भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
भामती
‘विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥’ इति।
तस्मात्सर्वमवदातम्। एवम्—
कार्यान्वयं विना सिद्धरूपे ब्रह्मणि मानता।
पुरुषार्थे स्वयं तावद्वेदान्तानां प्रसाधिता ॥ ४ ॥
इति भामत्यां चतुःसूत्री समाप्ता।
भामती-व्याख्या
“विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते।।” ( ईशा. ११ )
[ अन्तःकरण-वृत्तिरूप विद्या और प्रमाणादि-भेद-प्रतीत्यात्मक अविद्या को कार्य-कारणभाव के रूप में जो जानता है, वह अखण्डाकार वृत्तिरूप अविद्या के द्वारा अविद्यारूप मृत्यु का उच्छेद करके वृत्ति-प्रतिफलित चैतन्यरूप विद्या के द्वारा अमृत ब्रह्म की प्राप्ति कर लेता है।
ब्रह्मसूत्र-शाङ्कर भाष्य के वार्त्तिककार श्री नारायणसरस्वती ऊपर के तीनों श्लोकों को श्रीगोड़पादाचार्य की कृति मान कर कहते हैं— “अपि चाहुरस्मिन्नर्थे सम्प्रदायविदो गौड़पादाचार्याः”। किन्तु श्री आत्मस्वरूपभगवान् पञ्चपादिका की अपनी व्याख्या प्रबोधपरिशोधिनी में उक्त तीनों श्लोकों के रचयिता का नाम आचार्य सुन्दर पाण्ड्य बताते हैं। श्री माधवाचार्य-कृत सूतसंहिता-व्याख्या तात्पर्यदीपिका से भी ऐसा ही प्रतीत होता है ] ॥४॥
इति भामतीव्याख्यायां चतुःसूत्री समाप्ता