भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
७६८ भक्तिसुधा
पड़ता है, उस आभास या प्रतिबिम्बका निदान या बिम्बभूत जो अन्तरात्मा है, वही 'आनन्द' है। जो लक्षण आनन्दका, वही अन्तरात्माका भी है। जैसे सब कुछ आनन्दके लिये प्रिय है, आनन्द और किसीके लिये प्रिय नहीं, ठीक वैसे ही समस्त वस्तु आत्माके लिये प्रिय होती है, आत्मा किसी दूसरेके लिये प्रिय नहीं होता। अतः अन्तरात्मा ही आनन्द है और वही निरतिशय, निरुपाधिक परम प्रेमका आस्पद है। उसीका आभास अन्तर्मुख अन्तःकरणपर पड़नेसे 'मैं सुखी हूँ' ऐसा अनुभव होता है। इसीके लिये समस्त कार्य-करण-संघातकी प्रवृत्ति होती है। यह सुख- दुःख-मोहात्मक, नानात्मक, संघातसे विलक्षण सुख- दुःख-मोहातीत, असंहत, असंग, अद्वितीय तत्त्व ही भगवान्का 'आनन्द' रूप है। इस तरह सभी 'सच्चिदानन्द' भगवान्के उपासक हैं। प्राणिमात्र स्वतन्त्रता चाहते हैं। एक चींटी भी पकड़ी जानेपर व्याकुलताके साथ हाथ-पैर चलाती है। शुक, सारिका आदि पक्षी सोनेके पिंजड़ेमें रहकर सुन्दर मधुर भोजनकी अपेक्षा बन्धनमुक्त हो, स्वतन्त्रतासे वनमें खट्टे फलोंको भी खाकर जीवन व्यतीत करनेमें ही सच्चे आनन्दका अनुभव करते हैं। इस तरह प्राणिमात्र बन्धनसे छूटने तथा स्वतन्त्रताके लिये लालायित है। ऐसी स्थितिमें कौन नास्तिक बन्धनमुक्ति और स्वतन्त्रता न चाहेगा? परंतु स्वतन्त्रताका वास्तविक रूप विवेचन करनेसे स्पष्ट होगा कि यह भी भगवान्का ही स्वरूप है। बिना असंग सच्चिदानन्द भगवान्को प्राप्त किये बन्धन- मुक्ति और स्वतन्त्रताकी कल्पना अत्यन्त ही निराधार है। जबतक स्थूल, सूक्ष्म तथा कारणदेहका सम्बन्ध बना है, तबतक स्वतन्त्रता कैसी? भले ही कोई माता-पिता, गुरुजनों तथा वेद-शास्त्रकी आज्ञाओंको न माने और उनसे अपनेको स्वतन्त्र मान ले, परंतु जन्म, जरा, व्याधि, दरिद्रता, विपत्ति, मृत्यु आदिके परतन्त्र तो प्राणिमात्रको होना ही पड़ता है। कारण, जबतक कुछ स्वतन्त्रता त्यागकर शास्त्रों एवं गुरुजनोंके परतन्त्र होकर कर्म, उपासना तथा ज्ञानद्वारा मल, विक्षेप, आवरणको दूर करके शरीरत्रय-बन्धनसे मुक्त होकर निजी निर्विकार स्वरूपको न प्राप्त कर ले, तबतक पूर्ण स्वातन्त्र्य मिल सकता ही नहीं। इस विवेचनसे स्पष्ट होता है कि 'स्वतन्त्रता' भी सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, असंग, अनन्त, स्वप्रकाश, प्रत्यगभिन्न भगवान्का ही स्वरूप है। इसी तरह प्राणिमात्रकी यह भी रुचि होती है कि सब कुछ हमारे अधीन हो और मैं स्वाधीन रहूँ। यहाँतक कि माता-पिता, गुरुजनोंके प्रति भी यही रुचि होती है कि ये सब हमारी प्रार्थना मान लिया करें और सब तरहसे मेरे अनुकूल रहें। यही स्थिति देवताओंके प्रति भी होती है। ये सभी भाव भी जीवभावके रहते नहीं हो सकते। समस्त कल्पित पदार्थ कल्पनाके अधिष्ठानभूत भगवान्के ही परतन्त्र हो सकते हैं। इस तरह परमार्थतः पूर्ण अस्तित्व, पूर्ण बोध, पूर्ण आनन्द, पूर्ण स्वातन्त्र्य एवं पूर्ण नियामकत्व— ये सब भगवान्में ही होते हैं। जब आस्तिक-नास्तिक सभी पूर्ण स्वातन्त्र्य, पूर्ण नियामकत्व, पूर्ण बोध, पूर्णानन्द, पूर्ण अबाध्यता या सत्ताके लिये व्यग्र तथा इनकी प्राप्तिके लिये जी-जानसे प्रयत्न करते हैं, तब कौन कह सकता है कि अज्ञानी किंवा नास्तिक जिसकी प्राप्तिके लिये व्यग्र हैं, ये वही भक्तों और ज्ञानियोंके ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य, परब्रह्म भगवान् नहीं हैं? क्योंकि प्राणिमात्र किंवा तत्त्वमात्रका अन्तरात्मा भगवान् ही हैं। फिर उनसे विमुख होकर निःसत्त्व, निःस्फूर्ति कौन होना चाहेगा? इसी आशयसे श्रीवाल्मीकिकी उक्ति है—'लोके न हि स विद्येत यो न राममनुव्रतः।' लोकमें ऐसा कोई हुआ ही नहीं, जो रामका अनुगामी न हो। निज सर्वस्वके बिना किसीको भी कैसी विश्रान्ति ? अतएव तरंगकी जैसे समुद्रानुगामिता है, ठीक वैसे ही प्राणिमात्रकी भगवदनुगामिता है। भेद यही है कि ज्ञानी अपने प्रियतमको जानकर प्रेम करता है, दूसरे उसीके लिये व्यग्र होते हुए भी उसे जानते ही नहीं। विश्वेश्वरयतीन्द्रस्य श्रीगुरोश्चरणाम्बुजयोः । कृतिरेषार्पिता भूयान्मुदे सुमनसां सदा ॥