भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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[ ११ ] तृतीय खण्ड—भक्तितत्त्व १. भगवत्प्राप्ति .................................................. ५९५ ✿ भगवान्में उत्कट प्रीति होनेपर तत्क्षण ही भगवत्प्राप्ति ..................................................... ५९५ २. नामरूपकी उपयोगिता .......................................... ५९६ ✿ नामरूपसे नामरूपातीत तत्त्वकी प्राप्ति ...... ५९७ ✿ मनकी एकाग्रताके लिये सात्त्विक कर्म और ज्ञानका अवलम्बन अपेक्षित .......................... ५९७ ✿ नामरूपसे अतीत परब्रह्मकी दिव्यलीलाशक्तिके सहयोगसे नामरूपयुक्त सगुण-साकार रूपमें अभिव्यक्ति ..................................................... ५९८ ✿ सभी नामरूप भगवान्के ही हैं ..................... ५९८ ✿ भगवदर्थनामरूपकर्मसे भवबन्धनकी विमुक्ति ... ५९९ ३. इष्टदेवकी उपासना ............................................ ५९९ ✿ निन्दाका तात्पर्य अपने अभीष्टकी प्रशंसामें .. ५९९ ✿ अपने इष्टमें अनन्यता .................................. ६०० ✿ शिव-विष्णुमें अभेद-बुद्धि ............................. ६०१ ✿ जिस रूपमें प्रीति हो, उस रूपकी उपासना करनी चाहिये ................................................. ६०२ ✿ उपासनाके लिये अपनी कुल-परम्पराका समादर ........................................................... ६०३ ✿ कृपापरवश भगवान्द्वारा अनेक मंगलमय स्वरूपोंका धारण ............................................ ६०४ ✿ श्रौत-स्मार्तप्रतिपादित स्वधर्मका सम्पादन परमेश्वरका आराधन है ................................... ६०५ ४. मानसी आराधना ................................................ ६०६ ✿ उपासनामें भावनाका प्राधान्य ........................ ६०८ ५. सगुणोपासनामें सरलता ....................................... ६०९ ✿ सगुणोपासना एवं निर्गुणोपासनाका तारतम्य .. ६०९ ६. अव्यभिचार भक्तियोग ........................................ ६११ ✿ मानसी-सेवा ................................................ ६१२ ✿ चार प्रकारके भक्त ........................................ ६१२ ✿ सविकल्पक और निर्विकल्पक ब्रह्म ........... ६१३ ✿ ब्रह्म—अतिशयताकी कल्पनासे अतीत ...... ६१५ ७. सबसे सगे भगवान् ............................................ ६१६ ✿ एकमात्र भगवान्का सम्बन्ध ही स्थिर है .... ६१७ ८. विभीषण-शरणागति ............................................. ६१८ ✿ जीवभावसे मुक्त हुए बिना पूर्ण स्वातन्त्र्य सम्भव नहीं ..................................................... ६१८ ✿ भगवान्के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति है ..... ६१९ ✿ सत्संकल्पकी महिमा .................................... ६२२ ✿ भगवान्की भक्तपरवशताका एक दृष्टान्त ... ६२४ ✿ भगवान्के अवतरणका हेतु—अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्तियोगका विधान ......... ६२७ ९. चतुर्विधा भजन्ते ................................................ ६२८ ✿ ज्ञानी भक्त ................................................... ६२८ ✿ जिज्ञासु भक्त ................................................. ६२९ ✿ आर्त भक्त .................................................... ६३० ✿ अर्थार्थी भक्त ................................................ ६३० १०. भगवच्छरणागतिसे ही गति ................................. ६३१ ✿ अनन्य भगवत्परायणताका एक दृष्टान्त ..... ६३२ ११. भगवान्का अवलम्बन अनिवार्य ........................... ६३३ ✿ स्वधर्मानुष्ठानसे कल्याणकी प्राप्ति ................. ६३४ १२. प्रेमतत्त्व ........................................................... ६३५ ✿ अन्तःकरणकी सात्त्विकी वृत्ति ही प्रेम है ..... ६३५ ✿ भगवान् ही प्रेमके उद्गम-स्थान किंवा प्रेमस्वरूप हैं ................................................. ६३६ ✿ प्रेम, प्रेमी और प्रेमास्पदका अभेद सम्बन्ध ... ६३९ १३. भगवान् और प्रेम .............................................. ६४० ✿ आत्मामें सर्वातिशायी प्रेम होता है ............. ६४० ✿ उच्चकोटिका ज्ञान भी प्रेमके बिना सुशोभित नहीं होता .............................................................. ६४१ ✿ रागानुगा प्रीतिके सम्पादनके लिये भगवान्का प्राकट्य ......................................................... ६४२ १४. भगवत्कथामृत ................................................. ६४३ ✿ ब्रह्मसुख बृहत्तम सुख है ............................. ६४४ ✿ भगवान् सबके परम प्रकाशक ..................... ६४५ ✿ श्रवणकी महिमा .......................................... ६४५ ✿ श्रवणमें सभीका अधिकार ............................ ६४५ १५. प्रभुकृपा ........................................................... ६४६