भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रधानस्य जगत्कारणत्वम् ] हिन्दीसहितभामतोसंवलितम् १८७
भामती
प्रवर्त्तन्ते । 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति' इत्याद्याश्च श्रुतयोऽचेतनेऽपि चेतनवदुपचारात् स्वकार्योन्मुखत्वमा-
दर्शयन्ति । यथा कूलं पिपतिषतीति ।
यत्प्राये श्रूयते यच्च तत्तादृगवगम्यते ।
भाक्तप्राये श्रुतमिदमतो भाक्तं प्रतीयते ॥
अपि चाहुर्वृद्धाः—'यथाऽग्रग्रप्राये लिखितं दृष्ट्वा वदन्ति भवेदग्रमग्रग्रः' इति, तथेदमपि 'ता आप ऐक्षन्त' 'तत्तेज ऐक्षत' इत्याद्युपचारप्राये श्रुतम् । तदैक्षतेत्यौपचारिकमेव विज्ञेयम् । अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणोति च प्रधानस्य जीवात्मत्वं जीवार्थकारितयाह । यथा हि भद्रसेनो राजार्थकारी राज्ञा भद्रसेनो ममात्मेत्युपचर्य्यते । एवं तत्त्वमसीत्याद्याः श्रुतयो भाक्ताः सम्पत्त्यर्था वा द्रष्टव्याः । स्वमपीतो भवतीति च निरुक्तं जीवस्य प्रधाने स्वकीयेऽप्ययं सुषुप्तावस्थायां ब्रूते ।
भामती-व्याख्या
“तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय" ( छां. ६।२।२ ) इत्यादि श्रुतियां तो अचेतन ( जड़ प्रकृति ) में चेतन-जैसा गौण व्यवहार वैसे ही करती है, जैसे 'कूलं पिपतिषति' ( नदी का कगार गिरना ही चाहता है ) ऐसा गौण व्यवहार, क्योंकि—
यत्प्राये श्रूयते यच्च तत् तादृगवगम्यते ।
भाक्तप्राये श्रुतमिदमतो भाक्तं प्रतीयते ॥
[ “प्राय वचनाच्च" ( जै. सू. २।२।१२ ), “विषये प्रायदर्शनात्" ( जै. सू. ३।३।२ ) इत्यादि सूत्रों में सजातीय या समान पदार्थों के समूह, प्रसङ्ग या प्रकरण का 'प्राय' शब्द से निर्देश किया गया है और प्राय-पाठ को भी एक निर्णायक या तात्पर्य-ग्राहक माना जाता है, जैसा श्री शबरस्वामी कहते हैं—“प्रायादपि चार्थनिश्चयो भवति, यथा—अग्रप्राये लिखिते अग्रच इति गम्यते" ( शा. भा. पृ. ६०२ ) । अर्थात् प्रधान पदार्थों की पंक्ति में निर्दिष्ट पदार्थ प्रधान एवं गौण पदार्थों की पंक्ति में चर्चित पदार्थ गौण माना जाता है । प्रकृत में ईक्षण पदार्थ गौण ईक्षणों के प्रसङ्ग में वर्णित हैं, जैसे ] “ता आप ऐक्षन्त" ( छां. ६।२।४ ), “तत् तेज ऐक्षत", ( छां. ६।२।२ ) इत्यादि जलादि जड़ पदार्थों के औपचारिक ( गौण ) ईक्षणों के मध्य में “तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय" ( छां. ६।२।३ ) यह ईक्षण भी पठित है, अतः यहाँ 'तत्' पद से प्रधान ( प्रकृति ) का ही ग्रहण करना चाहिए, जिससे गौण ईक्षणों का प्रसङ्ग भङ्ग न हो । "अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" ( छां. ६।३।१ ) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा प्रधान की ओर से ही यह कहलवाया गया है कि मैं ( प्रधान ) इस मनुष्य शरीर में जीव के रूप में प्रविष्ट होकर नाम-रूप का व्याकरण [ देवदत्तादि विशेष नाम और गौरादि विशेषरूप धारण ] करूँ । यहां भी प्रधान में ही जीवात्मत्व का व्यवहार इस लिए कर दिया गया है कि प्रधान तत्त्व ही जीव का उपकार-साधन करता है—
नानाविधैरुपायैरुपकारिण्यनुपकारिणः पुंसः ।
गुणवत्यगुणस्य सतस्तस्यार्थमपार्थकं चरति ॥ ( सा. का. ६० )
लोक में उपकार-कर्त्ता को आत्मा ही समझा जाता है, जैसे भद्रसेन नामक पुरुष राजा का उपकार-साधन करता है, अतः राजा उसमें आत्मस्वरूपता का गौण व्यवहार करता है—'भद्रसेनो ममात्मा' । इसी प्रकार “तत्त्वमसि" ( छां. ६।८।७ ) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा जीव में प्रधानरूपता का उपचार या सम्पादन किया जाता है । “स्वमपीतो भवति" ( छां. ६।८।१ ) इस श्रुति के द्वारा सुषुप्त जीव का अपनी प्रकृति ( प्रधान ) में लय प्रतिपादित है,