भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१९२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ५

भामती

बिम्बसंक्रान्त्या चेदापन्नं चैतन्यस्य ज्ञातृत्वम् , चितिरेव ज्ञात्री स्वतन्त्रा, नान्तर्बहिकरणान्यन्धसहस्र- प्रतिमान्यस्वतन्त्राणि। न चास्याश्चितेः कूटस्थनित्याया अस्ति व्यापारयोगः। न च तदयोगेऽप्यज्ञातृत्वं व्यापारवतामपि जडानामज्ञत्वात्। तस्मादन्तःकरणवर्तिनं व्यापारमारोप्य चितिशक्तौ कर्तृत्वाभिमा- नोऽन्तःकरणे वा चैतन्यमारोप्य तस्य ज्ञातृत्वाभिमानः। सर्वथा भवन्मतेऽपि नेदं स्वाभाविकं क्वचिदपि ज्ञातृत्वमपि तु सांव्यावहारिकमेवेति परमार्थः। नित्यस्यात्मनो ज्ञानं परिणाम इति च भेदाभेदपक्षम्- पाकुर्वद्भिः परास्तम्। कूटस्थस्य नित्यस्यात्मनोऽव्यापारवत एव भिन्नं ज्ञानं धर्म इति चोपरिष्टादपाकरि- ष्यते। तस्माद्वस्तुतोऽनवच्छिन्नं चैतन्यं तत्त्वान्यत्वानिर्वचनीयाव्याकृतव्याचिकीर्षितनामरूपविषयावच्छिन्नं सज्ज्ञानं कार्यं तस्य कर्त्ता ईश्वरो ज्ञाता सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति सिद्धम्। तथा च श्रुतिः— 'तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते। अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते'॥ इति। तपसा ज्ञानेन अव्याकृतनामरूपविषयेण चीयते तद्व्याचिकीर्षावद्भवति। यथा कुविन्दादिरव्याकृतं पटादि बुद्ध्यावालिख्य चिकीर्षति। एकधर्मवान् द्वितीयधर्मोपजननेन उपचित उच्यते। व्याचिकीर्षायां

भामती-व्याख्या

चैतन्य प्राप्त करता है, उस मुख्य चैतन्य में ही ज्ञातृत्व होता है, वही चैतन्य तत्त्व स्वतन्त्र है, अन्तःकरण या बहिःकरणों का समूह वैसे ही कभी चेतन नहीं बन सकता, जैसे हजारों अन्धों का समूह चक्षुष्मान नहीं होता। इस मुख्य चिति शक्ति (आत्मा) में कूटस्थता, विभुता और नित्यता होने के कारण किसी प्रकार की क्रिया का सम्बन्ध नहीं। क्रिया का असम्बन्ध होने के कारण चैतन्य में अज्ञातृत्व नहीं कह सकते, क्रिया के अयोग से अज्ञातृत्व तब कह सकते थे, जबकि ज्ञातृत्व के प्रति क्रिया-सम्बन्ध व्यापक होता, किन्तु वैसा नहीं, क्योंकि जड़ पदार्थों में क्रिया का सम्बन्ध रहने पर भी ज्ञातृत्व नहीं माना जाता। अतः अन्तःकरणगत क्रिया का चित्ति शक्ति में आरोप करके ज्ञातृत्व का अभिमान होता है अथवा अन्तःकरण में चैतन्य का आरोप करके ज्ञातृत्व का अभिमान होता है। सर्वथा आप (सांख्य) के मत में भी ज्ञातृत्व कहीं पर स्वाभाविक (अनौपाधिक) नहीं होता, अपि तु सांव्यवहारिक ज्ञातृत्व बनता है। 'नित्य आत्मा का परिणाम ज्ञान है'—ऐसा भेदाभेदवादी भास्कराचार्य जो मानते हैं, वह पहले भेदाभेद-पक्ष का निराकरण करते समय निराकृत हो चुका है। नित्य और क्रिया-रहित आत्मा का ज्ञान धर्म है—इस पक्ष का आगे चलकर (ब्र. सू. २।३।१८ में) खण्डन किया जायगा। वस्तुतः अनवच्छिन्न चैतन्य सत्त्वासत्त्व से भिन्न (अनिर्वचनीय) व्याचिकीर्षित नाम-रूपात्मक विषय से अवच्छिन्न होकर जो ज्ञानरूप कार्य बनता है, उसका कर्त्ता है—ईश्वर, वह सर्वज्ञ और सर्वशक्ति-समन्वित होता है। जैसा कि श्रुति कहती है— “तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते। अन्नात् प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ (मुण्ड. १।१।८) । “यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते” (मुण्ड. १।१।९) । 'तपः' शब्द से अव्याकृत नाम-रूपात्मक विषयावगाही ज्ञान विवक्षित है। 'चीयते' का अर्थ है—'व्याचिकीर्षितो भवति,'। जैसे जुलाहा अव्याकृत (तन्त्वा- दिरूप में अवस्थित अप्रकट) पटादि का कुछ आकार अपनी बुद्धि में खींच कर निर्माण करना चाहता है। किसी एक धर्मवाले पदार्थ में द्वितीय धर्म का उत्पादन हो जाने पर वह पदार्थ उपचित कहा जाता है। “ततोऽन्नमभिजायते' का अर्थ यह है कि व्याचिकीर्षा और उपचय