भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १८६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ५ |
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वाक्याभासयुक्त्याभासविप्रतिपत्तयः पूर्वपक्षीकृत्य निराक्रियन्ते । तत्र सांख्याः प्रधानं त्रिगुणमचेतनं जगतः कारणमिति मन्यमाना आहुः— यानि वेदान्तवाक्यानि सर्वज्ञस्य सर्वशक्तेर्ब्रह्मणो जगत्कारणत्वं प्रदर्शयन्तीत्यवोचंस्तानि
भामती
तदेव विप्रतिपत्तेः संशये किं तावत्प्राप्तम् ? तत्र ज्ञानक्रियाशक्त्यभावाद् ब्रह्मणोऽपरिणामिनः । न सर्वशक्तिविज्ञाने प्रधाने त्वस्ति सम्भवः ॥ ज्ञानक्रियाशक्ती खलु ज्ञानक्रियाकार्यदर्शनोन्नेयसद्भावे । न च ज्ञानक्रिये चिदात्मनि स्तः, तस्यापरिणामित्वादेकत्वाच्च । त्रिगुणे च प्रधाने परिणामिनि सम्भवतः । यद्यपि च साम्यावस्थायां प्रधाने समुदाचरद्वृत्तिनी क्रियाज्ञाने न स्तः, तथाप्यव्यक्तेन शक्त्यात्मना रूपेण सम्भवत एव । तथा च प्रधानमेव सर्वज्ञं च सर्वशक्ति च, न तु ब्रह्म । स्वरूपचैतन्यं त्वस्यावृत्तिकमनुपयोगि जीवात्मनामिवास्माकम् । न च स्वरूपचैतन्ये कर्तृत्वम्, अकार्यत्वात्तस्य । कार्यत्वे वा न सर्वदा सर्वज्ञता । भोगापवर्गलक्षणपुरुषार्थ-द्वयप्रयुक्तानादिप्रधानपुरुषसंयोगनिमित्तस्तु महदहङ्कारादिक्रमेणाचेतनस्यापि चेतनानधिष्ठितस्य प्रधानस्य परिणामः सर्गः । दृष्टं चाचेतनं चेतनानधिष्ठितं पुरुषार्थे प्रवर्त्तमानम् । यथा वत्सविवृद्ध्यर्थमचेतनं क्षीरं
भामती-व्याख्या
पूर्वपक्ष—इस प्रकार संशय उपस्थित हो जाने पर सांख्याचार्यों की स्थापना है— ज्ञानक्रियाशक्त्यभावाद् ब्रह्मणोऽपरिणामिनः । न सर्वशक्तिविज्ञाने प्रधाने त्वस्ति सम्भवः ॥ ब्रह्म अपरिणामी है, अतः उसमें ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति सम्भव न होने के कारण सर्व शक्ति और सर्व-ज्ञान नहीं, उसके विना उपादानकारणता उपपन्न नहीं हो सकती, किन्तु प्रधान संज्ञक त्रिगुणा परिणामिनी प्रकृति में ज्ञानशक्ति (सत्त्व गुण) और क्रिया शक्ति (रजोगुण) विद्यमान होने के कारण जगदुपादानत्व उपपन्न हो जाता है। यद्यपि साम्यावस्था में प्रकृतिगत क्रिया (रजोगुण) और ज्ञान (सत्त्वगुण) कार्यकारी नहीं होते, तथापि अव्यक्त-शक्ति के रूप में अवस्थित रहते हैं, उनको लेकर प्रधान तत्त्व ही सर्वज्ञ और सर्व-शक्ति-समन्वित हो सकता है, ब्रह्म नहीं। ब्रह्म का स्वरूप चैतन्य तो अविद्या से आवृत और अवृत्तिक अर्थात् जगद्रूपेण परिणत होने में वैसे ही अक्षम होता है, जैसे कि हम संसारी जीवगण। स्वरूप (अनौपाधिक) चैतन्य में सर्वज्ञत्व या ज्ञान-कर्तृत्व भी नहीं रहता, क्योंकि वह ज्ञान पदार्थ जन्य ही नहीं होता, जिसकी जनकता उसमें सम्भव हो। यदि उस स्वरूप ज्ञान को जन्य माना जाता है, तब वह सदातन नहीं रह सकता, ब्रह्म की सदा सर्वज्ञता समाप्त हो जाती है।
चेतनानधिष्ठित जड़ प्रकृति की जगद्रचना में प्रवृत्ति क्योंकर होगी? यह प्रश्न भी संगत नहीं, क्योंकि इसका उत्तर दिया गया है—"पुरुषार्थ एव हेतुः, न केनचित् कार्यते करणम्" (सां. का. ३१) अर्थात् भोग और मोक्षरूप द्विविध पुरुषार्थ से प्रयुक्त अनादि पुरुष-संयोग प्रकृति को महत्, अहङ्कारादि क्रम से परिणत होने में सक्षम बना देता है। यह देखा भी गया है कि चेतन से अधिष्ठित न होकर भी अचेतन (जड़) पदार्थ भोगापवर्गरूप कार्य के साधन में प्रवृत्त होता है, जैसे बछड़े की क्षुधा निवृत्त करने के लिए गौ के स्तनों में दूध अपने-आप उतर आता है— वत्संविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरज्ञस्य । पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथा प्रवृत्तिः प्रधानस्य ॥ (सां. का. ५७)