भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 212
१९४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ५

'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत' ( छान्दो० ६।२।३ ) इति । तत्रेवंदशब्दवाच्यं नामरूपव्याकृतं जगत्प्रागुत्पत्तेः सदात्मनावधार्य तस्यैव प्रकृतस्य सच्छब्दवाच्यस्येक्षणपूर्वकं तेजःप्रभृतेः स्रष्टृत्वं दर्शयति । तथान्यत्र — 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र

भामती

प्रधानपरमाण्वादि । अशब्दं हिं तत् । न च प्रधानं परमाणवो वा तदतिरिक्तसर्वज्ञेश्वराधिष्ठिता जगदुपादानमिति साम्प्रतम्, तेषां भेदेन कार्य्यत्वात् । कारणात्कार्याणां भेदाभावात् । कारणज्ञानेन समस्तकार्यपरिज्ञानस्य मृदादिनिदर्शनेनागमेन प्रसाधितत्वात् । भेदे च तदनुपपत्तेः । साक्षाच्च 'एकमेवाद्वितीयं' 'नेह नानास्ति किञ्चन' 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति' इत्यादिभिर्बहुभिर्वचोभिर्ब्रह्मातिरिक्तस्य प्रपञ्चस्य प्रतिषेधाच्चेतनोपादानमेव जगद् भुजङ्ग इवारोपितो रज्जूपूादान इति सिद्धान्तः । सदुपादानत्वे हि सिद्धे जगतस्तदुपादानं चेतनमचेतनं वेति संशय्य मीमांस्येत । अद्यापि तु सदुपादानत्वमसिद्धमित्यत आह ꕤ तत्रेवं शब्दवाच्यम् ꕤ इत्यादि ꕤ दर्शयति ꕤ इत्यन्तेन । तथापीक्षिता पारमार्थिकप्रधानक्षेत्रज्ञातिरिक्त ईश्वरो भविष्यति, यथाहुरैरण्यगर्भा इत्यतः श्रुतिः पठिता 'एकमेवाद्वितीयम्' इति, 'बहु स्याम्' इति

भामती-व्याख्या

जैसे शुक्ति पदार्थ अपने में अध्यस्त रजत का, मरुमरीचि-पुञ्ज अपने में समारोपित जल का और एक चन्द्रमा अपने में अवभासित द्वितीय चन्द्र का उपादान कारण होता है।

सांख्य-सम्मत प्रधान ( प्रकृति ) वैशेषिकाभ्युपगत परमाणु आदि पदार्थ जगत् के कभी भी उपादान कारण नही बन सकते, क्योंकि वे अशब्द ( प्रमाण-रहित ) हैं। यद्यपि प्रधान और परमाण्वादि जड़ पदार्थ हैं, तथापि ईश्वर से अधिष्ठित होकर जगत् के उपादान क्यों न हो सकेंगे?' इस प्रश्न का उत्तर यह है कि मृदादि कारण से घटादि कार्य का भेद नहीं होता, किन्तु जगत् से प्रधानादि का भेद सिद्ध है। अत एव श्रुति ने एक कारण के ज्ञान से समस्त कार्य का ज्ञान मृदादि दृष्टान्त के द्वारा सिद्ध किया है— "यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्, वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" ( छां. ६।१।४ )। कार्य और कारण का भेद मानने पर एक कारण के ज्ञान से समस्त कार्य का ज्ञान सम्भव न हो सकेगा।

दूसरी बात यह भी है कि "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति, य इह नानेव पश्यति" ( बृह. उ. ४।४।१९ ) इत्यादि अनेक श्रुतियों के द्वारा ब्रह्म से अतिरिक्त प्रपञ्च का प्रतिषेध किया गया है, अतः यह प्रपञ्च वैसे ही ब्रह्मोपादानक सिद्ध होता है, जैसे— रज्जु में आरोपित सर्प रज्जूपूादानक होता है। जब यह सिद्ध हो जाय कि जगत् का उपादन कोई सत् तत्त्व है, तब उसमें वह 'सत्' पदार्थ चेतन है? अथवा अचेतन ? इस प्रकार का सन्देह उठाकर यह प्रस्तुत विचार किया जा सकता था, किन्तु सदुपादानकत्व तो जगत् में अभी तक सिद्ध नहीं किया गया, अतः भाष्यकार कह रहे हैं— "तत्रेवंदशब्दवाच्यं नामरूपव्याकृतं जगत् प्राग् उत्पत्तेः सदात्मनावधार्य तस्यैव प्रकृतस्य सच्छब्दवाच्यस्येक्षणपूर्वकं तेजःप्रभृतेः स्रष्टृत्वं दर्शयति"। अर्थात् 'तेज' आदि शब्दों के द्वारा उसी सत् या चेतन तत्त्व की उपस्थिति कराकर उसी में मुख्य ईक्षण प्रतिपादित हैं, अतः वहाँ गौण ईक्षण का प्रसङ्ग ही नहीं कि गौण ईक्षण मानना आवश्यक हो। 'सत्' पद के द्वारा पारमार्थिक वस्तु का ग्रहण कर लेने पर भी प्रधान और परमाणु से अतिरिक्त योग-सम्मत ईश्वर को जगत् का उपादान कारण क्यों न मान लिया जाय?' इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए "एकमेवाद्वितीयम्"— यह श्रुति पढ़ दी है ! एक अद्वितीय ब्रह्म तत्त्व का ही ग्रहण 'सत्' पद के द्वारा किया जा सकता है, अन्य किसी पदार्थ का नहीं। "बहुस्यां प्रजायेय" इस श्रुति के द्वारा भी एक अद्वितीय चेतन तत्त्व

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 212, कुल 639 में से · BharatKosha