भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रधानकारणतावादभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १९५
आसीत्। नान्यत्किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति । स इमाँल्लोकानसृजत' ( ऐत० १।१।१ ) इतीक्षापूर्विकानेव सृष्टिमाचष्टे । क्वचिच्च षोडशकलं पुरुषं प्रस्तुत्याह - 'स ईक्षांचक्रे। स प्राणमसृजत' ( प्रश्न० ६।३ ) इति । ईक्षतेरिति च धात्वर्थनिर्देशोऽभिप्रेतः, यजतेरितिवत् । न धातुनिर्देशः । तेन 'यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य
भामती च चेतनं कारणमात्मन एव बहुभावमाह । तेनापि कारणाच्चेतनादभिन्नं कार्यमवगम्यते । यद्यप्याकाशाद्या भूतसृष्टिस्तथापि तेजोबन्नानामेव त्रिवृत्करणस्य विवक्षितत्वात् तत्र तेजसः प्राथम्यात् तेजः प्रथममुक्तम् । एकद्वितीयं जगदुपादानमित्यत्र श्रुत्यन्तरमपि पठति ॐ तथान्यत्र ॐ इति । ब्रह्म चतुष्पादष्टाशफं षोडशकलम् । तद्यथा, प्राची प्रतीची दक्षिणादीचीति चतस्रः कला ब्रह्मणः । प्रकाशवान् नाम प्रथमः पादः । तदद्धं शफः । तथा पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौः समुद्र इत्यपराश्चतस्रः कला द्वितीयः पादोऽनन्तवान्नाम । तथाग्निः सूर्यश्चन्द्रमा विद्युदिति चतस्रः कलाः, स ज्योतिष्मान्नाम तृतीयः पादः । प्राणश्चक्षुः श्रोत्रं वागिति चतस्रः कलाः स चतुर्थ आयतनवान्नाम ब्रह्मणः पादः । तदेवं षोडशकलं षोडशावयवं ब्रह्मोपास्यमिति । स्यादेतत् । ईक्षतेरिति शितपा धातुस्वरूपमुच्यते, न चाविवक्षितार्थस्य धातुस्वरूपस्य चेतनोपादानसाधनत्वसम्भव इत्यत आह "ईक्षतेः" इति । धात्वर्थनिर्देशोऽभिमतः, विषयिणा विषयलक्षणात् । प्रसिद्धा चेयं लक्षणेत्याह
भामती-व्याख्या ही सृष्टि के रूप में अपना बहुभाव प्रदर्शित कर रहा है, इसलिए भी चेतन से जगत् अभिन्न ही प्रतीत होता है। यद्यपि आकाशादि से पाँच भूतों की सृष्टि दिखाई है, अतः पञ्चीकरण प्रक्रिया सर्व-सम्मत प्रतीत होती है। तथापि यहाँ तेज, जल और अन्न (पृथिवी) इन तीनों का त्रिवृत्करण विवक्षित है—'तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोत्' (छां. ६।३।२)। तीनों में तेज का प्रथम उल्लेख होने के कारण तेज की प्रथम चर्चा की गई है। एक अद्वितीय तत्त्व ही जगत् का उपादान कारण है—इस अर्थ की साधिका अन्य श्रुति प्रस्तुत की जाती है—"तथा अन्यत्र आत्मा वा इदमेक एवाग्रे आसीत्, नान्यत् किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति" (ऐत. १।१।२)। ब्रह्म चतुष्पात्, अष्टशफ और षोडशकलावाला है, अर्थात् (१) पूर्व, (२) पश्चिम, (३) दक्षिण और (४) उत्तर—ये चार कलाएँ ब्रह्म का 'प्रकाशवान्' नामक प्रथम पाद (खुर) हैं। (५) पृथिवी, (६) अन्तरिक्ष, (७) द्यौः और (८) समुद्र—ये चार कलाएँ ब्रह्म का 'अनन्तवान्' नामक द्वितीय पाद हैं। (९) अग्नि, (१०) सूर्य, (११) चन्द्रमा और (१२) विद्युत्—ये चार कलाएँ 'ज्योतिष्मान्' नामक तृतीय पाद हैं। (१३) प्राण, (१४) चक्षु, (१५) श्रोत्र और (१६) वाक्—ये चार कलाएँ 'आयतनवान्' नामक चतुर्थ पाद हैं। इस प्रकार चतुष्पात् और षोडश कला-युक्त ब्रह्म उपास्यरूप से निर्दिष्ट हुआ है। गौ आदि के प्रत्येक पैर में जो एक फटा हुआ खुर होता है, उसके प्रत्येक भाग को शफ कहते हैं, अतः पशु के चार पाद और आठ शफ माने जाते हैं।
'चेतनमेव जगदुपादानं भवति, ईक्षते:'—इस विवक्षित अनुमान में 'ईक्षते:' का अर्थ क्या है ? 'ईक्षति' शब्द में यदि 'श्तिप' का निर्देश माना जाता है, तब "इक्श्तिपौ धातुनिर्देशे विहितौ" (तं. वा. पृ. ३७९) इसके अनुसार 'ईक्षते:' का अर्थ होता है—'ईक्षिधातोः'। चेतनगत जगदुपादानता की साधक ईक्षधातु नहीं, अपितु ईक्षणरूप अर्थ साधक होता है, अतः कहा गया है—"ईक्षितेरिति धात्वर्थनिर्देशोऽभिप्रेतः। 'इक्' और 'श्तिप्' कहीं-कहीं अर्थ के भी निर्देशक माने गये हैं—"क्वचिदर्थेऽपि धातुमिक्श्तिबन्तं प्रयुञ्जते—यजिः, यजति इति च" (तं. वा. पृ. ३७९)। अथवा शब्दपरक इक् और श्तिप् की वाच्यार्थ में लक्षणा की जा सकती है। यह लक्षणा अत्यन्त प्रसिद्ध है—"यजतेरितिवत्"। ईक्षणरूप पदार्थ चेतन में ही सम्भव