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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

८८ भक्तिसुधा

यतीन्द्रोंका निर्मल चित्त पकड़नेमें समर्थ न हुआ, उसी पूर्णतम पुरुषोत्तम अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक निखिल- रसामृतमूर्ति प्रभुको नन्दगेहिनी 'लाला आज तो तुझे बता दूँगी' कहकर पकड़ना चाहती है। किसी तरह प्रभु पकड़में आयें। यशोदा कहती— 'लाला तू बड़ा लंगर हो गया है, मैं आज तेरा सब लंगरपन भुला दूँगी।' कुन्ती कहती— नाथ! इतना कहकर जब यशोदामैयाने रज्जु ली, तब तो आपकी विचित्र दशा हुई। आपके नील-कमल-कोशसमान कपोलपर अंजनमिश्रित अश्रुबिन्दु बड़े ही सुशोभित मालूम पड़े, सिर नीचा किया हुआ, आँखें डबडबायी हुईं; अंजनमिश्रित अश्रु कपोलोंपर ऐसे शोभित होते हैं, जैसे नीलकमलके कोशोंपर मोती विराजमान हों। क्या शोभा कही जाय! आप डर रहे हैं। भयभीत होकर अपने मुखारविन्दको नीचा किये रोते हैं, जिनके डरसे डर भी डरे, जो कालकाल महाकालेश्वर महामृत्युंजय— यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ (कठोपनिषद् १।२।२५) —सकल प्रपंचको मृत्युरूप दाल-शाकके साथ मिलाकर जो खा जाय, वह व्रजगेहिनीकी छड़ीसे डरे। यह सब भाव जब अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायकता प्रकट होती, तब न रहता। एक जगह कहा है— 'मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम् ॥' (श्रीमद्भा० ५।६।१८) भगवान् भक्तोंको मुक्ति दे देते हैं, भक्ति जल्दी नहीं देते; क्योंकि भगवान्‌को भक्तिके भावबन्धनमें बँधकर परतन्त्र हो जाना पड़ता है, यहाँ स्वाभाविक प्रेम है। इसी कारण वृन्दारण्यमें ग्वालबालोंको, व्रजांगनाओंको विष्णु-शिव-तत्त्वात्मक परमात्मामें वैसी प्रीति न होती, वैसी उत्कण्ठा न होती, जैसी 'नटवरवपु' भगवान्‌में। कहीं एक ऐसी कथा सुनी है— भगवान् जब व्रजसे मथुरामें गये, तब गोपांगना विरहिणी होकर विलाप करने लगीं। किसीने कहा— 'मथुरा बहुत दूर थोड़ी है, तुम वहीं जाकर प्रभुसे मिल आओ'। व्रजांगनाओंने ऐसा विलाप किया कि उनके अश्रुसागरमें जग डूब जाय, लोगोंने बहुत कुछ कहा-सुना तो वहाँपर सब गयीं, भगवान्‌को द्वारपालके खबर देते ही प्रभुने कहा— 'आने दो'। व्रजांगनाएँ भीतर गयीं और श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दका ऐश्वर्य देखा, देखते ही चट सबने घूँघट काढ़ा, कहने लगीं— 'यह तो हमारे मनमोहन नहीं हैं; मुरलीमनोहर काली कमलीवाले नन्दलाल हमारे सर्वस्व हैं।' एक बारकी ऐसी कथा है कि कोई वासन्तिक रासोत्सव था। उसमें श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन भगवान् रासविलास कर रहे थे, इतनेमें भगवान् एक लताकी आड़में छिप गये, तब गोपांगनाएँ भगवान्‌को खोजतीं-पूछतीं डोल रही थीं। दैवात् वहाँ पहुँचीं, जहाँ भगवान् छिपे थे। इनको देखते ही प्रभुने चतुर्भुजरूप धारण किया, जब चतुर्भुजभगवान्‌को देखा तो भक्तिसे उनको केवल प्रणामकर कहा— 'भगवन् ! आप हमारे श्यामसुन्दर व्रजलालसे भेंट करा दो, उनसे हमें मिला दो।' भगवान्ने 'तथास्तु' कहा। वह चतुर्भुजसे बिलकुल न खिचीं, यही बात 'नटवरवपुः' में है। द्विभुज मोहन मुरलीधरमें जो प्रीति है, वह अन्यत्र नहीं। चतुर्भुजत्वादि भगवान्‌का ऐश्वर्यभाव है। उसका प्रभाव माधुर्यभावके प्राकट्यमें नहीं। इतना ही क्यों, जैसा सूर्यके सामने चन्द्रमाका प्रकाश नहीं, वैसा ही माधुर्यभावके विकासमें, माधुर्यभावके प्राखर्यमें ऐश्वर्यभावका प्रकाश नहीं, श्रीवृषभानुनन्दिनीमें माधुर्यभावका पूर्ण प्रकाश है। अस्तु, यहाँ जैसे कहा जा चुका है कि हो अलौकिक ही, पर प्रीति उसमें लौकिक दृष्टिसे हो, अलौकिकता उसकी छिपी हो, भगवान्‌ने व्रजमें तो बहुत ही साजात्य प्रकट किया। पहले नरत्वेन, पीछे गोपत्वेन, सगे-सम्बन्धीरूपसे। 'श्रीविष्णुपुराण' में कथा है—जब भगवान्‌ने गोवर्धनको उठाया, तब वह अद्भुत प्रभाव देखकर सब समझ गये कि यह गोप नहीं, गोपवेशधारी ईश्वर हैं। भगवान् समझे यह हमसे सन्देह करते हैं। बस, प्रभु रोने लगे, गोपालोंने देखा कन्हैया रो रहा है तो सब मनाने लगे कि 'क्यों

रोते हो लाला?' तब प्रभुने कहा 'इसलिये कि तुम हमें अपना नहीं समझते, अजनबी समझते हो।' प्रीतिमें अलौकिकता बिलकुल प्रकट न हो, सन्देह यत्किंचित् न हो। एक समय जब भगवान्ने मिट्टी खायी, तब बलदाऊने अम्बासे आकर कहा कि कन्हैयाने मिट्टी खायी। सुनकर वह चली मारनेको और प्रभुको पकड़कर कहा- 'लाला तूने मिट्टी क्यों खायी?' तो प्रभुने डरकर कहा- 'नाहं भक्षितवानम्ब'- मैया मैंने मिट्टी नहीं खायी। यह ऐश्वर्य दिखलानेके लिये नहीं, किंतु प्राकृत शिशुके समान अम्बासे डरकर। तब अम्बा कहती है- 'सब यही कहते हैं'। प्रभुने कहा- 'सब झूठे हैं', मैया बोली- 'बलराम भी तो कह रहे हैं।' भगवान्ने कहा- 'आज ग्वालबालोंने दाऊको मिला लिया है, इसीलिये वह भी झूठ बोल गये, अगर विश्वास न हो तो मुँह देख ले।' भाव यह कि मुँह दिखानेको तैयार हो जानेसे अम्बा समझ लेगी कि मिट्टी नहीं खायी है, अगर मिट्टी खायी होती तो मुँह दिखानेके लिये तैयार न होता, एक झूठ छिपानेके लिये दुगुनी-तिगुनी झूठ बोलनी पड़ती है, पर अम्बा भी बड़ी जबर। उसने कहा- 'मुँह खोल, देखूँ तो सही' सुनकर भगवान्ने मुँह खोल दिया। खोल क्या दिया, भावुक कहते हैं कि मातृकोपसूर्यरश्मिसे प्रभुमुखकमल खिल गया। जब खिला तो भीतर ब्रह्माण्ड! यह कैसा हुआ? इसका कारण यह कि भगवान्‌की ऐश्वर्याधिष्ठात्री महामाया प्रभुके पीछे- पीछे सेवाका अवसर ढूँढ़ती हुई घूम रही थी। माया कहती- 'भगवन्! लोग आपको बड़ा तंग करते हैं, यह मुझसे नहीं सहा जाता।' प्रभुने कहा- 'तू चुपचाप रहकर तमाशा देख, कुछ करनेके फेरमें न पड़' तथापि उसे न मानती हुई, जब माँ मुँहमें मिट्टी देखने लगी तो ऐश्वर्याधिष्ठात्री महाशक्तिने सोचा कि अगर माँ मिट्टीको देख लेगी तो मेरे प्रभुको पीटेगी, यह मेरे होते ठीक नहीं। इसीलिये उस ऐश्वर्याधिष्ठात्री शक्तिने मुँहमें ब्रह्माण्ड दिखाया। मैयाके हाथकी छड़ी गिर गयी। भगवान्ने सोचा, मामला बिगड़ रहा है। झट 'व्यतनोद् वैष्णवीं मायाम्', यशोदामैया आँख खोलकर देखते ही समझ गयी कि मेरे लालाको कुछ अलाय-बलाय है, तब उसके निवारणके लिये थूः थूः करने लगी। भगवान् मायाको कहते हैं- 'ले, तूने मुझे बचाया क्या, थू थू करा दिया।' अस्तु, यह सब भाव नटवरवपुमें ही सम्भव है। कहा है- 'मायाश्रितानां नरदारकेण साकं विजहुः कृतपुण्यपुञ्जाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।१२।११) इस तरह आगे 'बिभ्रत्' है। क्यों? 'एवं नटवरस्येव वपुः नटवरवपुः तादृशं बिभ्रत्।' पहले कहा गया कि भगवान् रसात्मा हैं तो भी रस अमूर्त होनेके कारण चल-फिर नहीं सकता, परम तत्त्व भी चलता-फिरता नहीं, उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग- विप्रयोग शृंगाररसात्मा एक अमूर्त पदार्थ है, रस वस्तु हृदयस्थ है, केवल अमूर्तरस वेणु न बजाता, न चलता, न फिरता, वह तो केवल वृषभानुनन्दिनीके हृदयमें है, इसीसे कहा- 'बिभ्रत्'। अमूर्तरस यहाँ मूर्त बना, इसलिये कि भावुक उसे सर्वेन्द्रिय-ग्राह्यरूपसे ले सकें। अमूर्तरस तो मनोग्राहामात्र है, वेदान्तमें परम वस्तुका आस्वाद मनोग्राहा ही कहा है- 'बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्', (गीता ६।२१) 'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते' अतः कहा उसमें सर्वेन्द्रियग्राह्यता नहीं, भावुकोंको तो मनोग्राहातामात्रसे सन्तोष नहीं, किंतु सर्वेन्द्रियोंमें, अन्तरात्मामें, अन्तःकरणमें, प्राणमें, रोम-रोममें उसका अनुभव हो, इन्हीं भावुकोंकी इच्छापूर्तिके लिये 'बिभ्रत्'। अमूर्त उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक शृंगाररसमूर्ति श्रीकृष्णचन्द्र- परमानन्दकन्दके रूपमें मूर्त होकर देखा जाय, जैसा रसका ही परिणाम शर्करादि, जैसे रसका ही निर्यास- गोंद, वैसे ही परमानन्दरसका निर्यास भगवान्, गोंद रसका ही घनीभाव होता है- आगे इसकी अभिव्यक्तिमें बड़ी ऊँचाई रखी है। यह मूर्त कैसे बना? अनाघातं भृङ्गैरनपहृतसौगन्ध्यमनिलैः अनुत्पन्नं नीरैस्खनुपहतमूर्मीकणभरैः ।

९० भक्तिसुधा अदृष्टं केनापि क्वचन च चिदानन्दरससो यशोदायाः क्रोडे कुवलयमिवौजस्तदभवत् ॥ 'नटवरवपुः बिभ्रत्'—से कहा गया कि उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोग शृंगाररस स्वयं अमूर्त होनेसे उसका गमनागमन न हो सकता—अतः 'बिभ्रत्'। है तो अमूर्त ही, पर भक्तानुग्रहविशेषात् उसीने नटवरवपु धारण किया, अमूर्तरस मूर्तरूपमें प्रकट हुआ, भक्त कहते हैं, वेदान्तियोंका ब्रह्म केवल मनोग्राह्य, बुद्धिग्राह्य है, सर्वेन्द्रियग्राह्य नहीं, पर वे तो चाहते हैं निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्‌को सर्वेन्द्रियग्राह्य बनाना, सर्व इन्द्रियाँ मन-बुद्धिसे ईर्ष्या करती हैं, उनको पूर्णतम पुरुषोत्तमका आस्वादन करते देख नेत्र, श्रोत्र, सर्व ही लालायित हो जाते हैं और क्या रोम- रोम अपने प्रियतम प्राणधनके संश्लेषके लिये उत्कण्ठित होता है, व्याकुल हो उठता है। भगवान्‌का सम्मिलन कौन न चाहेंगे? कहते हैं—'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्'। (कठ० २।१।१) स्वयम्भूने इन्द्रियोंको बहिर्मुख रचा। 'व्यतृणत्' में तृहु धातु हिंसार्थक है। स्वयम्भूने इन्द्रियोंको बनाया अर्थमें व्यरचयत् कहते हैं, हिंसितवान् क्यों? तो उसने उन्हें बहिर्मुख बनाकर मार डाला, उनको सर्व प्राणियोंके परमप्रेमास्पद भगवान्‌के रसास्वादसे वंचित किया। 'पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं', (रा०च०मा० २।६४।७) 'लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः' लोकमें ऐसा कोई नहीं है, जो प्राणेश्वरका वियोग सहन करे, जो इन्द्रियोंको बहिर्मुख न बनाया होता तो अन्तरात्माका आस्वादन करते। इसलिये स्पष्ट है कि सर्व इन्द्रियाँ भगवत्तत्त्वके अनुभव बिना, भगवद्दर्शन बिना, भगवान्‌के स्वरूपरसके आस्वादन बिना, भगवान्‌के मंगलमय श्रीअंगके संस्पर्श बिना, अपनेको अकृतार्थ हतभाग्य समझती हैं, वह अपना हिंसन समझती हैं, जैसे मति ब्रह्माकार होकर रसका आस्वादन करती है, वैसे हम भी करें। यह भाव आगे 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः' (श्रीमद्भा० १०।२१।७) इत्यादिमें और स्पष्ट होगा। वाल्मीकिने लिखा है— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा०रा० २।१७।१४) जिसने रामको स्नेहभरी दृष्टिसे नहीं देखा और जिसे रामने कृपादृष्टिसे नहीं देखा, वह सर्वलोकमें निन्दित है, उसकी अन्तरात्मा भी उसकी विगर्हा करती है। इसी प्रकार सर्व इन्द्रियोंकी निरर्थकता है कि जिनका भगवान्‌में उपयोग न हुआ हो, इसीलिये भक्तगण इतनेमें ही सन्तुष्ट नहीं कि वह उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक शृंगाररसात्मक शृंगाररसात्मा भगवान् केवल बुद्धिग्राह्य हो, वह तो उसका रोम-रोमसे, सर्वेन्द्रियोंसे संस्पर्श अवगाहन चाहते हैं—अतः उनके मनोवासनानुसार उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक तत्त्वने सर्वेन्द्रियग्राह्य होनेके लिये सर्व भावसे समास्वादन करा देनेके लिये नटवरवपु होकर वृन्दारण्यमें प्रवेश किया। 'बिभ्रत्''डुभृञ् धारणपोषणयोः'। इसके धारण-पोषण दोनों अर्थ हैं कि उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक भगवान् वेणुवादन करते हुए जो वृन्दारण्यमें पधारते हैं, वह कौन? तो श्रीवृषभानुनन्दिनीके हृदयकी वस्तु, भावुकोंके हृदयकी वस्तु, यानी भावुकोंका भाव ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके रूपमें प्रकट हुआ, एवं च भगवान् भक्तमनोभावनामय हैं। 'स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य', (श्रीमद्भा० १०।१४।२) स्व-स्वीया तेषाम् इच्छा स्वेच्छा, तन्मयः न तु भूतमयः। यह वपु भूतमय, मायामय, प्रकृतिमय नहीं, किंतु भावुकोंके प्रीतिमय, इच्छामय है, उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूप कहा था तो श्रीवृषभानुनन्दिनीके अन्तःकरणमें, श्रीव्रजांगनाओंके अन्तःकरणमें। नायकविषयक शृंगार नायिकाके ही अन्तःकरणमें (हृदयमें) उद्बुद्ध होता है। यह अमूर्त रस श्रीवृषभानुनन्दिनीके हृदयकी वस्तु मूर्त होकर श्रीवृन्दारण्यधाममें कैसे? तो सर्वेन्द्रियग्राह्य होनेके

लिये। उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा यदि हृदयस्थ वस्तु फिर सर्वेन्द्रिय ग्राह्य नहीं, पर वही हृदयस्थ वस्तु वृन्दारण्यधामस्थ हुई। हृदयस्थ ही पहले कैसे ? तो शुरूसे ही उसका धारण-पोषण श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने ही किया, 'आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।३३) व्रजांगना कहती है—'हे श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन, आपके सम्मिलनकी आशाको शुरूसे ही धारण किया, पोषण किया, उस आशा-कल्पलताका बीज व्रजांगनाओंके स्निग्ध हृदय-क्षेत्रमें आरोपण किया, रूखड़ पथरीले बालुकामय क्षेत्रमें यह आशा कल्पलता अंकुरित न होगी, अर्थात् भगवत्सम्मिलनकी आशा- कल्पलता हृदयमें बोयी जाय, वह अंकुरित हो, पुष्पित-फलित हो।' प्रत्याशित वस्तुका सम्मिलन ही उसकी सफलता—यह भगवत्कृपासे भावुक हृदयमें प्रकट होती है। व्रजांगनाओंके हृदयमें भगवत्सम्मिलनकी आशाको भी उन्होंने ही बोया, पोषण किया, यहाँ वह पुष्पित हो गयी, उसी फूलकी सुगन्धि वेणुगीतद्वारा निकलेगी। भाव यह कि श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रने ही श्रीवृषभानुनन्दिनीके, श्रीव्रजांगनाओंके हृदयमें स्वसम्मिलनकी उत्कण्ठाको, आशाको बोया और वही शृंगाररसका स्वरूप है। जब कभी वह आशाकल्पलतांकुर मुरझाने लगता है तो व्रजांगना अपने अश्रुबिन्दुसे उसे सींचना चाहती हैं, जबकि श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके वियोगानलरूप वाडवाग्निसे वह दग्ध होने लगता है, तब वही श्रीकृष्णचरणारविन्द-परागरूप कज्जलको आँखोंमें लगाती हैं, श्रीकृष्णपादपंकजपरागसे यह अग्नि प्रशान्त होती है। इस शृंगाररसका धारण-पोषण श्रीकृष्णचन्द्रने ही किया, यहाँपर भी हृदयस्थ उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक शृंगाररसको मूर्त होनेके लिये धारण और पोषण किया। भगवान्द्वारा मयूरपिच्छ-धारण अब भूषणका वर्णन—बर्हापीड— बर्हमय आपीड, वैजयन्ती, कर्णिकार, पीताम्बर यह सब भूषण है, स्वरूप केवल 'नटवरवपु' यदि नटवत् वरवत् वपुका ऊपरवाला अर्थ करें तो शोभा और भूषण आ जाता है, नट ही विचित्र वेश-वसनसे अपनेको सजाता है अर्थात् वैसा अर्थ लेनेसे वैसे वपुका बोधन है, किंतु इसके अलावा नटपदसे वरपदसे विप्रयोग-सम्प्रयोगात्मक शृंगार कहा गया तो भगवान्का उद्बुद्ध उभयविध शृंगारात्मक रसस्वरूप आता है। भगवान्के तीन शृंगार हैं, 'भूषिता अप्यभूषणम्।' श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द गोपाल बलरामके साथ जब भवनसे निकलते तो उसके पहले ही माता उबटन लगाकर अभ्यंग करनेके बाद नानाविध विचित्र दिव्य अलंकारोंसे भूषित करके गोचारणके लिये वृन्दारण्यमें भेजती, फिर वनमें आते तो ग्वालबाल वनकी सामग्रियोंसे भूषित, कर्णिकारसे आभूषित करते, गुंजाकी परमसुन्दर माला पहनाते, उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसका निर्यासरूप आनन्द-सुधासिन्धुका मन्थनकर यह अद्भुत सारतम तत्त्व विनिःसृत हुआ, इस प्रकार पूर्णानुराग-रससारसिन्धुसे प्रभुके सर्वांगका निर्माण हुआ, स्वरूपके प्रादुर्भाव होनेपर उबटन, अभ्यंग, अनुलेपन, स्नान वगैरह हुए। पहले उद्वर्तन हुआ। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में लिखा है कि 'उद्वर्त्तितमिव सौरभ्येण' अन्योंको, सौरभ्यके लिये उबटन, यहाँ भगवान्के स्वरूपको तो सौरभ्यसे ही उबटन, अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत जो सौरभसारसर्वस्व वही आपके लिये उबटन 'अभ्यक्तमिव स्नेहेन' अन्यत्र लोगोंमें स्नानसे मधुरिमा व्यक्त की जाती है, यहाँ तो भगवद्विषयक भावुकोंके स्नेहसे भगवान्के श्रीअंगका अभ्यंग हुआ। अनन्तब्रह्माण्डगत माधुर्य-बिन्दुके उद्गमस्थान माधुर्यसिन्धुके सारसे आपको स्नान कराया गया, श्रीकृष्णचन्द्रकी मंगलमयी मूर्तिका स्नान माधुर्यामृतसारसर्वस्वसे, 'मार्जितमिव लावण्येन' मुक्ताफल मध्यकी चमकको लावण्य कहते हैं, उस लावण्यसारसर्वस्वसे ही मार्जन। अब अनुलेपन 'अनुलिप्तमिव सौन्दर्येण' अन्यत्र अनुलेपनसे सौन्दर्य, यहाँ सौन्दर्यसारसर्वस्व ही अनुलेपन। 'भूषितमिव त्रैलोक्यलक्ष्म्या' अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत लक्ष्मीसे

ही आप भूषित हैं, यह स्वाभाविक शृंगार है। नन्दरानीसे किया हुआ शृंगार, उसके बाद ग्वालबालों द्वारा वनमें किया हुआ शृंगार वही 'बर्हापीडम्'। 'बिभ्रत्'—बर्हमय आपीडको धारण किये हुए, आपीड शिरोभूषण मयूरपिच्छसे निर्मित अद्भुत मुकुटको धारण किये हुए। नाचते हुए मयूरसे ही जो मयूरपिच्छ निःसृत होता है, उसे बर्ह कहते हैं, उसीसे यह बना, मयूरको जब आनन्दोल्लास होता है, तब वह नृत्य करता है। घनगर्जनसे मेघश्यामकी अद्भुत घटाका निरीक्षण करते मन्द-मन्द गर्जनसे रसोल्लास रसोद्बोधनके साथ जब वह नृत्य करता है, तभी वह पिच्छ गिरता है, उसको धारणकर उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसको और उद्बोधित किया, यह उद्दीपन कोटिमें आ गया, उसको अपने भूषणमें धारणकर भगवान्ने रसोल्लास व्यक्त किया, यहाँ जितनी- जितनी उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मामें रसकी अभिव्यक्ति होगी, उतनी ही भावुकोंमें रसोल्लास होगा। जब भक्त यह जानते हैं कि भगवान् मिलनेके लिये उत्कण्ठित हैं, तब तो उनकी उत्कण्ठाका पारावार नहीं रह जाता, इसीको और बढ़ानेके लिये भगवान्ने पिच्छ धारण किया। 'राधाप्रियमयूरस्य पत्रं राधेक्षणप्रभम्।' जिस मयूरके चन्द्रकको भगवान्ने आभूषण बनाया, वह श्रीवृषभानुनन्दिनीके निकुंजका है, श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दके श्रीअंगके समान उस मयूरके कण्ठकी श्यामलत्ता थी, इसीलिये श्रीकृष्णचन्द्रका स्मारक होनेके कारण श्रीवृषभानुनन्दिनी उस मयूरको अपने पास रखती हैं और उसीका पिच्छ भगवान् धारण करते हैं। इस पिच्छका चन्द्रक श्रीवृषभानुनन्दिनीके नयनके समान है, इसलिये भगवान्ने वह भूषण शिरोधार्य किया, भक्तकी सम्बन्धित वस्तुको भगवान् अपना शिरोभूषण बनाते हैं अथवा यह कि श्रीराधाके शीर्षजूट जूड़ाके सदृश यह पिच्छ, अतः राधाके अलंकार जूटके सदृश होनेके कारण भगवान्ने इसे अपना भूषण बनाया। साथ ही अगले प्रसंगमें तीन भाव दिखाये हैं, अत्यन्त, सरस नूतन अरुणवर्णका आम्रपल्लव होनेसे उसको भी प्रभुने अपने भूषणमें धारण किया, उसकी अरुणिमासे राग दिखाया, यह उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूप अंगी है और सब अंग हैं तो उससे इस स्वरूपमें रजःकृत एक रागजन्य विक्षेप सूचित किया और पिच्छकी जो श्यामलत्ता है, उससे लिलक्षयिषित तमसे गाढ़ आसक्ति दिखायी, सरस अरुण पल्लवसे राग दिखाया। रसमें यह सब राग हो रहा है, वैसे तो रागमें रस है, यहाँ तो उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें राग, आसक्ति व्यसन हो रहा है, तात्पर्य यह कि भक्त रसस्वरूप श्रीभगवान्में राग आसक्ति व्यसन प्राप्त करना चाहते हैं अर्थात् जहाँ उस तरहका राग-आसक्ति व्यसन भक्त करता है, वैसे ही आगे श्रीभगवान् भक्तमें राग-आसक्ति व्यसन करते हैं, जैसे श्रीवृषभानुनन्दिनीका, व्रजांगनाओंका श्रीकृष्ण- परमानन्दकन्द मनमोहन श्यामसुन्दरमें राग-आसक्ति व्यसन, वैसे ही श्रीभगवान्का श्रीवृषभानुनन्दिनीमें, व्रजांगनाओंमें राग-आसक्ति व्यसन। पहले भक्तका भगवान्में, फिर भगवान्का भक्तमें, जैसे बताया वृषभानुनन्दिनीके हृदयकी वस्तु श्रीकृष्णचन्द्र, वैसे ही श्रीश्यामसुन्दरके हृदयकी वस्तु वृषभानुनन्दिनी। कहा जा चुका है कि यह लौकिकवत् प्राकृतवत् व्यक्त हो, मगर है वह अलौकिक। रस-रसालम्बन-रसाश्रय तीन-तीन जातिके होते हैं, यहाँ एक ही है। परमरसामृतसिन्धुके ये तीन विकास हैं। श्रीकृष्णचन्द्र और वृषभानुनन्दिनी परस्परके हृदय हैं, जैसे श्रीकृष्णचन्द्रके स्वरूपसे श्रीवृषभानुनन्दिनीका हृदयगत उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस मूर्त हुआ, वैसे श्रीवृषभानुनन्दिनीके स्वरूपसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- कन्दका हृदयगत उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस मूर्त हुआ, अतः दोनों उभयात्मक हैं, इस दृष्टिसे दोनों ओर इस स्वरूपमें रसाभिव्यक्ति हुई, जैसे वीर रसमें वीर रसका, करुण रसमें करुण रसका संचार, वैसे उभयविध शृंगाररसात्मामें रसाभिव्यक्ति, यही कहा— 'बर्हापीडं नटवरवपुः।'

वेणुगीत ९३ भगवान्द्वारा कानोंमें कर्णिकार-धारण अब 'बिभ्रत्' बर्हापीडसे अलग, 'कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रत्' कानोंमें कनेलके फूलोंको धारण किये। 'कर्णयोः' द्विवचन, 'कर्णिकारम्' एकवचन, अतः उसमें भी द्वित्वकी कल्पना कोई करते हैं, अथवा कभी वाममें, कभी दक्षिणमें। एतावता रसवैदग्धी विशेष कहा। इसमें भावुक कहते हैं—भगवान्के दो कर्ण रसके उद्भावक हैं, कानोंमें रसानुभावक रसोद्बोधक पुष्प धारण करनेसे रसको उद्वेलित किया। किंवा द्विविध शृंगारके अनुभावक दोनों कर्ण। संप्रयोग कालमें हास-रास-विलासमिश्रित वचनोंसे उस रसकी पुष्टि विप्रयोगकालमें भी वेणूदूतद्वारा जब भक्तोंको भगवान् आहूत करते हैं, तब श्रोत्रोंका ही काम है, अथवा एकान्तमें भक्त जब भगवान्का चिन्तन करते हैं—'तच्चिन्तनं तत्कथनम्' उससे भावनापरिपाककी महिमासे इन श्रोत्रोंद्वारा ही दूरस्थ व्रजांगनाओंके आर्तिविलाप भगवान्को अनुभूत होते हैं, एवं च इसमें मुख्य जो कान उनको भूषित किया अर्थात् कभी सम्प्रयोग शृंगारका पोषण, कभी विप्रयोग शृंगारका पोषण भगवान्ने किया और लोग कहते हैं कर्णिकार अर्थात् कनेल नहीं, पीतवर्णका उत्पलाकार पुष्प, उसका स्वभाव है सूर्याभिमुख रहना, जिधर सूर्य जाय, उधर ही वह जाय, कर्णिकार पुष्पके इस स्वभावको जानकर उसको आपने धारण किया। भगवान् सूचित करते हैं कि हमारे प्रेमी जिधर मुँह करते हैं, वैसे मैं भी उन्हें अभिमुख होता हूँ, एतावता जिधर भक्तगण उधर ही उभयविध शृंगाररस उन्मुख, इसीलिये उनको धारणकर यही दिखलाया। पीताम्बरधारणका रहस्य 'बिभ्रद् वासः कनककपिशम्'—भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द कनकवर्ण पीताम्बर धारण किये हुए पधारे। यह इसलिये कि रस आवृत रहे। उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द हैं, वह रस अगर निरावरण हो जाय तो रसाभास हो जायगा, निरावरणरस रसाभास कहा जाता है, इसलिये उसे आवृत रखना चाहिये। यह रस उच्छलित रस है, उद्बोधित रस है, शृंगाररसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र भगवान्ने मयूरपिच्छमय मुकुटको धारणकर सूचित किया, रसोल्लासमें ही मयूरका चन्द्रक गिरता है, इसीलिये उसका धारण रसोल्लासका लक्षण है, ऐसा उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस यदि आवृत न हो तो रसाभास हो जाय, अतः 'कनककपिशं वासो बिभ्रत्' रस आवृत रहनेसे ही रस है, वैसे भी उत्कण्ठाविशेष बढ़ानेके लिये रस आवृत ही रहना चाहिये। श्रीवृन्दारण्यधाममें श्रीबिहारीजीके मन्दिरमें बार-बार, क्षण-क्षणपर परदा होता है; क्योंकि ऐसेमें ही उत्कण्ठा बनी रहती है, निरावरण निर्विघ्न रसमें उत्कण्ठाकी कमी होती है, वास्तवमें रस तो आस्वादनसे घटता नहीं, फिर भी लौकिक रीतिसे अलौकिक रसका आस्वादन प्रभु दे रहे हैं। अति सुन्दरी परम रमणीया नायिका भी मुखचन्द्रपर घूँघट रखती है, अतः उद्बुद्ध उभयविध शृंगारात्मा भगवान्ने कनककपिश पीताम्बरसे अपनेको आवृत किया। अर्थात् भक्तोंको श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मिलनेमें जो रुकावट— आवरण है, वह माया है, माया ही निरावरणरूपसे प्रभुको देखने नहीं देती। वैसे ही गोपांगनाओंको निरावरण उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके दर्शनमें बाधक पीताम्बर है। श्रीवल्लभाचार्य भी पीताम्बरको माया ही मानते हैं। भगवान् भी कहते हैं—'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७। २५) इसीलिये सबको भगवत्तत्त्वका अनुभव नहीं होता, अगर हो तो वह केवल भगवत्कृपासे ही। केवल पीताम्बर वस्त्र नहीं, अपितु तप्तकांचनके सदृश सुवर्णवर्णाम्बर क्यों? सुवर्ण मोहक है, बड़े-बड़े ईमानदारोंका ईमान डुबानेवाला सुवर्ण ही होता है। अतः सुवर्णवर्ण पीताम्बर व्यामोहक कनकतुल्या माया। जो इस कनकके व्यामोहको उल्लंघन करे, वही उस आवरणसे आवृत ब्रह्मको देख सकता है। यदि कनकके आवरणमें फँसा तो रसात्मा ब्रह्मको क्या देखेगा!

९४ भक्तिसुधा वेधा द्वेधा भ्रमं चक्रे कान्तासु कनकेषु च। तासु तेष्वप्यनासक्तः साक्षाद् भर्गो नराकृतिः ॥ ऐसे आवरणसे अपने श्रीअंगको आवृतकर भगवान् श्रीवृन्दारण्यधाममें पधारे। अर्थात् जो भगवान्‌को देखना चाहते हैं, उनके सामने प्रथम मायाकी चमक- दमक आती है, अगर उसे उल्लंघन किया तो ठीक, केवल कनकके समान ही नहीं, अपितु अग्नितप्त सुवर्णसदृश देदीप्यमान चमकीले पीतवर्णवाले पीताम्बरसे अपने श्रीअंगको आवृत किया। पीताम्बरकी चमक कई तरहकी होती है, कोई कहते हैं सुवर्णवर्ण, कोई दिव्य-दीप्तिमान् विद्युत्के सदृश, कोई कदम्ब-किंजल्क- सदृश, कोई रविकरसदृश, यहाँ तो बिजलीसे भी शतगुणित सहस्रगुणित देदीप्यमान पीताम्बर है, वह प्रभुके श्रीअंगको विलक्षण शोभा देता है, जैसे इन्द्रनीलमणिके पर्वतपर दामिनी दमके, वैसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके महेन्द्र-नीलमणिको लज्जित करनेवाले स्वरूपपर पीताम्बर दामिनीके समान दमक रहा है। अद्भुत शोभा दे रहा है, किंवा जिस रीतिसे सजल नीलाम्बुदपर—मेघश्यामपर दामिनी दमकती है, वैसे प्रभुके श्रीअंगपर पीताम्बर देदीप्यमान होता है, उसमें भी यह सजल नीलजलद जल देनेवाला है, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द तो आनन्दरस—अनुरागरसवर्षी हैं, प्रेमानन्दमयरसवर्षी हैं, यह कोई अद्भुत सुधामय जलद है, अतएव अद्भुत दामिनीके दमकको लज्जित करनेवाले पीताम्बरसे आवृत है, श्यामल जलद जलमय ही होता है, यहाँ भी श्रीकृष्णचन्द्र उद्‌बुद्ध उभयविध शृंगाररसस्वरूप ही हैं, शृंगाररसके अधिष्ठात्री देवता विष्णु श्याम और शृंगाररस स्वरूपवर्णनमें उस रसका वर्ण भी श्याम ही कहा है एवं प्रकारसे पीताम्बर प्रभुके श्रीअंगपर अद्भुत छवि दे रहा है। भावुक कहते हैं यह माया है, पर यह प्राकृत माया नहीं, अपितु यह एवंगुणविशिष्ट पीताम्बर श्रीवृषभानुनन्दिनी ही हैं, किं बहुना—श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके श्रीअंगपर यावान् भूषण हैं, सब श्रीवृषभानुनन्दिनी ही हैं, इसी प्रकार श्रीवृषभानुनन्दिनीके श्रीअंगपर जो भूषण हैं, वह सब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द ही हैं। श्रवसोः कुवलयमक्ष्णोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम । वृन्दावनतरुणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥ वृषभानुनन्दिनीके तथा व्रजांगनाओंके कानोंमें जो कमलके फूल हैं, वे रात्रिविकासी स्थलोद्भव कमलविशेष कुवलय होते हैं, वह श्रीकृष्ण अर्थात् उनके श्रोत्रभूषण भगवान् श्रीकृष्ण। वे अपनी आँखोंमें जो अंजन लगाती हैं, वह क्या प्राकृत अंजन है? नहीं! वह श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन ही अंजन होकर उनके नयनोंमें विराजमान हैं, काष्ठपाषाणमय भूषण उनके नहीं। ईदृशा पुरुषभूषणेन या भूषयन्ति हृदयं न सुभ्रुवः । धिक् तदीयकुलशीलयौवनं धिक् तदीयगुणरूपसम्पदः ॥ ऐसे पुरुषभूषणसे जो सुभ्रू अपने हृदयको नहीं भूषित करती; उनके कुल, शील, यौवन और गुणरूप सम्पत्तिको धिक्कार है। श्यामसुन्दर पुरुषभूषण, पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्रसे जिन्होंने अपनेको भूषित नहीं किया, वह अपनेको कंकड़-पत्थरोंसे भूषित करे। श्रीकृष्णचन्द्रके पादपंकजपरागको ही अंजन- रूपसे लगाती हैं, उनके हृदयमें महेन्द्रनीलमणिकी माला भी श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द ही हैं, संसारकी अन्य युवती भले ही कंकड़-पत्थरोंसे अपनेको भूषित करें, पर वृन्दावनतरुणियोंका मण्डन तो एक श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द ही हैं। वैसे श्रीकृष्ण परमानन्दकन्द मनमोहन मदनमोहन श्यामसुन्दर भगवान् उनके हृदयमें हैं ही, पर बाहर भी वही, हृदयके बाहर-भीतर एक ही हो। श्रीव्रजांगनाओंके, श्रीवृषभानुनन्दिनीके अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रियाँ, रोम-रोम सबमें, उपरिष्टात् अधस्तात् सर्वतः श्रीकृष्ण-ही- श्रीकृष्ण। श्रीवृषभानुनन्दिनीके श्रीअंगपर जो नील साड़ी, नील अद्भुत दिव्य निचोल, इन्द्रनील चूड़ी, हृदय विलिंपित मृगमद कस्तूरिका सब भगवान्-ही- भगवान्। सबका वर्णन कहाँतक किया जाय, अतः संक्षेपमें बताया कि 'मण्डनमखिलं हरिर्जयति', 'ये

यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) ऐसे प्रभुके सिद्धान्त ही हैं। पूर्णतम पुरुषोत्तम श्यामसुन्दरको भी वृषभानुनन्दिनीके अतिरिक्त भूषण ही नहीं, जिन्हें भगवान् अपना भूषण बनायें। श्रीव्रजांगनाओंके तथा श्रीवृषभानुनन्दिनीके भूषण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द तो भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके भी सब आभूषण श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीव्रजांगना ही हैं, श्रीप्रभुका अन्तरंगस्वरूप श्रीवृषभानु- नन्दिनी तथा श्रीवृषभानुनन्दिनीके अन्तरंगस्वरूप श्रीभगवान्। तभी कहा—'उभयोर्भयभावात्मा' जैसे भक्तमनोभावनामय भगवान्, वैसे भगवन्मनोभावनामय भक्त। भक्तके हृदय भगवान्, भगवान्‌के हृदय भक्त, इसी दृष्टिसे पीताम्बरसे आवृत हैं। जैसे अद्भुत अनन्त परमानन्द सुधा-सिन्धुमें मधुरिमा होती है, उसी रीतिसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द निखिलरसामृतसिन्धुमें माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी और उनकी अंशभूता श्रीव्रजांगना। श्रीकृष्ण परमानन्दकन्द एक तरुणतमाल हैं, श्रीवृषभानुनन्दिनी सुवर्णलता हैं, जैसे सुवर्णवर्णा लतासे परिवेष्टित तरुणतमाल सुशोभित हो, वैसे श्रीवृषभानुनन्दिनीसे परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र। दोनोंका अद्भुत अविघटित सुस्थिर सम्बन्ध है। भगवान्‌के श्रीकण्ठमें वैजयन्ती- मालाकी शोभा भगवान्‌के श्रीकण्ठमें वैजयन्ती। 'वै निश्चयेन जयन्ती जयशालिनी', मानो कन्दर्पने जिस धनुषसे निखिल विश्वको विजय किया और उसने उसे छोड़ दिया, वही है यह वैजयन्ती माला। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके नखमणिमय चन्द्रिकाके दर्शनसे कन्दर्प मूर्च्छित हुआ, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक कन्दर्प- दर्पदलनपटु भगवान्‌के गलेकी यह पंचवर्णपुष्पग्रथित अम्लान पुष्पमाला अद्भुत सौगन्ध्यसे युक्त है। श्रीभगवान्‌के पास तीन शक्तियाँ हैं—उद्बोधक, आच्छादक, विक्षेपक। कानोंके कर्णिकार उद्बोधक, पीताम्बर आच्छादक है, ब्रह्मस्वरूपोपलब्धिमें वह विघ्न है, परंतु रसज्ञोंके लिये रस भी है और ततोऽप्यधिक विक्षेपक वैजयन्ती, व्रजांगना उद्विग्न हो जाती है। वह समझती है, हमारे श्यामसुन्दरके ये सब आवरण हैं, क्योंकि रसास्वादनपरायण रसिक निर्विघ्न निरुपद्रव निरावरण रसास्वादन चाहता है, क्या उनको पीताम्बरका व्यवधान, वैजयन्तीका व्यवधान सह्य होगा ? जहाँ हार-कंचुकका भी व्यवधान असह्य वहाँ पीताम्बरका, वैजयन्तीका व्यवधान कैसे सह्य होगा ? ऐसा है श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका अद्भुत दिव्य स्वरूप। इन सबसे दुर्लभता सूचित है, दुर्लभतामें ही रस है। चकारात् वनमाला भी, श्रीकण्ठसे मधुर मनोहर पादारविन्दतक। इन सबसे श्रीअंग आवृत हैं, जैसे ज्योतिर्मय जलदावृत नभोमण्डल आच्छादित हो जाता, वैसे श्यामल, महोमय, आनन्दरसमय वपु अनेक आवरणोंसे आवृत हो अस्पष्ट ज्योति हो गया, उस पीताम्बरके माध्यमसे श्रीअंगकी देदीप्यमान श्यामलता चमकती है। जैसे विद्युत्‌से आवृत होनेपर भी इन्द्रनीलमणि पर्वतकी श्यामलता चमकती है, वैसे ही 'सो जानइ सपनेहुँ जेहिं देखा।।' (रा०च०मा० १।१९९।१२) जिनको स्वप्नमें भी एक बिन्दुमात्र भी आस्वादन करनेको मिला, वे ही जान सकते हैं। आपके सर्व अलंकारोंकी झलक जिसके मनमें आयी, वह सदाके लिये बिक गया। श्यामलता कैसी ? 'कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णम्' (श्रीमद्भा० ११।५।३२) श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द-कन्दका वपु है तो अतसीपुष्प- सदृश, नीलाम्बुज, नील नीरधरके समान तब भी वह 'त्विषाकृष्णम्' एक अद्भुत दीप्तिमें छिपा है। अतएव श्यामल महोमय कहा जाता है। तेज दो प्रकारके एक श्याम तेज, एक गौर तेज, श्याम तेज भगवान् श्रीकृष्ण

९६ भक्तिसुधा है, भावुकका मन मधुकरके समान है, मधुकर जैसे अनेक पुष्पोंसे मधु लेता है, उसी तरह भावुक भगवान्‌की मूर्ति इन तत्त्वोंको लेकर बनाता है। भगवान्‌की भूषणमयी शोभा भगवान्‌के अद्भुत अलंकारसहित मूर्तिका वर्णन क्या किया जाय, कोटि सूर्योंके समान दिव्य रत्नोंसे जड़ित अद्भुत मोरपिच्छयुक्त मुकुट, देदीप्यमान कुण्डलोंकी झलक, सुगन्धित पुष्पोंकी माला, श्यामल कपोलपर सुन्दर कुण्डल। कपोलोंपर लटकती हुई श्यामल स्निग्ध सचिक्कण अद्भुत अलकावलीकी शोभा तो अवर्णनीय है, जैसे श्यामल नागोंके शिशु अमृतमय चन्द्रमाका रस लेनेके लिये गये हों, किंवा जैसे नीलकमलकोशपर भ्रमरवृन्द आकर रसास्वादनके लिये निश्चल निस्तब्ध विराजमान हों, अथवा सुन्दर टेढ़े-टेढ़े घुँघुराले अलकोंकी वह अलकावली ! स्निग्ध सचिक्कण श्यामल अमृतमय नीलाम्बुजपर पराग- लोभसे बैठे मानो भ्रमरवृन्द ही हैं। फिर गुंजारव क्यों नहीं ? कारण यह कि वह अद्भुत मादक मकरन्दपानकर उन्मत्त होकर चंचलतारहित होकर स्तब्ध हो गये, ऐसा मुखचन्द्र ! अग्र हाथीके बच्चेके शुण्डसदृश गोल सुडौल सुचिक्कण दीप्तिमय योग्य चढ़ाव-उतारके श्रीभुज हैं, दिव्य कुंकुम-मिश्रित हरिचन्दनसे विलिंपित भुजा है। भगवान्‌के श्रीअंगपर कुंकुममिश्रित हरिचन्दन इस तरह सुशोभित होते हैं, जैसे चन्द्रमाकी चन्द्रिकासे व्याप्त इन्द्रनीलमणि। अंगद-कंकणादि, हस्तांगुलिदलोंमें मुद्रिका, नखोंमें अरुणिमा ऐसे श्रीहस्तोंसे वेणुको उठाकर अधरपर रखकर अधरसुधापूरित कर रहे हैं। वेणुवादन रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन्— वेणुके छिद्रोंको अधरसुधासे पूरित करते हुए भगवान् वृन्दावनधाममें पधारे, मानो श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी रुचि है वेणुच्छिद्रोंको अधरसुधासे पूरित करनेकी। नटनागर नटवरवपु श्रीकृष्णकी रुचि भी नटखट, इसलिये कि लोग हमारे वेणुमें दूषण बतलाते हैं। छिद्रोंको दूषण कहते ही हैं—'छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति' एक छिद्र कहीं हो तो अनर्थ होता है, यहाँ तो सात छिद्र हैं। इस सप्तछिद्रयुक्त वेणुको लोग निन्दित, कलंकित समझेंगे, इसलिये हम उसे अपनी सुमधुर अधरसुधासे पूरित कर दें। यानी परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके श्रीहस्तारविन्दमें रहनेवाले, उनके अधरपर विराजमान वेणु सच्छिद्र रहे, यह ठीक नहीं, ऐसी भगवान्‌की रुचि है, इसीलिये 'रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन्' (श्रीमद्भा० १०।२१।५)—अधर-सुधाने सोचा अरे जड़ वेणु ! मैं अपने अद्भुत प्रभावसे तुझे सप्राण बना दूँ! बस, इस अभिप्रायसे सुमधुर अधरसुधाने वेणुको सप्राण बनाना चाहा और वह अधर-सुधाके संस्पर्शसे सप्राण होकर सुमधुर गीतका विस्तार करने लगी। अब अधरसुधाने सोचा कि वेणु तो जड़-की-जड़ ही रह गयी। अधरसुधाके परंप्रवीण सम्बन्धसे वृक्षोंसे मधुधारा बहने लगी, सरोवरसरसी, कमल-कमलिनी, कुमुद-कुमुदिनी रोमांचित हो गये, यमुना रुकी, पाषाण द्रवरूप हो गया, मगर वेणु सूखी-की-सूखी ही रही। वेणु सच्छिद्र है, पोली है, रसशून्य है, हृदयशून्य है, इसीलिये इसपर अधरसुधारसका प्रभाव न पड़ा। इसका प्रभाव सहृदयपर ही पड़ता है, अहृदयपर नहीं। कहते हैं—मलयाचलपर चन्दन वृक्षके सम्पर्कसे सम्पूर्ण वृक्ष चन्दन हो जाते हैं, मगर बाँस, बाँस ही रह जाता है। औरोंमें हृदय है, और सब पोले, हृदयशून्य सच्छिद्र नहीं हैं, बाँस हृदयशून्य निःसार है। कहते हैं—ग्रन्थि रहना अच्छा नहीं। एक चिज्जड़ ग्रन्थि न जाने कबकी है। यह ग्रन्थि मिटना कठिन है। कहते हैं—अमुक बड़े गठीले चित्तके हैं। बाँसमें तो गाँठ-ही-गाँठ है। एक छिद्र हो तो सहस्रों अनर्थ उत्पन्न होते हैं, यहाँ तो सात छिद्र हैं, अतः उसपर प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिये अधरसुधाने यह सोचकर, वेणुछिद्रोंमें रस भरकर उसे सप्राण किया था, पर उस वेणुको छोड़कर वह व्रजांगनाओंके निरावरण कर्ण कुहरोंद्वारा वेणुगीतरूपमें उनके हृदयोंमें पहुँचा। यहीं उसने अपना सब विक्रम, सब माधुर्य व्यक्त किया। यहाँपर चक्रवर्तीने ऊपरके कुछ थोड़े

भाव कहे हैं। अथवा 'अधरा नीचीना (तुच्छा, अपकृष्टा) सुधा अपि यस्याः सकाशात् सा अधरसुधा,' श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी अधरसुधामें ऐसी मधुरिमा है, जिससे सुधा भी अति तुच्छ मालूम हो। अर्थात् देवताओंके, चन्द्रमाके और धन्वन्तरिके अमृतको अपकृष्ट बनानेवाली, यह जो अधरसुधा है, उससे भगवान् वंशीको पूरित करने लगे। वंशीमें सुमधुर अधरसुधा प्रविष्ट होती है, वह भी स्वयं अमूर्त है। छिद्रमें आकाश भरा है। अमूर्त पदार्थसे आकाश निश्छिद्र नहीं होता। अतः अमूर्त रससे वंशी निश्छिद्र न हुई। वास्तवमें वेणुको भगवान्ने अधरसुधा दी ही नहीं, केवल सम्पर्क होनेसे क्या होता है? प्रभुकृपासे वह जिसको मिले, उसपर ही प्रभाव होता है। उसी जलमें जोंक, उसीमें कमल, उसीमें मछली रहती है। अधिकारी, योग्य पात्र ही वस्तुको ग्रहण करता है, अर्थात् वेणुको वास्तवमें अधरसुधाका सम्प्रदान ही नहीं हुआ। वह केवल वेणुपात्रद्वारा व्रजांगनाओंको भेजी गयी। दर्वीसे रस चलाया जाय, परोसा जाय, परंतु दर्वीको रसास्वाद थोड़े ही आता है। वह तो रसोपभोगकी सामग्री है। वेणुपात्रद्वारा अधररस गोपांगनाओंको दिया गया, इसलिये कि गोपांगनाएँ सन्निहित नहीं थीं। वृन्दावनस्थ श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दकी अधरसुधाका सम्भोग व्रजस्थिता व्रजांगनाओंको कैसे हो? अतः अधरसुधाको साधनभूत वेणुके छिद्रोंमें भरकर व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाया। वेणु दर्वीके समान होनेसे सूखी, सच्छिद्र ही रह गयी। यहाँ केवल श्रीप्रभुकी इच्छा ही कारण है, वेणु सबके लिये समान है। जैसे—स्वातिबिन्दु बाँसमें वंशलोचन, गोमें गोरोचन, शुक्तिमें मुक्ता, गजकर्णीमें गजमुक्ता होता है, वैसे ही अधरसुधा भिन्न-भिन्न पात्रोंमें पड़ती है, वेणु केवल उसको विभिन्न-विभिन्न पात्रोंमें पहुँचानेवाली हुई। यहाँ कई पक्ष हैं। यों तो जब श्रीव्रजांगना वेणुपर प्रसन्न हों, तब प्रशंसा ही करती हैं, 'याचेऽहं वंशदेहम्'। कहती थी—'सखि! हम तो वंशदेहकी याचना करती हैं। यदि विधाता हमारे ऊपर प्रसन्न हों तो हमें वंशदेह दें। गोपांगनादेहमें हमें कृतार्थता नहीं है। यदि वंशदेह होता तो सम्भव था कि कभी भगवान्के अधरपर सोती, अधरसुधाका आस्वादन करती, पर हम तो कुलांगना ठहरीं, हमें यह अवसर प्राप्त नहीं हो सकता।' जब गोपांगना वेणुसे ईर्ष्या करती, तब तो उसके दोष-ही-दोष कहती थी। अस्तु, यह आया कि षट्धर्मसहित रसरूप धर्मीको वेणुछिद्रोंद्वारा व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाना वेणुका कार्य था। 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।' इत्यादि भगवान्में छः धर्म हैं। अर्थात् सम्पूर्ण षट्भगसम्पन्न, अचिन्त्य, अखण्ड, अनन्त, रसधर्मी, पूर्णतम, पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वेणुमें सप्तछिद्र हैं। अतः षट्छिद्रोंद्वारा एक-एक भगधर्म एवं सातवें छिद्रद्वारा षट्धर्मसहित भगवान् अधरसुधाद्वारा वंशीमें प्रवेशकर, तद्द्वारा श्रीव्रजांगनाओंके हृदयमें प्रवेश करते हैं, ऐसा भावुकोंने कहा है। तीन तरहकी अधरसुधाएँ हैं और उसके सम्भोगाधिकारी भी तीन हैं। जिन्हें निरोध सम्पन्न हुआ, वे ही सुधाके अधिकारी हैं। निरोध यानी सम्पूर्ण विश्वविस्मरणपूर्वक श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें मनका लय होना। वह भी तीन प्रकारका है—प्रेमनिरोध, आसक्तिनिरोध और व्यसननिरोध। प्रेमनिरोध-सम्पन्नको देवभोग्या, आसक्ति- निरोध-सम्पन्नको भगवद्भोग्या और व्यसननिरोध- सम्पन्नको सर्वाभोग्या कहा गया है। ये सिद्धान्त श्रीवल्लभाचार्यजीने बताये हैं। यह देव कौन हैं? श्रीमद्भागवतके दशमस्कन्धमें निरोध, एकादश-स्कन्धमें मुक्ति और द्वादशस्कन्धमें मुक्ति-आश्रय ब्रह्म है। निरोध-वर्णन होनेसे दशम ही मुख्य है, क्योंकि श्रीकृष्णचन्द्रमें मनोलय होना ही सब कुछ है। इनके मतमें मुक्ति बड़ी विलक्षण है। कहते हैं—पूर्णतम पुरुषोत्तम परमानन्दमें जो मुक्त हुए जीव जाकर मिल जाते हैं, ऐसा जो मुक्तत्व उसकी मुक्ति मुक्ति है। परमपुरुषार्थ तो श्रीकृष्णचन्द्रका लीलारसास्वादन है। जो मुक्त हो गये, वे क्या लीलारसास्वादन कर सकते

हैं? मुक्तोंका स्वरूपसे निष्कासन ही पुष्टिमार्गीय मुक्ति है। भागवतके अनुसार 'मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥' (श्रीमद्भा० २।१०।६) अर्थात् काल्पनिक, औपाधिक रूप छोड़कर पारमार्थिक भगवद्रूपमें लीन होना। पारमार्थिक रूप अखण्ड, अनन्त, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, स्वप्रकाशात्मक है, यह अद्वैतियोंकी मुक्ति है। कोई कहते हैं—जीवका निजी रूप गोपांगनाभाव है। उसे छोड़कर जो सांसारिक स्त्रीत्व-पुंस्त्वमें आया, उसको छोड़कर पूर्वभावमें जाना ही मुक्ति है। दूसरे कहते हैं—जीव स्वभावसे ही श्रीभगवान्‌का नित्यदास है। जहाँ दूसरे भाव आये कि वह भाव बिगड़ा, उन्हें छोड़कर— श्रीभगवान् हमारे स्वामी, हम उनके दास, इस रूपकी प्राप्ति मुक्ति है। किंतु यहाँकी मुक्ति, जीवकी मुक्तित्वसे मुक्ति है अर्थात् जीवको मुक्ततासे छुट्टी मिले। एक कथा है कि एक बार श्रीदेवर्षि नारद प्रफुल्लित अद्भुत आमोदमय वृन्दारण्यमें पधारे। वहाँपर जब उन्होंने श्रीवृषभानुनन्दिनी तथा व्रजांगनाओंके दिव्य प्रेममय हास-रास-विलास-विलासित भावोंका अनुभव किया तो रोने लगे। नारदको रोते देख व्रजरमणियोंने पूछा कि ऐसे आनन्द-समुद्रमें अवगाहन करनेके समय रोते क्यों हो? नारदने कहा—हम रोते उनके लिये हैं, जो मुक्त हो गये हैं। जो बन्धनमें हैं, उनको तो सम्भव है कि यह रस मिल सके। उनको श्रीवृषभानुनन्दिनी तथा श्रीकृष्ण परमानन्दके ऐसे अद्भुत प्रेमरसमय शृंगारका दर्शन हो सकेगा, मगर मुक्तोंको तो बिलकुल ही असम्भव है। इसी भावनासे कहते हैं कि वेदान्तियोंकी मुक्ति पाषाणकल्प है, किंतु उसके निरूपणका यह अवसर नहीं। आश्रय—ऊपर कहे हुए मुक्तोंको भगवल्लीलो- पयोगी दिव्य देहादिकोंका प्रदान करना, पूर्णतम पुरुषोत्तमलीन जीवोंका निष्कासन करनेपर उन मुक्तिमुक्तोंको लीलापरिकरोपयोगी बनाना आश्रय है, इसीको प्रत्यापत्ति कहते हैं, इसके अनुसार वह जीव वृन्दावनमें गुल्म, लता, पाषाण, वृक्ष हुए। मुक्त, मुनीन्द्र, अमलात्मा, महात्मा, परमहंस ही आकर सर्वरूपमें प्रकट हो गये हैं, इन्हींकी भोग्या सुधा देवभोग्या है। 'द्योतनात्मकत्वात्, प्रकाशात्मकत्वात्, श्रीकृष्णस्वरूपत्वात् देवाः, किं वा दीव्यन्तीति देवाः।' श्रीकृष्णचन्द्रसे क्रीड़ाके लिये जो आये, वे देव हैं। दिव् धातु तो बड़ा ही व्यापक अर्थ रखता है। 'दिवुक्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोद- मदस्वप्नकान्तिगतिषु'। ये देव पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्रके साथ लीला-परिकर होनेके लिये प्रादुर्भूत हुए। इनको भी प्रेमनिरोध हुआ। ये श्रीप्रभुके प्रेममें संसार- विस्मरणपूर्वक मनसे उनमें लीन हो गये। एक स्थिति तो यह कि 'वृन्दावनं परित्यज्य पदमेकं न गच्छति' तब तो ठीक ही है, पर जब भगवान् गये, तब तरु- गुल्म वगैरह शुष्क क्यों न हो गये? कारण यह कि बहिर्मुख नहीं, इनकी भावना यह है कि श्रीकृष्णचन्द्र कहीं गये ही नहीं। अगर वे प्रभुका वहाँ अभाव समझते तो मुरझाते, रोते, जल जाते, अतः प्रेमनिरोधसम्पन्न लता, तरु-गुल्म, खग-मृगोंमें देवभोग्या अधरसुधाका संचार हुआ। भगवान्‌के मुखचन्द्रसे निःसृत जिस वेणुनादामृतका वृक्ष-लता, खग-मृग, पशु आस्वादन करते हैं, वह देवभोग्या अधरसुधा है। यह सुधा है श्रोत्रपेया, मुखपेया नहीं, इस सुमधुर अधरसुधाका सम्भोग श्रोत्रोंद्वारा ही होता है। रसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रकी मंगलमयी लीला भी रसस्वरूप है एक बात यहाँ समझनी चाहिये कि वास्तवमें रसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी मंगलमयी लीला भी रसस्वरूप ही है। उनके लीलापरिकर भी रसस्वरूप हैं और लीलाभूमि भी रसस्वरूप है। भगवान् तो वास्तवमें आत्मरति हैं। जब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके भक्त आत्मरति हैं, उनको रमण करनेके लिये स्त्री, पुत्र, धन इत्यादि अनात्मसामग्री अपेक्षित नहीं है, तब उनके ध्येय पूर्णतम, पुरुषोत्तम, भगवान् आत्माराम, आप्तकाम आत्मामें रमण करेंगे, इसमें संशय ही क्या? वह अपने-आपमें रमण करते

वेणुगीत ९९ हैं— 'नहि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति'। एक सच्चिदानन्द परमात्माको छोड़कर सभी सान्त हैं भगवान्‌की रति आत्मामें, श्रीवृषभानुनन्दिनीमें और 'प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि'। (गीता श्रीव्रजांगनाओंमें है। सब उन्हींके रूप हैं। 'स १३।१९) समझो कि लीलारसविशेषके लिये निखिल भगवान् कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिम्नीति होवाच।' रसामृतसिन्धु, पूर्णतम, पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्र अन्तिम सर्वाधार अपने-आपहीमें स्थित होता है। परमानन्दकन्दने अपने-आपको ही सर्वस्वरूपमें विकसित पृथिवीका आधार जल, जलका तेज, तेजका वायु, किया, अतएव शुद्ध रसमय लीलामें प्राकृतता नहीं है। वायुका आकाश, उसका तन्मात्र, उसका अहंकार, यदि यह कहो कि आकर्षण नहीं—तो लीला कैसे? उसका महत्तत्व, उसका अव्यक्त प्रकृति, उसका तो प्रभु एक वैष्णवी मोहिनी मायासे सबोंके स्वरूपोंको सत्त्व; अब उसका आधार क्या? वह तो स्वयं आवृत—मोहित कर देते हैं। अतः निखिल रसामृतमूर्ति निराधार अपने-आपहीमें स्थित है। इसलिये श्रीकृष्णचन्द्र होते हुए भी वे अपने-आपको भूल जाते हैं। इसी परमानन्दकन्द सर्वत्र आपहीमें व्यक्त हुए। इस दृष्टिसे तरह श्रीवृषभानुनन्दिनी, व्रजांगना इत्यादि भी अपनेको आत्मरति बने, परंतु जब सब ही रसस्वरूप आत्मरति भूल जाते हैं। यदि स्वयं तृप्त हैं तो दूसरेकी स्पृहा हैं तो किसी एकको दूसरी ओर आकर्षण, प्रेम, कैसी? किंतु इस वैष्णवी मोहिनी मायासे यशोदामाता आसक्ति, व्यसन कैसे? क्योंकि जैसे श्रीकृष्णचन्द्र प्रभुके मुखारविन्दमें चराचर विश्वको देखती हुई भी, परमानन्दकन्द स्वरूपमें रमण करनेवाले हैं, वैसे ही अपनेको भूल गयीं, वैसे ही यहाँ भी सब अपने वृषभानुनन्दिनी और व्रजांगना आदि भी हैं। अर्थात् स्वरूपको भूल गये। यदि कोई कहे कि रुचिसे परस्पराकर्षण नहीं होगा, यदि आकर्षण नहीं तो अपनेको भुलाना कैसे? तो लोग जैसे भंग पीकर नानाविध विलास क्यों? एकमें अनेकत्व क्यों? अपनेको अपनी रुचिसे मोहित करते हैं। यह क्यों? 'एकोऽहं बहु स्याम्' यह क्यों? इसका उत्तर केवल विस्मृतिके लिये। विस्मृतिमें भी स्वाद है, रस है, यदि यही कि लीलारसास्वादनार्थ। वह स्वेच्छामूलक हो। अर्थात् जैसे प्राकृत मानव भगवान्‌के जन्म-कर्म बन्धनकारक नहीं हैं भंगादि मादक आसवोंद्वारा स्वरूपविस्मृतिपुरःसर लीलामें अब प्रश्न यह होता है कि आत्माराम, आप्तकाम, प्रवृत्त होता है, वैसे ही वैष्णवी मायासे भगवान् भी पूर्णतम, पुरुषोत्तमको लीलारसास्वादन कैसे? बात लीलामें प्रवृत्त होते हैं एवं यह स्पष्ट है कि इस ठीक है, पर यह तो आपत्ति सभी मतोंमें है। तब फिर मंगलमयी रसकी लीलासे, उसके मनन, निदिध्यासनसे किसलिये कहते हैं 'आप्तकामस्य का स्पृहा' और प्राणियोंका परम कल्याण है। जन्म, कर्म तो सबके कैसे फिर सब प्रपंच सम्भव है? अब पहला उत्तर ही हैं और प्राणियोंके जन्म-कर्म बन्धनकारक भी यह—जो सर्वमतसिद्ध भी है कि आप्तकाम भगवान्‌को होते हैं, मगर भगवान्‌के जन्म-कर्म बन्धन नहीं। अपना प्रयोजन तो कुछ नहीं, पर अनादिबद्ध जीवोंके जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। लिये प्रभु जगन्निर्माण करते हैं, एकमें अनेकता करते त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ हैं। यदि कहो 'न रहे बाँस न बजे बाँसुरी', यह (गीता ४।९) बात निरर्थक है, अनादिकालसे एकमें अनेकता व्यक्त श्रीभगवान् और जीवके जन्म-कर्म क्या बराबर है, जीवभाव नया नहीं है। जैसे जबसे आकाश है, हैं? जीवके जन्म-कर्म सुनते-देखते कल्प-कल्पान्तर तबसे ही उसमें श्यामलता भ्रान्ति है, वैसे ही अनादि बीत गये, अब भगवान्‌के जन्म-कर्म सुनने चाहिये। जीव हैं, अनादि प्रकृति है, किंतु अनादि रहनेपर भी उसीके द्वारा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी प्राप्ति सान्त हैं (यथा प्रागभाव)। अद्वैत मत यही है कि होगी। श्रीकृष्णके जन्म-कर्मके श्रवणसे प्राणियोंके

जन्म-कर्म छूटते हैं, प्राणियोंके जन्म-कर्म श्रवणसे जन्म-कर्मकी परम्परा बढ़ती है। अतः वह भगवान्‌की लीला ही थी, पर वह अप्राकृत थी। स्वाभाविक आसक्तिके लिये लौकिक रूपमें कही गयी है। संसारकी आकांक्षा, वांछा, आशा, तृष्णा और श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके सम्मिलनकी आकांक्षा, वांछा, आशा, तृष्णा क्या बराबर हैं? नहीं, दोनोंमें आकाश- पातालका अन्तर है। वह आशा पिशाची है। यह आशा कल्पलता है। इसलिये यह निर्विवाद है कि पूर्णतम, पुरुषोत्तम, निखिलरसामृतमूर्ति, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने अपने-आपको सर्वरूपमें व्यक्त किया। फिर भी लीलारसकी आसक्तिके लिये यहाँ स्वरूपानन्दका विस्मरण अपेक्षित है। इस तरह भगवत्स्वरूप होते हुए भी इन देवोंका विस्मृतिके कारण सुधाकी ओर आकर्षण उत्पन्न है। उनके प्रेमनिरोधके अनुकूल यह देवभोग्या सुधा है। व्रजांगनाएँ, जो श्रीकृष्णचन्द्रके अमृतमय मुखचन्द्रकी अधरसुधाके भोगनेयोग्य हैं, परंतु व्रजस्थ हैं, वे कैसे भोगें? इसलिये वेणुछिद्रोंमें प्रवेश कराके गीतरूपसे निरावरण कर्णकुहरोंद्वारा उनके हृदयमें पहुँचाना है, जिसे वे अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राण, रोम-रोममें अनुभव करके आन्तररमण प्राप्त करेंगी। भगवद्भोग्या अधरसुधा इसलिये प्रयुक्त है, जिससे सर्वाभोग्या अधरसुधाके अनुभवकी योग्यता प्राप्त हो। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके अमृतमय मुखसे निर्गत जो वेणुगीतपीयूष है, उसको निरावरण कर्णकुहरोंद्वारा पानकर अन्तःकरणमें उसे भावनासे परिवर्तित करती हुई व्रजांगना फिर उसीको उद्गाररूपमें वर्णन करती है। वही अधरसुधा व्रजांगनाओंके अधरपल्लवमें आती है, इसीसे अधरपल्लव पवित्र हो जाता है। अपवित्र मुखसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके अधरपल्लवमें रहनेवाली सर्वभोग्या अधरसुधाका सम्भोग नहीं हो सकता। अतः जब वे वेणुगीतपीयूषका श्रोत्रसे आस्वादन करेंगी और भावनापरिवर्धन-उद्गार- वर्णनसे मुख पवित्र होगा, तभी वह सर्वाभोग्या अधरसुधाके लिये अधिकारसम्पन्न होंगी।

प्रथम भगवान्‌का भक्तमें रमण, अनन्तर भक्तका भगवान्‌में रमण पहले भगवान् भक्तमें रमण करते हैं, तब भक्त भगवान्‌में रमण करनेके अधिकारी होते हैं। यदि श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मुखपंकजसे वेणुगीत- पीयूषद्वारा व्रजांगनाओंके मुखपंकजका अधरपल्लव शुद्ध हो लेगा, तब श्रीव्रजांगनाएँ भगवद्रमणयोग्य होंगी। सम्प्रयोगात्मक शृंगारमें श्रीकृष्ण भी व्रजांगनाओंके पवित्र अधरपल्लवमें अधरसुधाका सम्भोग करेंगे। इस तरह व्रजांगनाओंके अधरपल्लवमें स्थित सुधा भगवद्भोग्या सुधा है। व्रजांगनाओंके अधरपल्लवमें रहनेवाली सुधा भी श्रीकृष्णकी ही अधरसुधा है; क्योंकि भगवान्‌के अधरमें रहनेवाली भगवद्भोग्या अधरसुधा ही वेणुछिद्रोंमें प्रविष्ट होकर, गीतपीयूष- रूपमें व्यक्त होकर व्रजांगनाओंके श्रोत्र, अन्तःकरण, अन्तरात्मामें भरपूर हो, अधरपल्लवमें वर्णनव्याजसे प्राप्त होकर सम्प्रयोगकालमें भगवद्भोग्या हुई थी। भगवान्‌के अधरमें रहकर वह भगवद्भोग्या नहीं हो सकती थी, इस प्रकार हो गयी। 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च' यहाँ भी श्रीका अर्थ श्रीवृषभानुनन्दिनी है। वैसे तो श्री शब्दका प्रयोग लक्ष्मीमें भी होता है, पर जहाँ श्री तथा लक्ष्मीका पृथक् पठन है, वहाँ श्रीका अर्थ लक्ष्मी क्यों किया जाय? 'लक्ष्मी' अर्थमें 'श्रयते हरिः या सा श्रीः, श्रयते सेवते (श्रिञ् सेवायाम्)' ऐसे अर्थ हैं, किंतु यहाँ 'श्रीयते सर्वैर्गुणैर्या सा,' ऐसा कर्ममें प्रत्यय। जो समस्त गुणगणोंसे, अद्भुत सौन्दर्य, सौरस्य, सौगन्ध्य इत्यादिसे सेवित हो, वह श्री। यह सेविका श्री नहीं, सेव्या श्री है अर्थात् सकल गुण-गण मूर्तिमान् होकर जिसकी सेवा करें, वह श्रीवृषभानुनन्दिनी श्री हैं। जितनी भी अनन्तकोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत सौरस्य, सौगन्ध्य, सौन्दर्य, मार्दव, माधुर्यादि गुणोंकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी महाशक्तियाँ हैं, वे मूर्तिमती होकर राधाकी सेवामें उपस्थित हैं। इसीलिये गोलोकधाममें मूर्तिमती शोभादि गोपांगनाएँ राधाजीकी सेवामें उपस्थित हैं। अब

वेणुगीत १०१ वृषभानुनन्दिनीकी सुन्दरताकी कल्पना कौन करे? सोचते हैं कि भगवान् किसका ध्यान करते हैं? इतनेमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत सौन्दर्यबिन्दुका उद्गम- भगवान्‌का ध्यान खुला, युधिष्ठिर पूछते हैं- 'आप स्थान जो सौन्दर्यसिन्धु है, उसकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी अभी किसका ध्यान करते थे, भगवन्!' भगवान्‌ने श्रीवृषभानुनन्दिनीकी सेवामें रहती हैं। भगवान् श्यामसुन्दर, कहा- 'इस समय भीष्म शरशय्यापर पड़े हुए हमारा व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी तो ध्यान कर रहे थे। हमारा भी व्रत है कि 'ये यथा माधुर्याधिष्ठात्री स्वयं वृषभानुनन्दिनी ही हैं। अनन्तकोटि मां प्रपद्यन्ते' इसलिये हम भी उन्हींके ध्यानमें ब्रह्माण्डान्तर्गत जो मार्दव है, उसकी अधिष्ठात्री देवी तन्मनस्क रहे।' अस्तु, इन पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभुकी महालक्ष्मीके चरण इतने कोमल हैं कि कोमल-से- माधुर्याधिष्ठात्री देवता राधा हैं, उन्हींके ध्यानमें कोमल कमलकी पँखुड़ीके गड़नेका डर रहता है। भगवान् रहे, उन्हींका जप भी करते रहे। वंशीमें भी इतनी मृदुलता जिसके चरणोंमें है, उस महालक्ष्मीके वही बजाते थे 'ताहि श्याम वंशीमें गावत।' हस्तारविन्द कितने कोमल होंगे, कुछ ठिकाना नहीं। शुकको भी पढ़ाते थे कि 'वत्स पठ धाराधरवपुः ऐसी जो महालक्ष्मी हैं, वे अपने सुकोमल श्रीहस्तोंसे श्रीमन्नारायणोऽवतु।' इस व्याजसे धाराधरवपुमें वृषभानुनन्दिनीके श्रीचरणोंको स्पर्श करनेमें सकुचाती 'धाराधारा' कहनेसे राधाका नाम लेते थे। 'मरा मरा' हैं कि कोमल चरणोंमें कहीं आघात न लग जाय। कहनेसे वाल्मीकि भी राममें परिनिष्ठित हो गये। ऐसा ऐसे ही क्षमाधिष्ठात्री, दयाधिष्ठात्री, शोभाधिष्ठात्री, उलटा क्यों? इसलिये कि अगर अम्बा नन्दरानीके करुणाधिष्ठात्री शक्तियाँ सर्वगुणगणोंसहित निरन्तर सामने स्त्रीका नाम लें तो वह क्या समझेंगी? अतः श्रीवृषभानुनन्दिनीका सेवन करती हैं। प्रकट नहीं लेते। वैसे अम्बा व्रजगेहिनी नन्दरानी कोई भावुक तो कहते हैं कि 'श्रीयते हरिणाऽपि समझे कि हमारा लाला बड़ा भक्त है, स्नानकर या सा श्रीः।' जैसे भक्त भगवान्‌को भजते हैं, वैसे भगवान्‌का नाम जपा करता है। तात्पर्य यह कि ही भगवान् भक्तको। ठीक ही है, भगवान् स्वयं कहते 'श्रीयते श्रीकृष्णोऽपि या सा श्रीः।' वह श्री हैं— 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्'। जहाँ नहीं, वहाँ श्रीकृष्णका रमण नहीं। वही श्रीराधा (गीता ४।१०) माधुर्याधिष्ठात्री शक्ति, माधुर्यसारसर्वस्व श्रीकृष्णचन्द्रके यदि श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- अमृतमय मुखचन्द्रमें अधरसुधाके रूपमें विराजमान कन्दको भजती हैं तो वैसे ही भक्तभजनानुविधायी हैं। इसलिये जब अधरसुधाको वंशीके छिद्रमें निक्षिप्तकर भगवान् भी वृषभानुनन्दिनीको कैसे न भजें? व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाया तो वही अधरसुधा 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में एक कथा है- व्रजांगनाओंके मुखपंकजमें आयी। वह स्वरूप उनके एक समय श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द अपने अन्तरात्मामें, अन्तःकरणमें, प्राणोंमें, रोम-रोममें आ शुकको पढ़ाते थे, साथ-साथ श्रीराधाका ध्यान भी गया। वही वृषभानुनन्दिनी हैं। अतः वहाँ श्रीका यानी कर रहे थे। आखिर किसीका ध्यान तो करना ही वृषभानुनन्दिनीका संचार है और जहाँ उनका संचार चाहिये। भक्त भगवान्‌का ध्यान करते हैं तो भगवान् है, वहीं श्रीकृष्ण परमानन्दका रमण होता है। पूर्णतम, भक्तका करेंगे ही। उसी ध्यानानन्दमें महाराजके पुरुषोत्तम भगवान् अपनी ही माधुर्याधिष्ठात्री शक्तिका नयनोंसे अश्रु बह रहा था। श्रीअंगमें पुलकावली हो आस्वादन करते हैं। फूलोंमें स्वयं अगर घ्राणशक्ति हो गयी थी। भारतकी कथा है कि भगवान् भीष्मजीका तो वे जैसा आघ्राण करेंगे, वैसे ही यह रमण है। यह ध्यान कर रहे थे, उसी समय धर्मराज युधिष्ठिर पहुँचे आया कि भगवान् आत्मरति हैं। ठीक ही है, जिनका और भगवान्‌को ध्यान करते देख चकित हो गये। ध्यान करनेवाले अमलात्मा परमहंस मुनीन्द्र अपने

१०२ भक्तिसुधा रमणके लिये किसीकी अपेक्षा नहीं करते, उनके ध्येय, आराध्यदेव श्रीप्रभु अनात्मरति कैसे होंगे? जहाँ-जहाँ इनका प्राकट्य नहीं, वहाँ श्रीकृष्णका रमण भी नहीं। प्राणिमात्रके लिये अपेक्षित यही है कि वह ब्रह्म-संस्पर्श, ब्रह्मरस-सम्भोगका प्रयत्न करे। यही जीवनकी सफलता है। यहाँके षड्रस भोगते-भोगते कल्पकल्पान्तर बीत गये, अतः प्रत्येक उस ब्राह्मारस, स्पर्शके लिये लालायित हो, यही ठीक है। जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए विधाता॥ (रा०च०मा० १।२०४।२) भगवान्‌का आत्माभिरमण जिसका मन इनके लिये उत्कण्ठित न होता हो, वह प्राणी नहीं। अस्तु, यह हो तब श्रीकृष्ण सबमें रमण करें। प्रथम ब्रह्म जीवमें रमण करे, फिर जीव ब्रह्ममें। व्रजांगनाओंमें कोई ऋषिरूपा थी, कोई अग्निरूपा, कोई साधनसिद्धा, कोई नित्यसिद्धा, कोई जनकपुरनिवासिनी। उन सबोंमें प्रथम श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका रमण हो, फिर उनका श्रीकृष्णमें। यहाँपर दोनोंके रमणमें भेद है, पर प्रश्न यह है कि भगवान् भक्तमें रमण कैसे करें? वे तो आप्तकाम, आत्माराम हैं, परंतु श्रीवृषभानुनन्दिनी तो उनकी आत्मा ही हैं। क्या आनन्दसुधासिन्धुसे उसका माधुर्य पृथक् है? इसलिये श्रीकृष्णकी आत्मा ही वृषभानुनन्दिनी हैं। उनका रमण उन्हींमें है, फिर व्रजांगनामें कैसे रमण करें? इसका उत्तर यह है कि जहाँ श्रीकृष्णचन्द्रकी आत्माका संचार है, वहीं उनका रमण—इसीलिये व्रजांगनाओंमें पहले श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने आत्माका संचार किया। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दसिन्धुकी माधुर्यसारसर्वस्वभूता अधरसुधा वृषभानुनन्दिनी ही हैं। वेणुगीतद्वारा वे ही भगवद्भोग्या सुधाके रूपमें व्रजांगनाओंके श्रोत्रोंद्वारा उनके अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राण, इन्द्रियों एवं रोम-रोममें परिपूर्ण हो गयीं। अतएव व्रजांगना भी वृषभानुनन्दिनीरूप होकर कृष्णकी आत्मा ही होंगी, अब उनमें रमण भी श्रीकृष्णका आत्मामें ही रमण है। क्या उनमें आत्माका मुलम्मा हुआ? नहीं, उसके केवल संसर्गसे उनमें तन्मयता हो गयी। यदि माधुर्यसारसर्वस्व ऊपर-का-ऊपर ही रहता तो मुलम्मा कहा जाता। यहाँ तो भगवान्‌ने अपनी अधरसुधाको वेणुके द्वारा उनके हृदयमें भरकर भावनासे परिवर्धितकर सर्वत्र स्वरूपमें भरपूरकर तन्मय कर दिया। सूर्यका प्रतिबिम्ब जलपर पड़ता है, दर्पणपर पड़ता है, काष्ठपर नहीं, दीवारपर नहीं, पर दीवारको यदि जलसे तर कर दें तो दीवारपर भी प्रतिबिम्ब पड़ेगा। आत्माका प्रतिबिम्ब अन्तःकरणपर पड़ता है, घटपर नहीं, पर चक्षुद्वारा जब अन्तःकरण घटाकाराकारित हो, तब घटपर भी पड़ता है, जैसे जलमय दीवारपर सूर्य-प्रतिबिम्ब। इसी तरह जैसा सूर्य-प्रतिबिम्ब मुख्य रूपसे जलपर पड़ता है, दीवारपर जलसंसर्गसे ही पड़ता है, वैसे ही श्रीकृष्णका मुख्य रमण वृषभानुनन्दिनीमें और अन्यत्र वृषभानुनन्दिनीके संसर्गसे होता है। माधुर्यसारसर्वस्व अधरसुधाके संचारसे सर्वत्र संसर्ग होनेके कारण भगवान्‌का सर्वत्र रमण होता है, सिद्धान्त यह है कि एक पूर्णतम पुरुषोत्तम रसस्वरूप परम तत्त्व अपने-आप ही श्रीकृष्णरूपमें, वृषभानुनन्दिनीके रूपमें प्रकट है, वही व्रजांगनाओंके रूपमें लीलाभूमिके रूपमें भी प्रकट है, पर मोहिनी शक्तिसे सब आवृत रहा, किंतु जिसका जो रूप है, वह व्यक्त हो ही जाता है। व्यक्त अग्निवाले काष्ठके सम्बन्धसे जैसे अव्यक्त अग्निवाले काष्ठमें भी अग्निकी अभिव्यक्ति हो जाती है, उसी तरह व्यक्त आत्मस्वरूपवाली वस्तुके सम्बन्धसे अव्यक्त आत्मस्वरूपवाली वस्तुमें भी आत्माका प्राकट्य हो जाता है। वास्तवमें व्रजांगनाएँ भी रसस्वरूपा हैं; किंतु उनमें माधुर्यस्वरूप अव्यक्त था। उससे जब वृषभानुनन्दिनीके व्यक्त स्वरूपका सम्बन्ध हुआ, तब वह व्यक्त हो गया। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- कन्दकी अधरसुधा व्यक्त माधुर्यसारसर्वस्व है। उसके सम्बन्धसे व्रजांगनामें भी वह व्यक्त हो गया। हम

वेणुगीत १०३ तो कहते हैं कि जितना भी विश्व है, वह— ‘आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभि- संविशन्ति।’ (तैत्तिरीय० ३।६) इस सिद्धान्तके अनुसार आनन्दस्वरूप ही है। यह तो जैसे किसीको अमृतसिन्धुमें क्षारसिन्धुकी भ्रान्ति हो, वैसे ही अचिन्त्य, अनन्त, परमानन्दसिन्धुमें भवसिन्धुकी भ्रान्ति होती है—‘आनँद-सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥’ (विनय-पत्रिका १३६।२) ‘आनन्दसिन्धुके बर्फकी तू पुतली है, तेरे भीतर- बाहर सर्वत्र आनन्द भरपूर है।’ इस तरह सबका असली स्वरूप आनन्द ही है, पर वह अव्यक्त है, श्रुति कहती है—‘तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी।’ (तैत्तिरीय० २।१) वस्तुतः काष्ठ, अग्नि भी पृथक्-पृथक् वस्तु नहीं है। आत्मासे ही आकाश, उससे वायु, वायुसे तेज उत्पन्न हुआ। तेजसे ही जल, उससे पृथ्वी, उसीसे काष्ठादि। और यह सिद्धान्त है कि कारणसे भिन्न कार्य नहीं। फिर तो जैसे मिट्टीसे उत्पन्न घट मिट्टीसे पृथक् नहीं, वैसे ही तेजसे उत्पन्न जल तेजसे पृथक् नहीं, जलसे उत्पन्न पृथ्वी और उससे उत्पन्न काष्ठ भी अग्नि या तेजसे भिन्न नहीं। इस तरह काष्ठ, अग्निका भी वास्तविक भेद नहीं रहता। तथापि काष्ठ तेजका आवरक होता है। कार्यसे कारणस्वरूपका आवरण होता ही है एवं सर्व तत्त्वोंकी आनन्दस्वरूपता आवृत है, जहाँ माधुर्यसारसर्वस्व सुमधुर अधरसुधाके वेणुगीतपीयूषका आस्वादन प्राप्त होता है, वहाँ उस व्यक्त आनन्दस्वरूपसे आनन्द व्यक्त होता है, वहीं आत्मरति श्रीकृष्णका रमण भी होता है। यह लचर दलीलकी बात नहीं, शुद्ध भित्तिपर स्थित सिद्धान्त है। अगर कोई समझना चाहता है तो समझ ले। तात्पर्य यह कि श्रीकृष्णका रमण आत्मामें है, अनात्मामें नहीं। भगवान्‌के गुणगणोंके श्रवणसे अन्तःकरणमें भगवान्‌का प्राकट्य अभिव्यक्ति कई तरहसे होती है। जिन्हें वंशीगीत सुननेको नहीं मिला, उन जीवोंको ‘प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण स्वानां भावसरोरुहम्’ (श्रीमद्भा० २।८।५)-के अनुसार भगवान्‌की मंगलमयी कथासुधाके श्रवणसे स्वाभाविक आनन्दरूपता व्यक्त होती है। सर्वत्र इसीलिये श्रवण ही मुख्य कहा है। ‘मद्गुण- श्रुतिमात्रेण’ (श्रीमद्भा० ३।२९।११), ‘द्रुतस्य भगवद्धर्मात् धारावाहिकतां गता’, ‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः’ (बृहदारण्यक० २।४।५)। इत्यादिसे श्रवणका माहात्म्य स्पष्ट है। भगवान्‌के गुणगणोंके श्रवणसे अन्तःकरणमें भगवान्‌का प्राकट्य होता है। गुणचरित्र-श्रवणद्वारा भगवान्‌के स्नेहसे द्रवीभूत चित्तवृत्तिका भगवान्‌की ओर अखण्ड प्रवाह ही भक्ति है। श्रवणसे भगवान् अवश्य भक्तके हृदयमें व्यक्त होते हैं, परंतु श्रवण भी उसी तरहका हो। उच्चकोटिके परमहंस भावुक अपने हृदयमें भगवत्तत्त्वका अनुभव करते हुए ‘भावना’ से उसका परिवर्धन करते हैं। जैसे कहींका थोड़ा स्रोत बहुत जगहके झरनेसे बड़ा होता है, वैसे जो कोई भावुक पूर्णरूपसे श्रवण, मनन, निदिध्यासनोंसे भगवत्तत्त्वका हृदयमें साक्षात्कार, अवगाहन, चिन्तन किया करते हैं, वहाँ वही रस सर्वत्र अन्तःकरण, प्राण, रोम-रोममें भरपूर होता है। कहीं किसी तरहसे उसका उद्गार कथासुधारूपमें निकला, तब वह प्राकृत कथा नहीं, भगवत्तत्त्व ही उस रूपसे व्यक्त होता है। प्रसिद्ध है कि महर्षि वाल्मीकिका शोक ही श्लोक रूपमें व्यक्त हुआ— ‘शोकः श्लोकत्वमागतः’॥ (वा०रा० १।२।४०) महर्षि अपने शिष्य भरद्वाजको लेकर तमसातीरपर आये। वहाँ क्रौंच-क्रौंची विहार कर रहे थे। इतनेमें किसी व्याधने क्रौंचको बाण मारा। वह मर गया और क्रौंची करुण-विलाप करने लगी। महर्षिका हृदय करुणारससागरसे भरपूर था। आश्रममें जानकीजी पधारी थीं, लोकापवादभयसे श्रीमदरामजीने उन्हें

लक्ष्मणद्वारा त्याग दिया था। जब लक्ष्मणको रथपर विह्वल देखा तो जनकनन्दिनीने पूछा—लक्ष्मण! आपकी यह दशा किसलिये ? इसपर लक्ष्मणने जो कहा, उसे सुनकर जनकनन्दिनी मूर्च्छित हो गयीं। उन्हें वहीं छोड़कर लक्ष्मण अयोध्या चले गये। वाल्मीकिने शिष्योंद्वारा सुनकर जनकनन्दिनीसे वृत्तान्त पूछा। अनन्तर उनका सान्त्वनकर ऋषिपत्नियोंके संरक्षणमें उन्हें रखा। वहाँ यथाकाल उनके दो पुत्र हुए। रामवियोगमें जनकनन्दिनीके क्रन्दनसे जो अद्भुत कारुण्यरससागर हृदयमें लहरा रहा था, वही क्रौंची- विलापसे उमड़ पड़ा। मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥ (वा०रा० १।२।१५) यह बुद्धिपूर्वक लिखा गया श्लोक नहीं, शोक ही श्लोक बन गया है। कोई भी कोई बात समझके साथ कहे, वह उद्गार नहीं। रसमें उफान आ जाता है। वह उच्छलित हो उठता है। संकुचित दिव्यपात्रमें भरपूर रस वायुके हलचलसे या किसी अन्य कारणसे उच्छलित हो उठे, वह उद्गार है। इसीसे भावुक श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मंगलमय, परम पवित्र चरित्रका हृदयमें अवगाहन करते हैं, वहीं कहीं प्रश्नवशात् लीलासुधारससार परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान् जब निकलते हैं तो कथासुधारूपमें। यही व्यक्त अग्नि है। भावुकोंके मुखपंकजसे विनिःसृत श्रीकृष्ण-कथासुधा श्रोत्रोंद्वारा भक्तहृदयमें गयी तो वहाँ भी कृष्णस्वरूप व्यक्त हो उठता है। 'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यम्' (गीता १३।१७)-के अनुसार वैसे तो सब भगवान् हैं ही, पर अव्यक्त रहते हैं। जिसको वे व्यक्त हैं, उसके मुखपद्मसे कथासुधारूपमें जहाँ गये, वहाँपर भी व्यक्त हो जाते हैं। बस फिर जहाँ ही श्रीकृष्णकी आत्मा व्यक्त होती है, वहीं आत्माराम श्रीकृष्णका रमण होता है। श्रीकृष्णके रमणके पश्चात् भावुकोंका भी कृष्णमें रमण होता है। तात्पर्य यही कि आनन्दस्वरूप कृष्णसे सारा विश्व ही उत्पन्न है। अतः सभी कृष्णकी आत्मा हैं। किसी तरह भी जहाँ अव्यक्त आत्मा व्यक्त हुई, वहीं कृष्णका रमण होता है। विशेषतः व्रजांगनाओंको तो परम्परासे नहीं, साक्षात् श्रीकृष्णके ही मुखचन्द्रकी अधरसुधारूप श्रीकृष्णकी आत्मरूपा वृषभानुनन्दिनी श्रीवेणुगीतरूपमें प्राप्त हुई, अतः उनकी अव्यक्त रसरूपता-आत्मरूपता सुतरां व्यक्त हो उठी। अतः सब व्रजांगनाएँ वृषभानुनन्दिनी- स्वरूपा हो गयीं और श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके अधरमें रहनेवाली अधरसुधा व्रजांगनाओंके अधरमें आयी। उसका सम्भोग श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दने किया, अतः वह भगवद्भोग्या सुधा है। अब व्रजांगनाओंका रमण श्रीकृष्णमें होगा। 'छान्दोग्योपनिषद्' में कहा कि जीवात्मा नाना प्रकारके कर्मोंको करके चान्द्रमस लोकमें चन्द्रस्वरूप धारण करते हैं और वे चन्द्रभावापन्न होकर देवताओंके अन्न—भोग्य हो जाते हैं। तो कर्म क्या देवताओंके खानेकी सामग्री होनेके लिये किया जाता है ? नहीं, यहाँ अन्नका अर्थ सम्भोगसाधन है। जैसे राजाओंकी सभाके सभ्य (सदस्य) राजाके मनबहलावके लिये होनेके कारण उनके उपकरण समझे जाते हैं, वैसे ही जीव भी इन्द्रसभाके सभ्य होकर उनकी आनन्द- सामग्री होंगे। यही उनकी भोग्यता है। इस रीतिसे समस्त जीवजगत् परमात्माका आराधनकर उनका यश-विस्तीर्ण करता है, इसलिये वह परमात्माका भोग्य है। भगवान् तो वास्तवमें आप्तकाम, आत्माराम हैं, फिर भी भक्तोंके लिये स्वरूप धारण करते हैं। भक्तोंके मनमें भी वैसी ही उत्कण्ठा रहती है। वे भगवान्के पीताम्बर, भगवान्के चन्दन, भगवान्के मस्तकपर विराजित मुकुट-किरीट, भगवान्के श्रीअंगपर शोभायमान गुंजा, श्रीकण्ठमें वैजयन्ती, वन्यस्तबक- पुष्पमयी माला होकर उनकी सेवा करना चाहते हैं। इन्द्रादिक निष्काम नहीं हैं। भगवान् निष्काम हैं। केवल लोगोंके लिये वे सकाम हो जाते हैं। इस तरह जीवोंका भगवद्भोगसाधन बनना जीवोंकी भोग्यता है।

इसी तरह भगवान् भी जीवके भोग्य हो जाते हैं, यह बात अलग है। यह समझो कि इन सब सामग्रीसे— भगवद्भोग्या अधरसुधाके संचारसे—भगवदात्मभूता माधुर्यसारसर्वस्व श्रीवृषभानुनन्दिनीका संचार होगा, तब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका रमण होगा। पहले जीवमें भगवान्‌का भोग्यत्व होकर उसमें भगवान्‌का रमण होता है, फिर भगवान् जीवके भोग्य होते हैं और उनमें जीवका रमण होता है। प्रथम श्रीकृष्णका व्रजांगनामें रमण, फिर व्रजांगनाका श्रीकृष्णमें रमण। भोग्य परतन्त्र होता है, भोक्ता स्वतन्त्र। व्रजांगनाओंमें— जीवोंमें पारतन्त्र्य, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें स्वातन्त्र्य। स्वाधीन (कृष्णाधीन) जो जीव—व्रजांगनाएँ हैं, उनमें श्रीकृष्ण रमण करेंगे। जहाँ जीवात्मा— व्रजांगनाएँ भगवान्में रमण करते हैं, वहाँ जीवात्मा— व्रजांगनाएँ भोक्ता और भगवान् भोग्य, व्रजांगनामें स्वातन्त्र्य और श्रीकृष्णमें पारतन्त्र्य, यह उलटा होगा। मगर बात यह बहुत ऊँची है। यह दार्शनिक दृष्टि है। भगवान् पूर्ण स्वतन्त्र भक्त पूर्ण परतन्त्र यहाँ शृंगाररसका प्राधान्य है। सम्प्रयोग विप्रयोगात्मक शृंगाररसात्माकी यह लीला है। शृंगाररसमें यह स्थिति रहती है कि नायिका भोग्या होती है और नायक भोक्ता। इसको साधारणी स्थिति कहते हैं। असाधारणी स्थितिमें नायक नायिकाभावापन्न तथा नायिका नायकभावापन्न हो जाती हैं। लौकिक शृंगारमें तो सब आरोप-ही-आरोप हैं, तत्त्वतः कुछ नहीं। रसोद्रेकमें एक प्रकारका अभिमान हो जाता है। उस स्थितिमें विपरीत रति होती है, किंतु यहाँ केवल अभिमान ही नहीं, वस्तुतः नायक नायिकाभावापन्न तथा नायिका नायकभावापन्न हुई हैं। स्वातन्त्र्य ही पुंस्त्व है और पारतन्त्र्य ही स्त्रीत्व। पुमान् एक पूर्णतम पुरुषोत्तम ही हैं। निरंकुशता, पूर्ण स्वातन्त्र्य केवल उन्हींमें है। तद्व्यतिरिक्त जीवोंमें आधिपारतन्त्र्य, व्याधिपारतन्त्र्य, जरापारतन्त्र्य, मरणपारतन्त्र्य—अनेकविध पारतन्त्र्य—बन्धन हैं। जितने-जितने अंशमें पारतन्त्र्य मिटता गया, उतने अंशमें स्त्रीत्व भी मिटा। जितने- जितने अंशमें स्वातन्त्र्यका उदय हुआ, उतने-उतने अंशमें पुंस्त्वका भी उदय हुआ। अविद्या, कामकर्मादि जरादि, किसी प्रकारका भी पारत

१०६ भक्तिसुधा कहा कि हम भक्तद्रोहीका रक्षण नहीं कर सकते। आगे ब्रह्मा, शिवका भी यही जवाब हुआ। आखिर दुर्वासा श्रीभगवान् महाविष्णुके पास गये। तब भगवान् कहते हैं कि आपका रक्षण करना तो ठीक ही है, पर क्या करूँ? मैं स्वतन्त्र नहीं। स्वतन्त्र अगर होता तो अवश्यमेव आपका रक्षण करता। मैं भक्तपरतन्त्र हूँ। कारण, मेरा व्रत है कि—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) हमारे भक्त इतने तन्मय हो जाते हैं कि वे मुझसे अतिरिक्त कुछ जानते ही नहीं। तब फिर मैं भी उनसे अतिरिक्त क्या जानूँ?' इसीको लेकर यह आया कि पहले भक्तमें अत्यन्त परतन्त्र्य, भगवान्‌में स्वातन्त्र्य; पीछे 'ये यथा' के अनुसार भक्तमें स्वातन्त्र्य और भगवान्‌में परतन्त्र्य होता है। 'ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभर छाछ पै नाच नचावैं॥' बड़े-बड़े देवाधिदेव जिनका ध्यान करते हैं, 'भीरपि यद्विभेति', उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके दोनों श्रीहस्त अपने एक हाथमें पकड़कर नन्दरानी एक हाथसे छड़ी दिखायें और भगवान् भी उस छड़ीसे डरें, यही परतन्त्र्य है। इससे स्पष्ट है कि पहले भगवान्‌में स्वातन्त्र्य, फिर भक्तमें स्वातन्त्र्य; पहले भगवत्सम्मिलनके लिये भक्त लालायित, फिर भक्तसम्मिलनके लिये भगवान् लालायित। परमभक्त मधुसूदन सरस्वतीने वृन्दावनमें जाकर भगवत्साक्षात्कारके लिये 'गोपालसहस्रनाम' के चार पुरश्चरण किये, पर उनको साक्षात्कार न हुआ, फिर काशीमें आये और यहाँपर श्रीकालभैरवका अनुष्ठान किया। उस अनुष्ठानपर श्रीभैरव प्रसन्न हुए। कहा—वर माँगो। इसपर मधुसूदन सरस्वतीने कृष्णसाक्षात्कार ही माँगा। भैरव कहते हैं कि वृन्दावन जाओ और वहाँ 'गोपालसहस्रनाम' का पुरश्चरण करो। मधुसूदन कहते हैं कि मैंने तो वहाँपर चार पुरश्चरण किये, पर साक्षात्कार नहीं हुआ। इसपर श्रीकालभैरवने पापोंके चार पहाड़ दिखलाये और कहा कि उन पुरश्चरणोंसे ये नष्ट हुए, अबकी बार साक्षात्कार होगा। मधुसूदन सरस्वती पुनः वृन्दावन गये, 'गोपालसहस्रनाम' का अनुष्ठान किया और तब भगवान्‌का प्राकट्य हुआ। जब श्रीश्यामसुन्दर सामने आकर खड़े हुए तो मधुसूदन सरस्वतीने चट अपना मुँह फेर लिया। जिधर-जिधर श्यामसुन्दर जाकर खड़े हों, उधर-उधरसे मधुसूदन अपना मुँह फेर लें। आखिर श्रीकृष्णचन्द्रने ही उन्हें मनाना शुरू किया। कहाँ यह स्थिति कि वह श्रीकृष्णके लिये लालायित और कहाँ यह कि अब श्रीकृष्ण ही उन्हें मनाते हैं। महास्वातन्त्र्यके पूर्व परतन्त्र्य अपेक्षित है। अगर स्वतन्त्रता चाहते हो तो उसका कुछ त्याग भी करो। हम वेद, शास्त्र, माता, पिता, धर्म-कर्मोंसे भी स्वतन्त्रता चाहते हैं, पर यह स्वतन्त्रता तो परतन्त्रताके घोर गर्तमें गिरानेवाली है। बालक माता, पिता, अध्यापकोंके परतन्त्र न हों तो वे उच्छृंखल होंगे। फिर जन्म-जन्मके लिये घोर अनर्थमय कंटकाकीर्ण गर्तमें पड़ेंगे। कोई भी राष्ट्र स्वतन्त्रतारक्षाके लिये सैनिक-संगठन करना चाहे तो वह सेनापतिके अत्यन्त परतन्त्र हो। अगर सेना उसकी आज्ञाका उल्लंघन करे तो विजय, स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो सकती। अतः परम सिद्धान्त यह है कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भक्तके परतन्त्र होते हैं। जिनके भृकुटिविलाससे सबको नचानेवाली माया जिनके सामने नाचे, वे स्वयं नाचते हैं—'तद्वशो दारुयन्त्रवत्।' (श्रीमद्भा० १०।११।७) परमानन्दमूर्ति श्रीकृष्ण कठपुतलीके समान व्रजांगनाओंके परतन्त्र हो गये। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता १८।६१) सर्वभूतोंके हृदयमें स्थित होकर भगवान् काठकी पुतलीके समान सबको नचाते हैं और वे ही फिर प्रेम-परतन्त्र होकर भक्तोंके खिलौने बन जाते हैं। भक्तमें भगवद्भावापत्ति, भगवान्‌में भक्तभावापत्ति— इसीका नाम परस्परभावापन्नता है। यह रसोद्रेक, आनन्दोद्रेकमें होता है। अतएव श्रीकृष्णमें

व्रजांगनाभावापत्ति और व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णभावापत्ति कही गयी। वृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्ण हो गयीं और श्रीकृष्ण वृषभानुनन्दिनी हो गये—यह भावनाकी महिमा है। औरोंकी भावना अभिनिवेश, अभिमान अदृढ़ और भगवान्‌का तथा वृषभानुनन्दिनीका अभिमान सुदृढ़ है। जब रसोद्रेकमें विपरीत रतिका संचार हुआ, वृषभानुनन्दिनीका श्रीकृष्णमें अभिमानपुरःसर प्रवेश हुआ, तब वृषभानुनन्दिनीमें भी श्रीकृष्णका अभिमान- पुरःसर प्रवेश हुआ। इसीलिये कहा जाता है कि— 'शिवस्य हृदयं विष्णुः विष्णोश्च हृदयं शिवः।' दोनों परस्पर अन्तरात्मा हैं। शिव संहारक और विष्णु पालक देवता हैं। संहारमें तमोगुणप्राधान्य और पालनमें सत्त्वगुणप्राधान्य होता है। सत्त्व स्वच्छ, शुभ्र प्रकाशात्मक तथा तम आवरणात्मक, काला है। अतः शंकरको कृष्ण होना चाहिये और विष्णुको शुक्ल, पर यहाँ तो सब उलटा ही है। क्यों? परस्पर सुदृढ़ उपास्योपासकभावसे परस्परका रंग परस्परमें आया। कारण—'सेवक स्वामि सखा सिय पी के।' (रा०च०मा० १।१५।४) शिव भगवान्‌के सेवक भी, स्वामी भी, सखा भी, अतः स्वच्छ, सत्त्वमय विष्णुकी भावनाकी महिमासे शिव शुक्ल हो गये, भावनाकी ही महिमासे विष्णु श्यामल हो गये। ऐसे ही देखें तो संकीर्णताको अवकाश नहीं। कहीं-कहीं तो ऐसा भी लिखा है कि श्रीशंकर ही श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं; क्योंकि दोनों परस्पर अन्तरात्मा ही हैं न ! जैसे रुद्ररूपा वंशी मानी गयी, वैसे ही कहीं श्रीकृष्णको कालका अवतार माना है। प्रकृतमें यह आया कि साधारण शृंगारमें भावना अभिमानमात्र है। यहाँ तो स्वरूपपरिवर्तन भी है। यहाँ वृन्दावन्य, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द, वृषभानुनन्दिनी, व्रजांगनाएँ, एतत् समवेत मंगलमयी लीलाभूमि उस अचिन्त्य, अनन्त, अद्भुत, प्रेमानन्दरससिन्धुमें क्षण-क्षण आविर्भूत- तिरोभूत होते रहते हैं, उन्मज्जन-निमज्जन करते रहते हैं। उस स्थितिमें कभी श्रीकृष्ण वृषभानुनन्दिनीके रूपमें, कभी वृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्णके रूपमें प्रकट होती हैं। यही कहा 'उभयोभयभावात्मा।' आया यह कि साधारण नायकमें उत्कट रस ही व्यक्त नहीं हो सकता, पर निखिलरसामृतमूर्ति उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्ण तो रसस्वरूप ही हैं। इनके सम्पर्कसे इतना उत्कट, अद्भुत, अनन्तरस उद्भूत हो गया कि परस्पर भावापत्ति हो गयी। यह श्रीकृष्ण पूर्णतम, पुरुषोत्तम स्वयं भोक्ता ही हैं, भोग्य नहीं, व्रजांगना स्वयं स्त्री, भोग्या। अतएव उनके भोक्ता श्रीकृष्ण भोग्य नहीं हो सकते। उनके ही क्या, दूसरे पुरुषोंके भी भोग्य वे नहीं हो सकते। पुरुष पुरुषोंके भोग्य नहीं होते। पारतन्त्र्य लक्षण स्त्रीत्व ही सबमें हैं, अतः सब भोग्य ही हैं। तो क्या स्वयं श्रीकृष्ण ही अपना भोग करें? नहीं। यह इस रीतिके विरुद्ध है। अब अधरपल्लवकी सर्वाभोग्या सुधा किसकी भोग्या ? देवभोग्या खग, मृग, पशु, तरु, लता, गुल्मादिकोंको, भगवद्भोग्या श्रोत्रद्वारा व्रजांगनाओंको, अब सर्वाभोग्याका भोक्ता कौन ? यह तब भोग्य हो कि जब भगवान् भोग्य हों। यह कैसे हो ? उनका भोक्ता तो कोई भी नहीं हो सकता। इसलिये कहा कि जब भगवद्भोग्या अधरसुधा व्रजांगनाओंमें सर्वत्र भरपूर हुई और व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णका रमण हुआ, उन्होंने उस भगवद्भोग्या अधरसुधाका संभोग किया, तब लोकोत्तररसोद्रेकसे व्रजांगनाओंमें श्रीकृष्णभावापत्ति और श्रीकृष्णमें व्रजांगनाभावापत्ति हुई। उस समय श्रीकृष्ण भोग्य हुए। इसलिये सर्वाभोग्या अधरसुधाका भोग व्रजांगनाओंको प्राप्त हुआ। सारांश यह कि साधारण स्थितिमें जो अधरसुधा किसीको भोग्य नहीं, वह सर्वाभोग्या है। जहाँ श्रीकृष्णने रमण किया, वहाँ विपरीत भावापत्ति हुई। भक्तोंमें इसके अनेक उदाहरण हैं। 'विष्णुपुराण' में प्रह्लादका प्रसंग बड़ा ही सुन्दर वर्णित है। प्रह्लादके अंगमें शिला बाँधकर उसे समुद्रमें फेंक दिया गया। जितनी उसको अधिक यातना हुई, उतनी उसकी विष्णुप्रीति अधिक बढ़ी। यहाँ तो कुछ विघ्नबाधा हुई कि कहते हैं—भजन हमारे कुलमें सहता नहीं।