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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

भाव कहे हैं। अथवा 'अधरा नीचीना (तुच्छा, अपकृष्टा) सुधा अपि यस्याः सकाशात् सा अधरसुधा,' श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी अधरसुधामें ऐसी मधुरिमा है, जिससे सुधा भी अति तुच्छ मालूम हो। अर्थात् देवताओंके, चन्द्रमाके और धन्वन्तरिके अमृतको अपकृष्ट बनानेवाली, यह जो अधरसुधा है, उससे भगवान् वंशीको पूरित करने लगे। वंशीमें सुमधुर अधरसुधा प्रविष्ट होती है, वह भी स्वयं अमूर्त है। छिद्रमें आकाश भरा है। अमूर्त पदार्थसे आकाश निश्छिद्र नहीं होता। अतः अमूर्त रससे वंशी निश्छिद्र न हुई। वास्तवमें वेणुको भगवान्ने अधरसुधा दी ही नहीं, केवल सम्पर्क होनेसे क्या होता है? प्रभुकृपासे वह जिसको मिले, उसपर ही प्रभाव होता है। उसी जलमें जोंक, उसीमें कमल, उसीमें मछली रहती है। अधिकारी, योग्य पात्र ही वस्तुको ग्रहण करता है, अर्थात् वेणुको वास्तवमें अधरसुधाका सम्प्रदान ही नहीं हुआ। वह केवल वेणुपात्रद्वारा व्रजांगनाओंको भेजी गयी। दर्वीसे रस चलाया जाय, परोसा जाय, परंतु दर्वीको रसास्वाद थोड़े ही आता है। वह तो रसोपभोगकी सामग्री है। वेणुपात्रद्वारा अधररस गोपांगनाओंको दिया गया, इसलिये कि गोपांगनाएँ सन्निहित नहीं थीं। वृन्दावनस्थ श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दकी अधरसुधाका सम्भोग व्रजस्थिता व्रजांगनाओंको कैसे हो? अतः अधरसुधाको साधनभूत वेणुके छिद्रोंमें भरकर व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाया। वेणु दर्वीके समान होनेसे सूखी, सच्छिद्र ही रह गयी। यहाँ केवल श्रीप्रभुकी इच्छा ही कारण है, वेणु सबके लिये समान है। जैसे—स्वातिबिन्दु बाँसमें वंशलोचन, गोमें गोरोचन, शुक्तिमें मुक्ता, गजकर्णीमें गजमुक्ता होता है, वैसे ही अधरसुधा भिन्न-भिन्न पात्रोंमें पड़ती है, वेणु केवल उसको विभिन्न-विभिन्न पात्रोंमें पहुँचानेवाली हुई। यहाँ कई पक्ष हैं। यों तो जब श्रीव्रजांगना वेणुपर प्रसन्न हों, तब प्रशंसा ही करती हैं, 'याचेऽहं वंशदेहम्'। कहती थी—'सखि! हम तो वंशदेहकी याचना करती हैं। यदि विधाता हमारे ऊपर प्रसन्न हों तो हमें वंशदेह दें। गोपांगनादेहमें हमें कृतार्थता नहीं है। यदि वंशदेह होता तो सम्भव था कि कभी भगवान्के अधरपर सोती, अधरसुधाका आस्वादन करती, पर हम तो कुलांगना ठहरीं, हमें यह अवसर प्राप्त नहीं हो सकता।' जब गोपांगना वेणुसे ईर्ष्या करती, तब तो उसके दोष-ही-दोष कहती थी। अस्तु, यह आया कि षट्धर्मसहित रसरूप धर्मीको वेणुछिद्रोंद्वारा व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाना वेणुका कार्य था। 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।' इत्यादि भगवान्में छः धर्म हैं। अर्थात् सम्पूर्ण षट्भगसम्पन्न, अचिन्त्य, अखण्ड, अनन्त, रसधर्मी, पूर्णतम, पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वेणुमें सप्तछिद्र हैं। अतः षट्छिद्रोंद्वारा एक-एक भगधर्म एवं सातवें छिद्रद्वारा षट्धर्मसहित भगवान् अधरसुधाद्वारा वंशीमें प्रवेशकर, तद्द्वारा श्रीव्रजांगनाओंके हृदयमें प्रवेश करते हैं, ऐसा भावुकोंने कहा है। तीन तरहकी अधरसुधाएँ हैं और उसके सम्भोगाधिकारी भी तीन हैं। जिन्हें निरोध सम्पन्न हुआ, वे ही सुधाके अधिकारी हैं। निरोध यानी सम्पूर्ण विश्वविस्मरणपूर्वक श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें मनका लय होना। वह भी तीन प्रकारका है—प्रेमनिरोध, आसक्तिनिरोध और व्यसननिरोध। प्रेमनिरोध-सम्पन्नको देवभोग्या, आसक्ति- निरोध-सम्पन्नको भगवद्भोग्या और व्यसननिरोध- सम्पन्नको सर्वाभोग्या कहा गया है। ये सिद्धान्त श्रीवल्लभाचार्यजीने बताये हैं। यह देव कौन हैं? श्रीमद्भागवतके दशमस्कन्धमें निरोध, एकादश-स्कन्धमें मुक्ति और द्वादशस्कन्धमें मुक्ति-आश्रय ब्रह्म है। निरोध-वर्णन होनेसे दशम ही मुख्य है, क्योंकि श्रीकृष्णचन्द्रमें मनोलय होना ही सब कुछ है। इनके मतमें मुक्ति बड़ी विलक्षण है। कहते हैं—पूर्णतम पुरुषोत्तम परमानन्दमें जो मुक्त हुए जीव जाकर मिल जाते हैं, ऐसा जो मुक्तत्व उसकी मुक्ति मुक्ति है। परमपुरुषार्थ तो श्रीकृष्णचन्द्रका लीलारसास्वादन है। जो मुक्त हो गये, वे क्या लीलारसास्वादन कर सकते

हैं? मुक्तोंका स्वरूपसे निष्कासन ही पुष्टिमार्गीय मुक्ति है। भागवतके अनुसार 'मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥' (श्रीमद्भा० २।१०।६) अर्थात् काल्पनिक, औपाधिक रूप छोड़कर पारमार्थिक भगवद्रूपमें लीन होना। पारमार्थिक रूप अखण्ड, अनन्त, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, स्वप्रकाशात्मक है, यह अद्वैतियोंकी मुक्ति है। कोई कहते हैं—जीवका निजी रूप गोपांगनाभाव है। उसे छोड़कर जो सांसारिक स्त्रीत्व-पुंस्त्वमें आया, उसको छोड़कर पूर्वभावमें जाना ही मुक्ति है। दूसरे कहते हैं—जीव स्वभावसे ही श्रीभगवान्‌का नित्यदास है। जहाँ दूसरे भाव आये कि वह भाव बिगड़ा, उन्हें छोड़कर— श्रीभगवान् हमारे स्वामी, हम उनके दास, इस रूपकी प्राप्ति मुक्ति है। किंतु यहाँकी मुक्ति, जीवकी मुक्तित्वसे मुक्ति है अर्थात् जीवको मुक्ततासे छुट्टी मिले। एक कथा है कि एक बार श्रीदेवर्षि नारद प्रफुल्लित अद्भुत आमोदमय वृन्दारण्यमें पधारे। वहाँपर जब उन्होंने श्रीवृषभानुनन्दिनी तथा व्रजांगनाओंके दिव्य प्रेममय हास-रास-विलास-विलासित भावोंका अनुभव किया तो रोने लगे। नारदको रोते देख व्रजरमणियोंने पूछा कि ऐसे आनन्द-समुद्रमें अवगाहन करनेके समय रोते क्यों हो? नारदने कहा—हम रोते उनके लिये हैं, जो मुक्त हो गये हैं। जो बन्धनमें हैं, उनको तो सम्भव है कि यह रस मिल सके। उनको श्रीवृषभानुनन्दिनी तथा श्रीकृष्ण परमानन्दके ऐसे अद्भुत प्रेमरसमय शृंगारका दर्शन हो सकेगा, मगर मुक्तोंको तो बिलकुल ही असम्भव है। इसी भावनासे कहते हैं कि वेदान्तियोंकी मुक्ति पाषाणकल्प है, किंतु उसके निरूपणका यह अवसर नहीं। आश्रय—ऊपर कहे हुए मुक्तोंको भगवल्लीलो- पयोगी दिव्य देहादिकोंका प्रदान करना, पूर्णतम पुरुषोत्तमलीन जीवोंका निष्कासन करनेपर उन मुक्तिमुक्तोंको लीलापरिकरोपयोगी बनाना आश्रय है, इसीको प्रत्यापत्ति कहते हैं, इसके अनुसार वह जीव वृन्दावनमें गुल्म, लता, पाषाण, वृक्ष हुए। मुक्त, मुनीन्द्र, अमलात्मा, महात्मा, परमहंस ही आकर सर्वरूपमें प्रकट हो गये हैं, इन्हींकी भोग्या सुधा देवभोग्या है। 'द्योतनात्मकत्वात्, प्रकाशात्मकत्वात्, श्रीकृष्णस्वरूपत्वात् देवाः, किं वा दीव्यन्तीति देवाः।' श्रीकृष्णचन्द्रसे क्रीड़ाके लिये जो आये, वे देव हैं। दिव् धातु तो बड़ा ही व्यापक अर्थ रखता है। 'दिवुक्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोद- मदस्वप्नकान्तिगतिषु'। ये देव पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्रके साथ लीला-परिकर होनेके लिये प्रादुर्भूत हुए। इनको भी प्रेमनिरोध हुआ। ये श्रीप्रभुके प्रेममें संसार- विस्मरणपूर्वक मनसे उनमें लीन हो गये। एक स्थिति तो यह कि 'वृन्दावनं परित्यज्य पदमेकं न गच्छति' तब तो ठीक ही है, पर जब भगवान् गये, तब तरु- गुल्म वगैरह शुष्क क्यों न हो गये? कारण यह कि बहिर्मुख नहीं, इनकी भावना यह है कि श्रीकृष्णचन्द्र कहीं गये ही नहीं। अगर वे प्रभुका वहाँ अभाव समझते तो मुरझाते, रोते, जल जाते, अतः प्रेमनिरोधसम्पन्न लता, तरु-गुल्म, खग-मृगोंमें देवभोग्या अधरसुधाका संचार हुआ। भगवान्‌के मुखचन्द्रसे निःसृत जिस वेणुनादामृतका वृक्ष-लता, खग-मृग, पशु आस्वादन करते हैं, वह देवभोग्या अधरसुधा है। यह सुधा है श्रोत्रपेया, मुखपेया नहीं, इस सुमधुर अधरसुधाका सम्भोग श्रोत्रोंद्वारा ही होता है। रसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रकी मंगलमयी लीला भी रसस्वरूप है एक बात यहाँ समझनी चाहिये कि वास्तवमें रसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी मंगलमयी लीला भी रसस्वरूप ही है। उनके लीलापरिकर भी रसस्वरूप हैं और लीलाभूमि भी रसस्वरूप है। भगवान् तो वास्तवमें आत्मरति हैं। जब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके भक्त आत्मरति हैं, उनको रमण करनेके लिये स्त्री, पुत्र, धन इत्यादि अनात्मसामग्री अपेक्षित नहीं है, तब उनके ध्येय पूर्णतम, पुरुषोत्तम, भगवान् आत्माराम, आप्तकाम आत्मामें रमण करेंगे, इसमें संशय ही क्या? वह अपने-आपमें रमण करते

वेणुगीत ९९ हैं— 'नहि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति'। एक सच्चिदानन्द परमात्माको छोड़कर सभी सान्त हैं भगवान्‌की रति आत्मामें, श्रीवृषभानुनन्दिनीमें और 'प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि'। (गीता श्रीव्रजांगनाओंमें है। सब उन्हींके रूप हैं। 'स १३।१९) समझो कि लीलारसविशेषके लिये निखिल भगवान् कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिम्नीति होवाच।' रसामृतसिन्धु, पूर्णतम, पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्र अन्तिम सर्वाधार अपने-आपहीमें स्थित होता है। परमानन्दकन्दने अपने-आपको ही सर्वस्वरूपमें विकसित पृथिवीका आधार जल, जलका तेज, तेजका वायु, किया, अतएव शुद्ध रसमय लीलामें प्राकृतता नहीं है। वायुका आकाश, उसका तन्मात्र, उसका अहंकार, यदि यह कहो कि आकर्षण नहीं—तो लीला कैसे? उसका महत्तत्व, उसका अव्यक्त प्रकृति, उसका तो प्रभु एक वैष्णवी मोहिनी मायासे सबोंके स्वरूपोंको सत्त्व; अब उसका आधार क्या? वह तो स्वयं आवृत—मोहित कर देते हैं। अतः निखिल रसामृतमूर्ति निराधार अपने-आपहीमें स्थित है। इसलिये श्रीकृष्णचन्द्र होते हुए भी वे अपने-आपको भूल जाते हैं। इसी परमानन्दकन्द सर्वत्र आपहीमें व्यक्त हुए। इस दृष्टिसे तरह श्रीवृषभानुनन्दिनी, व्रजांगना इत्यादि भी अपनेको आत्मरति बने, परंतु जब सब ही रसस्वरूप आत्मरति भूल जाते हैं। यदि स्वयं तृप्त हैं तो दूसरेकी स्पृहा हैं तो किसी एकको दूसरी ओर आकर्षण, प्रेम, कैसी? किंतु इस वैष्णवी मोहिनी मायासे यशोदामाता आसक्ति, व्यसन कैसे? क्योंकि जैसे श्रीकृष्णचन्द्र प्रभुके मुखारविन्दमें चराचर विश्वको देखती हुई भी, परमानन्दकन्द स्वरूपमें रमण करनेवाले हैं, वैसे ही अपनेको भूल गयीं, वैसे ही यहाँ भी सब अपने वृषभानुनन्दिनी और व्रजांगना आदि भी हैं। अर्थात् स्वरूपको भूल गये। यदि कोई कहे कि रुचिसे परस्पराकर्षण नहीं होगा, यदि आकर्षण नहीं तो अपनेको भुलाना कैसे? तो लोग जैसे भंग पीकर नानाविध विलास क्यों? एकमें अनेकत्व क्यों? अपनेको अपनी रुचिसे मोहित करते हैं। यह क्यों? 'एकोऽहं बहु स्याम्' यह क्यों? इसका उत्तर केवल विस्मृतिके लिये। विस्मृतिमें भी स्वाद है, रस है, यदि यही कि लीलारसास्वादनार्थ। वह स्वेच्छामूलक हो। अर्थात् जैसे प्राकृत मानव भगवान्‌के जन्म-कर्म बन्धनकारक नहीं हैं भंगादि मादक आसवोंद्वारा स्वरूपविस्मृतिपुरःसर लीलामें अब प्रश्न यह होता है कि आत्माराम, आप्तकाम, प्रवृत्त होता है, वैसे ही वैष्णवी मायासे भगवान् भी पूर्णतम, पुरुषोत्तमको लीलारसास्वादन कैसे? बात लीलामें प्रवृत्त होते हैं एवं यह स्पष्ट है कि इस ठीक है, पर यह तो आपत्ति सभी मतोंमें है। तब फिर मंगलमयी रसकी लीलासे, उसके मनन, निदिध्यासनसे किसलिये कहते हैं 'आप्तकामस्य का स्पृहा' और प्राणियोंका परम कल्याण है। जन्म, कर्म तो सबके कैसे फिर सब प्रपंच सम्भव है? अब पहला उत्तर ही हैं और प्राणियोंके जन्म-कर्म बन्धनकारक भी यह—जो सर्वमतसिद्ध भी है कि आप्तकाम भगवान्‌को होते हैं, मगर भगवान्‌के जन्म-कर्म बन्धन नहीं। अपना प्रयोजन तो कुछ नहीं, पर अनादिबद्ध जीवोंके जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। लिये प्रभु जगन्निर्माण करते हैं, एकमें अनेकता करते त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ हैं। यदि कहो 'न रहे बाँस न बजे बाँसुरी', यह (गीता ४।९) बात निरर्थक है, अनादिकालसे एकमें अनेकता व्यक्त श्रीभगवान् और जीवके जन्म-कर्म क्या बराबर है, जीवभाव नया नहीं है। जैसे जबसे आकाश है, हैं? जीवके जन्म-कर्म सुनते-देखते कल्प-कल्पान्तर तबसे ही उसमें श्यामलता भ्रान्ति है, वैसे ही अनादि बीत गये, अब भगवान्‌के जन्म-कर्म सुनने चाहिये। जीव हैं, अनादि प्रकृति है, किंतु अनादि रहनेपर भी उसीके द्वारा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी प्राप्ति सान्त हैं (यथा प्रागभाव)। अद्वैत मत यही है कि होगी। श्रीकृष्णके जन्म-कर्मके श्रवणसे प्राणियोंके

जन्म-कर्म छूटते हैं, प्राणियोंके जन्म-कर्म श्रवणसे जन्म-कर्मकी परम्परा बढ़ती है। अतः वह भगवान्‌की लीला ही थी, पर वह अप्राकृत थी। स्वाभाविक आसक्तिके लिये लौकिक रूपमें कही गयी है। संसारकी आकांक्षा, वांछा, आशा, तृष्णा और श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके सम्मिलनकी आकांक्षा, वांछा, आशा, तृष्णा क्या बराबर हैं? नहीं, दोनोंमें आकाश- पातालका अन्तर है। वह आशा पिशाची है। यह आशा कल्पलता है। इसलिये यह निर्विवाद है कि पूर्णतम, पुरुषोत्तम, निखिलरसामृतमूर्ति, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने अपने-आपको सर्वरूपमें व्यक्त किया। फिर भी लीलारसकी आसक्तिके लिये यहाँ स्वरूपानन्दका विस्मरण अपेक्षित है। इस तरह भगवत्स्वरूप होते हुए भी इन देवोंका विस्मृतिके कारण सुधाकी ओर आकर्षण उत्पन्न है। उनके प्रेमनिरोधके अनुकूल यह देवभोग्या सुधा है। व्रजांगनाएँ, जो श्रीकृष्णचन्द्रके अमृतमय मुखचन्द्रकी अधरसुधाके भोगनेयोग्य हैं, परंतु व्रजस्थ हैं, वे कैसे भोगें? इसलिये वेणुछिद्रोंमें प्रवेश कराके गीतरूपसे निरावरण कर्णकुहरोंद्वारा उनके हृदयमें पहुँचाना है, जिसे वे अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राण, रोम-रोममें अनुभव करके आन्तररमण प्राप्त करेंगी। भगवद्भोग्या अधरसुधा इसलिये प्रयुक्त है, जिससे सर्वाभोग्या अधरसुधाके अनुभवकी योग्यता प्राप्त हो। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके अमृतमय मुखसे निर्गत जो वेणुगीतपीयूष है, उसको निरावरण कर्णकुहरोंद्वारा पानकर अन्तःकरणमें उसे भावनासे परिवर्तित करती हुई व्रजांगना फिर उसीको उद्गाररूपमें वर्णन करती है। वही अधरसुधा व्रजांगनाओंके अधरपल्लवमें आती है, इसीसे अधरपल्लव पवित्र हो जाता है। अपवित्र मुखसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके अधरपल्लवमें रहनेवाली सर्वभोग्या अधरसुधाका सम्भोग नहीं हो सकता। अतः जब वे वेणुगीतपीयूषका श्रोत्रसे आस्वादन करेंगी और भावनापरिवर्धन-उद्गार- वर्णनसे मुख पवित्र होगा, तभी वह सर्वाभोग्या अधरसुधाके लिये अधिकारसम्पन्न होंगी।

प्रथम भगवान्‌का भक्तमें रमण, अनन्तर भक्तका भगवान्‌में रमण पहले भगवान् भक्तमें रमण करते हैं, तब भक्त भगवान्‌में रमण करनेके अधिकारी होते हैं। यदि श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मुखपंकजसे वेणुगीत- पीयूषद्वारा व्रजांगनाओंके मुखपंकजका अधरपल्लव शुद्ध हो लेगा, तब श्रीव्रजांगनाएँ भगवद्रमणयोग्य होंगी। सम्प्रयोगात्मक शृंगारमें श्रीकृष्ण भी व्रजांगनाओंके पवित्र अधरपल्लवमें अधरसुधाका सम्भोग करेंगे। इस तरह व्रजांगनाओंके अधरपल्लवमें स्थित सुधा भगवद्भोग्या सुधा है। व्रजांगनाओंके अधरपल्लवमें रहनेवाली सुधा भी श्रीकृष्णकी ही अधरसुधा है; क्योंकि भगवान्‌के अधरमें रहनेवाली भगवद्भोग्या अधरसुधा ही वेणुछिद्रोंमें प्रविष्ट होकर, गीतपीयूष- रूपमें व्यक्त होकर व्रजांगनाओंके श्रोत्र, अन्तःकरण, अन्तरात्मामें भरपूर हो, अधरपल्लवमें वर्णनव्याजसे प्राप्त होकर सम्प्रयोगकालमें भगवद्भोग्या हुई थी। भगवान्‌के अधरमें रहकर वह भगवद्भोग्या नहीं हो सकती थी, इस प्रकार हो गयी। 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च' यहाँ भी श्रीका अर्थ श्रीवृषभानुनन्दिनी है। वैसे तो श्री शब्दका प्रयोग लक्ष्मीमें भी होता है, पर जहाँ श्री तथा लक्ष्मीका पृथक् पठन है, वहाँ श्रीका अर्थ लक्ष्मी क्यों किया जाय? 'लक्ष्मी' अर्थमें 'श्रयते हरिः या सा श्रीः, श्रयते सेवते (श्रिञ् सेवायाम्)' ऐसे अर्थ हैं, किंतु यहाँ 'श्रीयते सर्वैर्गुणैर्या सा,' ऐसा कर्ममें प्रत्यय। जो समस्त गुणगणोंसे, अद्भुत सौन्दर्य, सौरस्य, सौगन्ध्य इत्यादिसे सेवित हो, वह श्री। यह सेविका श्री नहीं, सेव्या श्री है अर्थात् सकल गुण-गण मूर्तिमान् होकर जिसकी सेवा करें, वह श्रीवृषभानुनन्दिनी श्री हैं। जितनी भी अनन्तकोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत सौरस्य, सौगन्ध्य, सौन्दर्य, मार्दव, माधुर्यादि गुणोंकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी महाशक्तियाँ हैं, वे मूर्तिमती होकर राधाकी सेवामें उपस्थित हैं। इसीलिये गोलोकधाममें मूर्तिमती शोभादि गोपांगनाएँ राधाजीकी सेवामें उपस्थित हैं। अब

वेणुगीत १०१ वृषभानुनन्दिनीकी सुन्दरताकी कल्पना कौन करे? सोचते हैं कि भगवान् किसका ध्यान करते हैं? इतनेमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत सौन्दर्यबिन्दुका उद्गम- भगवान्‌का ध्यान खुला, युधिष्ठिर पूछते हैं- 'आप स्थान जो सौन्दर्यसिन्धु है, उसकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी अभी किसका ध्यान करते थे, भगवन्!' भगवान्‌ने श्रीवृषभानुनन्दिनीकी सेवामें रहती हैं। भगवान् श्यामसुन्दर, कहा- 'इस समय भीष्म शरशय्यापर पड़े हुए हमारा व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी तो ध्यान कर रहे थे। हमारा भी व्रत है कि 'ये यथा माधुर्याधिष्ठात्री स्वयं वृषभानुनन्दिनी ही हैं। अनन्तकोटि मां प्रपद्यन्ते' इसलिये हम भी उन्हींके ध्यानमें ब्रह्माण्डान्तर्गत जो मार्दव है, उसकी अधिष्ठात्री देवी तन्मनस्क रहे।' अस्तु, इन पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभुकी महालक्ष्मीके चरण इतने कोमल हैं कि कोमल-से- माधुर्याधिष्ठात्री देवता राधा हैं, उन्हींके ध्यानमें कोमल कमलकी पँखुड़ीके गड़नेका डर रहता है। भगवान् रहे, उन्हींका जप भी करते रहे। वंशीमें भी इतनी मृदुलता जिसके चरणोंमें है, उस महालक्ष्मीके वही बजाते थे 'ताहि श्याम वंशीमें गावत।' हस्तारविन्द कितने कोमल होंगे, कुछ ठिकाना नहीं। शुकको भी पढ़ाते थे कि 'वत्स पठ धाराधरवपुः ऐसी जो महालक्ष्मी हैं, वे अपने सुकोमल श्रीहस्तोंसे श्रीमन्नारायणोऽवतु।' इस व्याजसे धाराधरवपुमें वृषभानुनन्दिनीके श्रीचरणोंको स्पर्श करनेमें सकुचाती 'धाराधारा' कहनेसे राधाका नाम लेते थे। 'मरा मरा' हैं कि कोमल चरणोंमें कहीं आघात न लग जाय। कहनेसे वाल्मीकि भी राममें परिनिष्ठित हो गये। ऐसा ऐसे ही क्षमाधिष्ठात्री, दयाधिष्ठात्री, शोभाधिष्ठात्री, उलटा क्यों? इसलिये कि अगर अम्बा नन्दरानीके करुणाधिष्ठात्री शक्तियाँ सर्वगुणगणोंसहित निरन्तर सामने स्त्रीका नाम लें तो वह क्या समझेंगी? अतः श्रीवृषभानुनन्दिनीका सेवन करती हैं। प्रकट नहीं लेते। वैसे अम्बा व्रजगेहिनी नन्दरानी कोई भावुक तो कहते हैं कि 'श्रीयते हरिणाऽपि समझे कि हमारा लाला बड़ा भक्त है, स्नानकर या सा श्रीः।' जैसे भक्त भगवान्‌को भजते हैं, वैसे भगवान्‌का नाम जपा करता है। तात्पर्य यह कि ही भगवान् भक्तको। ठीक ही है, भगवान् स्वयं कहते 'श्रीयते श्रीकृष्णोऽपि या सा श्रीः।' वह श्री हैं— 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्'। जहाँ नहीं, वहाँ श्रीकृष्णका रमण नहीं। वही श्रीराधा (गीता ४।१०) माधुर्याधिष्ठात्री शक्ति, माधुर्यसारसर्वस्व श्रीकृष्णचन्द्रके यदि श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- अमृतमय मुखचन्द्रमें अधरसुधाके रूपमें विराजमान कन्दको भजती हैं तो वैसे ही भक्तभजनानुविधायी हैं। इसलिये जब अधरसुधाको वंशीके छिद्रमें निक्षिप्तकर भगवान् भी वृषभानुनन्दिनीको कैसे न भजें? व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाया तो वही अधरसुधा 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में एक कथा है- व्रजांगनाओंके मुखपंकजमें आयी। वह स्वरूप उनके एक समय श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द अपने अन्तरात्मामें, अन्तःकरणमें, प्राणोंमें, रोम-रोममें आ शुकको पढ़ाते थे, साथ-साथ श्रीराधाका ध्यान भी गया। वही वृषभानुनन्दिनी हैं। अतः वहाँ श्रीका यानी कर रहे थे। आखिर किसीका ध्यान तो करना ही वृषभानुनन्दिनीका संचार है और जहाँ उनका संचार चाहिये। भक्त भगवान्‌का ध्यान करते हैं तो भगवान् है, वहीं श्रीकृष्ण परमानन्दका रमण होता है। पूर्णतम, भक्तका करेंगे ही। उसी ध्यानानन्दमें महाराजके पुरुषोत्तम भगवान् अपनी ही माधुर्याधिष्ठात्री शक्तिका नयनोंसे अश्रु बह रहा था। श्रीअंगमें पुलकावली हो आस्वादन करते हैं। फूलोंमें स्वयं अगर घ्राणशक्ति हो गयी थी। भारतकी कथा है कि भगवान् भीष्मजीका तो वे जैसा आघ्राण करेंगे, वैसे ही यह रमण है। यह ध्यान कर रहे थे, उसी समय धर्मराज युधिष्ठिर पहुँचे आया कि भगवान् आत्मरति हैं। ठीक ही है, जिनका और भगवान्‌को ध्यान करते देख चकित हो गये। ध्यान करनेवाले अमलात्मा परमहंस मुनीन्द्र अपने

१०२ भक्तिसुधा रमणके लिये किसीकी अपेक्षा नहीं करते, उनके ध्येय, आराध्यदेव श्रीप्रभु अनात्मरति कैसे होंगे? जहाँ-जहाँ इनका प्राकट्य नहीं, वहाँ श्रीकृष्णका रमण भी नहीं। प्राणिमात्रके लिये अपेक्षित यही है कि वह ब्रह्म-संस्पर्श, ब्रह्मरस-सम्भोगका प्रयत्न करे। यही जीवनकी सफलता है। यहाँके षड्रस भोगते-भोगते कल्पकल्पान्तर बीत गये, अतः प्रत्येक उस ब्राह्मारस, स्पर्शके लिये लालायित हो, यही ठीक है। जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए विधाता॥ (रा०च०मा० १।२०४।२) भगवान्‌का आत्माभिरमण जिसका मन इनके लिये उत्कण्ठित न होता हो, वह प्राणी नहीं। अस्तु, यह हो तब श्रीकृष्ण सबमें रमण करें। प्रथम ब्रह्म जीवमें रमण करे, फिर जीव ब्रह्ममें। व्रजांगनाओंमें कोई ऋषिरूपा थी, कोई अग्निरूपा, कोई साधनसिद्धा, कोई नित्यसिद्धा, कोई जनकपुरनिवासिनी। उन सबोंमें प्रथम श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका रमण हो, फिर उनका श्रीकृष्णमें। यहाँपर दोनोंके रमणमें भेद है, पर प्रश्न यह है कि भगवान् भक्तमें रमण कैसे करें? वे तो आप्तकाम, आत्माराम हैं, परंतु श्रीवृषभानुनन्दिनी तो उनकी आत्मा ही हैं। क्या आनन्दसुधासिन्धुसे उसका माधुर्य पृथक् है? इसलिये श्रीकृष्णकी आत्मा ही वृषभानुनन्दिनी हैं। उनका रमण उन्हींमें है, फिर व्रजांगनामें कैसे रमण करें? इसका उत्तर यह है कि जहाँ श्रीकृष्णचन्द्रकी आत्माका संचार है, वहीं उनका रमण—इसीलिये व्रजांगनाओंमें पहले श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने आत्माका संचार किया। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दसिन्धुकी माधुर्यसारसर्वस्वभूता अधरसुधा वृषभानुनन्दिनी ही हैं। वेणुगीतद्वारा वे ही भगवद्भोग्या सुधाके रूपमें व्रजांगनाओंके श्रोत्रोंद्वारा उनके अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राण, इन्द्रियों एवं रोम-रोममें परिपूर्ण हो गयीं। अतएव व्रजांगना भी वृषभानुनन्दिनीरूप होकर कृष्णकी आत्मा ही होंगी, अब उनमें रमण भी श्रीकृष्णका आत्मामें ही रमण है। क्या उनमें आत्माका मुलम्मा हुआ? नहीं, उसके केवल संसर्गसे उनमें तन्मयता हो गयी। यदि माधुर्यसारसर्वस्व ऊपर-का-ऊपर ही रहता तो मुलम्मा कहा जाता। यहाँ तो भगवान्‌ने अपनी अधरसुधाको वेणुके द्वारा उनके हृदयमें भरकर भावनासे परिवर्धितकर सर्वत्र स्वरूपमें भरपूरकर तन्मय कर दिया। सूर्यका प्रतिबिम्ब जलपर पड़ता है, दर्पणपर पड़ता है, काष्ठपर नहीं, दीवारपर नहीं, पर दीवारको यदि जलसे तर कर दें तो दीवारपर भी प्रतिबिम्ब पड़ेगा। आत्माका प्रतिबिम्ब अन्तःकरणपर पड़ता है, घटपर नहीं, पर चक्षुद्वारा जब अन्तःकरण घटाकाराकारित हो, तब घटपर भी पड़ता है, जैसे जलमय दीवारपर सूर्य-प्रतिबिम्ब। इसी तरह जैसा सूर्य-प्रतिबिम्ब मुख्य रूपसे जलपर पड़ता है, दीवारपर जलसंसर्गसे ही पड़ता है, वैसे ही श्रीकृष्णका मुख्य रमण वृषभानुनन्दिनीमें और अन्यत्र वृषभानुनन्दिनीके संसर्गसे होता है। माधुर्यसारसर्वस्व अधरसुधाके संचारसे सर्वत्र संसर्ग होनेके कारण भगवान्‌का सर्वत्र रमण होता है, सिद्धान्त यह है कि एक पूर्णतम पुरुषोत्तम रसस्वरूप परम तत्त्व अपने-आप ही श्रीकृष्णरूपमें, वृषभानुनन्दिनीके रूपमें प्रकट है, वही व्रजांगनाओंके रूपमें लीलाभूमिके रूपमें भी प्रकट है, पर मोहिनी शक्तिसे सब आवृत रहा, किंतु जिसका जो रूप है, वह व्यक्त हो ही जाता है। व्यक्त अग्निवाले काष्ठके सम्बन्धसे जैसे अव्यक्त अग्निवाले काष्ठमें भी अग्निकी अभिव्यक्ति हो जाती है, उसी तरह व्यक्त आत्मस्वरूपवाली वस्तुके सम्बन्धसे अव्यक्त आत्मस्वरूपवाली वस्तुमें भी आत्माका प्राकट्य हो जाता है। वास्तवमें व्रजांगनाएँ भी रसस्वरूपा हैं; किंतु उनमें माधुर्यस्वरूप अव्यक्त था। उससे जब वृषभानुनन्दिनीके व्यक्त स्वरूपका सम्बन्ध हुआ, तब वह व्यक्त हो गया। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- कन्दकी अधरसुधा व्यक्त माधुर्यसारसर्वस्व है। उसके सम्बन्धसे व्रजांगनामें भी वह व्यक्त हो गया। हम

वेणुगीत १०३ तो कहते हैं कि जितना भी विश्व है, वह— ‘आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभि- संविशन्ति।’ (तैत्तिरीय० ३।६) इस सिद्धान्तके अनुसार आनन्दस्वरूप ही है। यह तो जैसे किसीको अमृतसिन्धुमें क्षारसिन्धुकी भ्रान्ति हो, वैसे ही अचिन्त्य, अनन्त, परमानन्दसिन्धुमें भवसिन्धुकी भ्रान्ति होती है—‘आनँद-सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥’ (विनय-पत्रिका १३६।२) ‘आनन्दसिन्धुके बर्फकी तू पुतली है, तेरे भीतर- बाहर सर्वत्र आनन्द भरपूर है।’ इस तरह सबका असली स्वरूप आनन्द ही है, पर वह अव्यक्त है, श्रुति कहती है—‘तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी।’ (तैत्तिरीय० २।१) वस्तुतः काष्ठ, अग्नि भी पृथक्-पृथक् वस्तु नहीं है। आत्मासे ही आकाश, उससे वायु, वायुसे तेज उत्पन्न हुआ। तेजसे ही जल, उससे पृथ्वी, उसीसे काष्ठादि। और यह सिद्धान्त है कि कारणसे भिन्न कार्य नहीं। फिर तो जैसे मिट्टीसे उत्पन्न घट मिट्टीसे पृथक् नहीं, वैसे ही तेजसे उत्पन्न जल तेजसे पृथक् नहीं, जलसे उत्पन्न पृथ्वी और उससे उत्पन्न काष्ठ भी अग्नि या तेजसे भिन्न नहीं। इस तरह काष्ठ, अग्निका भी वास्तविक भेद नहीं रहता। तथापि काष्ठ तेजका आवरक होता है। कार्यसे कारणस्वरूपका आवरण होता ही है एवं सर्व तत्त्वोंकी आनन्दस्वरूपता आवृत है, जहाँ माधुर्यसारसर्वस्व सुमधुर अधरसुधाके वेणुगीतपीयूषका आस्वादन प्राप्त होता है, वहाँ उस व्यक्त आनन्दस्वरूपसे आनन्द व्यक्त होता है, वहीं आत्मरति श्रीकृष्णका रमण भी होता है। यह लचर दलीलकी बात नहीं, शुद्ध भित्तिपर स्थित सिद्धान्त है। अगर कोई समझना चाहता है तो समझ ले। तात्पर्य यह कि श्रीकृष्णका रमण आत्मामें है, अनात्मामें नहीं। भगवान्‌के गुणगणोंके श्रवणसे अन्तःकरणमें भगवान्‌का प्राकट्य अभिव्यक्ति कई तरहसे होती है। जिन्हें वंशीगीत सुननेको नहीं मिला, उन जीवोंको ‘प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण स्वानां भावसरोरुहम्’ (श्रीमद्भा० २।८।५)-के अनुसार भगवान्‌की मंगलमयी कथासुधाके श्रवणसे स्वाभाविक आनन्दरूपता व्यक्त होती है। सर्वत्र इसीलिये श्रवण ही मुख्य कहा है। ‘मद्गुण- श्रुतिमात्रेण’ (श्रीमद्भा० ३।२९।११), ‘द्रुतस्य भगवद्धर्मात् धारावाहिकतां गता’, ‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः’ (बृहदारण्यक० २।४।५)। इत्यादिसे श्रवणका माहात्म्य स्पष्ट है। भगवान्‌के गुणगणोंके श्रवणसे अन्तःकरणमें भगवान्‌का प्राकट्य होता है। गुणचरित्र-श्रवणद्वारा भगवान्‌के स्नेहसे द्रवीभूत चित्तवृत्तिका भगवान्‌की ओर अखण्ड प्रवाह ही भक्ति है। श्रवणसे भगवान् अवश्य भक्तके हृदयमें व्यक्त होते हैं, परंतु श्रवण भी उसी तरहका हो। उच्चकोटिके परमहंस भावुक अपने हृदयमें भगवत्तत्त्वका अनुभव करते हुए ‘भावना’ से उसका परिवर्धन करते हैं। जैसे कहींका थोड़ा स्रोत बहुत जगहके झरनेसे बड़ा होता है, वैसे जो कोई भावुक पूर्णरूपसे श्रवण, मनन, निदिध्यासनोंसे भगवत्तत्त्वका हृदयमें साक्षात्कार, अवगाहन, चिन्तन किया करते हैं, वहाँ वही रस सर्वत्र अन्तःकरण, प्राण, रोम-रोममें भरपूर होता है। कहीं किसी तरहसे उसका उद्गार कथासुधारूपमें निकला, तब वह प्राकृत कथा नहीं, भगवत्तत्त्व ही उस रूपसे व्यक्त होता है। प्रसिद्ध है कि महर्षि वाल्मीकिका शोक ही श्लोक रूपमें व्यक्त हुआ— ‘शोकः श्लोकत्वमागतः’॥ (वा०रा० १।२।४०) महर्षि अपने शिष्य भरद्वाजको लेकर तमसातीरपर आये। वहाँ क्रौंच-क्रौंची विहार कर रहे थे। इतनेमें किसी व्याधने क्रौंचको बाण मारा। वह मर गया और क्रौंची करुण-विलाप करने लगी। महर्षिका हृदय करुणारससागरसे भरपूर था। आश्रममें जानकीजी पधारी थीं, लोकापवादभयसे श्रीमदरामजीने उन्हें

लक्ष्मणद्वारा त्याग दिया था। जब लक्ष्मणको रथपर विह्वल देखा तो जनकनन्दिनीने पूछा—लक्ष्मण! आपकी यह दशा किसलिये ? इसपर लक्ष्मणने जो कहा, उसे सुनकर जनकनन्दिनी मूर्च्छित हो गयीं। उन्हें वहीं छोड़कर लक्ष्मण अयोध्या चले गये। वाल्मीकिने शिष्योंद्वारा सुनकर जनकनन्दिनीसे वृत्तान्त पूछा। अनन्तर उनका सान्त्वनकर ऋषिपत्नियोंके संरक्षणमें उन्हें रखा। वहाँ यथाकाल उनके दो पुत्र हुए। रामवियोगमें जनकनन्दिनीके क्रन्दनसे जो अद्भुत कारुण्यरससागर हृदयमें लहरा रहा था, वही क्रौंची- विलापसे उमड़ पड़ा। मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥ (वा०रा० १।२।१५) यह बुद्धिपूर्वक लिखा गया श्लोक नहीं, शोक ही श्लोक बन गया है। कोई भी कोई बात समझके साथ कहे, वह उद्गार नहीं। रसमें उफान आ जाता है। वह उच्छलित हो उठता है। संकुचित दिव्यपात्रमें भरपूर रस वायुके हलचलसे या किसी अन्य कारणसे उच्छलित हो उठे, वह उद्गार है। इसीसे भावुक श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मंगलमय, परम पवित्र चरित्रका हृदयमें अवगाहन करते हैं, वहीं कहीं प्रश्नवशात् लीलासुधारससार परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान् जब निकलते हैं तो कथासुधारूपमें। यही व्यक्त अग्नि है। भावुकोंके मुखपंकजसे विनिःसृत श्रीकृष्ण-कथासुधा श्रोत्रोंद्वारा भक्तहृदयमें गयी तो वहाँ भी कृष्णस्वरूप व्यक्त हो उठता है। 'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यम्' (गीता १३।१७)-के अनुसार वैसे तो सब भगवान् हैं ही, पर अव्यक्त रहते हैं। जिसको वे व्यक्त हैं, उसके मुखपद्मसे कथासुधारूपमें जहाँ गये, वहाँपर भी व्यक्त हो जाते हैं। बस फिर जहाँ ही श्रीकृष्णकी आत्मा व्यक्त होती है, वहीं आत्माराम श्रीकृष्णका रमण होता है। श्रीकृष्णके रमणके पश्चात् भावुकोंका भी कृष्णमें रमण होता है। तात्पर्य यही कि आनन्दस्वरूप कृष्णसे सारा विश्व ही उत्पन्न है। अतः सभी कृष्णकी आत्मा हैं। किसी तरह भी जहाँ अव्यक्त आत्मा व्यक्त हुई, वहीं कृष्णका रमण होता है। विशेषतः व्रजांगनाओंको तो परम्परासे नहीं, साक्षात् श्रीकृष्णके ही मुखचन्द्रकी अधरसुधारूप श्रीकृष्णकी आत्मरूपा वृषभानुनन्दिनी श्रीवेणुगीतरूपमें प्राप्त हुई, अतः उनकी अव्यक्त रसरूपता-आत्मरूपता सुतरां व्यक्त हो उठी। अतः सब व्रजांगनाएँ वृषभानुनन्दिनी- स्वरूपा हो गयीं और श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके अधरमें रहनेवाली अधरसुधा व्रजांगनाओंके अधरमें आयी। उसका सम्भोग श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दने किया, अतः वह भगवद्भोग्या सुधा है। अब व्रजांगनाओंका रमण श्रीकृष्णमें होगा। 'छान्दोग्योपनिषद्' में कहा कि जीवात्मा नाना प्रकारके कर्मोंको करके चान्द्रमस लोकमें चन्द्रस्वरूप धारण करते हैं और वे चन्द्रभावापन्न होकर देवताओंके अन्न—भोग्य हो जाते हैं। तो कर्म क्या देवताओंके खानेकी सामग्री होनेके लिये किया जाता है ? नहीं, यहाँ अन्नका अर्थ सम्भोगसाधन है। जैसे राजाओंकी सभाके सभ्य (सदस्य) राजाके मनबहलावके लिये होनेके कारण उनके उपकरण समझे जाते हैं, वैसे ही जीव भी इन्द्रसभाके सभ्य होकर उनकी आनन्द- सामग्री होंगे। यही उनकी भोग्यता है। इस रीतिसे समस्त जीवजगत् परमात्माका आराधनकर उनका यश-विस्तीर्ण करता है, इसलिये वह परमात्माका भोग्य है। भगवान् तो वास्तवमें आप्तकाम, आत्माराम हैं, फिर भी भक्तोंके लिये स्वरूप धारण करते हैं। भक्तोंके मनमें भी वैसी ही उत्कण्ठा रहती है। वे भगवान्के पीताम्बर, भगवान्के चन्दन, भगवान्के मस्तकपर विराजित मुकुट-किरीट, भगवान्के श्रीअंगपर शोभायमान गुंजा, श्रीकण्ठमें वैजयन्ती, वन्यस्तबक- पुष्पमयी माला होकर उनकी सेवा करना चाहते हैं। इन्द्रादिक निष्काम नहीं हैं। भगवान् निष्काम हैं। केवल लोगोंके लिये वे सकाम हो जाते हैं। इस तरह जीवोंका भगवद्भोगसाधन बनना जीवोंकी भोग्यता है।

इसी तरह भगवान् भी जीवके भोग्य हो जाते हैं, यह बात अलग है। यह समझो कि इन सब सामग्रीसे— भगवद्भोग्या अधरसुधाके संचारसे—भगवदात्मभूता माधुर्यसारसर्वस्व श्रीवृषभानुनन्दिनीका संचार होगा, तब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका रमण होगा। पहले जीवमें भगवान्‌का भोग्यत्व होकर उसमें भगवान्‌का रमण होता है, फिर भगवान् जीवके भोग्य होते हैं और उनमें जीवका रमण होता है। प्रथम श्रीकृष्णका व्रजांगनामें रमण, फिर व्रजांगनाका श्रीकृष्णमें रमण। भोग्य परतन्त्र होता है, भोक्ता स्वतन्त्र। व्रजांगनाओंमें— जीवोंमें पारतन्त्र्य, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें स्वातन्त्र्य। स्वाधीन (कृष्णाधीन) जो जीव—व्रजांगनाएँ हैं, उनमें श्रीकृष्ण रमण करेंगे। जहाँ जीवात्मा— व्रजांगनाएँ भगवान्में रमण करते हैं, वहाँ जीवात्मा— व्रजांगनाएँ भोक्ता और भगवान् भोग्य, व्रजांगनामें स्वातन्त्र्य और श्रीकृष्णमें पारतन्त्र्य, यह उलटा होगा। मगर बात यह बहुत ऊँची है। यह दार्शनिक दृष्टि है। भगवान् पूर्ण स्वतन्त्र भक्त पूर्ण परतन्त्र यहाँ शृंगाररसका प्राधान्य है। सम्प्रयोग विप्रयोगात्मक शृंगाररसात्माकी यह लीला है। शृंगाररसमें यह स्थिति रहती है कि नायिका भोग्या होती है और नायक भोक्ता। इसको साधारणी स्थिति कहते हैं। असाधारणी स्थितिमें नायक नायिकाभावापन्न तथा नायिका नायकभावापन्न हो जाती हैं। लौकिक शृंगारमें तो सब आरोप-ही-आरोप हैं, तत्त्वतः कुछ नहीं। रसोद्रेकमें एक प्रकारका अभिमान हो जाता है। उस स्थितिमें विपरीत रति होती है, किंतु यहाँ केवल अभिमान ही नहीं, वस्तुतः नायक नायिकाभावापन्न तथा नायिका नायकभावापन्न हुई हैं। स्वातन्त्र्य ही पुंस्त्व है और पारतन्त्र्य ही स्त्रीत्व। पुमान् एक पूर्णतम पुरुषोत्तम ही हैं। निरंकुशता, पूर्ण स्वातन्त्र्य केवल उन्हींमें है। तद्व्यतिरिक्त जीवोंमें आधिपारतन्त्र्य, व्याधिपारतन्त्र्य, जरापारतन्त्र्य, मरणपारतन्त्र्य—अनेकविध पारतन्त्र्य—बन्धन हैं। जितने-जितने अंशमें पारतन्त्र्य मिटता गया, उतने अंशमें स्त्रीत्व भी मिटा। जितने- जितने अंशमें स्वातन्त्र्यका उदय हुआ, उतने-उतने अंशमें पुंस्त्वका भी उदय हुआ। अविद्या, कामकर्मादि जरादि, किसी प्रकारका भी पारत

१०६ भक्तिसुधा कहा कि हम भक्तद्रोहीका रक्षण नहीं कर सकते। आगे ब्रह्मा, शिवका भी यही जवाब हुआ। आखिर दुर्वासा श्रीभगवान् महाविष्णुके पास गये। तब भगवान् कहते हैं कि आपका रक्षण करना तो ठीक ही है, पर क्या करूँ? मैं स्वतन्त्र नहीं। स्वतन्त्र अगर होता तो अवश्यमेव आपका रक्षण करता। मैं भक्तपरतन्त्र हूँ। कारण, मेरा व्रत है कि—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) हमारे भक्त इतने तन्मय हो जाते हैं कि वे मुझसे अतिरिक्त कुछ जानते ही नहीं। तब फिर मैं भी उनसे अतिरिक्त क्या जानूँ?' इसीको लेकर यह आया कि पहले भक्तमें अत्यन्त परतन्त्र्य, भगवान्‌में स्वातन्त्र्य; पीछे 'ये यथा' के अनुसार भक्तमें स्वातन्त्र्य और भगवान्‌में परतन्त्र्य होता है। 'ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभर छाछ पै नाच नचावैं॥' बड़े-बड़े देवाधिदेव जिनका ध्यान करते हैं, 'भीरपि यद्विभेति', उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके दोनों श्रीहस्त अपने एक हाथमें पकड़कर नन्दरानी एक हाथसे छड़ी दिखायें और भगवान् भी उस छड़ीसे डरें, यही परतन्त्र्य है। इससे स्पष्ट है कि पहले भगवान्‌में स्वातन्त्र्य, फिर भक्तमें स्वातन्त्र्य; पहले भगवत्सम्मिलनके लिये भक्त लालायित, फिर भक्तसम्मिलनके लिये भगवान् लालायित। परमभक्त मधुसूदन सरस्वतीने वृन्दावनमें जाकर भगवत्साक्षात्कारके लिये 'गोपालसहस्रनाम' के चार पुरश्चरण किये, पर उनको साक्षात्कार न हुआ, फिर काशीमें आये और यहाँपर श्रीकालभैरवका अनुष्ठान किया। उस अनुष्ठानपर श्रीभैरव प्रसन्न हुए। कहा—वर माँगो। इसपर मधुसूदन सरस्वतीने कृष्णसाक्षात्कार ही माँगा। भैरव कहते हैं कि वृन्दावन जाओ और वहाँ 'गोपालसहस्रनाम' का पुरश्चरण करो। मधुसूदन कहते हैं कि मैंने तो वहाँपर चार पुरश्चरण किये, पर साक्षात्कार नहीं हुआ। इसपर श्रीकालभैरवने पापोंके चार पहाड़ दिखलाये और कहा कि उन पुरश्चरणोंसे ये नष्ट हुए, अबकी बार साक्षात्कार होगा। मधुसूदन सरस्वती पुनः वृन्दावन गये, 'गोपालसहस्रनाम' का अनुष्ठान किया और तब भगवान्‌का प्राकट्य हुआ। जब श्रीश्यामसुन्दर सामने आकर खड़े हुए तो मधुसूदन सरस्वतीने चट अपना मुँह फेर लिया। जिधर-जिधर श्यामसुन्दर जाकर खड़े हों, उधर-उधरसे मधुसूदन अपना मुँह फेर लें। आखिर श्रीकृष्णचन्द्रने ही उन्हें मनाना शुरू किया। कहाँ यह स्थिति कि वह श्रीकृष्णके लिये लालायित और कहाँ यह कि अब श्रीकृष्ण ही उन्हें मनाते हैं। महास्वातन्त्र्यके पूर्व परतन्त्र्य अपेक्षित है। अगर स्वतन्त्रता चाहते हो तो उसका कुछ त्याग भी करो। हम वेद, शास्त्र, माता, पिता, धर्म-कर्मोंसे भी स्वतन्त्रता चाहते हैं, पर यह स्वतन्त्रता तो परतन्त्रताके घोर गर्तमें गिरानेवाली है। बालक माता, पिता, अध्यापकोंके परतन्त्र न हों तो वे उच्छृंखल होंगे। फिर जन्म-जन्मके लिये घोर अनर्थमय कंटकाकीर्ण गर्तमें पड़ेंगे। कोई भी राष्ट्र स्वतन्त्रतारक्षाके लिये सैनिक-संगठन करना चाहे तो वह सेनापतिके अत्यन्त परतन्त्र हो। अगर सेना उसकी आज्ञाका उल्लंघन करे तो विजय, स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो सकती। अतः परम सिद्धान्त यह है कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भक्तके परतन्त्र होते हैं। जिनके भृकुटिविलाससे सबको नचानेवाली माया जिनके सामने नाचे, वे स्वयं नाचते हैं—'तद्वशो दारुयन्त्रवत्।' (श्रीमद्भा० १०।११।७) परमानन्दमूर्ति श्रीकृष्ण कठपुतलीके समान व्रजांगनाओंके परतन्त्र हो गये। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता १८।६१) सर्वभूतोंके हृदयमें स्थित होकर भगवान् काठकी पुतलीके समान सबको नचाते हैं और वे ही फिर प्रेम-परतन्त्र होकर भक्तोंके खिलौने बन जाते हैं। भक्तमें भगवद्भावापत्ति, भगवान्‌में भक्तभावापत्ति— इसीका नाम परस्परभावापन्नता है। यह रसोद्रेक, आनन्दोद्रेकमें होता है। अतएव श्रीकृष्णमें

व्रजांगनाभावापत्ति और व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णभावापत्ति कही गयी। वृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्ण हो गयीं और श्रीकृष्ण वृषभानुनन्दिनी हो गये—यह भावनाकी महिमा है। औरोंकी भावना अभिनिवेश, अभिमान अदृढ़ और भगवान्‌का तथा वृषभानुनन्दिनीका अभिमान सुदृढ़ है। जब रसोद्रेकमें विपरीत रतिका संचार हुआ, वृषभानुनन्दिनीका श्रीकृष्णमें अभिमानपुरःसर प्रवेश हुआ, तब वृषभानुनन्दिनीमें भी श्रीकृष्णका अभिमान- पुरःसर प्रवेश हुआ। इसीलिये कहा जाता है कि— 'शिवस्य हृदयं विष्णुः विष्णोश्च हृदयं शिवः।' दोनों परस्पर अन्तरात्मा हैं। शिव संहारक और विष्णु पालक देवता हैं। संहारमें तमोगुणप्राधान्य और पालनमें सत्त्वगुणप्राधान्य होता है। सत्त्व स्वच्छ, शुभ्र प्रकाशात्मक तथा तम आवरणात्मक, काला है। अतः शंकरको कृष्ण होना चाहिये और विष्णुको शुक्ल, पर यहाँ तो सब उलटा ही है। क्यों? परस्पर सुदृढ़ उपास्योपासकभावसे परस्परका रंग परस्परमें आया। कारण—'सेवक स्वामि सखा सिय पी के।' (रा०च०मा० १।१५।४) शिव भगवान्‌के सेवक भी, स्वामी भी, सखा भी, अतः स्वच्छ, सत्त्वमय विष्णुकी भावनाकी महिमासे शिव शुक्ल हो गये, भावनाकी ही महिमासे विष्णु श्यामल हो गये। ऐसे ही देखें तो संकीर्णताको अवकाश नहीं। कहीं-कहीं तो ऐसा भी लिखा है कि श्रीशंकर ही श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं; क्योंकि दोनों परस्पर अन्तरात्मा ही हैं न ! जैसे रुद्ररूपा वंशी मानी गयी, वैसे ही कहीं श्रीकृष्णको कालका अवतार माना है। प्रकृतमें यह आया कि साधारण शृंगारमें भावना अभिमानमात्र है। यहाँ तो स्वरूपपरिवर्तन भी है। यहाँ वृन्दावन्य, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द, वृषभानुनन्दिनी, व्रजांगनाएँ, एतत् समवेत मंगलमयी लीलाभूमि उस अचिन्त्य, अनन्त, अद्भुत, प्रेमानन्दरससिन्धुमें क्षण-क्षण आविर्भूत- तिरोभूत होते रहते हैं, उन्मज्जन-निमज्जन करते रहते हैं। उस स्थितिमें कभी श्रीकृष्ण वृषभानुनन्दिनीके रूपमें, कभी वृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्णके रूपमें प्रकट होती हैं। यही कहा 'उभयोभयभावात्मा।' आया यह कि साधारण नायकमें उत्कट रस ही व्यक्त नहीं हो सकता, पर निखिलरसामृतमूर्ति उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्ण तो रसस्वरूप ही हैं। इनके सम्पर्कसे इतना उत्कट, अद्भुत, अनन्तरस उद्भूत हो गया कि परस्पर भावापत्ति हो गयी। यह श्रीकृष्ण पूर्णतम, पुरुषोत्तम स्वयं भोक्ता ही हैं, भोग्य नहीं, व्रजांगना स्वयं स्त्री, भोग्या। अतएव उनके भोक्ता श्रीकृष्ण भोग्य नहीं हो सकते। उनके ही क्या, दूसरे पुरुषोंके भी भोग्य वे नहीं हो सकते। पुरुष पुरुषोंके भोग्य नहीं होते। पारतन्त्र्य लक्षण स्त्रीत्व ही सबमें हैं, अतः सब भोग्य ही हैं। तो क्या स्वयं श्रीकृष्ण ही अपना भोग करें? नहीं। यह इस रीतिके विरुद्ध है। अब अधरपल्लवकी सर्वाभोग्या सुधा किसकी भोग्या ? देवभोग्या खग, मृग, पशु, तरु, लता, गुल्मादिकोंको, भगवद्भोग्या श्रोत्रद्वारा व्रजांगनाओंको, अब सर्वाभोग्याका भोक्ता कौन ? यह तब भोग्य हो कि जब भगवान् भोग्य हों। यह कैसे हो ? उनका भोक्ता तो कोई भी नहीं हो सकता। इसलिये कहा कि जब भगवद्भोग्या अधरसुधा व्रजांगनाओंमें सर्वत्र भरपूर हुई और व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णका रमण हुआ, उन्होंने उस भगवद्भोग्या अधरसुधाका संभोग किया, तब लोकोत्तररसोद्रेकसे व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णभावापत्ति और श्रीकृष्णमें व्रजांगनाभावापत्ति हुई। उस समय श्रीकृष्ण भोग्य हुए। इसलिये सर्वाभोग्या अधरसुधाका भोग व्रजांगनाओंको प्राप्त हुआ। सारांश यह कि साधारण स्थितिमें जो अधरसुधा किसीको भोग्य नहीं, वह सर्वाभोग्या है। जहाँ श्रीकृष्णने रमण किया, वहाँ विपरीत भावापत्ति हुई। भक्तोंमें इसके अनेक उदाहरण हैं। 'विष्णुपुराण' में प्रह्लादका प्रसंग बड़ा ही सुन्दर वर्णित है। प्रह्लादके अंगमें शिला बाँधकर उसे समुद्रमें फेंक दिया गया। जितनी उसको अधिक यातना हुई, उतनी उसकी विष्णुप्रीति अधिक बढ़ी। यहाँ तो कुछ विघ्नबाधा हुई कि कहते हैं—भजन हमारे कुलमें सहता नहीं।

एकादशीको अगर कोई मरा तो कहते हैं कि एकादशी हड़ही है। कनक जैसे-जैसे दग्ध किया जाता है, वैसे-वैसे उसका मूल्य बढ़ता है, वह चमकता है, निखरता है। वैसे ही भक्त अधिकाधिक निखरता है। अतएव भक्तोंको कष्ट, विपत्तियाँ आती हैं, पर वे धैर्यपुरःसर आगे ही बढ़ते हैं। पहली स्थिति यह कि 'भूतानि विष्णुः', सर्व विष्णुमय है। फिर 'अहं विष्णुः' की भावनाका दार्ढ्य सम्पादित होता है। तब प्रह्लादका पैर जिस क्षण समुद्रमें पड़ता, आसमुद्र भूमण्डल डगमग करने लगता। यह भावना- महिमासे विष्णुभावापत्ति है। इसी तरह छान्दोग्यमें 'भूमैवाधस्तात्' इत्यादिसे सर्वत्र सर्व दिशाओंमें भूमा पूर्णतम पुरुषोत्तमको बतलाकर 'अहमेव सर्वतः' ऐसा बतलाया है। श्रीवल्लभाचार्य भी इसे मानते हैं, पर कहते हैं कि यह संचारी भाव है। कुछ देरके लिये प्रेमोन्मादमें आता है। रासपंचाध्यायीमें व्रजांगना कहती हैं—'कृष्णोऽहं पश्यत गतिम्।' (श्रीमद्भा० १०।३०।१९) सखि ! मैं श्यामसुन्दर ही हूँ। उधर वृषभानुनन्दिनीकी स्थिति—'मधुरिपुरहमिति भावन- शीला।' सखी कृष्णसे सन्देश कहती है कि आपकी प्रियतमा आपकी प्रतीक्षा करती-करती 'श्रीकृष्ण हम ही हैं', यह भावना करती है। प्रेम और ज्ञानका अन्तिम भाव एक ही है। श्रीकृष्णने—मक्खन चुरानेवाले लालाने 'दासोऽहम्', 'दासोऽहम्' का जप करनेवाले, भावना करनेवाले, भक्तोंका 'दा' चुरा लिया। बच गया 'सोऽहम्', यह प्रेममार्गसे वेदान्तमार्ग अलग है। शृंगाररसमें नायक-नायिका परस्परभावापन्न होते हैं। वैसे ही श्रीकृष्ण और व्रजांगना वृषभानुनन्दिनीमें परस्पराभावापत्ति हो गयी। अतः जो किसीके भोग्य नहीं, उनके भोग्य हो जानेके कारण उस सर्वाभोग्या अधरसुधाकी प्राप्ति व्रजांगनाओंको हुई। भगवद्धाम वृन्दावनकी अद्भुत शोभा 'वृन्दारण्यं स्वपदरमणम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।५)—वृन्दारण्य कैसा? 'स्वपदरमणम्।' 'स्वपदं वैकुण्ठधाम तस्मादपि रमणम्। किंवा स्वपदेन (स्वस्य पदमधिष्ठानं) रमणम्।' वैकुण्ठ दो प्रकारके—१. भौमवैकुण्ठ, २. परमवैकुण्ठ। वृन्दारण्य भौमवैकुण्ठ है। वह परमवैकुण्ठसे भी रमण है। वैकुण्ठवासी यहाँ आये तो वह भी यहाँ आया। जहाँ भगवान् जाते हैं, वहाँ उनका धाम भी पधारता है। इसी अभिप्रायसे सुमित्रा लक्ष्मणलालसे कहती हैं— 'अयोध्यामटवीं विद्धि।' गोस्वामीजी कहते हैं— 'अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥' (रा०च०मा० २।७४।३) इससे यह बात निकलती है कि जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ वैकुण्ठ। भावुकोंका हृदय भी वैकुण्ठ है। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका वृन्दारण्य कहाँ? व्रजांगनाओंके हृदयमें। वहाँ जो प्रेमसुधातरंगिणी बही एवं यमुना, उनके उन्नत विशाल वक्षोज गोवर्धनादि पर्वत, रोमपंक्ति वन—इसी तरह सर्वभावोंका सम्पादन होता है। सजातीय-विजातीय-भेदरहित श्रीकृष्ण परब्रह्मका प्राकट्य कहाँ? महावाक्यजन्य परब्रह्मा- काराकारित मानसिक वृत्तिपर। जैसे सूर्यकान्तपर अग्निरूपमें सूर्यका प्राकट्य होता है, वैसे निर्वृत्तिक अन्तःकरणकी जो परब्रह्माकाराकारित वृत्ति है, उसीपर ब्रह्मका प्राकट्य होता है। भक्तहृदय कैसा? अति निर्मल, स्निग्ध, पवित्र, भगवदाकाराकारितवृत्तिमान्। भूमिसे लेकर क्रमशः सर्वोपरि अव्यक्त और उसके ऊपर भगवान्। यही अव्यक्त शेष है। 'शिष्यते यः स शेषः', कार्योंके कारणोंमें लय होनेके बाद कारण ही शेष रहता है। वह अव्यक्त मायावच्छिन्न चैतन्य महाकारण सहस्रफणायुक्त है। उसीपर श्रीमन्नारायण शयन करते हैं। वही महाकारणातीत, कार्यकारणातीत परब्रह्म है। भागवतमें कहा है—'अव्याकृत- मनन्ताख्यम्' (१२।११।१३) वही प्रकृतिविशिष्ट चैतन्य अनन्त भगवदधिष्ठान आसन है। भगवदाकारा- कारित, स्वच्छ, स्निग्ध मनोवृत्तिपर सगुण, साकार ब्रह्मका प्राकट्य है। जहाँ भगवान् हैं, वहाँ इसको जाना पड़ेगा, क्योंकि उसके बिना रामका प्राकट्य नहीं होगा। अतएव भक्तहृदय ही अवध और भक्तहृदय

वेणुगीत १०९ ही वृन्दारण्य। उसके सब जगह प्रकट करनेमें कठिनाई है, मेहनत है। पर वह है व्यापक। जैसे नेत्र जिसे कहते हैं वह नेत्रगोलक और उसके भीतर अतीन्द्रिय इन्द्रिय है, वैसे वृन्दारण्य गोलक और उसमें मुख्य वृन्दारण्य। वहाँ लौकिकताका भान दोषवश होता है। भगवान् तो अपने-आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। वह शेष केवल अव्यक्त जडांश नहीं, किंतु अव्यक्तांशपर चेतनांश होता है। वृन्दारण्यादि सर्व अद्भुत, अनन्त, परमानन्दसिन्धुमेंसे ही विकसित हैं। उसमें भी उसके भी ऊपर भगवत्स्वरूप वृन्दावन अलग है। वृन्दारण्य अव्यक्त रूप है। उसमें रसरूप वृन्दारण्य है और स्वस्वरूपभूत वृन्दारण्यमें ही भगवान्‌का रमण हुआ। ‘स्वपदरमणं, स्वपदादपि रमणम्'—वैकुण्ठसे भी रमण। व्रजांगना कहती हैं— 'जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१) हे श्यामसुन्दर, आपके मंगलमय जन्मसे व्रज अत्यन्त सुशोभित हो उठा। 'वैकुण्ठात् सर्वस्मादपि लोकात् अधिकं जयति।' कैसे? लक्ष्मी वृन्दावनमें सदा सेवा करती है, वैकुण्ठमें सेव्या है। व्रजमें लक्ष्मी श्रीजीके चरणारविन्दरजके स्पर्शके लिये लालायित हैं। 'यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपः।' (श्रीमद्भा० १०।१६।३६) यमुनाघाट बिल्ववनमें लक्ष्मी तपस्या करती है। इस प्रकार वह यहाँपर सेविका है। ऐसे 'स्वपदभ्यां रमणम्।' जहाँपर श्रीचरणारविन्द पाषाणोंपर अंकित हैं। पाषाणपर खड़े होकर किये वंशीनिनादसे वह कोमल हो जानेसे भगवत्पद वहाँपर अंकित हो उठा। ऐसे वृन्दारण्यमें भगवान् पधारे। वृन्दारण्य स्वयं सुशोभित है ही, पर प्रभुके श्रीचरणारविन्दोंसे अंकित होनेके कारण वह अधिक सुशोभित हुआ। अथवा 'स्वपदं रमणं रतिजनकं यस्य तत्' भगवान्‌के श्रीचरणारविन्दोंसे रमण, रति, आनन्द प्राप्त होता है जिसको, ऐसा वृन्दावन। अर्थात् प्रभुके श्रीचरणोंके स्पर्शमें वृन्दारण्यको अद्भुत, लोकोत्तर आनन्द प्राप्त होता है। भगवान्‌का चरण ही आनन्दमय मंगलमय है। इसलिये जिसको भी स्पर्श हो, उसीको आनन्द होगा ही, पर विशेषरूपसे जो सरस हैं, उनको अधिकाधिक आनन्द होता है। अतः वृन्दारण्यको अधिक आनन्द-रमण हुआ। वृन्दारण्य सरस है, आर्द्र है। तभी भगवान्‌के श्रीपद वहाँ अंकित होते हैं। यदि बहुत-सा श्रवण भी कर लिया, पर हृदय आर्द्र-सरस न हो तो प्रभुके पद अंकित नहीं हो सकते। कठोर लाक्षापर अंक सुस्थिर नहीं होता। अग्निके सम्बन्धसे लाख द्रुत होनेपर अंक (मुहर) वहाँ सुस्थिर होगा। इसी रीतिसे हृदय यदि आर्द्र है, तभी भगवान्‌के मंगलमय चरण अंकित होंगे। कठोर हृदयमें जब कभी प्रसंगवश अभिव्यक्त होनेपर भी सुस्थिर अंकित न हो सकेंगे। प्रसंगवश खल भी उत्तमोत्तम वार्तालाप प्रसंगमें रहते हैं, मगर वे उसमें स्थिर नहीं होते। वहाँ मालूम होनेवाला रस रसाभास है। अतएव हृदय द्रुत करनेका प्रयत्न करें तो प्रभुमें स्थायी रति हो। इसलिये वृन्दारण्य द्रुत होनेसे वहाँ श्रीचरण अंकित होते हैं और उसको रमण-आनन्द-रति प्राप्त होती है। यह तो वृन्दारण्यका अद्भुत भाग्य है कि वहाँ भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके निरावरण चरण हैं। यह भाग्य आजतक किसीको प्राप्त नहीं हुआ। द्वारकामें भगवान्‌का निवास था, वहाँ वे थे राजाधिराज। राजाधिराजके निरावरण चरणोंका स्पर्श भूमिको कैसे हो सकता है? तभी तो मथुराको भी मथुरानाथके चरणोंका स्पर्श नहीं। उसे यह सौभाग्य ही नहीं है। यह वृन्दारण्यको ही सौभाग्य है; क्योंकि यहाँपर गोचारणरूप स्वधर्मपालनार्थ प्रभु निरावरण चरण ही पधारे। भगवान्‌के चरणस्पर्शसे वृन्दावनकी भूमि सौभाग्यशालिनी हो गयी 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में कथा है कि एक बार श्रीकृष्णचन्द्र गोचारणार्थ वन जानेको मचल पड़े। प्रभुने कहा—'मैया, मैं तो गोचारणके लिये जाऊँगा।

११० भक्तिसुधा माता नन्दरानी यशोदा और बाबा नन्दराय तो अपने प्रभु कहते—'नहीं, गौ हमारी इष्टदेवी हैं। यदि ललनको एक क्षणके लिये भी अपनेसे वियुक्त होने निरावरण चरणसे ये जायेंगी तो हम कैसे पादत्राण देना नहीं चाहते थे। फणीको जैसे मणिसे लोकोत्तर धारण करें ? पशुपालन ही हमारा इष्टदेवताराधन है।' अनुराग होता है, वैसे नन्दराजको। हमारे ललन आराधनमें यही प्रकार होता है। दिलीप भी जब गोचारणके लिये जायँ, यह वियोग कैसे सहन हो ? नन्दिनीके साथ उसकी सेवा करने वनमें गये, तब इसी रात्रिमें जब व्रजगेहिनी अपने ललनको अंकमें लेकर तरह-से गये। सोती तो बीच-बीचमें जागती, बार-बार अपने ललनको स्थितः स्थितामुच्चलितः प्रयातां स्पर्श करती। जैसे किसी महारंकको चिन्तामणि मिले निषेदुषीमासनबन्धधीरः । और वह उसे बार-बार सम्हाले, वैसे ही व्रजेन्द्रगेहिनीका जलाभिलाषी जलमाददानां प्रभुमें अद्भुत अनुराग था, जिससे वह बार-बार चुम्बन छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् ॥ करती, मस्तक सूँघती। वही श्रीकृष्ण गोवत्सचारणके (रघुवंश २।६) लिये जानेको मचले। फिर तो यह श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने तो धर्मसंस्थापनार्थ नटखटकी मचल। मैया कहती—'न जाओ लाला!' अवतार लिया है—'यदा यदा हि धर्मस्य' (गीता लाला कहते—'नहीं मैया, मैं तो जाऊँगा। यह ४।७) ऐसा भगवान्‌का ही वचन है। स्वयं आचरणद्वारा गोचारणरूप अपना स्वधर्म है। उसका पालन करना धर्म स्थित होता है। इसीलिये गोचारणद्वारा स्वधर्म- ही चाहिये।' आखिर जब श्यामसुन्दर न माने तो स्थापन किया। भगवान् गौओंकी खूब सेवा करते हुए कहा—'अच्छा लाला, ठीक मुहूर्त मिले तो जाना। मैं चलते हैं। इसीलिये निरावरण-चरण चले। अतएव गर्गमहाराजसे पूछूँगी।' भगवान्‌की इच्छा होनेपर क्या वृन्दारण्यको साक्षात् चरणस्पर्श हुआ, इतरोंको परम्परया। देर! उसी समय श्रीगर्गाचार्यजी आ गये। प्रभुको देख, अन्य किसी धामको भी कृष्णके निरावरण चरणोंका पूछा—'आज क्यों लाला मचला हुआ है?' नन्दरानीने स्पर्श नहीं हुआ। इसीलिये जो अन्यत्र सेव्या श्रीलक्ष्मी, कहा—'महाराज! लाला कहता है, मैं गोचारणके वह भी यहाँपर सेविका होकर रहती है एवं चरणसम्बद्ध लिये वृन्दावन जाऊँगा, सो आप मुहूर्त बताओ।' वृन्दावनके सम्बन्धसे ही समस्त भूमिने अपनेको गर्गाचार्यने भी पत्रा देखकर बतलाया—'ठीक तो है। सौभाग्यशालिनी समझा। इसलिये कि प्रभु हमारेमें ही यह गोपाष्टमी बड़ा अच्छा दिन है। उसी दिन मुहूर्त हैं, भूमि गर्वीली हो गयी। करो।' गर्गाचार्यका वचन सुनकर श्रीकृष्णचन्द्र परम ब्रजांगनाओंने भूमिको देखकर पूछा कि 'हे प्रसन्न हुए। गोपाष्टमी आयी। उस दिन विधि- धरित्री, तुमने कौन-सा तप किया कि श्रीकृष्णचन्द्र विधानपूर्वक गोपूजन हुआ। अम्बाने श्रीकृष्णसे गौओंको परमानन्दकन्दके निरावरण चरणोंका तुम्हें स्पर्श हुआ!' साष्टांग प्रणाम कराया। प्रभु अपने अम्बा, बाबाको किं ते तपः क्षिति कृतं बत केशवाङ्घ्रि- प्रणामकर वृन्दारण्य पधारने निकले। अब अम्बा बार- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । बार गोपालोंको समझाती, कहती कि 'देखो, हमारे अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा लालाकी रक्षा करना; उसे अकेले कहीं न जाने देना।' आहो वराहवपुषः परिम्भणेन ॥ श्रीकृष्णका श्रीहस्तारविन्द गोपालोंके हाथमें देती। हे सखि धरित्रि! कौन योग, कौन-सी आराधना इस तरह कहते-कहते मैया-बाबा साथ-साथ चलते तुमने की, जिससे तुम्हें श्यामसुन्दर केशवके श्रीचरणोंका हैं, यह देख श्यामसुन्दर कहते हैं—'मैया, जाऊँगा स्पर्श हुआ ? बताओ तो हम भी वही करें। यदि मैया।' बाबाने कहा—'लाला पादत्राण तो पहनो!' तुम्हारी तपस्या जान लें तो युग-युगमें वही करें कि

कल्पकल्पान्तरमें कभी-न-कभी वह चरण हमें प्राप्त हो। धरित्रीने पूछा—तुमने हमारे इस सौभाग्यकी कल्पना कैसे की? व्रजांगनाने कहा—श्रीश्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनके श्रीचरणारविन्दके स्पर्शसे होनेवाला उत्सव हम देख रही हैं। आनन्दोद्रेकसे आह्लादमें रोमांच होता है। कार्यसे ही कारणका अनुमान किया जाता है। यह चरणस्पर्शका ही फल है कि तुम्हारे रोएँ खड़े हो रहे हैं। भूमिपर जो वृक्ष, लता, तरु, गुल्म, औषधियाँ, दूर्वाएँ हैं, वही रोमांच है। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दके चरणसंस्पर्शसे ही ऐसा आनन्द हो सकता है। धरित्रीने कहा—यह रोमांचरूप लतादि क्या आजहीके हैं? नहीं, ये तो कितने ही दिनोंके हैं। व्रजांगनाओंने कहा—अबके नहीं; न सही। जब भगवान् वामनने अपने चरणोंसे तीनों लोकको नापा था, उस समय उन मंगलमय चरणारविन्दोंके स्पर्शसे यह रोमावली उद्गत हुई होगी। आखिर कारण क्या? कुछ भी कहो, उनके चरणस्पर्शके बिना यह रोमांच नहीं हो सकता। ऐसा आह्लाद अन्यत्र कहीं नहीं होता। धरित्रीने फिर कहा—नहीं, ये और पहलेके हैं। क्या वामनावतारके पहले वृक्ष- लतादि रोमांचित नहीं थे? व्रजांगनाओंने कहा— 'आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) सखि, तबके भले हो-न-हों, पर जब हमारे प्रियतम प्राणधनने वराहावतार लेकर रसातलसे तुम्हारा उद्धार करते समय परिरम्भण किया, उस समयसे यह रोमावली होगी। यह रोमोद्गम ब्राह्मीरस-संस्पर्शसे ही हो सकता है। इसलिये अब नहीं तो वामनावतारमें, तब नहीं तो वाराहावतारमें ही सही। सखि धरित्रि ! छिपाओ मत, बतलाओ, बतलाओ, हम भी तुम्हारी ही तरह तपस्या करें। इसी कारण वृन्दारण्यके संस्पर्शसे सब भूमि रोमांचित हो गयी। भूमि अपने सौभाग्यपर गर्वीली होकर इठलाती है। जैसे 'बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई ॥', वही बात यहाँ भूमिके पक्षमें भी है। विन्ध्याचलके एक देश चित्रकूटका श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रने चरणसे स्पर्श किया। वहाँपर तपस्वीवेशसे भगवान्ने निवास किया। इतनेसे ही विन्ध्यने बड़ाई पायी। एक दिन देवर्षि नारद उसके यहाँ पधारे। कहा—तुम तो बहुत पुराने हो, लेकिन सब लोग मेरुको बड़ा समझते हैं। यह कुछ अटपट-सी बात मालूम होती है। विन्ध्यने सोचा—मेरुकी सूर्य प्रदक्षिणा करते हैं, इसीसे उसे लोग बड़ा समझते हैं तो वही बन्द कर दिया जाय। बस, विन्ध्य बढ़ने लगे। सूर्यभगवान्‌का मार्ग बन्द हो गया। सब धर्म, कर्म, उपासना, अग्निहोत्रानुष्ठान बन्द हो गये। सूर्योदय हो नहीं तो कुछ हो कैसे ? तब सब देवता, ऋषि संत्रस्त होकर अगस्त्यऋषिकी प्रार्थना करने काशीमें आये। ऋषिकी प्रार्थनाकर उन्हींको भेजा। विन्ध्यपर्वत अगस्त्यका शिष्य था। उन्हें देखकर उसने खर्वरूप धारण किया, प्रणाम किया। अगस्त्य प्रसन्न होकर बोले—'जबतक मैं उधरसे नहीं लौटता, तबतक ऐसे ही पड़े रहो। अगस्त्य दक्षिण समुद्रपर चले गये और विन्ध्य जैसा-का-तैसा पड़ा रहा। फिर श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रने जब चित्रकूटपर निवास किया, तब विन्ध्यने पुनः बिना श्रम उत्कर्ष पाया। उसके शत्रु भी उसकी महिमा गाने लगे। तात्पर्य यह कि भगवान्‌के मंगलमय श्रीचरणोंके स्पर्शसे वृन्दारण्य ही नहीं, समस्त भूमण्डल सौभाग्ययुक्त हुआ।' किंवा 'स्वपदयोः रमणं रतिजनकं—स्वपद- रमणम्।' भगवान्‌के मंगलमय श्रीचरणारविन्दोंको आनन्द देनेवाला। अर्थात् अतिरम्य भूमि, सुकोमल वालुका, श्यामल-श्वेत दूर्वाएँ एवं अद्भुत, अभिनव पत्र, पुष्प, पल्लवोंसे वृन्दारण्यभूमि सुशोभित है। जहाँ श्रीकृष्णके चरणारविन्द जायँ, वहाँ कठोरता न मालूम पड़े, अतः वृन्दारण्यने अपनेको सजा रखा। प्रभुचरणोंमें कहीं आघात न लगे। ऐसे वृन्दारण्यधाममें भगवान् पधारे। जहाँ-जहाँ प्रभुके श्रीचरणारविन्दका विन्यास होता है, वहाँ-वहाँ वृन्दारण्य अपने हृदयकमलको विकसित करता है। भगवान्‌के चरणारविन्द वृन्दारण्यके

११२ भक्तिसुधा हृदयपर ही विन्यस्त होते हैं। व्रजांगनाएँ इसका बड़ा संताप करती हैं कि प्रभुके चरण अत्यन्त सुकोमल हैं, उन्हें वृन्दारण्यके दूर्वा, कुश-कण्टक गड़ते होंगे। अलौकिक प्रतीति चाहिये ही। व्रजांगनाओंको यह बात सदा खटकती ही रहती है कि श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें कण्टकादि कहीं गड़ न जायँ— यत्तै सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।१९) हे श्यामसुन्दर, व्रजेन्द्रनन्दन, मनमोहन! आपके श्रीचरण सुजात, सद्योजात, सुकोमल कमलसे भी शतकोटिगुणित कोमल हैं। उनको अपने हृदयपर हम ताप-पापशान्त्यर्थ धारण करती हैं, पर संकुचित होती हैं कि चरण सुकोमल हैं, हमारे हृदय कठोर हैं, अतः कठोर हृदयके सम्पर्कसे चरणोंमें कहीं आघात न लगे। इसलिये भयभीत होकर कर्कश हृदयपर—वक्षोजपर मनमोहन श्रीकृष्णके चरणारविन्द धारण करती हैं, उसीसे आप अटवीका अटन करते हैं, वनमें विहरण करते हैं! क्या वहाँ वृन्दारण्यके जो दूर्वा, लता-गुल्म, तृण, अंकुर, कण्टक हैं, उनसे आपके सुकोमल चरण व्यथित नहीं होते? हा! क्या कहें, श्रीश्यामसुन्दरको इतना कष्ट और हम अभी भी जीवित हैं! इसी भावसे उनकी निष्कामता प्रकट होती है। यहाँ स्वसुखसुखित्व नहीं, तत्सुखसुखित्व है। इससे श्यामसुन्दरके सुखमें सुखिनी होना कहा गया। पिता जब अपने बालकका मुख चुम्बन करने लगता है, तब बालकको उसकी दाढ़ी-मूँछें गड़ती हैं, बालकको वे अच्छी नहीं लगतीं, वह रोता है, पर पिता अपने रसमें बालकके रोनेकी परवाह नहीं करता। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' यही सिद्धान्त है। पत्नी, पति, पुत्र इत्यादि उनके लिये प्यारे नहीं, अपने लिये प्यारे लगते हैं—'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) पिता बालककी तरफ ध्यान नहीं रखता, चुम्बनकी बौछार लगा देता है। रागका होना स्वाभाविक था, व्रजांगनाएँ चरणोंका पूर्ण आलिंगन करतीं, किन्तु उनका हृदय डरता है कि प्रभुचरण कोमल-से-कोमल हैं और हमारा हृदयप्रदेश अतिकठोर है। यहाँपर चरणोंको पीड़ा होगी, यही ध्यान है। अपने सुखपर ध्यान नहीं। प्राप्त यही था कि चरणोंका गाढ़ आलिंगन करतीं, परंतु वे रागोद्रेकको दबा देती हैं। जो कुछ हो, उन्हें अपनी परवाह नहीं है। यह भाव कहीं साधारण कामिनीमें हो सकता है? इसलिये कहा है कि 'प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्' गोपांगनाओंको काम नहीं था, किंतु उनका प्रेम ही काम शब्दसे प्रख्यात हुआ था। इस दृष्टिसे व्रजांगनाएँ कहती हैं कि श्रीचरणोंको कष्ट होते हुए देखकर भी क्या हम जीवित रह सकती हैं? हाँ! हमारे जीवनका कारण यह है कि ब्रह्माने शरीर-निर्माणकर हमें प्रदान किया, पर आयु आपके हाथ दी, नहीं तो अबतक कभीकी मर जातीं, किंतु आपके दर्शनकी लालसासे ये नेत्र मरने नहीं देते। 'भवानेव आयुर्यासां तासां भवदायुषाम्।' यह व्रजांगनाओंकी भावना है। वास्तवमें वृन्दावन नीरस नहीं, क्योंकि 'स भगवान् कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिम्नि' के अनुसार यह उनका स्वरूप ही है। वृन्दारण्यको मनमोहनके चरणकी कोमलता, चरणकी सरसताका ध्यान था। इसलिये वह चरणोंके नीचे अपना हृदयकमल विकसित करता था। वैसे तो उनके चरणस्पर्शसे महान् कठोरोंकी कठोरता भी दूर होती है। वज्र भी मक्खनके सदृश सुकोमल हो जाता है। जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी॥ (रा०च०मा० २।२६२।८) सिंहिनीको भी पुत्रमें राग होता है, पर सर्पिणीको नहीं। इसीसे इसको निर्दय, पुत्रभक्षिका, पुत्रादिनी कहते हैं। डाइनको भी पुत्रमें राग होता है, पर इसको नहीं। परंतु ऐसी सर्पिणी एवं वृश्चिकी भी भगवान्‌के चरणोंका दर्शनकर अपने सहज तामस भाव तथा

तीक्ष्ण विषको छोड़ देते हैं, निर्विष, शान्त, सात्त्विक हो जाते हैं। फिर वृन्दारण्यके दूर्वा, लता, कण्टक कोमल हो जायँ, इसमें आश्चर्य ही क्या? वह तो वस्तु ही ऐसी है। 'वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) वृन्दाके आख्यानका रहस्य भगवान्‌के चरणोंको आनन्द देनेवाला, व्रजांगनाओंको 'घबड़ाओ मत ! प्रभुके चरणोंको कष्ट नहीं होगा'—ऐसा आश्वासन देनेवाला जो वृन्दारण्य धाम, उसमें गोपवृन्दोंके संग गीतकीर्ति भगवान् पधारे। यह वृन्दाका अरण्य है। वृन्दा याने तुलसी। पहले जो वृन्दा जालन्धर दैत्यकी पत्नी थी, उसका अरण्य। तात्पर्य यह कि जो दैत्यभोग्या वृन्दा थी, वह अब भगवदीया—भगवान्‌की वस्तु हो गयी। यह वृन्दा—तुलसी लक्ष्मी, वृषभानुनन्दिनीकी तरह गोलोक- धाममें रहनेवाली भगवदीया दिव्य महाशक्ति थी, किंतु किसी प्रकारके दुर्दैवसे भगवान्‌की महाशक्ति भगवद्भोग्या होती हुई भी दैत्यभोग्या हो गयी और महाराजनी हुई। अरुचिपुरःसर जालन्धर दैत्यके प्रति रागिणी हो उठी। फिर पूर्णतम, पुरुषोत्तम, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने अपनी अनुकम्पा-विशेषसे दैत्यका वधकर वृन्दाको स्वीकार किया। कथा ऐसी है कि— जालन्धरसे श्रीशिवका संग्राम हो रहा था। उसकी पत्नी पतिव्रता वृन्दा थी। जबतक उसका पातिव्रत्य भंग न हो, तबतक जालन्धरका वध नहीं हो सकता था। इसलिये श्रीमहाविष्णुने जालन्धरका वेश धारण किया और वृन्दाके घरमें जाकर जब उसका पातिव्रत्य भंग किया, तब वह दैत्य मरा। यह ऊपरी भाव जरा टेढ़ा है। लोग कहेंगे कि श्रीमहाविष्णुने ऐसा कैसे किया ? परंतु अन्तरंग भाव कुछ और है। धर्माधर्मके विचारमें उनका गौरव-लाघव देखा जाता है। जालन्धर स्वयं पातिव्रत्य नहीं मानता था, वेदोक्त मर्यादाको विघटित करता था। फिर जो सर्वधार्मिक मर्यादाओंका व्यापादक है, वह पातिव्रत्य क्या जानता? ऐसे सर्वधर्मनाशक जालन्धरका नाश करनेके लिये किंचित् धर्म-व्यत्यय भी करना हो तो वह सह्य है। एक सत्यसे दस हजार गो-ब्राह्मणोंका वध होता हो तो उससे क्या लाभ ? वहाँ तो झूठ ही बोले। वहाँ सत्यभाषण मिथ्याधर्म है। यदि हमारे सत्यसे अपरिमित धर्मकी हानि होती हो तो उसकी महिमा नहीं है। अर्जुनकी प्रतिज्ञा थी कि हमारे गाण्डीव धनुषकी जो निन्दा करेगा उसका सिर उतार लूँगा। एक बार प्रसंग ऐसा आया कि कर्णसे युद्धमें विह्वल हुए धर्मराजने ही गाण्डीवकी निन्दा कर दी। सुनकर अर्जुनने सोचा—मैं क्षत्रिय हूँ, मेरी प्रतिज्ञा सुदृढ़ है। युधिष्ठिरको मारनेके लिये अर्जुनने तलवार निकाल ली। भगवान् श्रीकृष्ण बीचमें पड़े और अर्जुनसे कहा—'अरे ! तू धर्म जानता भी है ? परमाराध्य ज्येष्ठ भ्राता धर्मराज क्या तेरे वध्य हैं ? प्रतिज्ञापालनके लिये उनको 'युष्मत्' शब्दसे सम्बोधित कर—यही बड़ोंका वध है।' अर्जुन समझ गया, उसने धर्मराजके लिये 'तुम', 'तुम' शब्दका कई बार प्रयोग किया। इतनेसे युधिष्ठिर उद्विग्न हो गये। यह देखकर अर्जुन कहने लगा—'अब मैं आत्महत्या करूँगा, मैंने धर्मराजके लिये 'त्वं' पदका प्रयोग किया।' कृष्णने कहा— 'पागल है, तू अपनी बड़ाई-आत्मश्लाघा कर, यही अपना वध है। फिर अपनी बड़ाई अर्जुनने खूब गायी। इस तरह भगवान्‌ने चातुर्यसे पाण्डवोंकी नैयाको पार लगाया। इसीलिये कहा है कि 'कैवर्तकः केशवः'। अतः धर्माधर्मका गौरव-लाघव सोचना चाहिये। यदि सर्वधर्मका शत्रु जालन्धर अन्य उपायोंसे नहीं मरता, तब एक धर्मको विघटितकर अनन्त धर्मका संगठन करना नैतिक ही है।' दूसरी दृष्टिसे देखें तो वास्तवमें वहाँ पातिव्रत्य भंग ही नहीं हुआ, क्योंकि विष्णु वृन्दाके परम पति थे। वस्तुतः पातिव्रत्य धर्मसे भी विष्णुसम्बन्धको ही तो प्राप्त करना है। सारांश यह निकला कि पहले वृन्दा भगवदीया ही थी, गोलोक-धाम-निवासिनी थी, दुर्दैववशात् जालन्धरभोग्या हो गयी थी। यह वृन्दा प्राणियोंकी बुद्धि है, वास्तवमें इसका सम्बन्ध मुख्य

साक्षीसे ही होना चाहिये। इसलिये बुद्धिका पूर्णतम पुरुषोत्तमाकाराकारित होना, यही स्वाभाविक सफलता है। दुर्दैव यह है कि वह जगदाकाराकारित हो रही है। जीवोंको बुद्धि मिली है भगवत्प्राप्तिके लिये, सांसारिक निर्णयोंके लिये नहीं। इसलिये इसकी परम सफलता इसीमें है कि भगवत्सम्बन्ध सुस्थिर हो, वहाँ भगवदभिव्यक्ति हो। यह प्रभुकी महान् कृपा है कि दैत्य-सम्बन्ध छुड़ाकर उस दैत्यभोग्या वृन्दाको भगवद्भोग्या बनायें। यही स्थिति संसारमें भी है। बुद्धियोंपर शैतानका अधिकार है या भगवान्‌का ? साधारण बुद्धि शैतानभोग्या हो गयी है, तभी तो वह पाप, ताप, दम्भोंमें लगायी जाती है। उसका फल ही है नाना योनियोंमें भटकते रहना। वास्तवमें घट उत्पन्न होते ही आकाशसे परिपूरित हो जाता है; जल, दुग्ध या मृत्तिकासे पीछे परिपूरित होता है। इसी तरह बुद्धि उत्पन्न होते ही आकाशोपम परमात्मासे ही भरपूर हुई, इसमें प्रपंच जो भरा है वह आगन्तुक है। तथापि बुद्धि इस प्रपंचकी पतिव्रता हो गयी है। एक क्षणके लिये भी उसमेंसे प्रपंच नहीं निकलता। यही बुद्धिका दृश्यमें राग, प्रीति, पातिव्रत्य हठ हो गया। अब पूर्णतम, पुरुषोत्तम ही कृपा करें, हठात् यदि दैत्यसम्बन्ध छुड़ायें तभी कुछ हो, वह स्वयं तो निवृत्त होती नहीं। इसी बुद्धिके बलसे ही यह दैत्य संसारमें अनेक अनर्थ बढ़ा रहा है। कौन इस दैत्यका वध करे ? सब देवाधिदेव परेशान हैं। जब प्रभु बलात् इस दैत्यके संसर्गको छुड़ायें, नकली पातिव्रत्य बिगाड़ें तभी कल्याण हो। असली पति भगवान् ही हैं; क्योंकि शुरूमें वह बुद्धि भगवदाकाराकारित होकर पीछे सर्वाकाराकारित होती है। यही कथा वहाँ हुई। गोलोकनिवासिनी वृन्दाको शाप हुआ। जालन्धर भी गोलोकनिवासी गोप था, वह दैत्य हुआ, उसकी यह पत्नी हुई। उसका यह सम्बन्ध आगन्तुक था, इसलिये रुद्रादिके लाचार होनेपर छलसे दैत्य सम्बन्ध छुड़ाकर स्वकीयाको स्वीकार किया गया। ऐसे ही इस बुद्धिका शैतानसे संसर्ग छुड़ाकर प्रभु अपना संसर्ग स्थापित करें, बुद्धिके सर्वाकारको छुड़ाकर उसमें अपना आकार स्थापित करें, तभी तो आनन्द होगा, स्वातन्त्र्य होगा। उस वृन्दाका अरण्य ही वृन्दारण्य है। अथवा— 'वृन्दायाः वनं यौवनं वृन्दावनम्।' वृन्दाका यह यौवन है अर्थात् यह वृन्दावन वृन्दाका देदीप्यमान स्वरूप ही है। वृन्दाकी स्थिति है, हर स्थितिमें श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंसे सुशोभित होना। जहाँ प्रभु शालग्राममें विराजमान हों, वहाँ वह तुलसीरूपमें सेवा करती है। जब प्रियतम, प्राणधन, पूर्णतम, पुरुषोत्तम- रूपमें प्रभुने व्रजमें अवतार लिया, तब वह यहाँ वृन्दावनमें प्रकट हुई। यहाँ जो यमुना है, वह वृन्दाके हृदयकी प्रेमानन्दरससरिता, जो तरु हैं वे रोमांच और भूमि ही देह है। इसलिये व्रजांगनाएँ ईर्ष्या करती हैं कि सखि ! देखो, मनमोहन श्यामसुन्दर वृन्दारण्यमें पधारे हैं। यहाँ सब विपरीत-ही-विपरीत हो रहा है। हमारी अधरसुधाका वे कितना दुरुपयोग करते हैं। सखि ! जड़, सच्छिद्र शुष्क बाँसके छिद्रोंमें उसे भरते हैं। हम चाहती हैं, हमारे हृदयमें उनके चरणारविन्द स्थापित हों, पर नहीं, वे वृन्दारण्यमें प्रथम पधारे। अथवा 'स्वपदरमणं स्वस्याः आत्मीयायाः वृषभानुनन्दिन्याः पदैः रमणम्।' अर्थात् श्रीवृषभानु- नन्दिनीके मंगलमय चरणारविन्दोंसे सुशोभित वृन्दारण्यमें श्रीकृष्ण पधारे। रासलीलादिमें वृषभानुनन्दिनीका आगमन वहाँ होता है, इसलिये उनके चरणोंसे भूषित अरण्यमें पधारे। उद्दीपनविशेष सिद्ध हुआ। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी अन्तरंग प्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनीके चरणसे अंकित वृन्दारण्य देखकर प्रसन्नता हुई। इसलिये कहा गया 'प्राविशत्' अर्थात् वृन्दारण्यमें प्रविष्ट हुए। क्या करते हुए प्रवेश किया ? 'रन्ध्रान् वेणोरधर- सुधया पूरयन्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) यहाँ 'वेणोः' पुंस्त्व सूचित किया। वेणु पुमान् है अर्थात् पुमान् वेणुके छिद्रोंमें अधरसुधाको पूरित करते हुए भगवान् पधारे। दूसरी दृष्टि यह है कि वेणुछिद्रोंमें

अधरसुधाका सन्निवेशकर, भगवद्भोग्या अधरसुधाको व्रजांगनाओंमें और देवभोग्याको खगादिकोंमें पहुँचाना है। इसके लिये वेणु केवल पात्र ही है। अधर- सुधाका रस वेणुको नहीं मिलता, इसीका उपपादन है। जब भगवान्‌के अधरसुधासे पाषाण भी द्रवित हुए, तब वेणु क्यों न सुधरी ? उसमें हरापन क्यों न आया ? वह ज्यों-का-त्यों क्यों रहा ? इसका कारण यही है कि वह केवल पात्रमात्र रही, उसको कुछ मिला नहीं। अन्य दृष्टिसे कहें तो वेणु बड़ी चतुर भगवान्‌की प्रिय सखी है। वह वेणुरूपमें अपने- आपको छिपाकर पुमान्रूपमें अभिव्यक्त होकर श्यामसुन्दरके अधरपर विराजित होकर उसकी मधुर सुधाका पान करती है। वह इसलिये वेणु बनी कि कोई उससे ईर्ष्या न करे, कोई न जाने कि यह श्यामसुन्दरका रसास्वादन करती है, नहीं तो कोई उसे चुरा लेगा। वृषभानुनन्दिनीने तो कई बार उसको चुराया भी था। अतः वह वंशी सग्रन्थि एवं शुष्क होकर रहती है; क्योंकि वह चतुरा है। ऊँची कोटिके रसिक अपने रसको प्रकट नहीं करते। रोयेंगे तो भी भीतर-ही-भीतर, बाहर नहीं। इस तरह वेणु बड़े धैर्यसे रसास्वादन करती हुई भी अपनेको शुष्क बनाये रखती है। सोचती है कि यदि मुझमें हरे-हरे पल्लव निकल आये तो श्यामसुन्दर हमें छोड़ देंगे। कहेंगे कि यह हमारे कामकी नहीं रही। जिस रसाभिव्यक्तिमें श्यामसुन्दर उसे छोड़ दें, वह रस किस कामका ? माना कि यदि वेणु श्यामसुन्दरके अमृतमय मुखचन्द्रपर आसीन होकर अधरसुधारसास्वादनसे प्रफुल्लित हो गयी, तब तो वह बजेगी ही नहीं। अधर-पल्लवपर लिटाना, सुधाका स्वाद देना, यह सब तबतक ही, जबतक वह सरस न हो। इसलिये वह अपनेको सरस नहीं होने देती। जहाँ परम्परासे अधरसुधास्वादनसे पाषाण द्रुत हो गये, नदियाँ स्तब्ध एवं रोमांचित हो गयीं, वहाँ साक्षात् आस्वादन लेनेवाली वेणु सरस क्यों न हो ? इस चातुर्यका पता गोपियोंको लग गया। इसीलिये व्रजांगनाएँ आगे कहती हैं—‘गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।९) सखि! इस वेणुने कौन पुण्य किया है? कहीं ऐसा भी है—एक अवसरमें श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन जब श्रीराधाके गुणगानमें व्यग्र थे, उस समय भगवान्‌के मुखपंकजसे सरस्वती प्रकट हो गयी। जब उसने अनन्तकोटि कन्दर्पदर्पदलनपटीयान् स्वरूपको देखा, तब मुग्ध हो गयी और आलिंगन चाहा। श्रीकृष्णचन्द्रने कहा—'यदि मुझसे ऐसा परिरम्भण चाहती हो तो वृन्दावनमें वेणुरूपसे प्रकट हो।' जब वहाँ जाकर उसने घोर तप किया, बड़ी- बड़ी यातनाएँ सहन कीं, काटी गयी, छीली गयी, तपाकर सीधी की गयी, उसमें छिद्र किये गये, तब वह श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मुखचन्द्रपर विराजमान हुई। अब प्रभु उसको अपने अधरपर्यंकपर लिटाकर, मुकुटका छत्र धरकर, कुण्डलोंसे आरतीकर, अधरसुधाका भोग लगाकर, अपने कोमल अंगुलिदलोंसे उसका पादसंवाहन करते हैं। उसपर बड़े प्रसन्न हैं। इस प्रकार वेणुको सुधारससे पूरित करते हुए भगवान् श्रीवृन्दावनधाममें पधारे। इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम्। श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।६) वेणुछिद्रोंमें प्रविष्ट होकर भगवान्‌की अधरसुधा ही ‘बर्हापीडं' इस श्लोकके रूपमें व्यक्त हुई। इसमें उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस है। जब कहा कि— 'नाशकन् स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप ॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।४) अर्थात् स्मरवेगसे विक्षिप्तमनस्क होनेसे व्रजांगनाएँ उसके वर्णनमें असमर्थ हुईं। जब 'नाशकन्', वर्णन न कर सकीं, तब यह वर्णन कैसा ? इसका समाधान यह है कि परम अन्तरंग वक्ता श्रीशुक प्रायः व्रजांगनाओंमें तन्मय होकर लीलाका वर्णन करते हैं। इसलिये जिस समय वे जिस लीलाका वर्णन करते थे, उस समय उस रसमें तन्मय हो जाते थे। इसलिये जब श्रीव्रजांगनाएँ श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मुखचन्द्रसे निर्गत वेणुरव—वेणुनादको श्रवण करतीं, तब उसके

११६ भक्तिसुधा वर्णनमें प्रयत्नशील होतीं। किंतु वेणुनाद महा-मोहनमन्त्र है, उससे वे मूर्च्छित हो जातीं। कथंचित् भगवत्कृपासे लब्धावस्थिति होकर पुनः वेणुगीत सुनती हैं। नाद तो नादमात्र है, गीतमें कुछ अर्थ होता है। अतः वेणुगीतार्थ श्रीकृष्ण व्रजांगनाओंके हृदयमें, अन्तःकरणमें, अन्तरात्मामें अभिव्यक्त होते हैं। फिर वे वर्णनकी चेष्टा करतीं और पुनः स्मरणसे मूर्च्छित होती हैं। पहले वेणुनादसे मूर्च्छित, फिर उसके उद्गमस्थान श्रीकृष्णचन्द्रके स्मरणसे मूर्च्छित, फिर गीतार्थानुभवसे मोहित होती हैं। अन्तमें जब वर्णन करना चाहतीं तो विक्षिप्तमनस्का होकर न कर सकतीं। उनकी इस अशक्तिको देखकर तन्मयावस्थाप्राप्त शुक ही स्वयं वर्णन करते हैं। इसमें हेतु यह कि यहाँ यह शुकवाक्य है। यदि गोपियोंका वर्णित होता तो 'गोप्य ऊचुः', ऐसा लिखते। वैसा न होनेसे स्पष्ट है कि लीलारसभावापन्न होकर गोपांगनाभावापन्न श्रीशुक स्वयं कहते हैं- 'इति वेणुरवं राजन्', दूसरा भाव यह है कि राजाको सम्बोधितकर शुकदेव कहते हैं कि व्रजांगनाओंके मनमें क्षोभ क्यों हुआ ? श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दका यादृश स्वरूप अभिव्यक्त होकर क्षोभकारक हुआ, वह है- 'बर्हापीडं' इत्यादि। ऐसे उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूपका हृदयमें अनुभव करनेसे उनका हृदय स्मरवेगसे क्षुब्ध हुआ। अतः कहा गया है- 'यादृशं स्वरूपं मनःक्षोभकरं जातं तादृशमाह- बर्हापीडमिति।' इसीलिये भावुक कहते हैं कि श्रीशुक अन्तर्लीला-निविष्ट हैं, साक्षात् श्रीवृषभानुनन्दिनीके नित्यनिकुंजमें रहनेवाले हैं। उन्हींका यह अवतारविशेष है, जिनको श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्णका नाम पढ़ाती हैं और श्रीकृष्ण भी जिनको वृषभानुनन्दिनीका नाम पढ़ाते हैं। अतः ये लीलारसका प्रत्यक्ष आस्वादन करते हुए वर्णन करते थे। फिर भी उन्होंने अधिकारानुसार ही गुप्त शब्दोंमें वर्णन किया- 'इति वेणुरवम्।' यहाँ 'र' से अग्निबीज विप्रयोगात्मक शृंगार और 'व' से अमृतबीज संयोगात्मक शृंगार विवक्षित है। वह 'सर्वभूतमनोहरम्' है। श्रीजीवगोस्वामी कहते हैं कि यहाँ भूतपदसे चेतनाचेतन, स्थावर- जंगम सब लेना और मनोहर पदकी लक्षणा विकारकारी अर्थमें करनी चाहिये। वेणुरव-श्रवणका प्रभाव इस वेणुरवने सर्वप्राणिमात्र, चेतनाचेतनोंमें विकार उत्पन्न कर दिया। कहा है कि 'अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणाम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) जो गतिमान् थे, वे निश्चल हो गये, यमुनाका प्रवाह रुक गया, पर्वत-पाषाण द्रवित होकर बह चले। इसलिये यह मनोहर पद विकारकारीमें पर्यवसायी है। अतः स्थावर-जंगम सब क्षुब्ध हो उठे- 'श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वाः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।६) अन्य जगह क्षोभ तो हुआ ही, पर अधिक श्रीव्रजांगनाओंमें हुआ। वहाँ उसने अपना अत्यन्त पराक्रम व्यक्त किया। जहाँ चेतनाचेतनोंतक क्षोभ पहुँचा, फिर व्रजके लोगोंकी क्या कही जाय ? एक तो सबके मनको हरनेवाला, फिर जो प्रेमका प्रधानस्थान, वहाँ उसके प्रभावका कहना ही क्या है ? भक्ति वृद्धा होकर सर्वत्र घूमती हुई जहाँ आकर युवती हो गयी, जो भक्तिका परम दिव्य क्षेत्र है—चाहे ऊपरसे वह भले ही नीरस भूमि मालूम हो, पर अन्तरंग रूपसे अत्यन्त स्निग्ध और सरस है, उस व्रजके मनुष्य, उनमें भी स्त्रियाँ, जिनका हृदय अत्यन्त कोमल होता है और उनमें भी श्रीव्रजांगनाएँ, जिन्होंने उस मनोहर वेणुरवका श्रवण किया; उन कान्तभाववती और सख्यभाववती सौभाग्यवतियोंपर उसका विशेष प्रभाव पड़ा। किनपर प्रभाव पड़ा ? सबपर— 'सर्वाः।' इस पदसे नित्या, साधनसिद्धा आदि पूर्णतम, पुरुषोत्तम, परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण नित्य हैं, उनकी माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी नित्या तथा उसकी अंशभूता व्रजांगनाएँ भी 'नित्या' हैं। सदा गोलोकधाममें परमानन्दकन्द भगवान् विराजते हैं। वहीं श्रीवृषभानुनन्दिनी और वहीं अन्तरंगा अंशभूता व्रजांगनाएँ भी विराजती हैं। साधनसिद्धामें दो भेद हैं—श्रुतिरूपा और ऋषिरूपा। यह कहा गया है कि 'अद्यापि यत्पदरजः