भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 206
१८८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ५

प्रधानकारणपक्षेऽपि योजयितुं शक्यन्ते । सर्वशक्तित्वं तावत्प्रधानस्यापि स्वविकारविषयमुपपद्यते । एवं सर्वज्ञत्वमप्युपपद्यते । कथम् ? यत्तु ज्ञानं मन्यसे स सत्त्वधर्मः, ‘सत्त्वात्संजायते ज्ञानम्’ (गी० १४।१७) इति स्मृतेः । तेन च सत्त्वधर्मेण ज्ञानेन


भामती

प्रधानांशतमःसमुद्रेके हि जीवो निद्राणस्तमसीव मग्नो भवति । यदाहुः—‘अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा’ इति । वृत्तीनामन्यासां प्रमाणादीनामभावस्तस्य प्रत्ययः कारणं तमस्तदालम्बना निद्रा जीवस्य वृत्तिरित्यर्थः । तथा सर्वज्ञं प्रस्तुत्य श्वेताश्वतरमन्त्रोऽपि ‘स कारणं करणाधिपाधिपः’ इति प्रधानाभिप्रायः । प्रधानस्यैव सर्वज्ञत्वं प्रतिपादितमधस्तात् । तस्मादचेतनं प्रधानं जगदुपादानमनुवदन्ति श्रुतय इति पूर्वः पक्षः । एवं काणादादिमतेऽपि कथञ्चिद्योजनीयाः श्रुतयः । अक्षरार्थस्तु “प्रधानकारणपक्षेऽपि” इति “प्रधानस्यापि” इति अपिकारावेवकारार्थौ । स्यादेतत्—सत्त्वसम्पत्त्या चेदस्य सर्वज्ञताऽथ तमःसम्पत्त्याऽसर्वज्ञताऽस्य कस्मान्न भवतीत्यत आह ❖ तेन च सत्त्वधर्मेण ज्ञानेन ❖ इति । सत्त्वं हि प्रकाशशीलं निरतिशयोत्कर्षं सार्वज्ञ्यबीजम् । यदाहुः—‘निरतिशयं सार्वज्ञ्यबीजम्’ इति । यत् खलु सातिशयं तत् क्वचिन्निरतिशयं दृष्टं, यथा कुवलामलकबिल्वेषु सातिशयं महत्त्वं व्योम्नि परममहति निरतिशयम् । एवं ज्ञानमप्येकद्वि-


भामती-व्याख्या

क्योंकि प्रधान के तमोगुणरूप अंश की वृद्धि या प्रधानता हो जाने पर जीव सुषुप्तिरूप गाढ निद्रा में वैसे ही डूब जाता है, जैसे कोई गाढ़ अन्धकार में समा जाय । महर्षि पतञ्जलि निद्रा का लक्षण करते हैं— “अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा” (यो. सू. . १।१० ) अर्थात् अन्तःकरण की सब पाँच वृत्तियाँ होती हैं—( १ ) प्रमाण, ( २ ) विपर्यय, ( ३ ) विकल्प, ( ४ ) निद्रा और ( ५ ) स्मृति । निद्रा से भिन्न प्रमाणादि चार प्रकार की वृत्तियों के अभाव का जो प्रत्यय (कारण या सम्पादक) है—तमोगुण, उसको आलम्बन (विषय) करनेवाली वृत्ति को निद्रा कहते हैं । श्वेताश्वतर उपनिषत् में सर्वज्ञ का प्रकरण आरम्भ करके जो कहा गया है— “स कारणं करणाधिपाधिपः” (श्वेता० ६।९) वह प्रधान पदार्थ को अभिलक्ष्य करके कहा है कि वह जगत् का कारण एवं करणों (इन्द्रियों) के अधिपति जीव का अधिपति (अन्तर्यामी) है । प्रधान में ही सर्वज्ञता का उपपादन पहले किया जा चुका है, अतः अचेतन प्रधान को ही जगत् का उपादान कारण श्रुतियाँ बताती हैं—यह इस अधिकरण का पूर्वपक्ष है ।

यद्यपि वैशेषिकादि मतों में भी श्रुतियों की योजना की जा सकती है, तथापि प्रधान कारणता पक्ष में ही श्रुतियों का अक्षरार्थ घटता है। “प्रधानकारणपक्षेऽपि” और “सर्वशक्तिमत्त्वं तावत् प्रधानस्यापि” इन भाष्य-वाक्यों में प्रयुक्त दोनों ‘अपि’ शब्द एवकारार्थक हैं, अर्थात् श्रुतियों का शब्दार्थ प्रधान-कारणता-पक्ष में ही घटता है और सर्वशक्तिमत्त्व भी प्रधान तत्त्व में ही उपपन्न होता है । सर्वज्ञत्व भी वहीं समञ्जस होता है, क्योंकि सर्वज्ञत्व का घटकीभूत जो ज्ञान है, वह प्रधान के सत्त्व गुण का ही धर्म है, भगवद्गीता कहती है—“सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानम्” (गी. १४।१७) । ‘यदि सत्त्व गुण के धर्मभूत ज्ञान को लेकर प्रधान सर्वज्ञ है, तब अपने तमोगुण के धर्मभूत अज्ञान को लेकर असर्वज्ञ क्यों नहीं ?’ इस प्रश्न का उत्तर है—“तेन च सत्त्वधर्मेण ज्ञानेन कार्यकारणवन्तः पुरुषाः योगिनः सर्वज्ञाः प्रसिद्धाः, सत्त्वस्य हि निरतिशयोत्कर्षे सर्वज्ञत्वं प्रसिद्धम् ।” अर्थात् सत्त्वगुण प्रकाशशील है, प्रकाश का निरतिशय उत्कर्ष (असीम अवस्था में पहुँच जाना) ही सर्वज्ञता का बीज (कारण) है, जैसा कि योगसूत्र की स्थापना है—“तत्र निरतिशयं सार्वज्ञ्यबीजम्” (यो. सू. १।२५) । जो वस्तु सातिशय (तरतमभाव-युक्त) होती है, वह कहीं चरम सीमा में पहुँची देखी गई है, जैसे—

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