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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

१०६ भक्तिसुधा कहा कि हम भक्तद्रोहीका रक्षण नहीं कर सकते। आगे ब्रह्मा, शिवका भी यही जवाब हुआ। आखिर दुर्वासा श्रीभगवान् महाविष्णुके पास गये। तब भगवान् कहते हैं कि आपका रक्षण करना तो ठीक ही है, पर क्या करूँ? मैं स्वतन्त्र नहीं। स्वतन्त्र अगर होता तो अवश्यमेव आपका रक्षण करता। मैं भक्तपरतन्त्र हूँ। कारण, मेरा व्रत है कि—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) हमारे भक्त इतने तन्मय हो जाते हैं कि वे मुझसे अतिरिक्त कुछ जानते ही नहीं। तब फिर मैं भी उनसे अतिरिक्त क्या जानूँ?' इसीको लेकर यह आया कि पहले भक्तमें अत्यन्त परतन्त्र्य, भगवान्‌में स्वातन्त्र्य; पीछे 'ये यथा' के अनुसार भक्तमें स्वातन्त्र्य और भगवान्‌में परतन्त्र्य होता है। 'ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभर छाछ पै नाच नचावैं॥' बड़े-बड़े देवाधिदेव जिनका ध्यान करते हैं, 'भीरपि यद्विभेति', उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके दोनों श्रीहस्त अपने एक हाथमें पकड़कर नन्दरानी एक हाथसे छड़ी दिखायें और भगवान् भी उस छड़ीसे डरें, यही परतन्त्र्य है। इससे स्पष्ट है कि पहले भगवान्‌में स्वातन्त्र्य, फिर भक्तमें स्वातन्त्र्य; पहले भगवत्सम्मिलनके लिये भक्त लालायित, फिर भक्तसम्मिलनके लिये भगवान् लालायित। परमभक्त मधुसूदन सरस्वतीने वृन्दावनमें जाकर भगवत्साक्षात्कारके लिये 'गोपालसहस्रनाम' के चार पुरश्चरण किये, पर उनको साक्षात्कार न हुआ, फिर काशीमें आये और यहाँपर श्रीकालभैरवका अनुष्ठान किया। उस अनुष्ठानपर श्रीभैरव प्रसन्न हुए। कहा—वर माँगो। इसपर मधुसूदन सरस्वतीने कृष्णसाक्षात्कार ही माँगा। भैरव कहते हैं कि वृन्दावन जाओ और वहाँ 'गोपालसहस्रनाम' का पुरश्चरण करो। मधुसूदन कहते हैं कि मैंने तो वहाँपर चार पुरश्चरण किये, पर साक्षात्कार नहीं हुआ। इसपर श्रीकालभैरवने पापोंके चार पहाड़ दिखलाये और कहा कि उन पुरश्चरणोंसे ये नष्ट हुए, अबकी बार साक्षात्कार होगा। मधुसूदन सरस्वती पुनः वृन्दावन गये, 'गोपालसहस्रनाम' का अनुष्ठान किया और तब भगवान्‌का प्राकट्य हुआ। जब श्रीश्यामसुन्दर सामने आकर खड़े हुए तो मधुसूदन सरस्वतीने चट अपना मुँह फेर लिया। जिधर-जिधर श्यामसुन्दर जाकर खड़े हों, उधर-उधरसे मधुसूदन अपना मुँह फेर लें। आखिर श्रीकृष्णचन्द्रने ही उन्हें मनाना शुरू किया। कहाँ यह स्थिति कि वह श्रीकृष्णके लिये लालायित और कहाँ यह कि अब श्रीकृष्ण ही उन्हें मनाते हैं। महास्वातन्त्र्यके पूर्व परतन्त्र्य अपेक्षित है। अगर स्वतन्त्रता चाहते हो तो उसका कुछ त्याग भी करो। हम वेद, शास्त्र, माता, पिता, धर्म-कर्मोंसे भी स्वतन्त्रता चाहते हैं, पर यह स्वतन्त्रता तो परतन्त्रताके घोर गर्तमें गिरानेवाली है। बालक माता, पिता, अध्यापकोंके परतन्त्र न हों तो वे उच्छृंखल होंगे। फिर जन्म-जन्मके लिये घोर अनर्थमय कंटकाकीर्ण गर्तमें पड़ेंगे। कोई भी राष्ट्र स्वतन्त्रतारक्षाके लिये सैनिक-संगठन करना चाहे तो वह सेनापतिके अत्यन्त परतन्त्र हो। अगर सेना उसकी आज्ञाका उल्लंघन करे तो विजय, स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो सकती। अतः परम सिद्धान्त यह है कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भक्तके परतन्त्र होते हैं। जिनके भृकुटिविलाससे सबको नचानेवाली माया जिनके सामने नाचे, वे स्वयं नाचते हैं—'तद्वशो दारुयन्त्रवत्।' (श्रीमद्भा० १०।११।७) परमानन्दमूर्ति श्रीकृष्ण कठपुतलीके समान व्रजांगनाओंके परतन्त्र हो गये। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता १८।६१) सर्वभूतोंके हृदयमें स्थित होकर भगवान् काठकी पुतलीके समान सबको नचाते हैं और वे ही फिर प्रेम-परतन्त्र होकर भक्तोंके खिलौने बन जाते हैं। भक्तमें भगवद्भावापत्ति, भगवान्‌में भक्तभावापत्ति— इसीका नाम परस्परभावापन्नता है। यह रसोद्रेक, आनन्दोद्रेकमें होता है। अतएव श्रीकृष्णमें

व्रजांगनाभावापत्ति और व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णभावापत्ति कही गयी। वृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्ण हो गयीं और श्रीकृष्ण वृषभानुनन्दिनी हो गये—यह भावनाकी महिमा है। औरोंकी भावना अभिनिवेश, अभिमान अदृढ़ और भगवान्‌का तथा वृषभानुनन्दिनीका अभिमान सुदृढ़ है। जब रसोद्रेकमें विपरीत रतिका संचार हुआ, वृषभानुनन्दिनीका श्रीकृष्णमें अभिमानपुरःसर प्रवेश हुआ, तब वृषभानुनन्दिनीमें भी श्रीकृष्णका अभिमान- पुरःसर प्रवेश हुआ। इसीलिये कहा जाता है कि— 'शिवस्य हृदयं विष्णुः विष्णोश्च हृदयं शिवः।' दोनों परस्पर अन्तरात्मा हैं। शिव संहारक और विष्णु पालक देवता हैं। संहारमें तमोगुणप्राधान्य और पालनमें सत्त्वगुणप्राधान्य होता है। सत्त्व स्वच्छ, शुभ्र प्रकाशात्मक तथा तम आवरणात्मक, काला है। अतः शंकरको कृष्ण होना चाहिये और विष्णुको शुक्ल, पर यहाँ तो सब उलटा ही है। क्यों? परस्पर सुदृढ़ उपास्योपासकभावसे परस्परका रंग परस्परमें आया। कारण—'सेवक स्वामि सखा सिय पी के।' (रा०च०मा० १।१५।४) शिव भगवान्‌के सेवक भी, स्वामी भी, सखा भी, अतः स्वच्छ, सत्त्वमय विष्णुकी भावनाकी महिमासे शिव शुक्ल हो गये, भावनाकी ही महिमासे विष्णु श्यामल हो गये। ऐसे ही देखें तो संकीर्णताको अवकाश नहीं। कहीं-कहीं तो ऐसा भी लिखा है कि श्रीशंकर ही श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं; क्योंकि दोनों परस्पर अन्तरात्मा ही हैं न ! जैसे रुद्ररूपा वंशी मानी गयी, वैसे ही कहीं श्रीकृष्णको कालका अवतार माना है। प्रकृतमें यह आया कि साधारण शृंगारमें भावना अभिमानमात्र है। यहाँ तो स्वरूपपरिवर्तन भी है। यहाँ वृन्दावन्य, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द, वृषभानुनन्दिनी, व्रजांगनाएँ, एतत् समवेत मंगलमयी लीलाभूमि उस अचिन्त्य, अनन्त, अद्भुत, प्रेमानन्दरससिन्धुमें क्षण-क्षण आविर्भूत- तिरोभूत होते रहते हैं, उन्मज्जन-निमज्जन करते रहते हैं। उस स्थितिमें कभी श्रीकृष्ण वृषभानुनन्दिनीके रूपमें, कभी वृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्णके रूपमें प्रकट होती हैं। यही कहा 'उभयोभयभावात्मा।' आया यह कि साधारण नायकमें उत्कट रस ही व्यक्त नहीं हो सकता, पर निखिलरसामृतमूर्ति उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्ण तो रसस्वरूप ही हैं। इनके सम्पर्कसे इतना उत्कट, अद्भुत, अनन्तरस उद्भूत हो गया कि परस्पर भावापत्ति हो गयी। यह श्रीकृष्ण पूर्णतम, पुरुषोत्तम स्वयं भोक्ता ही हैं, भोग्य नहीं, व्रजांगना स्वयं स्त्री, भोग्या। अतएव उनके भोक्ता श्रीकृष्ण भोग्य नहीं हो सकते। उनके ही क्या, दूसरे पुरुषोंके भी भोग्य वे नहीं हो सकते। पुरुष पुरुषोंके भोग्य नहीं होते। पारतन्त्र्य लक्षण स्त्रीत्व ही सबमें हैं, अतः सब भोग्य ही हैं। तो क्या स्वयं श्रीकृष्ण ही अपना भोग करें? नहीं। यह इस रीतिके विरुद्ध है। अब अधरपल्लवकी सर्वाभोग्या सुधा किसकी भोग्या ? देवभोग्या खग, मृग, पशु, तरु, लता, गुल्मादिकोंको, भगवद्भोग्या श्रोत्रद्वारा व्रजांगनाओंको, अब सर्वाभोग्याका भोक्ता कौन ? यह तब भोग्य हो कि जब भगवान् भोग्य हों। यह कैसे हो ? उनका भोक्ता तो कोई भी नहीं हो सकता। इसलिये कहा कि जब भगवद्भोग्या अधरसुधा व्रजांगनाओंमें सर्वत्र भरपूर हुई और व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णका रमण हुआ, उन्होंने उस भगवद्भोग्या अधरसुधाका संभोग किया, तब लोकोत्तररसोद्रेकसे व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णभावापत्ति और श्रीकृष्णमें व्रजांगनाभावापत्ति हुई। उस समय श्रीकृष्ण भोग्य हुए। इसलिये सर्वाभोग्या अधरसुधाका भोग व्रजांगनाओंको प्राप्त हुआ। सारांश यह कि साधारण स्थितिमें जो अधरसुधा किसीको भोग्य नहीं, वह सर्वाभोग्या है। जहाँ श्रीकृष्णने रमण किया, वहाँ विपरीत भावापत्ति हुई। भक्तोंमें इसके अनेक उदाहरण हैं। 'विष्णुपुराण' में प्रह्लादका प्रसंग बड़ा ही सुन्दर वर्णित है। प्रह्लादके अंगमें शिला बाँधकर उसे समुद्रमें फेंक दिया गया। जितनी उसको अधिक यातना हुई, उतनी उसकी विष्णुप्रीति अधिक बढ़ी। यहाँ तो कुछ विघ्नबाधा हुई कि कहते हैं—भजन हमारे कुलमें सहता नहीं।

एकादशीको अगर कोई मरा तो कहते हैं कि एकादशी हड़ही है। कनक जैसे-जैसे दग्ध किया जाता है, वैसे-वैसे उसका मूल्य बढ़ता है, वह चमकता है, निखरता है। वैसे ही भक्त अधिकाधिक निखरता है। अतएव भक्तोंको कष्ट, विपत्तियाँ आती हैं, पर वे धैर्यपुरःसर आगे ही बढ़ते हैं। पहली स्थिति यह कि 'भूतानि विष्णुः', सर्व विष्णुमय है। फिर 'अहं विष्णुः' की भावनाका दार्ढ्य सम्पादित होता है। तब प्रह्लादका पैर जिस क्षण समुद्रमें पड़ता, आसमुद्र भूमण्डल डगमग करने लगता। यह भावना- महिमासे विष्णुभावापत्ति है। इसी तरह छान्दोग्यमें 'भूमैवाधस्तात्' इत्यादिसे सर्वत्र सर्व दिशाओंमें भूमा पूर्णतम पुरुषोत्तमको बतलाकर 'अहमेव सर्वतः' ऐसा बतलाया है। श्रीवल्लभाचार्य भी इसे मानते हैं, पर कहते हैं कि यह संचारी भाव है। कुछ देरके लिये प्रेमोन्मादमें आता है। रासपंचाध्यायीमें व्रजांगना कहती हैं—'कृष्णोऽहं पश्यत गतिम्।' (श्रीमद्भा० १०।३०।१९) सखि ! मैं श्यामसुन्दर ही हूँ। उधर वृषभानुनन्दिनीकी स्थिति—'मधुरिपुरहमिति भावन- शीला।' सखी कृष्णसे सन्देश कहती है कि आपकी प्रियतमा आपकी प्रतीक्षा करती-करती 'श्रीकृष्ण हम ही हैं', यह भावना करती है। प्रेम और ज्ञानका अन्तिम भाव एक ही है। श्रीकृष्णने—मक्खन चुरानेवाले लालाने 'दासोऽहम्', 'दासोऽहम्' का जप करनेवाले, भावना करनेवाले, भक्तोंका 'दा' चुरा लिया। बच गया 'सोऽहम्', यह प्रेममार्गसे वेदान्तमार्ग अलग है। शृंगाररसमें नायक-नायिका परस्परभावापन्न होते हैं। वैसे ही श्रीकृष्ण और व्रजांगना वृषभानुनन्दिनीमें परस्पराभावापत्ति हो गयी। अतः जो किसीके भोग्य नहीं, उनके भोग्य हो जानेके कारण उस सर्वाभोग्या अधरसुधाकी प्राप्ति व्रजांगनाओंको हुई। भगवद्धाम वृन्दावनकी अद्भुत शोभा 'वृन्दारण्यं स्वपदरमणम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।५)—वृन्दारण्य कैसा? 'स्वपदरमणम्।' 'स्वपदं वैकुण्ठधाम तस्मादपि रमणम्। किंवा स्वपदेन (स्वस्य पदमधिष्ठानं) रमणम्।' वैकुण्ठ दो प्रकारके—१. भौमवैकुण्ठ, २. परमवैकुण्ठ। वृन्दारण्य भौमवैकुण्ठ है। वह परमवैकुण्ठसे भी रमण है। वैकुण्ठवासी यहाँ आये तो वह भी यहाँ आया। जहाँ भगवान् जाते हैं, वहाँ उनका धाम भी पधारता है। इसी अभिप्रायसे सुमित्रा लक्ष्मणलालसे कहती हैं— 'अयोध्यामटवीं विद्धि।' गोस्वामीजी कहते हैं— 'अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥' (रा०च०मा० २।७४।३) इससे यह बात निकलती है कि जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ वैकुण्ठ। भावुकोंका हृदय भी वैकुण्ठ है। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका वृन्दारण्य कहाँ? व्रजांगनाओंके हृदयमें। वहाँ जो प्रेमसुधातरंगिणी बही एवं यमुना, उनके उन्नत विशाल वक्षोज गोवर्धनादि पर्वत, रोमपंक्ति वन—इसी तरह सर्वभावोंका सम्पादन होता है। सजातीय-विजातीय-भेदरहित श्रीकृष्ण परब्रह्मका प्राकट्य कहाँ? महावाक्यजन्य परब्रह्मा- काराकारित मानसिक वृत्तिपर। जैसे सूर्यकान्तपर अग्निरूपमें सूर्यका प्राकट्य होता है, वैसे निर्वृत्तिक अन्तःकरणकी जो परब्रह्माकाराकारित वृत्ति है, उसीपर ब्रह्मका प्राकट्य होता है। भक्तहृदय कैसा? अति निर्मल, स्निग्ध, पवित्र, भगवदाकाराकारितवृत्तिमान्। भूमिसे लेकर क्रमशः सर्वोपरि अव्यक्त और उसके ऊपर भगवान्। यही अव्यक्त शेष है। 'शिष्यते यः स शेषः', कार्योंके कारणोंमें लय होनेके बाद कारण ही शेष रहता है। वह अव्यक्त मायावच्छिन्न चैतन्य महाकारण सहस्रफणायुक्त है। उसीपर श्रीमन्नारायण शयन करते हैं। वही महाकारणातीत, कार्यकारणातीत परब्रह्म है। भागवतमें कहा है—'अव्याकृत- मनन्ताख्यम्' (१२।११।१३) वही प्रकृतिविशिष्ट चैतन्य अनन्त भगवदधिष्ठान आसन है। भगवदाकारा- कारित, स्वच्छ, स्निग्ध मनोवृत्तिपर सगुण, साकार ब्रह्मका प्राकट्य है। जहाँ भगवान् हैं, वहाँ इसको जाना पड़ेगा, क्योंकि उसके बिना रामका प्राकट्य नहीं होगा। अतएव भक्तहृदय ही अवध और भक्तहृदय

वेणुगीत १०९ ही वृन्दारण्य। उसके सब जगह प्रकट करनेमें कठिनाई है, मेहनत है। पर वह है व्यापक। जैसे नेत्र जिसे कहते हैं वह नेत्रगोलक और उसके भीतर अतीन्द्रिय इन्द्रिय है, वैसे वृन्दारण्य गोलक और उसमें मुख्य वृन्दारण्य। वहाँ लौकिकताका भान दोषवश होता है। भगवान् तो अपने-आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। वह शेष केवल अव्यक्त जडांश नहीं, किंतु अव्यक्तांशपर चेतनांश होता है। वृन्दारण्यादि सर्व अद्भुत, अनन्त, परमानन्दसिन्धुमेंसे ही विकसित हैं। उसमें भी उसके भी ऊपर भगवत्स्वरूप वृन्दावन अलग है। वृन्दारण्य अव्यक्त रूप है। उसमें रसरूप वृन्दारण्य है और स्वस्वरूपभूत वृन्दारण्यमें ही भगवान्‌का रमण हुआ। ‘स्वपदरमणं, स्वपदादपि रमणम्'—वैकुण्ठसे भी रमण। व्रजांगना कहती हैं— 'जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१) हे श्यामसुन्दर, आपके मंगलमय जन्मसे व्रज अत्यन्त सुशोभित हो उठा। 'वैकुण्ठात् सर्वस्मादपि लोकात् अधिकं जयति।' कैसे? लक्ष्मी वृन्दावनमें सदा सेवा करती है, वैकुण्ठमें सेव्या है। व्रजमें लक्ष्मी श्रीजीके चरणारविन्दरजके स्पर्शके लिये लालायित हैं। 'यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपः।' (श्रीमद्भा० १०।१६।३६) यमुनाघाट बिल्ववनमें लक्ष्मी तपस्या करती है। इस प्रकार वह यहाँपर सेविका है। ऐसे 'स्वपदभ्यां रमणम्।' जहाँपर श्रीचरणारविन्द पाषाणोंपर अंकित हैं। पाषाणपर खड़े होकर किये वंशीनिनादसे वह कोमल हो जानेसे भगवत्पद वहाँपर अंकित हो उठा। ऐसे वृन्दारण्यमें भगवान् पधारे। वृन्दारण्य स्वयं सुशोभित है ही, पर प्रभुके श्रीचरणारविन्दोंसे अंकित होनेके कारण वह अधिक सुशोभित हुआ। अथवा 'स्वपदं रमणं रतिजनकं यस्य तत्' भगवान्‌के श्रीचरणारविन्दोंसे रमण, रति, आनन्द प्राप्त होता है जिसको, ऐसा वृन्दावन। अर्थात् प्रभुके श्रीचरणोंके स्पर्शमें वृन्दारण्यको अद्भुत, लोकोत्तर आनन्द प्राप्त होता है। भगवान्‌का चरण ही आनन्दमय मंगलमय है। इसलिये जिसको भी स्पर्श हो, उसीको आनन्द होगा ही, पर विशेषरूपसे जो सरस हैं, उनको अधिकाधिक आनन्द होता है। अतः वृन्दारण्यको अधिक आनन्द-रमण हुआ। वृन्दारण्य सरस है, आर्द्र है। तभी भगवान्‌के श्रीपद वहाँ अंकित होते हैं। यदि बहुत-सा श्रवण भी कर लिया, पर हृदय आर्द्र-सरस न हो तो प्रभुके पद अंकित नहीं हो सकते। कठोर लाक्षापर अंक सुस्थिर नहीं होता। अग्निके सम्बन्धसे लाख द्रुत होनेपर अंक (मुहर) वहाँ सुस्थिर होगा। इसी रीतिसे हृदय यदि आर्द्र है, तभी भगवान्‌के मंगलमय चरण अंकित होंगे। कठोर हृदयमें जब कभी प्रसंगवश अभिव्यक्त होनेपर भी सुस्थिर अंकित न हो सकेंगे। प्रसंगवश खल भी उत्तमोत्तम वार्तालाप प्रसंगमें रहते हैं, मगर वे उसमें स्थिर नहीं होते। वहाँ मालूम होनेवाला रस रसाभास है। अतएव हृदय द्रुत करनेका प्रयत्न करें तो प्रभुमें स्थायी रति हो। इसलिये वृन्दारण्य द्रुत होनेसे वहाँ श्रीचरण अंकित होते हैं और उसको रमण-आनन्द-रति प्राप्त होती है। यह तो वृन्दारण्यका अद्भुत भाग्य है कि वहाँ भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके निरावरण चरण हैं। यह भाग्य आजतक किसीको प्राप्त नहीं हुआ। द्वारकामें भगवान्‌का निवास था, वहाँ वे थे राजाधिराज। राजाधिराजके निरावरण चरणोंका स्पर्श भूमिको कैसे हो सकता है? तभी तो मथुराको भी मथुरानाथके चरणोंका स्पर्श नहीं। उसे यह सौभाग्य ही नहीं है। यह वृन्दारण्यको ही सौभाग्य है; क्योंकि यहाँपर गोचारणरूप स्वधर्मपालनार्थ प्रभु निरावरण चरण ही पधारे। भगवान्‌के चरणस्पर्शसे वृन्दावनकी भूमि सौभाग्यशालिनी हो गयी 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में कथा है कि एक बार श्रीकृष्णचन्द्र गोचारणार्थ वन जानेको मचल पड़े। प्रभुने कहा—'मैया, मैं तो गोचारणके लिये जाऊँगा।

११० भक्तिसुधा माता नन्दरानी यशोदा और बाबा नन्दराय तो अपने प्रभु कहते—'नहीं, गौ हमारी इष्टदेवी हैं। यदि ललनको एक क्षणके लिये भी अपनेसे वियुक्त होने निरावरण चरणसे ये जायेंगी तो हम कैसे पादत्राण देना नहीं चाहते थे। फणीको जैसे मणिसे लोकोत्तर धारण करें ? पशुपालन ही हमारा इष्टदेवताराधन है।' अनुराग होता है, वैसे नन्दराजको। हमारे ललन आराधनमें यही प्रकार होता है। दिलीप भी जब गोचारणके लिये जायँ, यह वियोग कैसे सहन हो ? नन्दिनीके साथ उसकी सेवा करने वनमें गये, तब इसी रात्रिमें जब व्रजगेहिनी अपने ललनको अंकमें लेकर तरह-से गये। सोती तो बीच-बीचमें जागती, बार-बार अपने ललनको स्थितः स्थितामुच्चलितः प्रयातां स्पर्श करती। जैसे किसी महारंकको चिन्तामणि मिले निषेदुषीमासनबन्धधीरः । और वह उसे बार-बार सम्हाले, वैसे ही व्रजेन्द्रगेहिनीका जलाभिलाषी जलमाददानां प्रभुमें अद्भुत अनुराग था, जिससे वह बार-बार चुम्बन छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् ॥ करती, मस्तक सूँघती। वही श्रीकृष्ण गोवत्सचारणके (रघुवंश २।६) लिये जानेको मचले। फिर तो यह श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने तो धर्मसंस्थापनार्थ नटखटकी मचल। मैया कहती—'न जाओ लाला!' अवतार लिया है—'यदा यदा हि धर्मस्य' (गीता लाला कहते—'नहीं मैया, मैं तो जाऊँगा। यह ४।७) ऐसा भगवान्‌का ही वचन है। स्वयं आचरणद्वारा गोचारणरूप अपना स्वधर्म है। उसका पालन करना धर्म स्थित होता है। इसीलिये गोचारणद्वारा स्वधर्म- ही चाहिये।' आखिर जब श्यामसुन्दर न माने तो स्थापन किया। भगवान् गौओंकी खूब सेवा करते हुए कहा—'अच्छा लाला, ठीक मुहूर्त मिले तो जाना। मैं चलते हैं। इसीलिये निरावरण-चरण चले। अतएव गर्गमहाराजसे पूछूँगी।' भगवान्‌की इच्छा होनेपर क्या वृन्दारण्यको साक्षात् चरणस्पर्श हुआ, इतरोंको परम्परया। देर! उसी समय श्रीगर्गाचार्यजी आ गये। प्रभुको देख, अन्य किसी धामको भी कृष्णके निरावरण चरणोंका पूछा—'आज क्यों लाला मचला हुआ है?' नन्दरानीने स्पर्श नहीं हुआ। इसीलिये जो अन्यत्र सेव्या श्रीलक्ष्मी, कहा—'महाराज! लाला कहता है, मैं गोचारणके वह भी यहाँपर सेविका होकर रहती है एवं चरणसम्बद्ध लिये वृन्दावन जाऊँगा, सो आप मुहूर्त बताओ।' वृन्दावनके सम्बन्धसे ही समस्त भूमिने अपनेको गर्गाचार्यने भी पत्रा देखकर बतलाया—'ठीक तो है। सौभाग्यशालिनी समझा। इसलिये कि प्रभु हमारेमें ही यह गोपाष्टमी बड़ा अच्छा दिन है। उसी दिन मुहूर्त हैं, भूमि गर्वीली हो गयी। करो।' गर्गाचार्यका वचन सुनकर श्रीकृष्णचन्द्र परम ब्रजांगनाओंने भूमिको देखकर पूछा कि 'हे प्रसन्न हुए। गोपाष्टमी आयी। उस दिन विधि- धरित्री, तुमने कौन-सा तप किया कि श्रीकृष्णचन्द्र विधानपूर्वक गोपूजन हुआ। अम्बाने श्रीकृष्णसे गौओंको परमानन्दकन्दके निरावरण चरणोंका तुम्हें स्पर्श हुआ!' साष्टांग प्रणाम कराया। प्रभु अपने अम्बा, बाबाको किं ते तपः क्षिति कृतं बत केशवाङ्घ्रि- प्रणामकर वृन्दारण्य पधारने निकले। अब अम्बा बार- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । बार गोपालोंको समझाती, कहती कि 'देखो, हमारे अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा लालाकी रक्षा करना; उसे अकेले कहीं न जाने देना।' आहो वराहवपुषः परिम्भणेन ॥ श्रीकृष्णका श्रीहस्तारविन्द गोपालोंके हाथमें देती। हे सखि धरित्रि! कौन योग, कौन-सी आराधना इस तरह कहते-कहते मैया-बाबा साथ-साथ चलते तुमने की, जिससे तुम्हें श्यामसुन्दर केशवके श्रीचरणोंका हैं, यह देख श्यामसुन्दर कहते हैं—'मैया, जाऊँगा स्पर्श हुआ ? बताओ तो हम भी वही करें। यदि मैया।' बाबाने कहा—'लाला पादत्राण तो पहनो!' तुम्हारी तपस्या जान लें तो युग-युगमें वही करें कि

कल्पकल्पान्तरमें कभी-न-कभी वह चरण हमें प्राप्त हो। धरित्रीने पूछा—तुमने हमारे इस सौभाग्यकी कल्पना कैसे की? व्रजांगनाने कहा—श्रीश्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनके श्रीचरणारविन्दके स्पर्शसे होनेवाला उत्सव हम देख रही हैं। आनन्दोद्रेकसे आह्लादमें रोमांच होता है। कार्यसे ही कारणका अनुमान किया जाता है। यह चरणस्पर्शका ही फल है कि तुम्हारे रोएँ खड़े हो रहे हैं। भूमिपर जो वृक्ष, लता, तरु, गुल्म, औषधियाँ, दूर्वाएँ हैं, वही रोमांच है। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दके चरणसंस्पर्शसे ही ऐसा आनन्द हो सकता है। धरित्रीने कहा—यह रोमांचरूप लतादि क्या आजहीके हैं? नहीं, ये तो कितने ही दिनोंके हैं। व्रजांगनाओंने कहा—अबके नहीं; न सही। जब भगवान् वामनने अपने चरणोंसे तीनों लोकको नापा था, उस समय उन मंगलमय चरणारविन्दोंके स्पर्शसे यह रोमावली उद्गत हुई होगी। आखिर कारण क्या? कुछ भी कहो, उनके चरणस्पर्शके बिना यह रोमांच नहीं हो सकता। ऐसा आह्लाद अन्यत्र कहीं नहीं होता। धरित्रीने फिर कहा—नहीं, ये और पहलेके हैं। क्या वामनावतारके पहले वृक्ष- लतादि रोमांचित नहीं थे? व्रजांगनाओंने कहा— 'आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) सखि, तबके भले हो-न-हों, पर जब हमारे प्रियतम प्राणधनने वराहावतार लेकर रसातलसे तुम्हारा उद्धार करते समय परिरम्भण किया, उस समयसे यह रोमावली होगी। यह रोमोद्गम ब्राह्मीरस-संस्पर्शसे ही हो सकता है। इसलिये अब नहीं तो वामनावतारमें, तब नहीं तो वाराहावतारमें ही सही। सखि धरित्रि ! छिपाओ मत, बतलाओ, बतलाओ, हम भी तुम्हारी ही तरह तपस्या करें। इसी कारण वृन्दारण्यके संस्पर्शसे सब भूमि रोमांचित हो गयी। भूमि अपने सौभाग्यपर गर्वीली होकर इठलाती है। जैसे 'बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई ॥', वही बात यहाँ भूमिके पक्षमें भी है। विन्ध्याचलके एक देश चित्रकूटका श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रने चरणसे स्पर्श किया। वहाँपर तपस्वीवेशसे भगवान्ने निवास किया। इतनेसे ही विन्ध्यने बड़ाई पायी। एक दिन देवर्षि नारद उसके यहाँ पधारे। कहा—तुम तो बहुत पुराने हो, लेकिन सब लोग मेरुको बड़ा समझते हैं। यह कुछ अटपट-सी बात मालूम होती है। विन्ध्यने सोचा—मेरुकी सूर्य प्रदक्षिणा करते हैं, इसीसे उसे लोग बड़ा समझते हैं तो वही बन्द कर दिया जाय। बस, विन्ध्य बढ़ने लगे। सूर्यभगवान्‌का मार्ग बन्द हो गया। सब धर्म, कर्म, उपासना, अग्निहोत्रानुष्ठान बन्द हो गये। सूर्योदय हो नहीं तो कुछ हो कैसे ? तब सब देवता, ऋषि संत्रस्त होकर अगस्त्यऋषिकी प्रार्थना करने काशीमें आये। ऋषिकी प्रार्थनाकर उन्हींको भेजा। विन्ध्यपर्वत अगस्त्यका शिष्य था। उन्हें देखकर उसने खर्वरूप धारण किया, प्रणाम किया। अगस्त्य प्रसन्न होकर बोले—'जबतक मैं उधरसे नहीं लौटता, तबतक ऐसे ही पड़े रहो। अगस्त्य दक्षिण समुद्रपर चले गये और विन्ध्य जैसा-का-तैसा पड़ा रहा। फिर श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रने जब चित्रकूटपर निवास किया, तब विन्ध्यने पुनः बिना श्रम उत्कर्ष पाया। उसके शत्रु भी उसकी महिमा गाने लगे। तात्पर्य यह कि भगवान्‌के मंगलमय श्रीचरणोंके स्पर्शसे वृन्दारण्य ही नहीं, समस्त भूमण्डल सौभाग्ययुक्त हुआ।' किंवा 'स्वपदयोः रमणं रतिजनकं—स्वपद- रमणम्।' भगवान्‌के मंगलमय श्रीचरणारविन्दोंको आनन्द देनेवाला। अर्थात् अतिरम्य भूमि, सुकोमल वालुका, श्यामल-श्वेत दूर्वाएँ एवं अद्भुत, अभिनव पत्र, पुष्प, पल्लवोंसे वृन्दारण्यभूमि सुशोभित है। जहाँ श्रीकृष्णके चरणारविन्द जायँ, वहाँ कठोरता न मालूम पड़े, अतः वृन्दारण्यने अपनेको सजा रखा। प्रभुचरणोंमें कहीं आघात न लगे। ऐसे वृन्दारण्यधाममें भगवान् पधारे। जहाँ-जहाँ प्रभुके श्रीचरणारविन्दका विन्यास होता है, वहाँ-वहाँ वृन्दारण्य अपने हृदयकमलको विकसित करता है। भगवान्‌के चरणारविन्द वृन्दारण्यके

११२ भक्तिसुधा हृदयपर ही विन्यस्त होते हैं। व्रजांगनाएँ इसका बड़ा संताप करती हैं कि प्रभुके चरण अत्यन्त सुकोमल हैं, उन्हें वृन्दारण्यके दूर्वा, कुश-कण्टक गड़ते होंगे। अलौकिक प्रतीति चाहिये ही। व्रजांगनाओंको यह बात सदा खटकती ही रहती है कि श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें कण्टकादि कहीं गड़ न जायँ— यत्तै सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।१९) हे श्यामसुन्दर, व्रजेन्द्रनन्दन, मनमोहन! आपके श्रीचरण सुजात, सद्योजात, सुकोमल कमलसे भी शतकोटिगुणित कोमल हैं। उनको अपने हृदयपर हम ताप-पापशान्त्यर्थ धारण करती हैं, पर संकुचित होती हैं कि चरण सुकोमल हैं, हमारे हृदय कठोर हैं, अतः कठोर हृदयके सम्पर्कसे चरणोंमें कहीं आघात न लगे। इसलिये भयभीत होकर कर्कश हृदयपर—वक्षोजपर मनमोहन श्रीकृष्णके चरणारविन्द धारण करती हैं, उसीसे आप अटवीका अटन करते हैं, वनमें विहरण करते हैं! क्या वहाँ वृन्दारण्यके जो दूर्वा, लता-गुल्म, तृण, अंकुर, कण्टक हैं, उनसे आपके सुकोमल चरण व्यथित नहीं होते? हा! क्या कहें, श्रीश्यामसुन्दरको इतना कष्ट और हम अभी भी जीवित हैं! इसी भावसे उनकी निष्कामता प्रकट होती है। यहाँ स्वसुखसुखित्व नहीं, तत्सुखसुखित्व है। इससे श्यामसुन्दरके सुखमें सुखिनी होना कहा गया। पिता जब अपने बालकका मुख चुम्बन करने लगता है, तब बालकको उसकी दाढ़ी-मूँछें गड़ती हैं, बालकको वे अच्छी नहीं लगतीं, वह रोता है, पर पिता अपने रसमें बालकके रोनेकी परवाह नहीं करता। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' यही सिद्धान्त है। पत्नी, पति, पुत्र इत्यादि उनके लिये प्यारे नहीं, अपने लिये प्यारे लगते हैं—'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) पिता बालककी तरफ ध्यान नहीं रखता, चुम्बनकी बौछार लगा देता है। रागका होना स्वाभाविक था, व्रजांगनाएँ चरणोंका पूर्ण आलिंगन करतीं, किन्तु उनका हृदय डरता है कि प्रभुचरण कोमल-से-कोमल हैं और हमारा हृदयप्रदेश अतिकठोर है। यहाँपर चरणोंको पीड़ा होगी, यही ध्यान है। अपने सुखपर ध्यान नहीं। प्राप्त यही था कि चरणोंका गाढ़ आलिंगन करतीं, परंतु वे रागोद्रेकको दबा देती हैं। जो कुछ हो, उन्हें अपनी परवाह नहीं है। यह भाव कहीं साधारण कामिनीमें हो सकता है? इसलिये कहा है कि 'प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्' गोपांगनाओंको काम नहीं था, किंतु उनका प्रेम ही काम शब्दसे प्रख्यात हुआ था। इस दृष्टिसे व्रजांगनाएँ कहती हैं कि श्रीचरणोंको कष्ट होते हुए देखकर भी क्या हम जीवित रह सकती हैं? हाँ! हमारे जीवनका कारण यह है कि ब्रह्माने शरीर-निर्माणकर हमें प्रदान किया, पर आयु आपके हाथ दी, नहीं तो अबतक कभीकी मर जातीं, किंतु आपके दर्शनकी लालसासे ये नेत्र मरने नहीं देते। 'भवानेव आयुर्यासां तासां भवदायुषाम्।' यह व्रजांगनाओंकी भावना है। वास्तवमें वृन्दावन नीरस नहीं, क्योंकि 'स भगवान् कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिम्नि' के अनुसार यह उनका स्वरूप ही है। वृन्दारण्यको मनमोहनके चरणकी कोमलता, चरणकी सरसताका ध्यान था। इसलिये वह चरणोंके नीचे अपना हृदयकमल विकसित करता था। वैसे तो उनके चरणस्पर्शसे महान् कठोरोंकी कठोरता भी दूर होती है। वज्र भी मक्खनके सदृश सुकोमल हो जाता है। जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी॥ (रा०च०मा० २।२६२।८) सिंहिनीको भी पुत्रमें राग होता है, पर सर्पिणीको नहीं। इसीसे इसको निर्दय, पुत्रभक्षिका, पुत्रादिनी कहते हैं। डाइनको भी पुत्रमें राग होता है, पर इसको नहीं। परंतु ऐसी सर्पिणी एवं वृश्चिकी भी भगवान्‌के चरणोंका दर्शनकर अपने सहज तामस भाव तथा

तीक्ष्ण विषको छोड़ देते हैं, निर्विष, शान्त, सात्त्विक हो जाते हैं। फिर वृन्दारण्यके दूर्वा, लता, कण्टक कोमल हो जायँ, इसमें आश्चर्य ही क्या? वह तो वस्तु ही ऐसी है। 'वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) वृन्दाके आख्यानका रहस्य भगवान्‌के चरणोंको आनन्द देनेवाला, व्रजांगनाओंको 'घबड़ाओ मत ! प्रभुके चरणोंको कष्ट नहीं होगा'—ऐसा आश्वासन देनेवाला जो वृन्दारण्य धाम, उसमें गोपवृन्दोंके संग गीतकीर्ति भगवान् पधारे। यह वृन्दाका अरण्य है। वृन्दा याने तुलसी। पहले जो वृन्दा जालन्धर दैत्यकी पत्नी थी, उसका अरण्य। तात्पर्य यह कि जो दैत्यभोग्या वृन्दा थी, वह अब भगवदीया—भगवान्‌की वस्तु हो गयी। यह वृन्दा—तुलसी लक्ष्मी, वृषभानुनन्दिनीकी तरह गोलोक- धाममें रहनेवाली भगवदीया दिव्य महाशक्ति थी, किंतु किसी प्रकारके दुर्दैवसे भगवान्‌की महाशक्ति भगवद्भोग्या होती हुई भी दैत्यभोग्या हो गयी और महाराजनी हुई। अरुचिपुरःसर जालन्धर दैत्यके प्रति रागिणी हो उठी। फिर पूर्णतम, पुरुषोत्तम, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने अपनी अनुकम्पा-विशेषसे दैत्यका वधकर वृन्दाको स्वीकार किया। कथा ऐसी है कि— जालन्धरसे श्रीशिवका संग्राम हो रहा था। उसकी पत्नी पतिव्रता वृन्दा थी। जबतक उसका पातिव्रत्य भंग न हो, तबतक जालन्धरका वध नहीं हो सकता था। इसलिये श्रीमहाविष्णुने जालन्धरका वेश धारण किया और वृन्दाके घरमें जाकर जब उसका पातिव्रत्य भंग किया, तब वह दैत्य मरा। यह ऊपरी भाव जरा टेढ़ा है। लोग कहेंगे कि श्रीमहाविष्णुने ऐसा कैसे किया ? परंतु अन्तरंग भाव कुछ और है। धर्माधर्मके विचारमें उनका गौरव-लाघव देखा जाता है। जालन्धर स्वयं पातिव्रत्य नहीं मानता था, वेदोक्त मर्यादाको विघटित करता था। फिर जो सर्वधार्मिक मर्यादाओंका व्यापादक है, वह पातिव्रत्य क्या जानता? ऐसे सर्वधर्मनाशक जालन्धरका नाश करनेके लिये किंचित् धर्म-व्यत्यय भी करना हो तो वह सह्य है। एक सत्यसे दस हजार गो-ब्राह्मणोंका वध होता हो तो उससे क्या लाभ ? वहाँ तो झूठ ही बोले। वहाँ सत्यभाषण मिथ्याधर्म है। यदि हमारे सत्यसे अपरिमित धर्मकी हानि होती हो तो उसकी महिमा नहीं है। अर्जुनकी प्रतिज्ञा थी कि हमारे गाण्डीव धनुषकी जो निन्दा करेगा उसका सिर उतार लूँगा। एक बार प्रसंग ऐसा आया कि कर्णसे युद्धमें विह्वल हुए धर्मराजने ही गाण्डीवकी निन्दा कर दी। सुनकर अर्जुनने सोचा—मैं क्षत्रिय हूँ, मेरी प्रतिज्ञा सुदृढ़ है। युधिष्ठिरको मारनेके लिये अर्जुनने तलवार निकाल ली। भगवान् श्रीकृष्ण बीचमें पड़े और अर्जुनसे कहा—'अरे ! तू धर्म जानता भी है ? परमाराध्य ज्येष्ठ भ्राता धर्मराज क्या तेरे वध्य हैं ? प्रतिज्ञापालनके लिये उनको 'युष्मत्' शब्दसे सम्बोधित कर—यही बड़ोंका वध है।' अर्जुन समझ गया, उसने धर्मराजके लिये 'तुम', 'तुम' शब्दका कई बार प्रयोग किया। इतनेसे युधिष्ठिर उद्विग्न हो गये। यह देखकर अर्जुन कहने लगा—'अब मैं आत्महत्या करूँगा, मैंने धर्मराजके लिये 'त्वं' पदका प्रयोग किया।' कृष्णने कहा— 'पागल है, तू अपनी बड़ाई-आत्मश्लाघा कर, यही अपना वध है। फिर अपनी बड़ाई अर्जुनने खूब गायी। इस तरह भगवान्‌ने चातुर्यसे पाण्डवोंकी नैयाको पार लगाया। इसीलिये कहा है कि 'कैवर्तकः केशवः'। अतः धर्माधर्मका गौरव-लाघव सोचना चाहिये। यदि सर्वधर्मका शत्रु जालन्धर अन्य उपायोंसे नहीं मरता, तब एक धर्मको विघटितकर अनन्त धर्मका संगठन करना नैतिक ही है।' दूसरी दृष्टिसे देखें तो वास्तवमें वहाँ पातिव्रत्य भंग ही नहीं हुआ, क्योंकि विष्णु वृन्दाके परम पति थे। वस्तुतः पातिव्रत्य धर्मसे भी विष्णुसम्बन्धको ही तो प्राप्त करना है। सारांश यह निकला कि पहले वृन्दा भगवदीया ही थी, गोलोक-धाम-निवासिनी थी, दुर्दैववशात् जालन्धरभोग्या हो गयी थी। यह वृन्दा प्राणियोंकी बुद्धि है, वास्तवमें इसका सम्बन्ध मुख्य

साक्षीसे ही होना चाहिये। इसलिये बुद्धिका पूर्णतम पुरुषोत्तमाकाराकारित होना, यही स्वाभाविक सफलता है। दुर्दैव यह है कि वह जगदाकाराकारित हो रही है। जीवोंको बुद्धि मिली है भगवत्प्राप्तिके लिये, सांसारिक निर्णयोंके लिये नहीं। इसलिये इसकी परम सफलता इसीमें है कि भगवत्सम्बन्ध सुस्थिर हो, वहाँ भगवदभिव्यक्ति हो। यह प्रभुकी महान् कृपा है कि दैत्य-सम्बन्ध छुड़ाकर उस दैत्यभोग्या वृन्दाको भगवद्भोग्या बनायें। यही स्थिति संसारमें भी है। बुद्धियोंपर शैतानका अधिकार है या भगवान्‌का ? साधारण बुद्धि शैतानभोग्या हो गयी है, तभी तो वह पाप, ताप, दम्भोंमें लगायी जाती है। उसका फल ही है नाना योनियोंमें भटकते रहना। वास्तवमें घट उत्पन्न होते ही आकाशसे परिपूरित हो जाता है; जल, दुग्ध या मृत्तिकासे पीछे परिपूरित होता है। इसी तरह बुद्धि उत्पन्न होते ही आकाशोपम परमात्मासे ही भरपूर हुई, इसमें प्रपंच जो भरा है वह आगन्तुक है। तथापि बुद्धि इस प्रपंचकी पतिव्रता हो गयी है। एक क्षणके लिये भी उसमेंसे प्रपंच नहीं निकलता। यही बुद्धिका दृश्यमें राग, प्रीति, पातिव्रत्य हठ हो गया। अब पूर्णतम, पुरुषोत्तम ही कृपा करें, हठात् यदि दैत्यसम्बन्ध छुड़ायें तभी कुछ हो, वह स्वयं तो निवृत्त होती नहीं। इसी बुद्धिके बलसे ही यह दैत्य संसारमें अनेक अनर्थ बढ़ा रहा है। कौन इस दैत्यका वध करे ? सब देवाधिदेव परेशान हैं। जब प्रभु बलात् इस दैत्यके संसर्गको छुड़ायें, नकली पातिव्रत्य बिगाड़ें तभी कल्याण हो। असली पति भगवान् ही हैं; क्योंकि शुरूमें वह बुद्धि भगवदाकाराकारित होकर पीछे सर्वाकाराकारित होती है। यही कथा वहाँ हुई। गोलोकनिवासिनी वृन्दाको शाप हुआ। जालन्धर भी गोलोकनिवासी गोप था, वह दैत्य हुआ, उसकी यह पत्नी हुई। उसका यह सम्बन्ध आगन्तुक था, इसलिये रुद्रादिके लाचार होनेपर छलसे दैत्य सम्बन्ध छुड़ाकर स्वकीयाको स्वीकार किया गया। ऐसे ही इस बुद्धिका शैतानसे संसर्ग छुड़ाकर प्रभु अपना संसर्ग स्थापित करें, बुद्धिके सर्वाकारको छुड़ाकर उसमें अपना आकार स्थापित करें, तभी तो आनन्द होगा, स्वातन्त्र्य होगा। उस वृन्दाका अरण्य ही वृन्दारण्य है। अथवा— 'वृन्दायाः वनं यौवनं वृन्दावनम्।' वृन्दाका यह यौवन है अर्थात् यह वृन्दावन वृन्दाका देदीप्यमान स्वरूप ही है। वृन्दाकी स्थिति है, हर स्थितिमें श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंसे सुशोभित होना। जहाँ प्रभु शालग्राममें विराजमान हों, वहाँ वह तुलसीरूपमें सेवा करती है। जब प्रियतम, प्राणधन, पूर्णतम, पुरुषोत्तम- रूपमें प्रभुने व्रजमें अवतार लिया, तब वह यहाँ वृन्दावनमें प्रकट हुई। यहाँ जो यमुना है, वह वृन्दाके हृदयकी प्रेमानन्दरससरिता, जो तरु हैं वे रोमांच और भूमि ही देह है। इसलिये व्रजांगनाएँ ईर्ष्या करती हैं कि सखि ! देखो, मनमोहन श्यामसुन्दर वृन्दारण्यमें पधारे हैं। यहाँ सब विपरीत-ही-विपरीत हो रहा है। हमारी अधरसुधाका वे कितना दुरुपयोग करते हैं। सखि ! जड़, सच्छिद्र शुष्क बाँसके छिद्रोंमें उसे भरते हैं। हम चाहती हैं, हमारे हृदयमें उनके चरणारविन्द स्थापित हों, पर नहीं, वे वृन्दारण्यमें प्रथम पधारे। अथवा 'स्वपदरमणं स्वस्याः आत्मीयायाः वृषभानुनन्दिन्याः पदैः रमणम्।' अर्थात् श्रीवृषभानु- नन्दिनीके मंगलमय चरणारविन्दोंसे सुशोभित वृन्दारण्यमें श्रीकृष्ण पधारे। रासलीलादिमें वृषभानुनन्दिनीका आगमन वहाँ होता है, इसलिये उनके चरणोंसे भूषित अरण्यमें पधारे। उद्दीपनविशेष सिद्ध हुआ। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी अन्तरंग प्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनीके चरणसे अंकित वृन्दारण्य देखकर प्रसन्नता हुई। इसलिये कहा गया 'प्राविशत्' अर्थात् वृन्दारण्यमें प्रविष्ट हुए। क्या करते हुए प्रवेश किया ? 'रन्ध्रान् वेणोरधर- सुधया पूरयन्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) यहाँ 'वेणोः' पुंस्त्व सूचित किया। वेणु पुमान् है अर्थात् पुमान् वेणुके छिद्रोंमें अधरसुधाको पूरित करते हुए भगवान् पधारे। दूसरी दृष्टि यह है कि वेणुछिद्रोंमें

अधरसुधाका सन्निवेशकर, भगवद्भोग्या अधरसुधाको व्रजांगनाओंमें और देवभोग्याको खगादिकोंमें पहुँचाना है। इसके लिये वेणु केवल पात्र ही है। अधर- सुधाका रस वेणुको नहीं मिलता, इसीका उपपादन है। जब भगवान्‌के अधरसुधासे पाषाण भी द्रवित हुए, तब वेणु क्यों न सुधरी ? उसमें हरापन क्यों न आया ? वह ज्यों-का-त्यों क्यों रहा ? इसका कारण यही है कि वह केवल पात्रमात्र रही, उसको कुछ मिला नहीं। अन्य दृष्टिसे कहें तो वेणु बड़ी चतुर भगवान्‌की प्रिय सखी है। वह वेणुरूपमें अपने- आपको छिपाकर पुमान्रूपमें अभिव्यक्त होकर श्यामसुन्दरके अधरपर विराजित होकर उसकी मधुर सुधाका पान करती है। वह इसलिये वेणु बनी कि कोई उससे ईर्ष्या न करे, कोई न जाने कि यह श्यामसुन्दरका रसास्वादन करती है, नहीं तो कोई उसे चुरा लेगा। वृषभानुनन्दिनीने तो कई बार उसको चुराया भी था। अतः वह वंशी सग्रन्थि एवं शुष्क होकर रहती है; क्योंकि वह चतुरा है। ऊँची कोटिके रसिक अपने रसको प्रकट नहीं करते। रोयेंगे तो भी भीतर-ही-भीतर, बाहर नहीं। इस तरह वेणु बड़े धैर्यसे रसास्वादन करती हुई भी अपनेको शुष्क बनाये रखती है। सोचती है कि यदि मुझमें हरे-हरे पल्लव निकल आये तो श्यामसुन्दर हमें छोड़ देंगे। कहेंगे कि यह हमारे कामकी नहीं रही। जिस रसाभिव्यक्तिमें श्यामसुन्दर उसे छोड़ दें, वह रस किस कामका ? माना कि यदि वेणु श्यामसुन्दरके अमृतमय मुखचन्द्रपर आसीन होकर अधरसुधारसास्वादनसे प्रफुल्लित हो गयी, तब तो वह बजेगी ही नहीं। अधर-पल्लवपर लिटाना, सुधाका स्वाद देना, यह सब तबतक ही, जबतक वह सरस न हो। इसलिये वह अपनेको सरस नहीं होने देती। जहाँ परम्परासे अधरसुधास्वादनसे पाषाण द्रुत हो गये, नदियाँ स्तब्ध एवं रोमांचित हो गयीं, वहाँ साक्षात् आस्वादन लेनेवाली वेणु सरस क्यों न हो ? इस चातुर्यका पता गोपियोंको लग गया। इसीलिये व्रजांगनाएँ आगे कहती हैं—‘गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।९) सखि! इस वेणुने कौन पुण्य किया है? कहीं ऐसा भी है—एक अवसरमें श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन जब श्रीराधाके गुणगानमें व्यग्र थे, उस समय भगवान्‌के मुखपंकजसे सरस्वती प्रकट हो गयी। जब उसने अनन्तकोटि कन्दर्पदर्पदलनपटीयान् स्वरूपको देखा, तब मुग्ध हो गयी और आलिंगन चाहा। श्रीकृष्णचन्द्रने कहा—'यदि मुझसे ऐसा परिरम्भण चाहती हो तो वृन्दावनमें वेणुरूपसे प्रकट हो।' जब वहाँ जाकर उसने घोर तप किया, बड़ी- बड़ी यातनाएँ सहन कीं, काटी गयी, छीली गयी, तपाकर सीधी की गयी, उसमें छिद्र किये गये, तब वह श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मुखचन्द्रपर विराजमान हुई। अब प्रभु उसको अपने अधरपर्यंकपर लिटाकर, मुकुटका छत्र धरकर, कुण्डलोंसे आरतीकर, अधरसुधाका भोग लगाकर, अपने कोमल अंगुलिदलोंसे उसका पादसंवाहन करते हैं। उसपर बड़े प्रसन्न हैं। इस प्रकार वेणुको सुधारससे पूरित करते हुए भगवान् श्रीवृन्दावनधाममें पधारे। इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम्। श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।६) वेणुछिद्रोंमें प्रविष्ट होकर भगवान्‌की अधरसुधा ही ‘बर्हापीडं' इस श्लोकके रूपमें व्यक्त हुई। इसमें उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस है। जब कहा कि— 'नाशकन् स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप ॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।४) अर्थात् स्मरवेगसे विक्षिप्तमनस्क होनेसे व्रजांगनाएँ उसके वर्णनमें असमर्थ हुईं। जब 'नाशकन्', वर्णन न कर सकीं, तब यह वर्णन कैसा ? इसका समाधान यह है कि परम अन्तरंग वक्ता श्रीशुक प्रायः व्रजांगनाओंमें तन्मय होकर लीलाका वर्णन करते हैं। इसलिये जिस समय वे जिस लीलाका वर्णन करते थे, उस समय उस रसमें तन्मय हो जाते थे। इसलिये जब श्रीव्रजांगनाएँ श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मुखचन्द्रसे निर्गत वेणुरव—वेणुनादको श्रवण करतीं, तब उसके

११६ भक्तिसुधा वर्णनमें प्रयत्नशील होतीं। किंतु वेणुनाद महा-मोहनमन्त्र है, उससे वे मूर्च्छित हो जातीं। कथंचित् भगवत्कृपासे लब्धावस्थिति होकर पुनः वेणुगीत सुनती हैं। नाद तो नादमात्र है, गीतमें कुछ अर्थ होता है। अतः वेणुगीतार्थ श्रीकृष्ण व्रजांगनाओंके हृदयमें, अन्तःकरणमें, अन्तरात्मामें अभिव्यक्त होते हैं। फिर वे वर्णनकी चेष्टा करतीं और पुनः स्मरणसे मूर्च्छित होती हैं। पहले वेणुनादसे मूर्च्छित, फिर उसके उद्गमस्थान श्रीकृष्णचन्द्रके स्मरणसे मूर्च्छित, फिर गीतार्थानुभवसे मोहित होती हैं। अन्तमें जब वर्णन करना चाहतीं तो विक्षिप्तमनस्का होकर न कर सकतीं। उनकी इस अशक्तिको देखकर तन्मयावस्थाप्राप्त शुक ही स्वयं वर्णन करते हैं। इसमें हेतु यह कि यहाँ यह शुकवाक्य है। यदि गोपियोंका वर्णित होता तो 'गोप्य ऊचुः', ऐसा लिखते। वैसा न होनेसे स्पष्ट है कि लीलारसभावापन्न होकर गोपांगनाभावापन्न श्रीशुक स्वयं कहते हैं- 'इति वेणुरवं राजन्', दूसरा भाव यह है कि राजाको सम्बोधितकर शुकदेव कहते हैं कि व्रजांगनाओंके मनमें क्षोभ क्यों हुआ ? श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दका यादृश स्वरूप अभिव्यक्त होकर क्षोभकारक हुआ, वह है- 'बर्हापीडं' इत्यादि। ऐसे उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूपका हृदयमें अनुभव करनेसे उनका हृदय स्मरवेगसे क्षुब्ध हुआ। अतः कहा गया है- 'यादृशं स्वरूपं मनःक्षोभकरं जातं तादृशमाह- बर्हापीडमिति।' इसीलिये भावुक कहते हैं कि श्रीशुक अन्तर्लीला-निविष्ट हैं, साक्षात् श्रीवृषभानुनन्दिनीके नित्यनिकुंजमें रहनेवाले हैं। उन्हींका यह अवतारविशेष है, जिनको श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्णका नाम पढ़ाती हैं और श्रीकृष्ण भी जिनको वृषभानुनन्दिनीका नाम पढ़ाते हैं। अतः ये लीलारसका प्रत्यक्ष आस्वादन करते हुए वर्णन करते थे। फिर भी उन्होंने अधिकारानुसार ही गुप्त शब्दोंमें वर्णन किया- 'इति वेणुरवम्।' यहाँ 'र' से अग्निबीज विप्रयोगात्मक शृंगार और 'व' से अमृतबीज संयोगात्मक शृंगार विवक्षित है। वह 'सर्वभूतमनोहरम्' है। श्रीजीवगोस्वामी कहते हैं कि यहाँ भूतपदसे चेतनाचेतन, स्थावर- जंगम सब लेना और मनोहर पदकी लक्षणा विकारकारी अर्थमें करनी चाहिये। वेणुरव-श्रवणका प्रभाव इस वेणुरवने सर्वप्राणिमात्र, चेतनाचेतनोंमें विकार उत्पन्न कर दिया। कहा है कि 'अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणाम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) जो गतिमान् थे, वे निश्चल हो गये, यमुनाका प्रवाह रुक गया, पर्वत-पाषाण द्रवित होकर बह चले। इसलिये यह मनोहर पद विकारकारीमें पर्यवसायी है। अतः स्थावर-जंगम सब क्षुब्ध हो उठे- 'श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वाः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।६) अन्य जगह क्षोभ तो हुआ ही, पर अधिक श्रीव्रजांगनाओंमें हुआ। वहाँ उसने अपना अत्यन्त पराक्रम व्यक्त किया। जहाँ चेतनाचेतनोंतक क्षोभ पहुँचा, फिर व्रजके लोगोंकी क्या कही जाय ? एक तो सबके मनको हरनेवाला, फिर जो प्रेमका प्रधानस्थान, वहाँ उसके प्रभावका कहना ही क्या है ? भक्ति वृद्धा होकर सर्वत्र घूमती हुई जहाँ आकर युवती हो गयी, जो भक्तिका परम दिव्य क्षेत्र है—चाहे ऊपरसे वह भले ही नीरस भूमि मालूम हो, पर अन्तरंग रूपसे अत्यन्त स्निग्ध और सरस है, उस व्रजके मनुष्य, उनमें भी स्त्रियाँ, जिनका हृदय अत्यन्त कोमल होता है और उनमें भी श्रीव्रजांगनाएँ, जिन्होंने उस मनोहर वेणुरवका श्रवण किया; उन कान्तभाववती और सख्यभाववती सौभाग्यवतियोंपर उसका विशेष प्रभाव पड़ा। किनपर प्रभाव पड़ा ? सबपर— 'सर्वाः।' इस पदसे नित्या, साधनसिद्धा आदि पूर्णतम, पुरुषोत्तम, परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण नित्य हैं, उनकी माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी नित्या तथा उसकी अंशभूता व्रजांगनाएँ भी 'नित्या' हैं। सदा गोलोकधाममें परमानन्दकन्द भगवान् विराजते हैं। वहीं श्रीवृषभानुनन्दिनी और वहीं अन्तरंगा अंशभूता व्रजांगनाएँ भी विराजती हैं। साधनसिद्धामें दो भेद हैं—श्रुतिरूपा और ऋषिरूपा। यह कहा गया है कि 'अद्यापि यत्पदरजः

श्रुतिमृग्यमेव।' अर्थात् आजतक श्रुतियाँ पररसामृतमूर्ति भगवान्‌को ढूँढ़ रही हैं। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते इनको जब मूर्तिमान् प्रभु प्राप्त हुए और उनके अद्भुत गुणगणोंपर प्रसन्न हुए, तब उन्होंने ब्राह्मरसस्पर्शकी इच्छा प्रकट की। प्रभुने उनको ब्रजमें आनेको कहा। वे ही साधनसिद्धा हैं। वे भी नित्या ही हैं; क्योंकि ब्रह्ममें ही श्रुतियोंका निरन्तर रमण होता है। निष्कर्ष यह है कि 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) समस्त वेद उस पूर्णतम पुरुषोत्तमका ही प्रतिपादन करते हैं। इस सिद्धान्तानुसार सर्व श्रुतियोंका तात्पर्य परमेश्वरमें ही है, वहीं उनका रमण है। इन श्रुतियोंमें दो भेद हैं—एक अनूढ़ा, दूसरी ऊढ़ा। उसमें अनूढ़ा कन्या वे हैं, जिन्होंने श्रीकृष्णप्राप्तिके लिये कात्यायनी-पूजन किया। दूसरी हैं ऊढ़ा—उनमें भिन्न-भिन्न पतियोंकी ममतामात्र थी। वास्तवमें तो यही था कि जिस समय ब्रह्माने वत्सगोपालादिकोंका हरण किया था और प्रभु स्वयं ही एक वर्षतक सब कुछ बने थे; उस समय सब गोप-कुमारियोंके विवाह ऊपरी दृष्टिसे दूसरे गोपोंके साथ हुए, परंतु वस्तुतः सबके विवाह प्रभुसे ही हुए थे; क्योंकि श्रीकृष्ण ही उस समय सब गोपरूपमें विराजमान थे। इसलिये लोकदृष्ट्या वह अन्यविवाहिता होती हुई भी प्रभुकी ही स्वकीया थीं। उनमें परकीयात्वका केवल आरोपमात्र था। इसलिये कहा गया है—'न जातु व्रजदेवीनां पतिभिः सह सङ्गमः' व्रजांगनाएँ कभी भी प्राकृत पतियोंसे संगत नहीं हुईं, अपितु प्रभु ही उनके सर्वस्व थे, यही बात 'श्रुतिरूपा' में भी है। कई श्रुतियाँ साक्षात् प्रभुमें तात्पर्य रखती हैं, जैसे 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इत्यादि। कई परम्परया अग्नि, यम और वरुण आदिकी स्तुतिद्वारा प्रभुके साथ सम्बन्ध रखती हैं। जिन श्रुतियोंका जो अर्थ होता है, उनके साथ उनका सम्बन्ध है, यही प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव सम्बन्ध भी कहा जाता है। रामायणमें कहा है— 'गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद....॥' (रा०च०मा० १।१८) कहा जाता है कि वाणी और अर्थका भेद वास्तवमें भेद नहीं है। गिरा और अर्थका सम्बन्ध पति-पत्नी सम्बन्ध है। अर्थ पति और गिरा पत्नी है। 'कदाचनस्तरीरसि' यह श्रुति इन्द्रस्ताविका होनेसे इन्द्रपत्नी है। जिसका जो प्रतिपाद्य है, वही उसका पति है। वैसे ही जिनका साक्षात् परमात्मा ही अर्थ है, अन्य अर्थ नहीं, उनके साक्षात् पति परमात्मा ही हैं। जिनका आपाततः अर्थ अन्य है, परंतु महातात्पर्य ब्रह्ममें है—अवान्तर तात्पर्य इन्द्रादिमें और महातात्पर्य ब्रह्मप्रकाशनमें है, ऐसी भी श्रुतियाँ हैं। इसलिये एक श्रुति ऐसी है, जिसका मुख्य पति परमात्मा ही है। जैसे 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि। यही प्रभुकी स्वकीया हैं और जो इन्द्रादिका प्रतिपादन करती हुई प्रभुमें पर्यवसित होती हैं, उनके अवान्तर पति इन्द्रादि और मुख्य पति प्रभु ब्रह्म हैं। ऐसी परिस्थितिमें कहा कि 'कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम्॥' (श्रीमद्भा० १०।८७।१५) अर्थात् कोई कहीं भी पैर रखे, आखिर वह पृथ्वीपर ही है। इस प्रकार सब तत्त्व परम्परासे ब्रह्महीमें हैं। कटक, मुकुट, कुण्डलादि क्या सुवर्ण नहीं हैं? समुद्रकी लाखों तरंगें समुद्रहीसे हैं, परमात्मासे बने इन्द्रादि सब परमात्मा ही हैं। मीमांसक जातिमें शक्ति मानते हैं, वह 'त्व' प्रत्ययवेद्या है। जैसे घटत्व अर्थात् घटका भाव, घटरूपमें परिणत मृत्तिका एवं मृत्तिकात्वका अर्थ जल, जलत्वका तेज, तेजत्वका वायु, वायुत्वका आकाश, आकाशका अहंतत्त्व, उसका महत्तत्त्व, उसका अव्यक्त और उसका सत्तत्त्वमें पर्यवसान होता है। इसलिये सबका अर्थ वही है। 'सा सत्ता सा महानात्मा तामाहुस्त्वतलादयः'। अतः जितनी जातियाँ हैं, सबका पर्यवसान ब्रह्ममें ही है। सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद्वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) अर्थात् सब वस्तुओंका भावार्थ—स्वकारणमें

१९८ भक्तिसुधा पर्यवसित होता है, उसका भी सत्तामें और वही सत्ता शुद्ध याथात्म्य ब्रह्म है, फिर श्रुतियोंका अर्थ ब्रह्ममें पर्यवसित हो—इसमें क्या आश्चर्य? आखिर शब्द कहेंगे किसको? प्रपंचको, वह तो परब्रह्म ही है। अतः जो कुछ भी करे सबका पर्यवसान सत्तामें ही होता है और वही परब्रह्म है। फिर भी उनका अवान्तर अर्थ, वह और वह, विभिन्न पदार्थ ही हैं। घटका साक्षात् अर्थ कंबुग्रीवादिमान् व्यक्ति है। किंतु जब गम्भीरतासे विचार करें, तब उसका अर्थ ब्रह्म ही होता है। असली रूप वही है, नकली रूप अलग- अलग हैं। इसलिये व्रजांगनाओंके नकली ममताके आस्पद विभिन्न गोप थे, परन्तु उनसे व्रजांगनाओंका संगम नहीं हुआ था। जब व्रजांगनाएँ श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दके साथ रासलीला कर रही थीं, तब व्रजमें ब्राह्मी रात्रि प्रकट हुई। उस रासलीलाकी दिव्य शोभाको देखकर चन्द्र मध्याकाशमें स्थगित हो गया—‘विस्मितः शशाङ्कः’। छः मासकी रात्रि थी, घरमें सब गोपोंको अपनी-अपनी दाराएँ अपने-अपने पास मिलीं— ‘मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥’ (श्रीमद्भा० १०।३३।३८) एतावता यह सिद्ध हुआ कि ये व्रजांगनाएँ श्रीकृष्णकी स्वकीया थीं। जब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके संग विहार करती थीं, तब भी उनका मायामय स्वरूप सब गोपोंके पास था। इसीलिये कहा—‘न जातु’। तो बात यही आयी—‘व्रजदेवीनां पतिभिः सह संगमः’ कि जिन श्रुतियोंका अवान्तर तात्पर्य इन्द्रादिकोंमें है, वे परकीया और जिनका साक्षात् प्रभुमें है, वे स्वकीया हैं। इनमें भी तटस्था, प्रौढ़ा, मुग्धा इत्यादि बहुत भेद हैं। कोई निषेधमुखेन, कोई विधिमुखेन प्रभुमें पर्यवसित होती हैं। इस तरह अवान्तर अर्थ भी तबतक आदरणीय है, जबतक महातात्पर्यका ज्ञान नहीं होता। लोकमें भी गौण पति एवं मुख्य पति होते हैं। राजादि गौण पति और असली पति पूर्णतम पुरुषोत्तम परमात्मा हैं। जबतक उनकी प्राप्ति नहीं हुई, तबतक अवान्तर पतिका अनुसरण अपेक्षित ही है। जल ब्रह्म और तरंग जीव हैं।—‘सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥’ (रा०च०मा० ७।१११।६) जैसे वारिमें वीचि, वैसे पूर्णतम पुरुषोत्तममें जीवभाव है। इनमें एक तरंगका दूसरे तरंगोंके साथ सम्बन्ध गौण है। जलके साथ मुख्य, सुस्थिर, स्थायी सम्बन्ध है। परंतु अन्तर्मुखता न होनेके कारण अपने असली सम्बन्धपर दृष्टि नहीं जाती। यदि तरंग जलका अपलाप करे तो स्वयं कैसे रहेगा? वैसे ही जीव ब्रह्मका खण्डन करेगा तो स्वयं रहेगा कैसे? वास्तवमें वह ब्रह्म ही है, परंतु अन्तर्मुख न होनेके कारण ब्रह्मको नहीं देखता—‘आनँद- सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥’ (विनय-पत्रिका १३६।२) असलीको भूलकर नकलीको देखता है। हम जीव नकली सम्बन्धी दारादिकोंसे सम्बन्ध जोड़ेंगे, पर असली सम्बन्धी ब्रह्मसे नहीं। सब कुछ करेंगे नकलीके लिये, पर एक तरंगका दूसरी तरंगसे सम्बन्ध कितने दिन? एक-न-एक दिन वियोग होगा ही। जीवका जीवसे सम्बन्ध आगन्तुक है। अतएव क्षणभंगुर है। इसीलिये सबके परमपति श्रीपूर्णतम पुरुषोत्तम ही सबके मुख्य पति हैं। रास-प्रसंगमें जब प्रभुने व्रजांगनाओंसे लौट जानेके लिये कहा, तब उन्होंने कृष्णसे एक कहानी कही और पूछा—‘एक साध्वी स्त्री थी। एक बार जब उसके पति विदेश गये, तब वह पतिदेवकी मूर्ति बनाकर पूजा करती थी। एक दिन ऐसा अवसर आया कि वह मूर्तिकी पूजा कर रही थी, इतनेमें पतिदेव आ गये और स्त्रीसे कहा— किवाड़ा खोलो।’ अब प्रश्न है कि वह किवाड़ा खोले या मूर्तिकी ही पूजा करती बैठे? प्रभुने कहा— ‘असली पतिका स्वागत करना चाहिये।’ व्रजांगनाओंने कहा—हमारा भी उत्तर हो गया। तात्पर्य यह है कि शालग्रामका विष्णुबुद्धिसे पूजन, वैसे ही प्राकृत पतियोंका परमपति-बुद्धिसे पूजन

वेणुगीत ९९१

करना चाहिये। इसीलिये कन्यादानमें कहते हैं— ‘विष्णुरूपाय वराय लक्ष्मीरूपां कन्यां सम्प्रददे।’ अतः जगत्की सब हलचलें पूर्णतम पुरुषोत्तमकी ओर हैं। जबतक वह प्राप्त नहीं होता, तबतक गति बनी ही रहेगी। इसलिये सब श्रुतियोंका महातात्पर्य ब्रह्महीमें निर्धारित है। इस तरह स्वकीया, परकीया, मुग्धा, प्रौढ़ा, कान्तभाववती, सख्यभाववती, श्रुतिरूपा और मुनिरूपा—सब व्रजांगनाएँ वेणुरवका श्रवणकर उसका वर्णन करती हुई, आनन्दोन्मादमें तन्मयतावशात् एक दूसरीको ही श्रीकृष्ण समझकर परिरम्भण करने लगीं। प्रेमोन्मादमें श्रीकृष्ण ही उन्हें सर्वत्र दीखने लगे अथवा यों कहिये कि वर्णन करती हुई स्वबुद्ध्यारूढ़ प्रभुकी मंगलमय मूर्तिका परिरम्भण करने लगीं। वेणुरवमें भगवान्‌का स्वरूप तथा उनकी लीला प्रतिष्ठित है वेणुरवमें ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका स्वरूप और उनकी मंगलमयी लीला है। अतः उसके वर्णनमें प्रभुका वर्णन है। पहले तो श्रीकृष्ण ही रसामृतमूर्ति हैं। उनमें भी साधनता और साध्यता दोनों हैं। श्रीहस्त और श्रीचरणारविन्दादि अन्यान्य अंगोंमें साध्यता है और साधनता भी, किंतु आनन्द केवल साध्य ही है, सब उसीके लिये है, पर वह किसीके लिये नहीं। यही ब्रह्मका लक्षण है। अतः दोनों एक ही हैं। शब्दादि सब पदार्थ आनन्दके लिये हैं, वैसे ही आत्माके लिये भी हैं—‘आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।’ (बृहदारण्यक० २।४।५) जैसे आनन्द निरतिशय, निरुपाधिक और परप्रेमास्पद है, वैसे आत्मा भी निरतिशय, निरुपाधिक, परप्रेमास्पद है। जिसमें कभी प्रेम हो और कभी नहीं, वह अपरप्रेमास्पद है। जो ऐसा नहीं, वह परप्रेमास्पद है। औपाधिक ‘अपर’ और स्वाभाविक ‘पर’ है। औपाधिक उपाधिके अधीन होता है और स्वाभाविक उपाधिके अधीन नहीं होता। वह मिटता नहीं। संसारके सब प्रेम औपाधिक हैं, जैसे स्त्री-पुत्रादि प्रेम। इतना ही क्यों, संसारमें देवतापर भी जब वह अनुकूल होता है, तभी प्रेम होता है। मन्त्रोंमें भी कोई अरिमन्त्र, कोई मध्यम मन्त्र है। जिससे अनुकूल फल नहीं होता, वह अरिमन्त्र है। इसी विचारसे कहा है कि जब समान तत्त्व और समान साधक मिलें, तब मन्त्रसिद्धि ठीक होती है। आजकल तो यह सब विचार ही नहीं है। शास्त्र कहते हैं—पहले ठीक विचार कर लो, फिर मन्त्र लेना। अस्तु, सारांश यह कि जब देवता भी आत्मानुकूल हों, तब उनमें प्रेम होता है। देखा जाता है कि शैव विष्णुद्वेष और वैष्णव शिवद्वेष करते हैं। वास्तवमें पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभु एक ही हैं, पर व्यर्थ उनमें द्वेषास्पदता, रागास्पदताकी कल्पना करते हैं। रामभक्तोंको रामायणमें जो मिठास प्रतीत होता है, वह इतर ग्रन्थोंमें नहीं। वृन्दावनमें तो कृष्णमें भी भेद मानते हैं, एक बायें मुकुटवाले श्रीकृष्ण, दूसरे दायें मुकुटवाले श्रीकृष्ण। वास्तवमें बाये-दायेंमें भी कुछ रहस्य, कुछ भाव अवश्य है। वेणुगीतप्रसंगमें बायें मुकुटवाले ही श्रीकृष्ण हैं। ‘वामबाहुकृतवामकपोलः’ (श्रीमद्भा० १०।३५।२) श्रीभगवान्‌की ललित मूर्तिमें मुकुट बायीं ओर ही झुकता है। कहते हैं जहाँ वामांगमें श्रीवृषभानुनन्दिनी विराजमान हैं, वहाँ श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण परमानन्दका वामांगमें ही झुकाव है। जैसे उनका झुकाव, वैसे उनके भूषणोंका भी झुकाव है। इसलिये उस परिस्थितिमें मुकुटका बायीं ओर झुकाव स्वाभाविक है। जहाँपर श्रीकृष्ण और बलराम, वहाँपर दक्षिणमें और जहाँ नन्दबाबा दक्षिणमें और वाममें श्रीनन्दरानी, मध्यमें बलराम नन्दरायके पास, श्रीकृष्ण यशोदाके पास, उस समय मुकुटका दायें बलरामकी ओर झुकाव होता है। यही वास्तवमें रहस्य है। यह झगड़ा आखिर जब कचहरीमें गया तो जजने कहा—मुकुटको सीधा रखो। अस्तु, मूल विषय यह था कि आनन्द निरतिशय, निरुपम, परप्रेमास्पद है और अन्य

औपाधिक सातिशय हैं। आनन्द और आत्मा एक ही बात। आनन्दसे जैसे कभी शत्रुता नहीं होती वैसे ही आत्मासे भी कभी शत्रुता नहीं होती। सर्वद्रोह हो सकता है, पर आत्मद्रोह नहीं होता। श्रीकृष्ण निखिलरसामृतमूर्ति, आनन्दसारसर्वस्व हैं। वे साध्य-ही-साध्य हैं, साधन नहीं, अतः परप्रेमास्पद हैं। इनमें भी कुछ भावुक तारतम्य करते हैं और कहते हैं कि उनमें भी केवल अमृतमय मुखचन्द्रकी सुधा ही साध्य है, वह किसीकी साधन नहीं। पर भावुक कहते हैं कि उसमें भी देवभोग्या अधरसुधा, भगवद्भोग्या अधरसुधाका साधन और वह भी सर्वभोग्या अधरसुधाका साधन है। परस्पर भावापत्तिपूर्वक वह सर्वभोग्या अधरसुधाका साध्यमात्र है, वह किसीका साधन नहीं है। वह रससे अभिव्यक्त होती है। अतः प्राधान्यात् यहाँ रववर्णन किया गया है। उसमें श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द और उनकी नित्य लीला भी निहित है, इसलिये 'इति वेणुरवं राजन्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।६) इस वेणुरवमें अमृतत्वका उपालम्भ होता है, जिससे ब्रह्मा, शुक, सनकादि भी मोहित होते हैं— 'शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः.... कश्मलं ययुरनिश्चिततत्त्वाः॥' (श्रीमद्भा० १०।३५।१५) इस रवका प्राधान्य इसीलिये है कि उससे पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभु प्रकट होते हैं। वैसे तो प्रभु सर्वत्र हैं ही; पर जब व्यंजक नहीं तब क्या? इसलिये भावुक व्यंग्य भगवान्‌से भी अधिक व्यंजक नामको बड़ा मानते हैं। अरबोंकी सम्पत्ति घरमें भरी हो, पर वह विदित नहीं तो उसका क्या उपयोग? घरवाला हल ही चलाता रहेगा। 'नाम' यह खजानेका बीजक है। पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम प्रभु 'निधि' हैं और 'नाम' उसका बीजक है। यही कहा है— नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥ (रा०च०मा० १।२३।८) इस नामबीजकद्वारा प्रयत्न करनेपर प्रभु प्रकट होते हैं कहा है कि—'कहउँ नामु बड़ राम तें', (रा०च०मा० १।२३) 'राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥' (रा०च०मा० १।२४।३) नाम मूल-चिकित्सा है और राम पल्लव-चिकित्सा। राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥ नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥ (रा०च०मा० १।२५।३-४) श्रीरामने भालु-बन्दरोंको लेकर प्राकृत शतयोजन समुद्र पार किया, किंतु नाम लेनेसे अपार भवसिन्धु ही सूख जाता है। अतः नाम सबसे बड़ा है। वेदान्त कहते हैं कि वाक्य-श्रवणसे तत्त्वसाक्षात्कार होता है। भक्त भी भगवत्साक्षात्कारका मूल श्रवण ही मानते हैं। निर्गुण-साक्षात्कारको भी श्रवणकी ही अपेक्षा है। व्रजांगनाओंको भी उद्बुद्ध उभयविधि शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णके लिये वेणुरव ही अपेक्षित है। इसलिये वह मूल वेणुरवको पकड़ती हैं कि उसी रवसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द व्यक्त होंगे। जैसे हृदयमें प्रथममें ही विराजमान निर्गुण परब्रह्म तत्त्वका श्रवण-मनन-निदिध्यासनद्वारा महावाक्यसे ही साक्षात्कार होता है, उसी तरह सगुण-साकार सच्चिदानन्द परब्रह्मका भी साक्षात्कार उन चरित्रों एवं गुणगणोंके श्रवणसे होता है। चरित्रश्रवणसे प्रथम चरित्रनायक भगवान्‌का मानसरूप प्रकट होता है, उसी मानसी भगवदीय प्रतिमाका ध्यान करते-करते ही माया-जवनिकाके अपसारणसे, जिससे कि भगवान् आवृत होते हैं, उस भगवान्‌का दिव्य रूप प्रकट होता है। इस तरह शब्दसे ही भगवान्‌का प्राकट्य होता है, फिर जहाँ भगवच्चरित्रों और भगवन्नामोंसे भगवान्‌का प्राकट्य होता है, तब साक्षात् भगवान्‌के मुखचन्द्रसे निर्गत वेणुगीतपीयूषके पानसे भगवान्‌का प्राकट्य होना स्वाभाविक है। शब्द प्रकाशक और अर्थ प्रकाश्य होता है। शब्दब्रह्मरूपमें व्यक्त भगवदधरसुधासे भगवान्‌का प्राकट्य होना स्वाभाविक है।

वेणुगीत १२१ वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण परस्पर अन्तरात्मा हैं उस वेणुरवका ही वर्णन करती हुई व्रजांगनाएँ परस्पर अभिरमण करती हैं। इस रवद्वारा सदानन्दरूप ही हृदयमें व्यक्त होता है। कृष्ण पदका अर्थ ही सदानन्द है। कहा है—'कृषिर्भूवाचकः शब्दः णश्च निर्वृतिवाचकः।' कृष् धातुका अर्थ भू— सत्ता और 'ण' का अर्थ निवृति—आनन्द है। तथा च 'सत्ता—आनन्द' यह कृष्ण पदका अर्थ है। 'तमालश्यामलत्विट् यशोदास्तनन्धय' इसका अर्थ कोई श्रीकृष्ण ही कहते हैं, इसमें भी विरोध नहीं है। उसमें भी सत्ता और आनन्द दोनोंका ऐक्य है। स्वयंप्रकाश सत्तारूप आनन्द, आनन्दरूप सत्ता दोनों एक ही बात है। सत्तारूपा श्रीवृषभानुनन्दिनी एवं आनन्दरूप श्रीकृष्ण हैं। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द और श्रीवृषभानुनन्दिनी वैसे ही अभिन्न हैं, जैसे सत्ता और आनन्द। यदि आनन्द सत्ता न हो तो सत्ता बिना आनन्द असत् हो जाय। फिर जो असत् है, वह आनन्द कैसे ? वैसे ही आनन्दसे वियुक्त शुद्ध सत्ता नहीं है। जड़ोंकी सत्ता दूषित, सविशेष सप्रपंच है, किंतु शुद्ध सत्ता निरुपद्रव, निर्विशेष आनन्दरूप ही है और सब विनश्वर सत्ता है। यों तो वैषयिक आनन्द भी विनश्वर है, अतः सदानन्द कहाँ ? आनन्द, सत्ता दोनों परस्पर विशेषण हैं। वह आनन्द अबाध्य है, जगदानन्द बाध्य, इसीलिये वह श्रीकृष्णका स्वरूप वास्तविक सद्रूप एवं आनन्दरूप है, जो अत्यन्त अबाध्य नित्य स्वप्रकाश है। उसके साथ जब सत् लगा, तब सांसारिकसे विलक्षणता, नित्यता आयी एवं सत्में आनन्द न लगाते तो प्रापंचिक सत्ता आती। अतः सत् और आनन्द दोनोंको लगाया। यह सत् और आनन्द परस्पर वियुक्त कभी नहीं होते, इसलिये वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण परस्पर अन्तरात्मा हैं। एक तो यह कि जैसे जलमें तरंग, वैसे परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णमें व्रजांगना, जैसे चन्द्रमामें चन्द्रिका, जैसे भानुसे प्रभाका, वैसा उनका अविघटित स्वाभाविक सम्बन्ध है, किंतु इससे भी अन्तरंग यह सम्बन्ध है, जैसे अमृतमें मधुरिमा एवं जहाँ परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण, वहाँ उनकी माधुर्याधिष्ठात्री वृषभानुनन्दिनी। अमृतसे मधुरिमाको अलग किया, फिर अमृतत्व ही क्या ? वेदान्ती गुण-गुणीका तादात्म्य मानते हैं। इसलिये सत्ता-आनन्दरूप वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण दोनों एक ही हैं। एक ही सदानन्दरूप भगवान् गौरतेज-श्यामतेजरूपमें—राधा-माधव उभय रूपमें प्रकट हुए। इसी दृष्टिसे कहते हैं कि श्रीकृष्णका आन्तरस्वरूप वृषभानुनन्दिनी तथा बाह्यस्वरूप पुमान् है तथा वृषभानुनन्दिनीका आन्तरस्वरूप पुमान् और बाह्यस्वरूप वृषभानुनन्दिनी है। हितहरिवंश-सम्प्रदायमें कहा है कि गौरश्याम शीशियोंमें श्यामगौर रस भरा हो, वैसे ये दोनों हैं। दोनों शीशी भी एक जातिकी ही हैं। गौर शीशी श्यामहृदयकी वस्तु है और श्याम शीशी गौर-हृदयकी वस्तु है। गौरमें श्यामरस एवं श्याममें गौररस भरा है। इस तरह परस्पर श्रीकृष्ण और वृषभानुनन्दिनी परस्पर हृदयकी वस्तु हैं, दोनोंमें परम अन्तरंगता है। इसलिये कहा है कि 'उभयोभयभावात्मा' हैं। इस प्रकार वह परमतत्त्व भरपूर होकर वेणुरवद्वारा व्यक्त होता है। इसलिये उसका वर्णन करती हुई व्रजांगनाएँ श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका परिरम्भण करती हुई अनुरागकी महिमासे परस्परका परिरम्भण करने लगीं अथवा श्रीकृष्ण-साक्षात्कारसे रमण करने लगीं। इन्द्रियवानोंकी यही लालसा कि प्रभु इन्द्रियग्राह्य होकर प्राप्त हों गोप्य ऊचुः— अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननु विवेशयतोर्वयस्यैः। वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।७) श्रीधराचार्यके मतमें 'गोप्य ऊचुः' नहीं है, इसलिये 'अनुवर्णनेनाहुः-अक्षण्वतामिति' ऐसा

उन्होंने लिखा है। 'गोप्यः' का अर्थ सनातन गोस्वामी 'गोपयन्ति श्यामसुन्दरमिति गोप्यः' करते हैं। व्रजांगनाएँ अपने श्यामसुन्दरको छिपाती हैं, इसलिये कि कोई उन्हें जान न जाय। व्रजांगनाएँ कहती हैं—हे सखियो! नेत्रवानोंका, नेत्रधारियोंका यही फल है। क्या? जल्दी नहीं कहते बना, प्रेमभारसे विवश हो गयीं, अतः सहसा हृद्गत तत्त्व निर्देष्टुं अशक्य हो गया। वह निकलता ही नहीं, सखि! क्या? वह इस समय उनका हृदय ही जानता है। यहाँ 'अक्षण्वतां' से 'सर्वेन्द्रियवतां' यह अर्थ करना चाहिये। इन्द्रियवानोंका और उनकी इन्द्रियोंका यही फल है। 'आवृत्तचक्षुः' माने केवल आँखोंको मींचकर ही दर्शन न होगा, अपितु चक्षुपलक्षित सर्वेन्द्रियोंका निग्रह आवश्यक है। यहाँ भी व्रजांगनाएँ कहती हैं—हे सखि! सर्वेन्द्रियवानोंका यही फल है, केवल चक्षुष्मानोंका नहीं। क्या? तब कहते हैं कि वे जो परमरसामृतमूर्ति व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द हैं, उनके मंगलमय अंगोंके सौरस्यादिका आस्वादन करना। नहीं तो फिर निर्गुण, निराकार परब्रह्म तो इन्द्रियानुपभोग्य है। 'यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह।' (तैत्तिरीय० २।४) इन्द्रियाँ तो विफल हुईं न? बुद्धिग्राह्य होनेपर भी क्या हुआ? महावाक्यजन्य तदाकाराकारित अन्तःकरणवृत्तिसे स्पर्श किया, निर्वृत्तिक अन्तःकरणको भी स्पर्श न मिलेगा। फिर भी मान लो कि उसको मिला, पर इन्द्रियोंको तो नहीं मिला। ठीक स्पर्श जीवात्माको— सर्वोपाधिविनिर्मुक्तको मिलेगा। इसीलिये कहती है कि सखि! इन्द्रियवानोंके इन्द्रिय होनेकी सफलता मनमोहन श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके अमृतमय मुखचन्द्रका इन नयनोंसे दर्शन, भुजाओंसे परिरम्भण, घ्राणोंसे उनके सौरभका अवघ्राण, रसनासे प्रियतम प्रधानके अमृतमय मुखचन्द्रकी सुमधुर अधरसुधा-पान करनेको मिले। सर्वेन्द्रियद्वारा सम्भोगयोग्य सबके परम प्रेमास्पद केवल बुद्धिग्राह्य हों, यह सह्य नहीं, किंतु सर्व रोम- रोम भी उतावले हो उठेंगे। भले ही कैवल्यकी कोई स्थिति हो, जहाँ इन्द्रियोंका रोना-धोना कुछ नहीं, परंतु यदि वह स्थिति न हो तो पूर्ण आस्वादन सभीको हो; क्योंकि कोई भी तत्त्व भगवद् विप्रयोगमें हो, उस सत्तारूपसे भी वियुक्त होना, असत्, स्फूर्तिविहीन, निस्फूर्ति, नीरस हो जाना कौन चाहेगा? कौन अपनेको स्फूर्तिविहीन, नीरस, सत्ताविहीन होना चाहेगा? कहा है—'लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः' परमप्रेमीका लक्षण यही है कि जो प्रियतमके वियोगमें रह न सके। 'त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१५) एक लव, निमेषमें भी युग, कल्प, महाकल्प हों। 'गोपीनां परमानन्द आसीद् गोविन्द- दर्शने। क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत्॥' (श्रीमद्भा० १०।१९।१६) व्रजांगनाओंको श्याम- सुन्दरके दर्शनमें महाकल्प भी क्षणके समान और वियोगमें क्षण भी कल्पके समान बीतता था, यही तीव्रताप है। इतना ही नहीं, बल्कि वियोगमें रह ही न सके? यही उत्कट प्रेम है। जलसे वियुक्त कहीं तरंग रह सकेगी? यह शुद्ध प्रेमका लक्षण है कि प्रियके वियोगमें न रह सके। सत्से वियुक्त होनेसे असत् हो जाता है। श्रीकृष्ण परमानन्द रसस्वरूपके वियोगमें नीरसता, निस्फूर्तिता हो जाती है। इस प्रकार जब सभी श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दके अनन्य प्रेमी हैं, तब इन्द्रियोंको ईर्ष्या होती है कि जो श्रीकृष्ण प्रभु प्रकट हैं, हाय! हम उनसे वंचित हैं। वे रोती हैं—'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूः' (कठ० २।१।१)। जो ध्यानमें श्रीकृष्णका अनुभव करते हैं, उनके नेत्रादि इन्द्रियाँ तड़फड़ाती रहती हैं, लालायित रहती हैं, अतः एक कहती है—'अक्षण्वतां फलमिदम्'। दूसरी कहती है—'न परं विदामः परं किञ्चित्' तो यह कुछ है ही नहीं। परंतु 'वयं तु न विदामः' हम तो नहीं जानतीं। हमें खण्डन-मण्डनसे क्या मतलब? किसीके लिये भले ही परमात्मा हों, पर हमारे तो श्यामसुन्दर हैं। भावुक कहते हैं—श्यामसुन्दर चाहे जैसे हों, प्रियतम

प्राणधन हमसे द्वेष करते हों या करुणा करते हों, पर हमारे ज्ञेय, ध्येय सब कुछ वे ही हैं। यह शर्त नहीं कि यदि वह प्रेम करें, तभी हम उनसे प्रेम करें। यह तो व्यापार हुआ। सौन्दर्यकी शर्त भी नहीं, वह व्यभिचारिणी भक्ति होगी। अटल भक्तिके माने यही है कि चाहे जो जैसा हो, अपनी वस्तुओंमें निरतिशय प्रीति होती है। वही ठीक है। अतः वह खण्डन-मण्डन नहीं करतीं। वह तो कहती है कि 'अन्ये अन्यञ्जानन्तु नाम वयं तु न विदामः' अर्थात् मोक्षादि अन्य फलोंको भले ही कोई जानते हों, परंतु हम नहीं जानतीं। मान लिया कैवल्य हुआ, किंतु वह सर्वेन्द्रियग्राह्य नहीं है। इसलिये इन्द्रियवानोंकी लालसा यही है कि वह श्रीकृष्ण प्रभु सर्वेन्द्रियग्राह्य होकर प्राप्त हों। व्रजांगनाएँ कहती हैं—सखि! 'वयं उपनिषद्रूपाः' हम उपनिषद्रूपा हैं। यदि हम न जानेंगी तो दूसरा कौन जानेगा ? फल तो श्रुति ही कहती है। फिर वेदविहीन नये फलको कोई जानते हों तो जानें। अर्थात् वेदप्रामाण्यवाले सारभूत फल-निर्णयमें उपनिषदोंको ही प्रमाण मानते हैं, इसलिये यह फल है, दूसरा नहीं। इससे भी ऊँची बात यह है कि ब्रह्मदेव कहते हैं—'एषां तु भाग्यमहिमा' इन व्रजांगनाओंके— घोष-निवासियोंके अनन्त अद्भुत भाग्यकी महिमा, हम उसे क्या गायें? हम तो अपनेको कृतार्थ समझते हैं। हम कौन ? ग्यारह इन्द्रियोंके अधिष्ठात्री देवता। जो व्रजांगनाजन आपके उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक परमरसामृतमूर्ति आपके आनन्दका साक्षात्कार करते हैं, उनकी महिमा तो अलौकिक है। हम इन्द्रियोंकी अधिष्ठात्री देवता अपनेको अत्यन्त भाग्यवान् समझते हैं। यह क्यों ? इसलिये कि जब व्रजांगना अपने हृषीक-चषकोंसे आपके श्रीअंगोंके सौन्दर्यामृतसुधाका पान करती हैं, तब उनकी अधिष्ठात्री देवता होनेसे हमारा परम्परासे हृषीक-चषकोंसे सम्बन्ध होता है, व्रजांगनाएँ अपने हृषीक-चषक इन्द्रियपानपात्रोंसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दके सौन्दर्यमाधुर्य-सौगन्ध्यामृतका पान करती हैं। इसलिये मुख्य पात्र व्रजांगनाएँ हैं। पानका साधन इन्द्रियपानपात्र है। जैसे नेत्रपानपात्रद्वारा आपके अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्यामृतका, घ्राणपानपात्रद्वारा सौगन्ध्यामृतका, श्रोत्रपानपात्रद्वारा वेणुगीत तथा अमृत वचनोंका, रसपानपात्रद्वारा अमृतमय मुखचन्द्रकी सुमधुर अधरसुधाका पान करना। यहाँ व्रजांगनाएँ पानकर्त्री हैं। इन्द्रियरूप पानपात्रका सम्बन्ध रससे कहा है—'दर्वी पाकरसं यथा।' यहाँ ब्रह्मा कहते हैं कि हम तो चषक भी नहीं हैं। इन्द्रिय भी करण हैं, जब उनको भी रससम्भोग नहीं, तब उन इन्द्रियोंके अधिष्ठाता हम देवताओंको वह रससम्भोग कहाँ ? व्रजांगनाएँ श्रोत्रद्वारा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके वचनसुधाका पान करती हैं, उसमें ये इन्द्रियाँ दोना हैं। पानपात्रको क्या स्वाद आयेगा ? कटोरा क्या स्वाद ले ? तथापि उस रसको छूनेवाला एक चषक भी अपनेको कृतकृत्य मानता है और हम तो परम्परा भी अपनेको कृतार्थ मानते हैं। फिर इन्द्रियाँ और उनसे भी अधिक व्रजांगनाएँ कितनी भाग्यवती हैं। हम इतना ही अपना भाग्य समझते हैं कि हम जिन इन्द्रियोंके देवता हैं, उनके द्वारा व्रजांगनाएँ प्रभुके सौन्दर्य-सौगन्ध्यादिका पान करती हैं, इसलिये 'एषां तु भाग्यमहिमाच्युत तावदास्ताम्।' (श्रीमद्भा० १०।१४।३३) जहाँ ब्रह्मादि देव ऐसा परम्परा कहते हैं, वहाँ व्रजांगनाएँ क्यों न कहें कि 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः'। सखि ! हमारा- तुम्हारा संवाद है। सम्मति है कि नहीं? कहती हैं 'इदं' यानी उस समय जो स्वरूप प्रस्फुरित होता था, जिसका 'बर्हापीडं नटवरवपुः' से वर्णन किया गया है, वही वृन्दावनविहारी यहाँ 'इदं' से कहे गये हैं। व्रजमें व्रजांगनाओंको श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- कन्दका दर्शन होता ही है, फिर वे अत्यन्त आर्त क्यों ? तो कहती हैं कि यद्यपि व्रजस्थ श्रीकृष्णका दर्शन तो करती ही हैं, तथापि अन्यान्य स्वरूपोंमें। इस समयका विशेष दर्शन है। 'इदं इति बुद्धिस्थत्वादिदमानिर्देशः' अर्थात् द्वारकावासी,

१२४ भक्तिसुधा मथुरावासी, व्रजवासी सब भले ही एक हों, परंतु मनमोहनका यह ‘नटवरवपु’ है। इन व्रजेशसुत नन्दरायसुवन श्रीकृष्ण और बलरामको गौओंको वृन्दावनमें निवेश कराते हुए जिसने देखा, उसीकी इन्द्रियोंकी सफलता है। बलराम यद्यपि व्रजेशसुत नहीं तथापि ‘पालितपुत्रत्वात्’ यह आरोप है। कोई-कोई वसुदेवको भी व्रजेश कहते हैं, पर वह खींचा-तानी है। नन्दरायके पुत्र ललन—कृष्ण और वसुदेवके बलराम, मगर व्रज यही समझता था कि दोनों व्रजेशनन्दन ही हैं। इसलिये ‘व्रजेशसुतयोः’ यहाँ द्विवचन कहा गया है। ‘वक्त्रम्’ यह एकवचन एकवद् भावसे हो सकता है, पर इसमें सरसता नहीं है। व्रजांगनाओंके मनमें तो मनमोहन श्रीकृष्णका ही अमृतमय मुखचन्द्र था। तब फिर ‘व्रजेशसुतयोः’ क्यों ? इसलिये कहते हैं—‘अनुवेणुजुष्टम्’। यह श्रीबलरामके मुखका व्यावर्तन है। व्रजेशसुत बलराम और श्रीकृष्ण, दोनोंमें जो वेणुजुष्ट है, उसके सौन्दर्य- माधुर्य-सुधाका पान किया। इनके मनमें सिवा श्रीकृष्णके दूसरी बात ही नहीं है अथवा—जबतक उनको होश-हवास था, तबतक अपनेको संभाला। कोई कुछ कहेंगे कि कुछ गड़बड़ी है क्या? ‘गुप्त प्रेम सखि सदा दुरैये’ इसलिये कहा—‘हम तो दोनोंकी बात कर रही हैं अर्थात् सँभालकर द्विवचन दिया। ‘व्रजेश’ इसलिये कहा कि हम व्रजमें बसती हैं तो उनके लड़केकी प्रशंसा करनी ही चाहिये। यहाँतक तो ठीक, पर आगे सँभाले सँभल न सकीं। प्रभुका मुखचन्द्र सम्मुख आया, वह तो व्रजांगनाओंके हृदयके पूर्णानुराग-रससार-सरोवरसे निकलनेवाला ही है। जैसे तूफानसे सागर उद्वेलित हो उठता है, उसी प्रकार व्रजांगनाओंको हुआ और वे अपने भावोंको सँभाल न सकीं। यहाँ वल्लभाचार्य कहते हैं—जिन्हें भगवान्ने आधिदैविक देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि इत्यादि प्रदान किया है, उनके लिये यही परम फल है कि कृष्णचन्द्रके सौंदर्यादिका आस्वादन करें। जैसे कोई कमलनेत्र पुरुष सदा अन्धकारहीमें स्थित रहे तो उसके नेत्रोंका होना ही निरर्थक है, वैसे ही भगवान्ने कृपाकर आधिदैविक देहादिको प्रदान किया है, उनसे यदि प्रभुकी सुधाका आस्वादन न किया तो वे विफल हैं। हाँ, यह हो सकता है कि किंचित् काल अन्धकारमें स्थिति हो, पर सर्वदा हो तो नेत्रोंका होना-न-होना बराबर ही हो जायगा। इस स्थितिको वल्लभाचार्य ‘सर्वात्मभाव’ कहते हैं अर्थात् देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकारादि विस्मरणपूर्वक सर्वत्र श्यामसुन्दरका ही दर्शन होना। इस अवस्थामें निजी अस्तित्व पृथक् नहीं रहता, इसलिये स्वपार्थक्येन श्रीकृष्ण प्रभुका भी भान नहीं होता। इसीलिये उनके सुधास्वादनका भी भान नहीं रहता, किंतु इसे कदाचित्क, यानी संचारी भाव कहते हैं। यह भाव (सर्वात्मभाव) विशेषकर विप्रयोगमें मानते हैं। इसीको आन्तररमण भी कहते हैं अर्थात् बाह्यसंप्रयोग न होनेपर भी आन्तरसंप्रयोग होता ही है। इसकी भी बड़ी महिमा गायी गयी है। कहते हैं— ‘संगमविरहविकल्पे वरमिह विरहो न संगमस्तस्य’। संगम और विरह, इनमें प्रियतमका विरह ही अच्छा है; क्योंकि संगममें प्रियतम एक ही हैं, विरहमें निखिल विश्व ही प्रियतम हो जाता है। जिधर दृष्टि जाय, उधर प्रियतम-ही-प्रियतम दिखलायी पड़ते हैं। फिर भी इस भावको सार्वदिक् मानें तो गड़बड़ हो जाय, इसलिये ही कमलनेत्र पुरुषकी उपमा दी। प्रभुके अधरसुधाका आस्वादन यही परम फल है। ध्यान लगानेकी रीति ध्यानाभ्यासी लोग अन्तमें सर्वविस्मरण चाहते हैं। ‘विष्णुपुराण’, ‘भागवतादि’ में जहाँ ध्यान कहा है, वहाँ सांग, सपरिवार, सर्वभूषणादिसहितका ध्यान है, किंतु मन तो महाचंचल बेताल है। उसका एक जगह होना ही कठिन है, अतः मन प्रभुके भूषणोंका ही चिन्तन करे। मन अनेक विषयोंमें क्यों न स्थित हो, पर वह अनेकता प्रभुके स्वरूपमें ही हो। वहाँसे उसको अलग न जाने देना। बस, ध्यानकी यही सीमा

है। चंचल बन्दरको पद्मासनपर बैठकर निर्विकल्प समाधि कैसे लगे ? तो उसके लिये यह उपाय करो— पहले एक बगीचेसे यह बाहर न जाय। फिर एक ही वृक्षपर, फिर एक ही शाखापर बैठा रहेगा। मन बन्दरसे भी अधिक चंचल है। क्षणमें स्वर्गसे नरकतक दौड़ लगाता है। इसको पहले आलम्बन दो। भक्तगाथा, श्रीकृष्णकी लीला आलम्बन है। फिर मूर्तिमें ही रहे। इस प्रकार विषय-संचार सीमित किया जाय। जितना अधिकाधिक विषयचिन्तन, उतनी ही चंचलता अधिकाधिक। जितनी श्रीकृष्णचिन्तनमें संलग्नता, उतनी स्थिरता अधिक।—‘मामनुस्मरतश्चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥’ (श्रीमद्भा० ११।१४।२७) मक्षिकाकी सन्तान दुर्गन्धित वस्तुपर बैठती है, चन्दनपर नहीं। भावुक कहते हैं कि प्रथम श्रीकृष्णके सर्वांगका भूषणसहित ध्यान, फिर श्रीअंगोंका, फिर केवल मन्दहासयुक्त मुखचन्द्रका ही ध्यान करना चाहिये— ‘तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा।’ (गीता ६।१२) यदि सुस्मित मुखचन्द्रमें मन एकाग्र हुआ तो फिर कुछ चिन्तन न करे। अन्तमें मुखचन्द्रका चिन्तन होते-होते और अलौकिक सौन्दर्य, माधुर्य सुधास्वादनमें मन स्तब्ध हो जाता है, विभोर-विह्वल हो जाता है, वाग्- गद्गदा होती है, चित्त द्रवता है, सर्वेन्द्रियोंको निश्चेष्टता प्राप्त हो जाती है। ‘प्रेम भरा मन’ श्रीभरत-राम-संमिलनके अवसरपर भरतके प्रेमरूपीरसमें सराबोर हो गया, मन निज गतिसे रहित हो गया। उस समय न किसीने कुछ कहा, न पूछा, कहा—‘मन बुधि चित अह्मिति बिसराई॥’ (रा०च०मा० २।२४१।२) इससे बढ़कर निर्विकल्प समाधि कहाँ? चारों अन्तःकरण निश्चल हो गये। इस प्रेमामृतसिन्धुमें जब प्रेमीका उन्मज्जन-निमज्जन होता है, तब फिर सर्व विस्मरण हो जाता है। कहा है— यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) इसीलिये ‘भागवत’ तृतीयस्कन्धमें कपिल- देवहूति-संवादमें परब्रह्मका उपदेशकर सगुण साकारका ध्यान बतलाया है। पहले श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दके सर्व आभूषणोंका चिन्तन करे। कहा है—‘तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते॥’ (श्रीमद्भा० ३।२८।३४) एवं भगवान्‌के स्वरूपमें उस मनको आसक्तकर सर्व विश्वसे हटा ले। अन्तमें प्रेमोन्मादमें ऐसा होता है कि दूसरोंका ध्यान दूर रहा, ध्येयस्वरूप भी छूट जाता है। किंतु प्रेमी यह नहीं चाहते कि हमारे मनको भगवान् भूल जायँ, क्योंकि वह मुमुक्षुके लिये है। भक्त मुमुक्षु नहीं होता, वह ब्रह्मलोकान्त विरक्त होकर प्रभुके मुखचन्द्रका दर्शन ही चाहता है। कहा है— न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) सर्वात्मभाववाले भक्तको चाहे श्रीकृष्णके मुखचन्द्रके दर्शनमें क्षणिक सर्वविस्मृतिपुरःसर सर्वत्र प्रभुका ही भान हो जाय, पर सर्वदाके लिये यह इष्ट नहीं मानते। वह चाहते हैं कि सावधानीसे प्रभुकी सेवा करें। इसी भावको लेकर कहा है—‘अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।’ यहाँ यद्यपि ‘चन्द्र’ पद नहीं दिया तथापि आगेके ‘पीतम्’ से ज्ञात होता है कि ‘चन्द्रमुख’ यदि चन्द्र न हो तो पेय कैसे हो? ‘पिबत भागवतं रसमालयम्’ (श्रीमद्भा० १।१।३) यहाँ निगमकल्पतरुसे विगलित रसमय फल पीनेके लिये कहा है। कहते हैं फल तो चोष्य होता है, पेय नहीं। उसमें बकला, गुठली होती है, अतः कहा ‘रसम्’ अर्थात् ‘रसवत्’ (‘गुणवचनान्मत्तुप्’)। आम्रफल रसवान् होता है, उसमें भी कुछ त्याज्य होता ही है। यहाँ रसात्मकता कही, इसीलिये कि यहाँ कुछ छोड़नेकी चीज है ही नहीं। इसी अर्थसे यहाँ ‘पीओ’ कहा है। जिन्होंने श्रीकृष्णचन्द्रके वक्त्रका पान किया। इससे मुखचन्द्रका ग्रहण होता है। चकोरी जैसे अमृतमय चन्द्रमाकी चन्द्रिकाका पान करती है, वैसे ही व्रजांगनाएँ श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र