भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रधानस्य जगत्कारणत्वभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १९१
भामती सम । तस्याम्नायतो नित्यज्ञानस्वभावत्वविनिश्चयात् । नन्वत एवास्य नेक्षितृत्वं; नित्यस्य ज्ञानस्वभाव- भूतस्येक्षणस्याक्रियात्वेन ब्रह्मणस्तत्प्रति निमित्तभावाभावात् । अक्रियानिमित्तस्य च कारकत्वनिवृत्तौ तद्व्याप्यस्य तद्विशेषस्य कर्तृत्वस्य निवृत्तेः । सत्यं ब्रह्मस्वभावश्चैतन्यं नित्यतया न क्रिया, तस्य त्वनवच्छि- न्नस्य तत्तद्विषयोपाधानभेदावच्छेदेन कल्पितभेदस्यानित्यत्वं कार्य्यत्वं चोपपद्यते । तथा चैवंलक्षणे ईक्षणे सर्वविषये ब्रह्मणः स्वातन्त्र्यलक्षणं कर्तृत्वमुपपन्नम् । यद्यपि च कूटस्थनित्यस्यापरिणामिन औदासीन्यमस्य वास्तवं तथाप्यनाद्यनिर्वचनीयाविद्यावच्छिन्नस्य व्यापारवत्त्वमवभासत इति कर्तृत्वोपपत्तिः । परैरपि च चिच्छक्तेः कूटस्थनित्याया वृत्तौ प्रति कर्तृत्वमीदृशमेवाभ्युपेयम् । चैतन्यसामानाधिकरण्येन ज्ञातृत्वोप- लब्धेः । न हि प्राधानिकाभ्यन्तरबाह्यकरणानि त्रयोदश सत्त्वप्रधानान्यपि स्वयमेवाचेतनानि तद्वृत्तयश्च स्वं वा परं वा वेदितुमुत्सहन्ते । नो खल्वन्धाः सहस्रमपि पान्थाः पन्थानं विदन्ति । चक्षुष्मता चैकेन चेद् वेद्यते, स एव तर्हि मार्गदर्शी स्वतन्त्रः कर्त्ता नेता तेषाम् । एवं बुद्धिसत्त्वस्य स्वयमचेतनस्य चिति-
भामती-व्याख्या में नहीं । इसी प्रकार ब्रह्म में ही ईक्षितृत्व मुख्य रूप से घटता है, क्योंकि वेद के द्वारा उसमें नित्यज्ञानरूपता प्रतिपादित है, प्रधानादि में नहीं ।
शङ्का—नित्यज्ञानस्वरूपता होने के कारण ही ब्रह्म में ईक्षण-कर्तृत्व सम्भव नहीं, क्योंकि घटादि कार्य (जन्य) पदार्थों का ही कुलालादि में कर्तृत्व देखा जाता है, नित्य ज्ञानरूप ईक्षण कार्य (जन्य) पदार्थ नहीं, अतः उसका कर्तृत्व ब्रह्म में क्योंकर होगा ? 'यत्र यत्र कारकत्वम्, तत्र तत्र क्रिया-निमित्तत्वम्'—इस प्रकार व्यापकीभूत क्रिया-निमित्तत्व की निवृत्ति हो जाने से ब्रह्म में कारकत्व ही नहीं घटता, कारकत्व धर्म कर्तृत्वादि का व्यापक है, उसकी निवृत्ति हो जाने से उसके व्याप्यभूत कर्तृत्व की भी निवृत्ति हो जाती है, तब ब्रह्म में ईक्षणकर्तृत्व कैसे बनेगा ?
समाधान—यह सत्य है कि ब्रह्मस्वरूप ज्ञान नित्य है, कार्य (जन्य) नहीं, किन्तु स्वभावतः अनवच्छिन्न ज्ञान अपनी विषयरूप उपाधियों से अवच्छिन्न होकर वैसे ही कार्य (अनित्य) माना जाता है, जैसे घटादि से अवच्छिन्न होकर आकाश । फलतः इस प्रकार के ईक्षणरूप ज्ञान को लेकर ब्रह्म में उसका "स्वतन्त्रः कर्त्ता" (पा. सू. १।४।५४) के अनुसार कर्तृत्व उपपन्न हो जाता है । यद्यपि इस कूटस्थ, नित्य और अपरिणामी ब्रह्म में औदासीन्य (अक्रियाकारित्व) ही वास्तविक है, तथापि अनादि और अनिर्वचनीय अविद्या से अवच्छिन्न होकर ब्रह्म क्रियावान् हो जाता है, अतः उसमें कर्तृत्व बन जाता है । सांख्याचार्यादि भी चिति शक्ति (पुरुष) को कूटस्थ और नित्य मानते हैं, अतः उन्हें भी बुद्धिस्थ वृत्ति (क्रिया) का कर्तृत्व ऐसा ही स्वीकार करना होगा, क्योंकि ज्ञातृत्व जड़ में नहीं, चेतन में ही प्रतीत होता है ।
प्रधान (प्रकृति) के द्वारा जो मन, बुद्धि और अहङ्काररूप त्रिविध अन्तःकरण, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय रूप दशविध बाह्य करण; सब मिलाकर तेरह प्रकार का करण-कलाप उत्पन्न किया जाता है—"करणं त्रयोदशविधम्" (सां. का. ३२) । वह सब सत्त्व गुण का कार्य होने पर भी अचेतन एवं उसकी वृत्तियां भी जड़ हैं, अतः वे न अपने को जान सकती हैं और न अपने से भिन्न विषय को । हजारों अन्धे यदि मिलकर किसी मार्ग पर चल पड़ते हैं, तब भी उस मार्ग का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते, किन्तु आँखवाला व्यक्ति भले ही एक अकेला हो, यदि सब कुछ देख सकता है, तब वही आँखवाला व्यक्ति ही सभी का नेता माना जायगा । बुद्धिगत सत्त्व स्वयं अचेतन होकर जिस चैतन्य की छाया पत्ति के द्वारा