भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ५
पपत्तिर्मृदादिवत् , नासंहतस्यैकात्मकस्य ब्रह्मण इत्येवं प्राप्त इदं सूत्रमारभ्यते—
ईक्षतेर्नाशब्दम् ॥ ५ ॥
न सांख्यपरिकल्पितमचेतनं प्रधानं जगतः कारणं शक्यं वेदान्तेष्वाश्रयितुम् । अशब्दं हि तत् । कथमशब्दत्वम् ? ईक्षतेः-ईक्षितृत्वश्रवणात्कारणस्य । कथम् ? एवं हि श्रूयते—‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’ ( छान्दो० ६।२।१ ) इत्युपक्रम्य
भामती
एवं प्राप्त उच्यते – नाम रूप-प्रपञ्च-लक्षणकार्यदर्शनादेतत्कारणमात्रवदिति सामान्यकल्पनायामस्ति प्रमाणं, न तु तदचेतनं चेतनमिति वा विशेषकल्पनायामस्त्यनुमानमित्युपरिष्टात्प्रवेदयिष्यते । तस्मान्नामरूपप्रपञ्चकारणभेवप्रमायामाम्नाय एव भगवानुपासनीयः । तदेवमाम्नायैकसमधिगमनीये जगत्कारणे—
पौर्वापर्यपरामर्शाद् यदाम्नायोऽञ्जसा वदेत् ।
जगद्बीजं तदेवेष्टं चेतने च स आञ्जसः ॥
तेषु तेषु खल्वाम्नायप्रदेशेषु तदैक्षतेत्येवंजातीयकैर्वाक्यैरीक्षितुः कारणाज्जगज्जन्माख्यायते इति, न च प्रधानपरमाण्वादेरचेतनस्येक्षितृत्वमाञ्जसम् । सत्त्वांशेनेक्षितु प्रधानं तस्य प्रकाशकत्वादिति चेत् । न; तस्य जाड्येन तत्त्वानुपपत्तेः । कस्तर्हि रजस्तमोभ्यां सत्त्वस्य विशेषः ? स्वच्छता । स्वच्छं हि सत्त्वम् । अस्वच्छे च रजस्तमसी । स्वच्छस्य च चैतन्यबिम्बोद्ग्राहितया प्रकाशत्वव्यपदेशो नेतरयोरस्वच्छतया तद्ग्राहित्वाभावात् । पार्थिवत्वे तुल्य इव मणेर्बिम्बोद्ग्राहिता न लोष्ठादीनाम् । ब्रह्मणस्त्वीक्षितृत्वमाञ्ज-
भामती-व्याख्या
सिद्धान्त—नाम-रूपात्मक प्रपञ्च को देख कर अनुमान प्रमाण से तो केवल इतनी ही कल्पना की जा सकती है कि 'इदं कार्यजातं कारणवत्, कार्यत्वाद् घटादिवत्' । इससे अतिरिक्त वह कारण पदार्थ चेतन है? या अचेतन? इस प्रकार की विशेष कल्पना में अनुमान की गति नहीं हो सकती—यह आगे चल कर कहा जायगा, अतः इस नाम-रूपात्मक प्रपञ्च के विशेष कारण का निश्चय करने के लिए भगवान् वेद की ही शरण लेनी आवश्यक है। जब वेद के द्वारा ही जगत् की कारण वस्तु का अधिगम करना है, तब—
पौर्वापर्यपरामर्शाद् यदाम्नायोऽञ्जसा वदेत् ।
जगद्बीजं तदेवेष्टं चेतने च स आञ्जसः ॥
[ वेद अपनी तात्पर्य-ग्राहिका उपक्रमोपसंहारादि युक्तियों की सहायता से जो जगत् का कारण बताएगा, वही मानना होगा, वेद के द्वारा वह कारणता ब्रह्मरूप चेतन पदार्थ में ही सम्यक् प्रतिपादित है, क्योंकि ] वेद के अनेक प्रदेशों में 'तदैक्षत' ( छां. ६।२।३ ) इत्यादि वचनों के द्वारा ईक्षण-कर्ता पुरुष से जगत् का जन्म कथित है । प्रधान और परमाणु आदि अचेतन पदार्थों में मुख्य ईक्षितृत्व सीधे-सीधे नहीं घटता । 'सत्त्व गुण के अंशभूत ज्ञान के द्वारा प्रधान ( प्रकृति ) में जो ईक्षितृत्व सांख्याचार्य कहते हैं, वह सम्भव नहीं, क्योंकि प्रधान जड़ है, अतः मुख्यरूप से उसमें ईक्षण का कर्तृत्व उपपन्न नहीं होता । यदि पूछा जाय कि सत्त्व के माध्यम से प्रधान में यदि ईक्षितृत्व नहीं बन सकता, तब रजोगुण और तमोगुण से सत्त्व की विशेषता ही क्या रह जाती है ? तो इसका सहज उत्तर है कि सत्त्व की वह विशेषता है—स्वच्छता, क्योंकि सत्त्वगुण स्वच्छ होता है, रज और तम अस्वच्छ होते हैं । स्वच्छ द्रव्य में ही चैतन्य के प्रतिबिम्ब की ग्राहकता होती है, अत एव सत्त्व को प्रकाशक मान लिया गया है—"सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टम्" ( सां. का. १३ ) । रजोगुण और तमो गुण में अस्वच्छता होने के कारण प्रतिबिम्ब-ग्राहित्व नहीं होता । यद्यपि स्फटिकादि मणि और लोष्ठ (पत्थर) सभी समानरूप से पार्थिव है, तथापि मणि में ही प्रतिबिम्ब-ग्राहिता होती है, लोष्ठादि