भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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उपनिषदां ब्रह्मपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १८३

देहात्मप्रत्ययो यद्वत्प्रमाणत्वेन कल्पितः ।
लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वाऽऽत्मनिश्चयात्' ॥ इति ॥ ४ ॥
इति भाष्ये चतुःसूत्री समाप्ता


भामती

एतदुक्तं भवति । एष हि विभागोऽद्वैतसाक्षात्कारकारणम् । ततो नियमेन प्राग् भावात् । तेन तदभावे कार्यं नोत्पद्यते इति । न च प्रमातुरात्मनोऽन्वेष्टव्य आत्माऽन्य इत्याह ॐ अन्विष्टः स्यात्प्रमातैव पाप्मदोषादिवर्जितः ॐ । उक्तं ग्रीवास्थग्रैवेयकनिदर्शनम् । स्यादेतत्—अप्रमाणात्कथं पारमार्थिकाद्वैतानु-भवोत्पत्तिरित्यत आह ॐ देहात्मप्रत्ययो यद्वत्प्रमाणत्वेन कल्पितः । लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं तु ॐ । अस्यावधिमाह ॐ आत्मनिश्चयात् ॐ । आ ब्रह्मस्वरूपसाक्षात्कारादित्यर्थः । एतदुक्तं भवति—पारमार्थि-कप्रपञ्चवादिभिरपि देहादिष्वात्माभिमानो मिथ्येति वक्तव्यं, प्रमाणबाधितत्वात् । तस्य च समस्तप्रमा-णकारणत्वं भाविकलोकयात्रावाहित्वं चाभ्युपेयम् । सेयमस्माकमप्यद्वैतसाक्षात्कारे विधा भविष्यति । न चायमद्वैतसाक्षात्कारोऽप्यन्तःकरणवृत्तिरेव एकान्ततः परमार्थः । यस्तु साक्षात्कारो भाविकः, नासौ कार्यः, तस्य ब्रह्मस्वरूपत्वात् । अविद्या तु यद्यविद्यामुच्छिन्द्याज्जनयेद्वा, न तत्र काचिदनुपपत्तिः । तथा च श्रुतिः—


भामती-व्याख्या

पश्चात् नहीं। प्रमातृत्व का कथन प्रमाण, प्रमेय और प्रमा के विभाग का भी उपलक्षक है। सारांश यह है कि यह प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमा का विभाग ही अद्वैत-साक्षात्कार का कारण है, क्योंकि वह नियमतः अद्वैत-साक्षात्कार के पूर्वकाल में रहता है, अतः उस नियत पूर्वभावी कारण का अभाव होने पर कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती। प्रमाता आत्मा से कभी अन्वेष्टव्य (प्रमेयभूत) आत्मा भिन्न नहीं, अतः कहा है—"अन्विष्टः स्यात् प्रमातैव पाप्मदोषादिवर्जितः"। अन्वेष्टा और अन्वेष्टव्य आत्मा एक ही है, तब किसके द्वारा किसका अन्वेषण होगा? इस शङ्का का समाधान 'गले के हार' का दृष्टान्त देकर किया जा चुका है। 'यदि प्रमाणादि-विभाग काल्पनिक और अप्रमाणभूत है, तब उससे पारमार्थिक अद्वैतानुभव की उत्पत्ति क्योंकर होगी?' इस प्रश्न का उत्तर है—"देहात्मप्रत्ययो यद्वत्प्रमाणत्वेन कल्पितः, लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं तु"। जैसे देह में आत्म-प्रत्यय को व्यवहार-काल में प्रमाण माना जाता है, वैसे ही प्रमाणादि-भेद-प्रत्यय को भी प्रमाण ही माना जाता है। कब तक यह प्रमाण माना जाता है? इसकी अवधि बताई गई है—"आ आत्मनिश्चयात्"। ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार होने तक। आशय यह है कि जो लोग प्रपञ्च को पारमार्थिक मानते हैं, उन्हें भी देहादि में आत्माभिमान को मिथ्या ही मानना होगा, क्योंकि वह प्रमाणों के द्वारा बाधित है। देहादि में अहमनुभव को समस्त प्रमाणों का कारण और भावी लोक-व्यवहार का निर्वाहक भी मानना होगा। ये दोनों मान्यताएं हमें भी अद्वैत-साक्षात्कार में अपनानी होंगी। यह अद्वैत-साक्षात्कार भी जो अन्तःकरण की एक विशेष वृत्ति है, एकान्ततः परमार्थ नहीं माना जाता और वृत्ति-प्रतिफलित चैतन्यरूप जो पारमार्थिक साक्षात्कार है, वह कार्य (जन्य) नहीं माना जाता, क्योंकि वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध ब्रह्मस्वरूप ही है। अविद्या यदि अविद्या का नाश या उत्पादन करती है, तब उसमें किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं, जैसा कि श्रुति कहती है—