भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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प्रधानकारणतावादभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १९३


भामती

चोपचये सति ततो नामरूपमन्नमदनीयं साधारणं संसारिणां व्याचिकीर्षितमभिजायते । तस्मादव्याकृताद् व्याचिकीर्षिताद् अन्नात्प्राणो हिरण्यगर्भो ब्रह्मणो ज्ञानक्रियाशक्त्यधिष्ठानं जगत् सूत्रात्मा साधारणो जायते । यथाऽव्याकृताद् व्याचिकीर्षितात् पटाद् अवान्तरकार्यं द्वितन्तुकादि । तस्माच्च प्राणाद् मनआख्यं सङ्कल्पविकल्पादिव्याकरणात्मकं जायते । ततो व्याकरणात्सकात् मनसः सत्यशब्दवाच्यान्याकाशादीनि जायन्ते । तेभ्यश्च सत्याख्येभ्योऽनुक्रमेण लोका भूर्वादयः । तेषु मनुष्यादिप्राणिनो वर्णाश्रमक्रमेण कर्माणि धर्माधर्मरूपाणि जायन्ते । कर्मंसु चामृतं फलं स्वर्गनरकादि । तच्च स्वनििमत्तयोर्धर्माधर्मयोः सतोर्न विनश्यतीत्यमृतं यावद्धर्माधर्मभावीति यावत् । यः सर्वज्ञः सामान्यतः सर्वविद्विशेषतो यस्य भगवतो ज्ञानमयं तपो धर्मो नायासमयम् । तस्माद् ब्रह्मणः पूर्वस्मादेतदपरं कार्यं ब्रह्म । किञ्च नामरूपमन्नं च ब्रीह्यवादि जायत इति । तस्मात् प्रधानस्य साम्यावस्थायामनीक्षितृत्वात् , क्षेत्रज्ञानां च सत्यपि चैतन्ये सर्गादौ विषयानीक्षणात् , मुख्यसम्भवे चोपचारस्यान्याय्यत्वात् , मुमुक्षोश्चायथार्थोपदेशानुपपत्तेः, मुक्तिविरोधित्वात्तेजःप्रभृतीनाञ्च मुख्यासम्भवेनोपचाराश्रयणस्य युक्तिसिद्धत्वात् , संशये च तत्प्रायपाठस्य निश्चायकत्वात् , इह तु मुख्यस्यौत्सर्गिकत्वेन निश्चये सति संशयाभावाद्, अन्यथा किरातशतसङ्कीर्णदेशनिवासिनो ब्राह्मणायनस्यापि किरातत्वापत्तेः, ब्रह्मैवेक्षित्रनाद्यनिर्व्वाच्याविद्यासचिवं जगदुपादानं, शुक्तिरिव समारोपितस्य रजतस्य, मरीचय इव जलस्यैकश्चन्द्रमा इव द्वितीयस्य चन्द्रमसः । न त्वचेतनं


भामती-व्याख्या

के हो जाने पर नाम-रूपात्मक प्रपञ्च अन्न (भोग्यवर्ग) के रूप में उत्पन्न होता है। उस व्याचिकीर्षित अव्यक्त से प्राण (हिरण्यगर्भ, ब्रह्म की ज्ञान-शक्ति और क्रियाशक्ति का अधिष्ठानभूत सूत्रात्मा) वैसे ही उत्पन्न होता है, जैसे—व्याचिकीर्षित एकतन्त्वात्मक पट से बहुतन्त्वात्मक पट उत्पन्न होता है। उस प्राण तत्त्व से मनःसंज्ञ क संकल्प-विकल्पात्मक वस्तु उत्पन्न होती है। उस मन से 'सत्य' शब्द-वाच्य आकाशादि जगत्, उस से क्रमशः भू, भुवः और स्वः ये तीन लोक, उन लोकों में मनुष्य एवं वर्णाश्रमोचित कर्म (धर्माधर्म) उत्पन्न होते हैं। धर्म और अधर्म से स्वर्ग-नरकादि रूप फल उत्पन्न होता है, [उसको अमृत (अविनाशी) इसलिए कहा जाता है कि वह अपने कारणीभूत धर्म और अधर्म के रहने पर नष्ट नहीं होता, धर्माधर्म-पर्यन्त स्थायी होता है]। दूसरी श्रुति का अर्थ यह है कि 'यः सर्वज्ञः' जो सर्वविषयक सामान्य ज्ञानवान् और सर्ववित् (विशेषतः सर्वविषयक ज्ञानवान्) है, जिस परमेश्वर का तप ज्ञानात्मक है, उस परब्रह्म परमेश्वर से यह ब्रह्म (बृहत् कार्य) नाम, रूप एवं व्रीहि आदि अन्न उत्पन्न होता है। फलतः साम्यावस्थापन्न प्रधान में ईक्षितृत्व, सर्गारम्भकालीन जीवों में विषय का ईक्षण सम्भव न होने के कारण ब्रह्म को ही जगत् का उपादान कारण मानना पड़ता है। जब कि ब्रह्म में मुख्य सर्वज्ञत्व बन सकता है, तब प्रधानादि में गौण सर्वज्ञत्वादि मानना अन्याय है। 'तत्त्वमसि' आदि श्रुतियों के द्वारा मुमुक्षु जीव को प्रधानात्मकता का उपदेश अयथार्थ होने के कारण मुक्ति का साधक न होकर बाधक है। तेज और जलादि में मुख्य ईक्षितृत्व सम्भव न होने के कारण गौण ईक्षितृत्व का आश्रयण अगत्या किया जाता है, ब्रह्म में वैसा करने की कोई आवश्यकता नहीं। ब्रह्म में ईक्षण-कर्तृत्व निश्चित है, सन्दिग्ध नहीं, जहाँ सन्देह होता है, वहाँ ही प्राय-पाठ को निर्णायक माना जाता है, ब्रह्म में तो मुख्य ईक्षितृत्व ही सहज-सिद्ध है। फिर भी यदि प्राय-पाठ को महत्त्व देकर गौण ईक्षितृत्व सिद्ध किया जाता है, तब चारों ओर भीलों से आकीर्ण देश में रहनेवाले ब्राह्मण को भी किरात (भील) ही मानना पड़ेगा। परिशेषतः अनादि एवं अनिर्वचनीय अविद्या की सहायता से सच्चिदात्मक ब्रह्म ही समस्त जगत् का वैसे ही उपादान कारण सिद्ध होता है,

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