भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
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भक्तियोग
स्वामी विवेकानन्द
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भक्तियोग
स्वामी विवेकानन्द
( पंचम संस्करण )
श्रीरामकृष्ण आश्रम,
धन्तोली, नागपुर-१.
प्रकाशक—
स्वामी भास्करेश्वरानन्द,
अध्यक्ष, श्रीरामकृष्ण आश्रम,
धन्तोली, नागपुर-१
अनुवादक—
प्राचार्य डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल,
एम. एससी., पीएच. डी.
श्रीरामकृष्ण-शिवानन्द-स्मृतिग्रन्थमाला
पुष्प १० वाँ
( श्रीरामकृष्ण आश्रम, नागपुर द्वारा सर्वाधिकार सुरक्षित )
मूल्य रु. १.५० न. पै.
मुद्रक—
बा. गो. ओगले, बी. ए.
नक्षत्र प्रेस, ओगले रोड,
नागपुर-२
वक्तव्य
‘भक्तियोग’ का यह पंचम संस्करण पाठकों के सम्मुख रखते हमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है। स्वामी विवेकानन्दजी स्वयं भक्ति के महान् आचार्य थे। इस पुस्तक में स्वामीजी ने भक्ति के भिन्न भिन्न प्रकार के साधनों का विवेचन अनेकानेक धर्मग्रन्थों तथा आत्मानुभूति के आधार पर किया है। भक्तियोग के द्वारा मनुष्य किस प्रकार भगवत्प्राप्ति कर सकता है, भक्ति का सच्चा अर्थ क्या है, भगवान का स्वरूप क्या है, पराभक्ति किस प्रकार प्राप्त हो सकती है—आदि सब मौलिक बातें स्वामीजी ने बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत पुस्तक में दर्शायी हैं।
प्राचार्य डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल, एम. एससी., पीएच. डी., के हम बहुत कृतज्ञ हैं, जिन्होंने यह अनुवाद-कार्य सफलतापूर्वक किया है।
हमें विश्वास है कि इस पुस्तक द्वारा पाठकों का विशेष हित होगा।
<br>नागपुर,
विजयादशमी
१९-१०-१९६१
—प्रकाशक
अनुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १. भक्ति के लक्षण | ... ... १ |
| २. ईश्वर का स्वरूप | ... ... १४ |
| ३. भक्तियोग का ध्येय—प्रत्यक्षानुभूति... | ... ... २४ |
| ४. गुरु की आवश्यकता | ... ... २८ |
| ५. गुरु और शिष्य के लक्षण | ... ... ३३ |
| ६. अवतार | ... ... ४२ |
| ७. मंत्र | ... ... ४७ |
| ८. प्रतीक तथा प्रतिमा-उपासना | ... ... ५१ |
| ९. इष्टनिष्ठा | ... ... ५५ |
| १०. भक्ति के साधन | ... ... ५९ |
पराभक्ति
| ११. पराभक्ति—त्याग | ... ... ६७ |
| १२. भक्त का वैराग्य—प्रेमजन्य | ... ... ७२ |
| १३. भक्तियोग की स्वाभाविकता और उसका रहस्य | ... ७८ |
| १४. भक्ति के अवस्था-भेद | ... ... ८२ |
| १५. सार्वजनीन प्रेम | ... ... ८५ |
| १६. पराविद्या और पराभक्ति दोनों एक हैं... | ... ९२ |
| १७. प्रेम—त्रिकोणात्मक | ... ... ९४ |
| १८. प्रेममय भगवान स्वयं अपना प्रमाण हैं | .... १०० |
| १९. दैवी प्रेम की मानवी विवेचना | ... ... १०४ |
| २०. उपसंहार | ... ... ११४ |
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स्वामी विवेकानन्द
भक्तियोग
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प्रार्थना
स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता। य ईशेऽस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुः विद्यते ईशनाय॥ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवम् आत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥
"वह विश्व की आत्मा है, अमरणधर्मा और ईश्वररूप से स्थित है, वह सर्वज्ञ, सर्वगत और इस भुवन का रक्षक है, जो सर्वदा इस जगत् का शासन करता है; क्योंकि इसका शासन करने के लिए और कोई समर्थ नहीं है।"
"जिसने सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा को उत्पन्न किया और जिसने उसके लिए वेदों को प्रवृत्त किया, आत्मबुद्धि को प्रकाशित करनेवाले उस देव की मैं मुमुक्षु शरण ग्रहण करता हूँ।"
—श्वेताश्वतर उपनिषद्, ६।१७-१८
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भक्ति के लक्षण
निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज को भक्तियोग कहते हैं। इस खोज का आरम्भ, मध्य और अन्त प्रेम में होता है। ईश्वर के प्रति एक क्षण की भी प्रेमोन्मत्तता हमारे लिए शाश्वत मुक्ति की देनेवाली होती है। भक्तिसूत्र में नारदजी कहते हैं, "भगवान के प्रति उत्कट प्रेम ही भक्ति है।" "जब मनुष्य इसे प्राप्त कर लेता है, तो सभी उसके प्रेम-पात्र बन जाते हैं। वह किसी से घृणा नहीं करता; वह सदा के लिए सन्तुष्ट हो जाता है।" "इस प्रेम से किसी काम्य वस्तु की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जब तक सांसारिक वासनाएँ घर किए रहती हैं, तब तक इस प्रेम का उदय ही नहीं होता।" "भक्ति कर्म से श्रेष्ठ है और ज्ञान तथा योग से भी उच्च है," क्योंकि इन सबका एक-न-एक लक्ष्य है ही, पर "भक्ति स्वयं ही साध्य और साधनस्वरूपा है।"*
हमारे देश के साधु-महापुरुषों के बीच भक्ति ही चर्चा का एक विषय रही है। भक्ति की विशेष रूप से व्याख्या करनेवाले शाण्डिल्य और नारद जैसे महापुरुषों को छोड़ देने पर भी, स्पष्टतः ज्ञानमार्ग के समर्थक, व्याससूत्र के महान् भाष्यकारों ने भी भक्ति के सम्बन्ध में हमें बहुत-कुछ दर्शाया है। भले ही उन भाष्यकारों ने,
* सा तु अस्मिन् परमप्रेमरूपा। नारदभक्तिसूत्र, प्रथम अनुवाक, द्वितीय सूत्र। सा न कामयमाना, निरोधरूपत्वात्। ,, द्वितीय अनुवाक, प्रथम सूत्र। सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्य अपि अधिकतरा। ,, चतुर्थ अनु०, २५ सूत्र। स्वयं फलरूपता इति ब्रह्मकुमाराः। ,, ,, ३० सूत्र।
६
भक्तियोग
सब सूत्रों की न सही, पर अधिकतर सूत्रों की व्याख्या शुष्क ज्ञान के अर्थ में ही की है, किन्तु यदि हम उन सूत्रों के, और विशेषकर उपासना-काण्ड के सूत्रों के अर्थ पर निरपेक्ष भाव से विचार करें, तो देखेंगे कि उनकी इस प्रकार यथेच्छ व्याख्या नहीं हो सकती।
वास्तव में ज्ञान और भक्ति में उतना अन्तर नहीं, जितना लोगों का अनुमान है। पर जैसा हम आगे देखेंगे, ये दोनों हमें एक ही लक्ष्य-स्थल पर ले जाते हैं। यही हाल राजयोग का भी है। उसका अनुष्ठान जब मुक्ति-लाभ के लिए किया जाता है—भोले-भाले लोगों की आँखों में धूल झोंकने के उद्देश्य से नहीं (जैसा बहुधा ढोंगी और जादू-मंतरवाले करते हैं)—तो वह भी हमें उसी लक्ष्य पर पहुँचा देता है।
भक्तियोग का एक बड़ा लाभ यह है कि वह हमारे चरम लक्ष्य (ईश्वर) की प्राप्ति का सबसे सरल और स्वाभाविक मार्ग है। पर साथ ही उससे एक विशेष भय की आशंका यह है कि वह अपनी निम्न या गौणी अवस्था में मनुष्य को बहुधा भयानक मतान्ध और कट्टर बना देता है। हिन्दू, इस्लाम या ईसाई धर्म में जहाँ कहीं इस प्रकार के धर्मान्ध व्यक्तियों का दल है, वह सदैव ऐसे ही निम्न श्रेणी के भक्तों द्वारा गठित हुआ है। वह इष्ट-निष्ठा, जिसके बिना यथार्थ प्रेम का विकास सम्भव नहीं, अक्सर दूसरे सब धर्मों की निन्दा का भी कारण बन जाती है। प्रत्येक धर्म और देश में जितने सब दुर्बल और अविकसित बुद्धिवाले मनुष्य हैं, वे अपने आदर्श से प्रेम करने का एक ही उपाय जानते हैं, और वह है—अन्य सभी आदर्शों को घृणा की दृष्टि से देखना। यहीं इस बात का उत्तर मिलता है कि वही मनुष्य, जो धर्म और ईश्वर सम्बन्धी अपने आदर्श में इतना
भक्ति के लक्षण ७
अनुरक्त हैं, किसी दूसरे आदर्श को देखते ही या उस सम्बन्ध में कोई बात सुनते ही इतना खूँखार क्यों हो उठता है। इस प्रकार का प्रेम कुछ-कुछ, दूसरों के हाथ से अपने स्वामी की सम्पत्ति की रक्षा करनेवाले एक कुत्ते की सहज प्रवृत्ति के समान है। पर हाँ, कुत्ते की वह सहज प्रेरणा मनुष्य की युक्ति से कहीं श्रेष्ठ है, क्योंकि वह कुत्ता कम-से-कम अपने स्वामी को शत्रु समझकर कभी भ्रमित तो नहीं होता—चाहे उसका स्वामी किसी भी वेष में उसके सामने क्यों न आए। फिर, मतान्ध व्यक्ति अपनी सारी विचार-शक्ति खो बैठता है। व्यक्तिगत विषयों की ओर उसकी इतनी अधिक नजर रहती है कि वह यह जानने का बिलकुल इच्छुक नहीं रह जाता है कि कोई व्यक्ति कहता क्या है—वह सही है या गलत; उसका एकमात्र ध्यान रहता है यह जानने में कि वह बात कहता कौन है। देखोगे, जो व्यक्ति अपने सम्प्रदाय के—अपने मतवाले लोगों के प्रति दयालु है, भला और सच्चा है, सहानुभूतिसम्पन्न है, वही अपने सम्प्रदाय से बाहर के लोगों के प्रति बुरा-से-बुरा काम करने में भी न हिचकेगा।
पर यह आशंका भक्ति की केवल निम्नतर अवस्था में रहती है। इस अवस्था को 'गौणी' कहते हैं। परन्तु जब भक्ति परिपक्व होकर उस अवस्था को प्राप्त हो जाती है, जिसे हम 'परा' कहते हैं, तब इस प्रकार की भयानक मतान्धता और कट्टरता की फिर आशंका नहीं रह जाती। इस 'परा' भक्ति से अभिभूत व्यक्ति प्रेमस्वरूप भगवान के इतने निकट पहुँच जाता है कि वह फिर दूसरों के प्रति घृणा-भाव के विस्तार का यन्त्रस्वरूप नहीं हो सकता।