भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१८२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

अन्वेष्टव्यात्मविज्ञानात्प्राक्प्रमातृत्वमात्मनः ।
अन्विष्टः स्यात्प्रमातैव पाप्मदोषादिवर्जितः ॥

भामती

यथा स्वदुःखेन दुःखी यथा स्वसुखेन सुखी तथा पुत्रादिगतेनापीति सोऽयं गुणः। न त्वेकत्वाभिमानो, भेदस्यानुभवसिद्धत्वात् ? तस्माद् गौर्वाहीक इतिवद्गौणः, देहेन्द्रियादिषु त्वभेदानुभवान्न गौण आत्माभिमानः, किन्तु शुक्तौ रजतज्ञानवन्मिथ्या । तदेवं द्विविधोऽयमात्माभिमानो लोकयात्रां वहति, तदसत्त्वे तु न लोकयात्रा, नापि ब्रह्मात्मैकत्वानुभवः तदुपायस्य श्रवणमननादेरभावात्। तद्विवाह ॐ पुत्रदेहादिबाधनात् ॐ । गौणात्मनोऽसत्त्वे पुत्रकलत्रादिबाधनं ममकाराभाव इति यावत् । मिथ्यात्मनोऽसत्त्वे देहेन्द्रियादिबाधनं श्रवणादिबाधनञ्च । तथा च न केवलं लोकयात्रासमुच्छेदः सद् ब्रह्माहमित्येवंबोधशीलं यत्कार्यमद्वैतसाक्षात्कार इति यावत् तदपि ॐ कथं भवेत् ॐ । कुतस्तदसम्भव इत्यत आह ॐ अन्वेष्टव्यात्मविज्ञानात्प्राक् प्रमातृत्वमात्मनः ॐ । उपलक्षणं चैतत् । प्रमाप्रमेयप्रमाणविभाग इत्यपि द्रष्टव्यम् ।

भामती-व्याख्या

अन्वेष्टव्यात्मविज्ञानात् प्राक् प्रमातृत्वमात्मनः ।
अन्विष्टः स्यात् प्रमातैव पाप्मदोषादिवर्जितः ॥
देहात्मप्रत्ययो यद्वत्प्रमाणत्वेन कल्पितः ।
लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वात्मनिश्चयात् ॥

पुत्र-दारादि में आत्माभिमान गौण होता है, क्योंकि जैसे सिंह के शूरतादि गुणों को अपना कर देवदत्त गौण सिंह बनता है, वैसे ही पुत्र-दारादि के सुखित्व-दुःखित्वादि रूप गुणों को अपने में मानकर अहमर्थभूत आत्मा कहता है—'अहं सुखी, दुःखी च'। पुत्र-दारादि के साथ एकत्वाभिमान नहीं होता, क्योंकि उनसे आत्मा का भेद अनुभव-सिद्ध है, अतः 'गौर्वाहीकः'—इत्यादि के समान गौणाभिमान ही है [गुण वृत्ति का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कैयट ने लिखा है—'सिंहो माणवकः', 'गौर्वाहीकः' इत्यादावपि ताद्धर्म्यात्ताद्रूप्यारोपात् तच्छब्द वृत्तिः, तदुक्तं हरिणा—

गोत्वानुषङ्गो वाहीके निमित्तात् कैश्चिदिष्यते ।
अर्थमात्रं विपर्यस्तं शब्दः स्वार्थे व्यवस्थितः ॥

किसी जड़-मूर्ख व्यक्ति के लिए जैसे 'बैल' शब्द का गौण प्रयोग हो जाता है, वैसे ही पञ्जाब के 'बहिः' प्रखण्ड में रहनेवाले मूर्ख हलवाहे के लिए 'गौर्वाहीकः'—ऐसा प्रयोग प्राचीनकाल से होता आया है ]। देह और इन्द्रियादि में जो आत्माभिमान होता है, गौण नहीं, क्योंकि वहाँ देहादि से आत्मा का भेद प्रतीत नहीं होता, अतः वह वैसा ही मिथ्या प्रत्यय या अध्यास है, जैसा कि शुक्ति में रजत-प्रत्यय । यही 'गौण' और 'मिथ्या' भेद से भिन्न द्विविध आत्माभिमान लौकिक व्यवहार का निर्वाहक माना जाता है । उसकी सत्ता न मानने पर न तो लोक-व्यवहार का निर्वाह होगा और न ब्रह्मात्मैकत्व का अनुभव, क्योंकि उसके उपायभूत श्रवण-मननादि का अनुष्ठान अध्यासमूलक ही होता है, अध्यास का अभाव होने पर न हो सकेगा, यही कहा गया है—"पुत्रदेहादिबाधनात्" । अर्थात् गौणात्मा के न होने पर ममकार का अभाव हो जाने से पुत्र-दारादि का बाध हो जाता है और मिथ्या आत्मा की असत्ता होने पर देहेन्द्रियादि और श्रवणादि साधनों का बाध हो जाता है । तब न केवल लोक-व्यवहार का समुच्छेद हो जाता है, अपितु 'सद्ब्रह्माहम्'—इस प्रकार का जो बोधरूप कार्य (अद्वैत-साक्षात्कार) है, वह भी कैसे होगा ? क्योंकि "अन्वेष्टव्यात्मविज्ञानात् प्राक् प्रमातृत्वमात्मनः" । आत्म-साक्षात्कार के होने से पहले ही आत्मा में कर्तृत्व-प्रमातृत्वादि का भान हो सकता है, उसके