भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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प्रधानस्य जगत्कारणत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १८५

( ५ ईक्ष्यत्यधिकरणम् । सू० ५-११ )

एवं तावद्वेदान्तवाक्यानां ब्रह्मात्मावगतिप्रयोजनानां ब्रह्मात्मनि तात्पर्येण समन्वितानामन्तरेणापि कार्यानुप्रवेशं ब्रह्मणि पर्यवसानमुक्तम् । ब्रह्म च सर्वज्ञं सर्व-शक्ति जगदुत्पत्तिस्थितिविनाशकारणमित्युक्तम् । सांख्यादयस्तु परिनिश्चितं वस्तु प्रमाणान्तरगम्यमेवेति मन्यमानाः प्रधानादीनि कारणान्तराण्यनुमिमानास्तत्परतयैव वेदान्तवाक्यानि योजयन्ति । सर्वेष्वेव वेदान्तवाक्येषु सृष्टिविषयेष्वनुमानेनैव कार्येण कारणं लिलक्षयिषितम् । प्रधानपुरुषसंयोगा नित्यानुमेया इति सांख्या मन्यन्ते । काणादास्त्वेतेभ्य एव वाक्येभ्य ईश्वरं निमित्तकारणमनुमिमते, अणूंश्च समवायि-कारणम् । एवमन्येऽपि तार्किका वाक्याभासयुक्त्याभासावष्टम्भाः पूर्वपक्षवादिन इहोत्तिष्ठन्ते । तत्र पदवाक्यप्रमाणज्ञेनाचार्येण वेदान्तवाक्यानां ब्रह्मावगतिपरत्वदर्शनाय

भामती

ब्रह्मजिज्ञासां प्रतिज्ञाय जन्माद्यस्य यत इत्यादिना तत्तु समन्वयादित्यन्तेन सूत्रसन्दर्भेण सर्वज्ञे सर्वशक्तौ जगदुत्पत्तिस्थितिविनाशकारणे प्रामाण्यं वेदान्तानामुपपादितम् । तच्च ब्रह्मणीति परमार्थतो न त्वद्यापि ब्रह्मण्येवेति व्युत्पादितम् । तदत्र सन्दिह्यते । तज्जगदुपादानकारणं किं चेतनमुताचेतनमिति । अत्र च विप्रतिपत्तेः प्रतिवादिनां विशेषानुपलम्भे सति संशयः । तत्र च प्रधानमचेतनं जगदुपादानकारण-मनुमानसिद्धमनुवदन्त्युपनिषद इति सांख्याः । जीवाणुव्यतिरिक्तचेतनेश्वरनिमित्ताधिष्ठिताश्चतुर्विधाः परमाणवो जगदुपादानकारणमनुमितमनुवदन्तीति काणादाः । आदिग्रहणेनाभावोपादानत्वादि प्रहीतव्यम् । अनिर्वचनीयानाद्यविद्याशक्तिकमचेतनोपादानं जगदागमिकमिति ब्रह्मविदः । एतासां च विप्रतिपत्तीनामनु-मानवाक्यानुमानवाक्याभासा बीजम् ।

भामती-व्याख्या

संगति—विगत ग्रन्थ के द्वारा कार्यान्वयन के बिना ही सिद्ध ब्रह्म में वेदान्त-वाक्यों का प्रामाण्य सिद्ध किया गया, सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म स्वयं पुरुषार्थ है, वह अन्य किसी पुरुषार्थ का साधन नहीं। अर्थात् ब्रह्म-जिज्ञासा की प्रतिज्ञा करके "जन्माद्यस्य यतः" (ब्र. सू. १।१।२) यहाँ से लेकर "तत्तु समन्वयात्" (ब्र. सू. १।१।३) यहाँ तक के सूत्र-सन्दर्भ के द्वारा सर्वज्ञ सर्वशक्ति-समन्वित, जगत्-कारणीभूत ब्रह्म में वेदान्त-वाक्यों का प्रमाण्य संस्थापित किया ।

संशय—जगज्जन्मादि-कारणत्व परमार्थतः ब्रह्म में है, किन्तु वह ब्रह्म में ही है, अन्यत्र ( प्रधानादि में ) नहीं—इस सिद्धान्त का व्युत्पादन अभी तक नहीं किया गया, अतः यह सन्देह होता है कि जगत् का उपादान कारण क्या चेतन है ? अथवा अचेतन ? इस विप्रति-पत्ति में वादिगणों का कोई विशेष व्युत्पादन न देख कर संशय का हो जाना स्वाभाविक है । ( १ ) सांख्याचार्यों का कहना है कि जो अचेतन प्रधान तत्त्व जगत् का उपादान कारण अनुमान-सिद्ध है, उपनिषद्वाक्य उसी का अनुवाद करते हैं । ( २ ) कणादमतावलम्बी आचार्यों की घोषणा है कि जीव और अणुओं से भिन्न चतुर्विध ( पृथिवी, जल, तेज और वायु के ) परमाणु चेतन ईश्वर से अधिष्ठित होकर जगत् के उपादान कारण जो अनुमान के द्वारा सिद्ध किए जाते हैं, उन्हीं का अनुवाद उपनिषद्वाक्य करते हैं । ( ३ ) भाष्यकार ने जो कहा है—'सांख्यादयः" वहां 'आदि' पद के द्वारा अभावोपादानकत्वादि का ग्रहण कर लेना चाहिए । ( ४ ) ब्रह्मवादियों का सिद्धान्त है कि अनादि अनिर्वचनीय अविद्यारूप शक्ति से समन्वित चेतन पुरुष जगत् का उपादान कारण है—इसका उपपादन हमारे आगम उपनिषद् ग्रन्थ करते हैं । इस प्रकार के विविध मतवादों के पोषक अनुमान, वैदिक वाक्य, अनुमानाभास और वाक्याभास माने जाते हैं ।

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