है। फिर शुष्क भी है। सरस होता तो बात दूसरी रही। ‘वंशी’ कहते तो अधिकार सूचित होता। इसीलिये जानबूझकर वैसा नहीं कहा। तो यह वेणु हमारे श्यामसुन्दरके हस्तारविन्दमें निरन्तर विराजमान है, कभी उदरमें, कभी मुखचन्द्रमें, कभी वक्षःस्थलपर विराजता है। अस्तु, अब तो ‘सुधामपि भुङ्क्ते’ सर्वत्र रहनेकी, इतनी धृष्टता तो की, पर यह धृष्टता तो देखो। दामोदरमनमोहनके अधरसुधाका सम्भोग करने लगा। अबतक यही धृष्टता थी कि प्रभुका आलिंगन-संस्पर्शादि करता रहा। यह पर्याप्त था, पर अब आगे बढ़ा। सखि! ‘अयं वेणुः युष्माकं दामोदराधरसुधाम्’ आपलोगोंकी व्रजांगनाओंकी निधि परमधनभूता दामोदरके अमृतमय मुखचन्द्रको इसने स्वयं यानी आपकी सम्मति बिना पान किया। हमारे श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र हैं, उनके श्रीअंगका स्पर्श किया। हमारे मनमोहनकी सुधाको हमारी आज्ञा बिना भोगने लगा। नेक पूछा भी नहीं। ‘गोपिकानाम्— तदेकाशयैव गोपिकानाम् (गुपू रक्षणे)’ यह अमृतमय मुखचन्द्रकी अधरसुधा हम गोपिकाओंकी है। एक मनमोहन श्यामसुन्दरके सुमधुर अधरसुधाके सम्भोगके लिये ही हमने अपने देह-प्राणोंका रक्षण कर रखा है, केवल इस आशासे कि कभी वह अधरसुधा भोगनेको मिलेगी, नहीं तो यह कभी चले गये होते। सखि! वह जीवनाधार, प्राणाधार सर्वस्व है। यह ममता कि प्रभु हमारे हैं। मनमोहन श्यामसुन्दर हमारे ही हैं। सखि! हमसे कुछ पूछताछ न किया। ‘दामोदराधरसुधाम्’ कहा, क्या मनमोहनका ठेका तुमलोगोंने ले रखा है? यह तो पूर्णतम पुरुषोत्तम निखिल विश्वके हैं। हमारे ही प्रणयपाशसे बँधे हैं। हमारी व्रजेन्द्रगेहिनीने उनको प्रणयपाशसे बाँध रखा था। यदि हमारे न होते तो कैसे बाँधे जाते? यदि सबके होते तो और भी बाँधते। क्या किसीने बाँधा?
वेणुगीत १३३ ललनको जब नन्दरानी बाँधने लगीं तो रज्जु दो अंगुल कम हुई। गोकुलभरकी रस्सियाँ लगीं, पर बछड़ोंकी नहीं! यह व्रजेन्द्रगेहिनी अपने ललनके सुकोमल अंगको कठोर रज्जुसे कैसे बाँधे? रेशमोंकी सुकोमल डोरियाँ थीं, जिसमें लालाको कष्ट न हो। वात्सल्यरससागर जिसके हृदयमें उमड़ रहा है, वह करुणामयी पुत्रवत्सला अम्बा कैसे कठोर रज्जु ले? दो अंगुलकी कमी हुई। भावुक कहते हैं कि परमात्मा बँधते, पर बिलकुल बँध जायें तो गजब हो जाय, जब सब रज्जु कम पड़ी, तब वृषभानुनन्दिनी आयीं, कहा—'हमारे वेणीका पाश है, लो'। जब उन्होंने अपनी वेणीका बन्धन दिया, तब प्रभुने कहा—इसके बन्धनमें तो हैं ही। भगवान् माधुर्याधिष्ठात्रीके प्रणयपाशमें हैं ही। 'दाम-रस्सी थी उदरमें जिसके' अर्थात् वृषभानुनन्दिनीके, हमारी स्वामिनीके उस वेणीबन्धनसे श्रीकृष्ण बँधे थे। हमारे थे तभी न बँधे! इसलिये उनकी सुमधुर अधरसुधा हमारी है। ऐसी प्राणाधारभूता सुधाको यह वेणु भोगने लगी। अबतक क्षमा किया, अब नहीं रहा जाता। 'हे गोप्यः!' आपलोग क्यों गोपी हुईं, गोपी-जन्ममें जन्मकी सार्थकता नहीं है, वेणुजन्ममें है, अतः चलो वेणु बननेका प्रयास करो। कहा—सखि! आप यों ही दोषारोपण उसमें करती हो। दामोदरका मुखचन्द्र तो ज्यों-का-त्यों ही सरस है। यदि वह सम्भोग करता तो वह शुष्क हो जाता! कहा—रस-ही-रस तो रहा है, सुधा तो सब उसने भोग ली। 'अवशिष्टं रसो रसमात्रं यथा स्यात्तथा।' अथवा कहा—सखि! शुष्क बाँसका वेणु कितना भोगेगा, भोग लेने दो। हमारे श्रीकृष्णचन्द्रकी अधरसुधा अपरिमित है, अनन्त है। 'अवशिष्टो रसो रागो यस्मिन् तत्।' इतना ही नहीं कि यह हमारे श्यामसुन्दरकी अधरसुधाका सम्भोगकर तृप्त हो गयी, पर नहीं, अभी इसका राग मिटा नहीं। कितने दिनसे अधरसुधाको भोगती है, पर वही लालसा बनी ही है। इसलिये वह सदाके लिये सौत बन गयी। ऐसे भक्तोंकी भावना यह है कि हमारे भगवदरसका सब ही आस्वादन करें। भक्त यदि सौतियाडाह करें तो दूसरेको भक्त बनायें कैसे? यदि उनमें मूलतः कमी होती तो सोचते कि उसमें कमी होगी। वास्तवमें सांसारिक रस कम होनेवाला है, पर यह परमानन्दरसामृतस्वरूप सच्चिद्घन परब्रह्म अपार है, कितना ही सम्भोग करो चुकेगा थोड़े ही! कितने ही परमहंसोंने रस लिया, पर चुका नहीं। इसलिये वह भोक्ता दूसरे भोक्तासे ईर्ष्या नहीं करता। जिनका भोग्य ससीम हो, वह दूसरोंका उपस्थान नहीं चाहते हैं। यह तो अगाध है, इसलिये कहते हैं आओ, बल्कि वंचितोंको देखकर घबराते हैं। कहा है—'जाकर मन' जिन्होंने इन परम रसामृतमूर्तिका स्वाद न लिया, उनके नाम वह आँसू गिराते हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभु इसीलिये रोते थे कि ये लोग श्रीकृष्णरससे वंचित हैं। कुछ लोग कहते हैं— श्रीगौरांगको उन्मादका रोग था। था तो मगर दूसरे ढंगका। भावुक कहते हैं, ऐसा उन्माद हमें हो जाय। जहाँकी वस्तुस्थिति ऐसी है कि ईर्ष्यापूर्वक मिथ्या कल्पना है। यह प्रेमका विचित्र एक भाव है—अतृप्ति है—तृष्णा है। भक्तोंको यदि सन्तोष हो कि आज वही पूजा करें तो भक्त कैसे? वे जानते हैं कि हम अगर भोग न लगाये तो प्रभु भूखे रहेंगे। यह भावना हो गयी कि प्रभु तृप्त हैं तो भाव बिगड़ गया। यह सहृदय-हृदयवेद्य है। इस अपरिमित अगाध रसमें भी भावका—हमारी सर्वस्वभूता अधरसुधाका सम्भोग यह वेणु करता है। न जाने यह कितने दिनतक हमारेमें हिस्सा बँटायेगा। अथवा—'अवशिष्टं वशिष्टं (वष्टिभागुरिरल्लोपः) न वशिष्टः रसमात्रं यस्मिन्।' इस वेणुने अधरसुधाका इतना सम्भोग किया कि रस भी नहीं रह गया। निरवशेष सम्भोग किया। अथवा— क्या प्रमाण कि शुष्क बाँसका वेणु ज्यों-का-त्यों पड़ा हुआ दामोदरके सुमधुर अधरसुधाका भोग करता है? कुछ भी सरस होता तो भोगता। इसलिये तुम व्यर्थ बहक रही हो। कहा—नहीं, देखो! इसका अवशिष्ट रस हृदिनीमें है। देखो, यह सच्छिद्र है तो एक ओरसे