भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
१९० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ५
पपत्तिर्मृदादिवत् , नासंहतस्यैकात्मकस्य ब्रह्मण इत्येवं प्राप्त इदं सूत्रमारभ्यते—
ईक्षतेर्नाशब्दम् ॥ ५ ॥
न सांख्यपरिकल्पितमचेतनं प्रधानं जगतः कारणं शक्यं वेदान्तेष्वाश्रयितुम् । अशब्दं हि तत् । कथमशब्दत्वम् ? ईक्षतेः-ईक्षितृत्वश्रवणात्कारणस्य । कथम् ? एवं हि श्रूयते—‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’ ( छान्दो० ६।२।१ ) इत्युपक्रम्य
भामती
एवं प्राप्त उच्यते – नाम रूप-प्रपञ्च-लक्षणकार्यदर्शनादेतत्कारणमात्रवदिति सामान्यकल्पनायामस्ति प्रमाणं, न तु तदचेतनं चेतनमिति वा विशेषकल्पनायामस्त्यनुमानमित्युपरिष्टात्प्रवेदयिष्यते । तस्मान्नामरूपप्रपञ्चकारणभेवप्रमायामाम्नाय एव भगवानुपासनीयः । तदेवमाम्नायैकसमधिगमनीये जगत्कारणे—
पौर्वापर्यपरामर्शाद् यदाम्नायोऽञ्जसा वदेत् ।
जगद्बीजं तदेवेष्टं चेतने च स आञ्जसः ॥
तेषु तेषु खल्वाम्नायप्रदेशेषु तदैक्षतेत्येवंजातीयकैर्वाक्यैरीक्षितुः कारणाज्जगज्जन्माख्यायते इति, न च प्रधानपरमाण्वादेरचेतनस्येक्षितृत्वमाञ्जसम् । सत्त्वांशेनेक्षितु प्रधानं तस्य प्रकाशकत्वादिति चेत् । न; तस्य जाड्येन तत्त्वानुपपत्तेः । कस्तर्हि रजस्तमोभ्यां सत्त्वस्य विशेषः ? स्वच्छता । स्वच्छं हि सत्त्वम् । अस्वच्छे च रजस्तमसी । स्वच्छस्य च चैतन्यबिम्बोद्ग्राहितया प्रकाशत्वव्यपदेशो नेतरयोरस्वच्छतया तद्ग्राहित्वाभावात् । पार्थिवत्वे तुल्य इव मणेर्बिम्बोद्ग्राहिता न लोष्ठादीनाम् । ब्रह्मणस्त्वीक्षितृत्वमाञ्ज-
भामती-व्याख्या
सिद्धान्त—नाम-रूपात्मक प्रपञ्च को देख कर अनुमान प्रमाण से तो केवल इतनी ही कल्पना की जा सकती है कि 'इदं कार्यजातं कारणवत्, कार्यत्वाद् घटादिवत्' । इससे अतिरिक्त वह कारण पदार्थ चेतन है? या अचेतन? इस प्रकार की विशेष कल्पना में अनुमान की गति नहीं हो सकती—यह आगे चल कर कहा जायगा, अतः इस नाम-रूपात्मक प्रपञ्च के विशेष कारण का निश्चय करने के लिए भगवान् वेद की ही शरण लेनी आवश्यक है। जब वेद के द्वारा ही जगत् की कारण वस्तु का अधिगम करना है, तब—
पौर्वापर्यपरामर्शाद् यदाम्नायोऽञ्जसा वदेत् ।
जगद्बीजं तदेवेष्टं चेतने च स आञ्जसः ॥
[ वेद अपनी तात्पर्य-ग्राहिका उपक्रमोपसंहारादि युक्तियों की सहायता से जो जगत् का कारण बताएगा, वही मानना होगा, वेद के द्वारा वह कारणता ब्रह्मरूप चेतन पदार्थ में ही सम्यक् प्रतिपादित है, क्योंकि ] वेद के अनेक प्रदेशों में 'तदैक्षत' ( छां. ६।२।३ ) इत्यादि वचनों के द्वारा ईक्षण-कर्ता पुरुष से जगत् का जन्म कथित है । प्रधान और परमाणु आदि अचेतन पदार्थों में मुख्य ईक्षितृत्व सीधे-सीधे नहीं घटता । 'सत्त्व गुण के अंशभूत ज्ञान के द्वारा प्रधान ( प्रकृति ) में जो ईक्षितृत्व सांख्याचार्य कहते हैं, वह सम्भव नहीं, क्योंकि प्रधान जड़ है, अतः मुख्यरूप से उसमें ईक्षण का कर्तृत्व उपपन्न नहीं होता । यदि पूछा जाय कि सत्त्व के माध्यम से प्रधान में यदि ईक्षितृत्व नहीं बन सकता, तब रजोगुण और तमोगुण से सत्त्व की विशेषता ही क्या रह जाती है ? तो इसका सहज उत्तर है कि सत्त्व की वह विशेषता है—स्वच्छता, क्योंकि सत्त्वगुण स्वच्छ होता है, रज और तम अस्वच्छ होते हैं । स्वच्छ द्रव्य में ही चैतन्य के प्रतिबिम्ब की ग्राहकता होती है, अत एव सत्त्व को प्रकाशक मान लिया गया है—"सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टम्" ( सां. का. १३ ) । रजोगुण और तमो गुण में अस्वच्छता होने के कारण प्रतिबिम्ब-ग्राहित्व नहीं होता । यद्यपि स्फटिकादि मणि और लोष्ठ (पत्थर) सभी समानरूप से पार्थिव है, तथापि मणि में ही प्रतिबिम्ब-ग्राहिता होती है, लोष्ठादि
प्रधानस्य जगत्कारणत्वभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १९१
भामती सम । तस्याम्नायतो नित्यज्ञानस्वभावत्वविनिश्चयात् । नन्वत एवास्य नेक्षितृत्वं; नित्यस्य ज्ञानस्वभाव- भूतस्येक्षणस्याक्रियात्वेन ब्रह्मणस्तत्प्रति निमित्तभावाभावात् । अक्रियानिमित्तस्य च कारकत्वनिवृत्तौ तद्व्याप्यस्य तद्विशेषस्य कर्तृत्वस्य निवृत्तेः । सत्यं ब्रह्मस्वभावश्चैतन्यं नित्यतया न क्रिया, तस्य त्वनवच्छि- न्नस्य तत्तद्विषयोपाधानभेदावच्छेदेन कल्पितभेदस्यानित्यत्वं कार्य्यत्वं चोपपद्यते । तथा चैवंलक्षणे ईक्षणे सर्वविषये ब्रह्मणः स्वातन्त्र्यलक्षणं कर्तृत्वमुपपन्नम् । यद्यपि च कूटस्थनित्यस्यापरिणामिन औदासीन्यमस्य वास्तवं तथाप्यनाद्यनिर्वचनीयाविद्यावच्छिन्नस्य व्यापारवत्त्वमवभासत इति कर्तृत्वोपपत्तिः । परैरपि च चिच्छक्तेः कूटस्थनित्याया वृत्तौ प्रति कर्तृत्वमीदृशमेवाभ्युपेयम् । चैतन्यसामानाधिकरण्येन ज्ञातृत्वोप- लब्धेः । न हि प्राधानिकाभ्यन्तरबाह्यकरणानि त्रयोदश सत्त्वप्रधानान्यपि स्वयमेवाचेतनानि तद्वृत्तयश्च स्वं वा परं वा वेदितुमुत्सहन्ते । नो खल्वन्धाः सहस्रमपि पान्थाः पन्थानं विदन्ति । चक्षुष्मता चैकेन चेद् वेद्यते, स एव तर्हि मार्गदर्शी स्वतन्त्रः कर्त्ता नेता तेषाम् । एवं बुद्धिसत्त्वस्य स्वयमचेतनस्य चिति-
भामती-व्याख्या में नहीं । इसी प्रकार ब्रह्म में ही ईक्षितृत्व मुख्य रूप से घटता है, क्योंकि वेद के द्वारा उसमें नित्यज्ञानरूपता प्रतिपादित है, प्रधानादि में नहीं ।
शङ्का—नित्यज्ञानस्वरूपता होने के कारण ही ब्रह्म में ईक्षण-कर्तृत्व सम्भव नहीं, क्योंकि घटादि कार्य (जन्य) पदार्थों का ही कुलालादि में कर्तृत्व देखा जाता है, नित्य ज्ञानरूप ईक्षण कार्य (जन्य) पदार्थ नहीं, अतः उसका कर्तृत्व ब्रह्म में क्योंकर होगा ? 'यत्र यत्र कारकत्वम्, तत्र तत्र क्रिया-निमित्तत्वम्'—इस प्रकार व्यापकीभूत क्रिया-निमित्तत्व की निवृत्ति हो जाने से ब्रह्म में कारकत्व ही नहीं घटता, कारकत्व धर्म कर्तृत्वादि का व्यापक है, उसकी निवृत्ति हो जाने से उसके व्याप्यभूत कर्तृत्व की भी निवृत्ति हो जाती है, तब ब्रह्म में ईक्षणकर्तृत्व कैसे बनेगा ?
समाधान—यह सत्य है कि ब्रह्मस्वरूप ज्ञान नित्य है, कार्य (जन्य) नहीं, किन्तु स्वभावतः अनवच्छिन्न ज्ञान अपनी विषयरूप उपाधियों से अवच्छिन्न होकर वैसे ही कार्य (अनित्य) माना जाता है, जैसे घटादि से अवच्छिन्न होकर आकाश । फलतः इस प्रकार के ईक्षणरूप ज्ञान को लेकर ब्रह्म में उसका "स्वतन्त्रः कर्त्ता" (पा. सू. १।४।५४) के अनुसार कर्तृत्व उपपन्न हो जाता है । यद्यपि इस कूटस्थ, नित्य और अपरिणामी ब्रह्म में औदासीन्य (अक्रियाकारित्व) ही वास्तविक है, तथापि अनादि और अनिर्वचनीय अविद्या से अवच्छिन्न होकर ब्रह्म क्रियावान् हो जाता है, अतः उसमें कर्तृत्व बन जाता है । सांख्याचार्यादि भी चिति शक्ति (पुरुष) को कूटस्थ और नित्य मानते हैं, अतः उन्हें भी बुद्धिस्थ वृत्ति (क्रिया) का कर्तृत्व ऐसा ही स्वीकार करना होगा, क्योंकि ज्ञातृत्व जड़ में नहीं, चेतन में ही प्रतीत होता है ।
प्रधान (प्रकृति) के द्वारा जो मन, बुद्धि और अहङ्काररूप त्रिविध अन्तःकरण, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय रूप दशविध बाह्य करण; सब मिलाकर तेरह प्रकार का करण-कलाप उत्पन्न किया जाता है—"करणं त्रयोदशविधम्" (सां. का. ३२) । वह सब सत्त्व गुण का कार्य होने पर भी अचेतन एवं उसकी वृत्तियां भी जड़ हैं, अतः वे न अपने को जान सकती हैं और न अपने से भिन्न विषय को । हजारों अन्धे यदि मिलकर किसी मार्ग पर चल पड़ते हैं, तब भी उस मार्ग का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते, किन्तु आँखवाला व्यक्ति भले ही एक अकेला हो, यदि सब कुछ देख सकता है, तब वही आँखवाला व्यक्ति ही सभी का नेता माना जायगा । बुद्धिगत सत्त्व स्वयं अचेतन होकर जिस चैतन्य की छाया पत्ति के द्वारा
१९२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ५
भामती
बिम्बसंक्रान्त्या चेदापन्नं चैतन्यस्य ज्ञातृत्वम् , चितिरेव ज्ञात्री स्वतन्त्रा, नान्तर्बहिकरणान्यन्धसहस्र- प्रतिमान्यस्वतन्त्राणि। न चास्याश्चितेः कूटस्थनित्याया अस्ति व्यापारयोगः। न च तदयोगेऽप्यज्ञातृत्वं व्यापारवतामपि जडानामज्ञत्वात्। तस्मादन्तःकरणवर्तिनं व्यापारमारोप्य चितिशक्तौ कर्तृत्वाभिमा- नोऽन्तःकरणे वा चैतन्यमारोप्य तस्य ज्ञातृत्वाभिमानः। सर्वथा भवन्मतेऽपि नेदं स्वाभाविकं क्वचिदपि ज्ञातृत्वमपि तु सांव्यावहारिकमेवेति परमार्थः। नित्यस्यात्मनो ज्ञानं परिणाम इति च भेदाभेदपक्षम्- पाकुर्वद्भिः परास्तम्। कूटस्थस्य नित्यस्यात्मनोऽव्यापारवत एव भिन्नं ज्ञानं धर्म इति चोपरिष्टादपाकरि- ष्यते। तस्माद्वस्तुतोऽनवच्छिन्नं चैतन्यं तत्त्वान्यत्वानिर्वचनीयाव्याकृतव्याचिकीर्षितनामरूपविषयावच्छिन्नं सज्ज्ञानं कार्यं तस्य कर्त्ता ईश्वरो ज्ञाता सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति सिद्धम्। तथा च श्रुतिः— 'तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते। अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते'॥ इति। तपसा ज्ञानेन अव्याकृतनामरूपविषयेण चीयते तद्व्याचिकीर्षावद्भवति। यथा कुविन्दादिरव्याकृतं पटादि बुद्ध्यावालिख्य चिकीर्षति। एकधर्मवान् द्वितीयधर्मोपजननेन उपचित उच्यते। व्याचिकीर्षायां
भामती-व्याख्या
चैतन्य प्राप्त करता है, उस मुख्य चैतन्य में ही ज्ञातृत्व होता है, वही चैतन्य तत्त्व स्वतन्त्र है, अन्तःकरण या बहिःकरणों का समूह वैसे ही कभी चेतन नहीं बन सकता, जैसे हजारों अन्धों का समूह चक्षुष्मान नहीं होता। इस मुख्य चिति शक्ति (आत्मा) में कूटस्थता, विभुता और नित्यता होने के कारण किसी प्रकार की क्रिया का सम्बन्ध नहीं। क्रिया का असम्बन्ध होने के कारण चैतन्य में अज्ञातृत्व नहीं कह सकते, क्रिया के अयोग से अज्ञातृत्व तब कह सकते थे, जबकि ज्ञातृत्व के प्रति क्रिया-सम्बन्ध व्यापक होता, किन्तु वैसा नहीं, क्योंकि जड़ पदार्थों में क्रिया का सम्बन्ध रहने पर भी ज्ञातृत्व नहीं माना जाता। अतः अन्तःकरणगत क्रिया का चित्ति शक्ति में आरोप करके ज्ञातृत्व का अभिमान होता है अथवा अन्तःकरण में चैतन्य का आरोप करके ज्ञातृत्व का अभिमान होता है। सर्वथा आप (सांख्य) के मत में भी ज्ञातृत्व कहीं पर स्वाभाविक (अनौपाधिक) नहीं होता, अपि तु सांव्यवहारिक ज्ञातृत्व बनता है। 'नित्य आत्मा का परिणाम ज्ञान है'—ऐसा भेदाभेदवादी भास्कराचार्य जो मानते हैं, वह पहले भेदाभेद-पक्ष का निराकरण करते समय निराकृत हो चुका है। नित्य और क्रिया-रहित आत्मा का ज्ञान धर्म है—इस पक्ष का आगे चलकर (ब्र. सू. २।३।१८ में) खण्डन किया जायगा। वस्तुतः अनवच्छिन्न चैतन्य सत्त्वासत्त्व से भिन्न (अनिर्वचनीय) व्याचिकीर्षित नाम-रूपात्मक विषय से अवच्छिन्न होकर जो ज्ञानरूप कार्य बनता है, उसका कर्त्ता है—ईश्वर, वह सर्वज्ञ और सर्वशक्ति-समन्वित होता है। जैसा कि श्रुति कहती है— “तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते। अन्नात् प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ (मुण्ड. १।१।८) । “यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते” (मुण्ड. १।१।९) । 'तपः' शब्द से अव्याकृत नाम-रूपात्मक विषयावगाही ज्ञान विवक्षित है। 'चीयते' का अर्थ है—'व्याचिकीर्षितो भवति,'। जैसे जुलाहा अव्याकृत (तन्त्वा- दिरूप में अवस्थित अप्रकट) पटादि का कुछ आकार अपनी बुद्धि में खींच कर निर्माण करना चाहता है। किसी एक धर्मवाले पदार्थ में द्वितीय धर्म का उत्पादन हो जाने पर वह पदार्थ उपचित कहा जाता है। “ततोऽन्नमभिजायते' का अर्थ यह है कि व्याचिकीर्षा और उपचय
प्रधानकारणतावादभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १९३
भामती
चोपचये सति ततो नामरूपमन्नमदनीयं साधारणं संसारिणां व्याचिकीर्षितमभिजायते । तस्मादव्याकृताद् व्याचिकीर्षिताद् अन्नात्प्राणो हिरण्यगर्भो ब्रह्मणो ज्ञानक्रियाशक्त्यधिष्ठानं जगत् सूत्रात्मा साधारणो जायते । यथाऽव्याकृताद् व्याचिकीर्षितात् पटाद् अवान्तरकार्यं द्वितन्तुकादि । तस्माच्च प्राणाद् मनआख्यं सङ्कल्पविकल्पादिव्याकरणात्मकं जायते । ततो व्याकरणात्सकात् मनसः सत्यशब्दवाच्यान्याकाशादीनि जायन्ते । तेभ्यश्च सत्याख्येभ्योऽनुक्रमेण लोका भूर्वादयः । तेषु मनुष्यादिप्राणिनो वर्णाश्रमक्रमेण कर्माणि धर्माधर्मरूपाणि जायन्ते । कर्मंसु चामृतं फलं स्वर्गनरकादि । तच्च स्वनििमत्तयोर्धर्माधर्मयोः सतोर्न विनश्यतीत्यमृतं यावद्धर्माधर्मभावीति यावत् । यः सर्वज्ञः सामान्यतः सर्वविद्विशेषतो यस्य भगवतो ज्ञानमयं तपो धर्मो नायासमयम् । तस्माद् ब्रह्मणः पूर्वस्मादेतदपरं कार्यं ब्रह्म । किञ्च नामरूपमन्नं च ब्रीह्यवादि जायत इति । तस्मात् प्रधानस्य साम्यावस्थायामनीक्षितृत्वात् , क्षेत्रज्ञानां च सत्यपि चैतन्ये सर्गादौ विषयानीक्षणात् , मुख्यसम्भवे चोपचारस्यान्याय्यत्वात् , मुमुक्षोश्चायथार्थोपदेशानुपपत्तेः, मुक्तिविरोधित्वात्तेजःप्रभृतीनाञ्च मुख्यासम्भवेनोपचाराश्रयणस्य युक्तिसिद्धत्वात् , संशये च तत्प्रायपाठस्य निश्चायकत्वात् , इह तु मुख्यस्यौत्सर्गिकत्वेन निश्चये सति संशयाभावाद्, अन्यथा किरातशतसङ्कीर्णदेशनिवासिनो ब्राह्मणायनस्यापि किरातत्वापत्तेः, ब्रह्मैवेक्षित्रनाद्यनिर्व्वाच्याविद्यासचिवं जगदुपादानं, शुक्तिरिव समारोपितस्य रजतस्य, मरीचय इव जलस्यैकश्चन्द्रमा इव द्वितीयस्य चन्द्रमसः । न त्वचेतनं
भामती-व्याख्या
के हो जाने पर नाम-रूपात्मक प्रपञ्च अन्न (भोग्यवर्ग) के रूप में उत्पन्न होता है। उस व्याचिकीर्षित अव्यक्त से प्राण (हिरण्यगर्भ, ब्रह्म की ज्ञान-शक्ति और क्रियाशक्ति का अधिष्ठानभूत सूत्रात्मा) वैसे ही उत्पन्न होता है, जैसे—व्याचिकीर्षित एकतन्त्वात्मक पट से बहुतन्त्वात्मक पट उत्पन्न होता है। उस प्राण तत्त्व से मनःसंज्ञ क संकल्प-विकल्पात्मक वस्तु उत्पन्न होती है। उस मन से 'सत्य' शब्द-वाच्य आकाशादि जगत्, उस से क्रमशः भू, भुवः और स्वः ये तीन लोक, उन लोकों में मनुष्य एवं वर्णाश्रमोचित कर्म (धर्माधर्म) उत्पन्न होते हैं। धर्म और अधर्म से स्वर्ग-नरकादि रूप फल उत्पन्न होता है, [उसको अमृत (अविनाशी) इसलिए कहा जाता है कि वह अपने कारणीभूत धर्म और अधर्म के रहने पर नष्ट नहीं होता, धर्माधर्म-पर्यन्त स्थायी होता है]। दूसरी श्रुति का अर्थ यह है कि 'यः सर्वज्ञः' जो सर्वविषयक सामान्य ज्ञानवान् और सर्ववित् (विशेषतः सर्वविषयक ज्ञानवान्) है, जिस परमेश्वर का तप ज्ञानात्मक है, उस परब्रह्म परमेश्वर से यह ब्रह्म (बृहत् कार्य) नाम, रूप एवं व्रीहि आदि अन्न उत्पन्न होता है। फलतः साम्यावस्थापन्न प्रधान में ईक्षितृत्व, सर्गारम्भकालीन जीवों में विषय का ईक्षण सम्भव न होने के कारण ब्रह्म को ही जगत् का उपादान कारण मानना पड़ता है। जब कि ब्रह्म में मुख्य सर्वज्ञत्व बन सकता है, तब प्रधानादि में गौण सर्वज्ञत्वादि मानना अन्याय है। 'तत्त्वमसि' आदि श्रुतियों के द्वारा मुमुक्षु जीव को प्रधानात्मकता का उपदेश अयथार्थ होने के कारण मुक्ति का साधक न होकर बाधक है। तेज और जलादि में मुख्य ईक्षितृत्व सम्भव न होने के कारण गौण ईक्षितृत्व का आश्रयण अगत्या किया जाता है, ब्रह्म में वैसा करने की कोई आवश्यकता नहीं। ब्रह्म में ईक्षण-कर्तृत्व निश्चित है, सन्दिग्ध नहीं, जहाँ सन्देह होता है, वहाँ ही प्राय-पाठ को निर्णायक माना जाता है, ब्रह्म में तो मुख्य ईक्षितृत्व ही सहज-सिद्ध है। फिर भी यदि प्राय-पाठ को महत्त्व देकर गौण ईक्षितृत्व सिद्ध किया जाता है, तब चारों ओर भीलों से आकीर्ण देश में रहनेवाले ब्राह्मण को भी किरात (भील) ही मानना पड़ेगा। परिशेषतः अनादि एवं अनिर्वचनीय अविद्या की सहायता से सच्चिदात्मक ब्रह्म ही समस्त जगत् का वैसे ही उपादान कारण सिद्ध होता है,
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'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत' ( छान्दो० ६।२।३ ) इति । तत्रेवंदशब्दवाच्यं नामरूपव्याकृतं जगत्प्रागुत्पत्तेः सदात्मनावधार्य तस्यैव प्रकृतस्य सच्छब्दवाच्यस्येक्षणपूर्वकं तेजःप्रभृतेः स्रष्टृत्वं दर्शयति । तथान्यत्र — 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र
भामती
प्रधानपरमाण्वादि । अशब्दं हिं तत् । न च प्रधानं परमाणवो वा तदतिरिक्तसर्वज्ञेश्वराधिष्ठिता जगदुपादानमिति साम्प्रतम्, तेषां भेदेन कार्य्यत्वात् । कारणात्कार्याणां भेदाभावात् । कारणज्ञानेन समस्तकार्यपरिज्ञानस्य मृदादिनिदर्शनेनागमेन प्रसाधितत्वात् । भेदे च तदनुपपत्तेः । साक्षाच्च 'एकमेवाद्वितीयं' 'नेह नानास्ति किञ्चन' 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति' इत्यादिभिर्बहुभिर्वचोभिर्ब्रह्मातिरिक्तस्य प्रपञ्चस्य प्रतिषेधाच्चेतनोपादानमेव जगद् भुजङ्ग इवारोपितो रज्जूपूादान इति सिद्धान्तः । सदुपादानत्वे हि सिद्धे जगतस्तदुपादानं चेतनमचेतनं वेति संशय्य मीमांस्येत । अद्यापि तु सदुपादानत्वमसिद्धमित्यत आह ꕤ तत्रेवं शब्दवाच्यम् ꕤ इत्यादि ꕤ दर्शयति ꕤ इत्यन्तेन । तथापीक्षिता पारमार्थिकप्रधानक्षेत्रज्ञातिरिक्त ईश्वरो भविष्यति, यथाहुरैरण्यगर्भा इत्यतः श्रुतिः पठिता 'एकमेवाद्वितीयम्' इति, 'बहु स्याम्' इति
भामती-व्याख्या
जैसे शुक्ति पदार्थ अपने में अध्यस्त रजत का, मरुमरीचि-पुञ्ज अपने में समारोपित जल का और एक चन्द्रमा अपने में अवभासित द्वितीय चन्द्र का उपादान कारण होता है।
सांख्य-सम्मत प्रधान ( प्रकृति ) वैशेषिकाभ्युपगत परमाणु आदि पदार्थ जगत् के कभी भी उपादान कारण नही बन सकते, क्योंकि वे अशब्द ( प्रमाण-रहित ) हैं। यद्यपि प्रधान और परमाण्वादि जड़ पदार्थ हैं, तथापि ईश्वर से अधिष्ठित होकर जगत् के उपादान क्यों न हो सकेंगे?' इस प्रश्न का उत्तर यह है कि मृदादि कारण से घटादि कार्य का भेद नहीं होता, किन्तु जगत् से प्रधानादि का भेद सिद्ध है। अत एव श्रुति ने एक कारण के ज्ञान से समस्त कार्य का ज्ञान मृदादि दृष्टान्त के द्वारा सिद्ध किया है— "यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्, वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" ( छां. ६।१।४ )। कार्य और कारण का भेद मानने पर एक कारण के ज्ञान से समस्त कार्य का ज्ञान सम्भव न हो सकेगा।
दूसरी बात यह भी है कि "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति, य इह नानेव पश्यति" ( बृह. उ. ४।४।१९ ) इत्यादि अनेक श्रुतियों के द्वारा ब्रह्म से अतिरिक्त प्रपञ्च का प्रतिषेध किया गया है, अतः यह प्रपञ्च वैसे ही ब्रह्मोपादानक सिद्ध होता है, जैसे— रज्जु में आरोपित सर्प रज्जूपूादानक होता है। जब यह सिद्ध हो जाय कि जगत् का उपादन कोई सत् तत्त्व है, तब उसमें वह 'सत्' पदार्थ चेतन है? अथवा अचेतन ? इस प्रकार का सन्देह उठाकर यह प्रस्तुत विचार किया जा सकता था, किन्तु सदुपादानकत्व तो जगत् में अभी तक सिद्ध नहीं किया गया, अतः भाष्यकार कह रहे हैं— "तत्रेवंदशब्दवाच्यं नामरूपव्याकृतं जगत् प्राग् उत्पत्तेः सदात्मनावधार्य तस्यैव प्रकृतस्य सच्छब्दवाच्यस्येक्षणपूर्वकं तेजःप्रभृतेः स्रष्टृत्वं दर्शयति"। अर्थात् 'तेज' आदि शब्दों के द्वारा उसी सत् या चेतन तत्त्व की उपस्थिति कराकर उसी में मुख्य ईक्षण प्रतिपादित हैं, अतः वहाँ गौण ईक्षण का प्रसङ्ग ही नहीं कि गौण ईक्षण मानना आवश्यक हो। 'सत्' पद के द्वारा पारमार्थिक वस्तु का ग्रहण कर लेने पर भी प्रधान और परमाणु से अतिरिक्त योग-सम्मत ईश्वर को जगत् का उपादान कारण क्यों न मान लिया जाय?' इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए "एकमेवाद्वितीयम्"— यह श्रुति पढ़ दी है ! एक अद्वितीय ब्रह्म तत्त्व का ही ग्रहण 'सत्' पद के द्वारा किया जा सकता है, अन्य किसी पदार्थ का नहीं। "बहुस्यां प्रजायेय" इस श्रुति के द्वारा भी एक अद्वितीय चेतन तत्त्व
प्रधानकारणतावादभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १९५
आसीत्। नान्यत्किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति । स इमाँल्लोकानसृजत' ( ऐत० १।१।१ ) इतीक्षापूर्विकानेव सृष्टिमाचष्टे । क्वचिच्च षोडशकलं पुरुषं प्रस्तुत्याह - 'स ईक्षांचक्रे। स प्राणमसृजत' ( प्रश्न० ६।३ ) इति । ईक्षतेरिति च धात्वर्थनिर्देशोऽभिप्रेतः, यजतेरितिवत् । न धातुनिर्देशः । तेन 'यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य
भामती च चेतनं कारणमात्मन एव बहुभावमाह । तेनापि कारणाच्चेतनादभिन्नं कार्यमवगम्यते । यद्यप्याकाशाद्या भूतसृष्टिस्तथापि तेजोबन्नानामेव त्रिवृत्करणस्य विवक्षितत्वात् तत्र तेजसः प्राथम्यात् तेजः प्रथममुक्तम् । एकद्वितीयं जगदुपादानमित्यत्र श्रुत्यन्तरमपि पठति ॐ तथान्यत्र ॐ इति । ब्रह्म चतुष्पादष्टाशफं षोडशकलम् । तद्यथा, प्राची प्रतीची दक्षिणादीचीति चतस्रः कला ब्रह्मणः । प्रकाशवान् नाम प्रथमः पादः । तदद्धं शफः । तथा पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौः समुद्र इत्यपराश्चतस्रः कला द्वितीयः पादोऽनन्तवान्नाम । तथाग्निः सूर्यश्चन्द्रमा विद्युदिति चतस्रः कलाः, स ज्योतिष्मान्नाम तृतीयः पादः । प्राणश्चक्षुः श्रोत्रं वागिति चतस्रः कलाः स चतुर्थ आयतनवान्नाम ब्रह्मणः पादः । तदेवं षोडशकलं षोडशावयवं ब्रह्मोपास्यमिति । स्यादेतत् । ईक्षतेरिति शितपा धातुस्वरूपमुच्यते, न चाविवक्षितार्थस्य धातुस्वरूपस्य चेतनोपादानसाधनत्वसम्भव इत्यत आह "ईक्षतेः" इति । धात्वर्थनिर्देशोऽभिमतः, विषयिणा विषयलक्षणात् । प्रसिद्धा चेयं लक्षणेत्याह
भामती-व्याख्या ही सृष्टि के रूप में अपना बहुभाव प्रदर्शित कर रहा है, इसलिए भी चेतन से जगत् अभिन्न ही प्रतीत होता है। यद्यपि आकाशादि से पाँच भूतों की सृष्टि दिखाई है, अतः पञ्चीकरण प्रक्रिया सर्व-सम्मत प्रतीत होती है। तथापि यहाँ तेज, जल और अन्न (पृथिवी) इन तीनों का त्रिवृत्करण विवक्षित है—'तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोत्' (छां. ६।३।२)। तीनों में तेज का प्रथम उल्लेख होने के कारण तेज की प्रथम चर्चा की गई है। एक अद्वितीय तत्त्व ही जगत् का उपादान कारण है—इस अर्थ की साधिका अन्य श्रुति प्रस्तुत की जाती है—"तथा अन्यत्र आत्मा वा इदमेक एवाग्रे आसीत्, नान्यत् किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति" (ऐत. १।१।२)। ब्रह्म चतुष्पात्, अष्टशफ और षोडशकलावाला है, अर्थात् (१) पूर्व, (२) पश्चिम, (३) दक्षिण और (४) उत्तर—ये चार कलाएँ ब्रह्म का 'प्रकाशवान्' नामक प्रथम पाद (खुर) हैं। (५) पृथिवी, (६) अन्तरिक्ष, (७) द्यौः और (८) समुद्र—ये चार कलाएँ ब्रह्म का 'अनन्तवान्' नामक द्वितीय पाद हैं। (९) अग्नि, (१०) सूर्य, (११) चन्द्रमा और (१२) विद्युत्—ये चार कलाएँ 'ज्योतिष्मान्' नामक तृतीय पाद हैं। (१३) प्राण, (१४) चक्षु, (१५) श्रोत्र और (१६) वाक्—ये चार कलाएँ 'आयतनवान्' नामक चतुर्थ पाद हैं। इस प्रकार चतुष्पात् और षोडश कला-युक्त ब्रह्म उपास्यरूप से निर्दिष्ट हुआ है। गौ आदि के प्रत्येक पैर में जो एक फटा हुआ खुर होता है, उसके प्रत्येक भाग को शफ कहते हैं, अतः पशु के चार पाद और आठ शफ माने जाते हैं।
'चेतनमेव जगदुपादानं भवति, ईक्षते:'—इस विवक्षित अनुमान में 'ईक्षते:' का अर्थ क्या है ? 'ईक्षति' शब्द में यदि 'श्तिप' का निर्देश माना जाता है, तब "इक्श्तिपौ धातुनिर्देशे विहितौ" (तं. वा. पृ. ३७९) इसके अनुसार 'ईक्षते:' का अर्थ होता है—'ईक्षिधातोः'। चेतनगत जगदुपादानता की साधक ईक्षधातु नहीं, अपितु ईक्षणरूप अर्थ साधक होता है, अतः कहा गया है—"ईक्षितेरिति धात्वर्थनिर्देशोऽभिप्रेतः। 'इक्' और 'श्तिप्' कहीं-कहीं अर्थ के भी निर्देशक माने गये हैं—"क्वचिदर्थेऽपि धातुमिक्श्तिबन्तं प्रयुञ्जते—यजिः, यजति इति च" (तं. वा. पृ. ३७९)। अथवा शब्दपरक इक् और श्तिप् की वाच्यार्थ में लक्षणा की जा सकती है। यह लक्षणा अत्यन्त प्रसिद्ध है—"यजतेरितिवत्"। ईक्षणरूप पदार्थ चेतन में ही सम्भव
१९६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ५
ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते' ( मुण्ड० १।१।९ ) इत्येवमादी- न्यपि सर्वज्ञेश्वरकारणपराणि वाक्याक्युदाहर्तव्यानि । यत्तूक्तं सत्त्वधर्मेण ज्ञानेन सर्वज्ञं प्रधानं भविष्यतीति, तन्नोपपद्यते । नहि प्रधाना- वस्थायां गुणसाम्यात्सत्त्वधर्मो ज्ञानं संभवति । ननूक्तं, सर्वज्ञानशक्तिमत्त्वेन सर्वज्ञं भवि- ष्यतीति । तदपि नोपपद्यते । यदि गुणसाम्ये सति सत्त्वव्यपाश्रयां ज्ञानशक्तिमाश्रित्य सर्वज्ञं प्रधानमुच्येत, कामं रजस्तमोव्यपाश्रयामपि ज्ञानप्रतिबन्धकशक्तिमाश्रित्य किंचिज्ज्ञमुच्येत । अपि च नासाक्षिका सत्त्ववृत्तिर्ज्ञानातिनाऽभिधीयते । न चाचेतनस्य प्रधानस्य साक्षित्वमस्ति । तस्मादनुपपन्नं प्रधानस्य सर्वज्ञत्त्वम् । योगिनां तु चेतन- त्वात्सत्त्वोत्कर्षनिमित्तं सर्वज्ञत्वमुपपन्नमित्यनुदाहरणम् । अथ पुनः साक्षिनिमित्तमीक्षि-
भामती
** यजतेरितिवत् इति ** । ** यः सर्वज्ञः ** इति सामान्यतः, ** सर्ववित् ** इति विशेषतः ।' सांख्यीयं स्वमतसमाधानमुपन्यस्य दूषयति । "यत्तूक्तं सत्त्वधर्मेण" इति । पुनः सांख्यमुत्थापयति ** ननूक्तम् इति ** । परिहरति । ** तदपि इति ** । समुदाचरद्वृत्ति तावन्न भवति सत्त्वं, गुणवैषम्यप्रसङ्गेन साम्यानुपपत्तेः । न चाव्यक्तेन रूपेण ज्ञानमुपयुज्यते, रजस्तमसोस्तत्प्रतिबन्धस्यापि सूक्ष्मेण रूपेण सद्भा- वादित्यर्थः । अपि च चैतन्यप्रधानवृत्तिवचनो जानातिर्न चाचेतने वृत्तिमात्रे दृष्टचरप्रयोग इत्याह ** अपि च नासाक्षिका इति ** । कथं तर्हि योगिनां सत्त्वांशोत्कर्षहेतुकं सर्वज्ञत्वमित्यत आह ** योगिनां तु इति ** । सत्त्वांशोत्कर्षो हि योगिनां चैतन्यचक्षुषामानुकूल्यं नाकरोति नान्धस्य प्रधानस्येत्यर्थः । यदि तु कापि- लमतमपहाय हैरण्यगर्भमास्थीयेत तत्राप्याह ** अथ पुनः साक्षिनिमित्तम् इति ** । तेषामपि हि प्रकृष्ट- सत्त्वोपादानं पुरुषविशेषस्यैव क्लेशकर्मविपाकाशयापरामृष्टस्य सर्वज्ञत्वं, न तु प्रधानस्याचेतनस्य । तदपि
भामती-व्याख्या
होने के कारण जगदुपादानत्व उपपन्न होगा, प्रधानादि जड़-वर्ग में नहीं । "यः सर्वज्ञः सर्ववित्"—इस श्रुति में सामान्यतः सर्वविषयावगाहिज्ञानवत्त्व 'सर्वज्ञ' पद से और 'सर्ववित्' पद से विशेषतः सर्वविषयावगाहिज्ञानवत्त्व विवक्षित है, अतः पुनरुक्ति दोष नहीं ।
सांख्य-मत का अनुवाद करके निरास किया जाता है—"यत्तूक्तं सत्त्वधर्मेण ज्ञानेन सर्वज्ञं प्रधानं भविष्यतीति, तन्नोपपद्यते"। सांख्य-मत का पुनः उज्जीवन किया जाता है— "ननूक्तं सर्वज्ञानशक्तिमत्त्वेन सर्वज्ञं भविष्यतीति"। उसका भी परिहार किया जाता है— "तदपि नोपपद्यते" । साम्यावस्था में सत्त्व को यदि कार्यकारी माना जाता है, तब साम्य भङ्ग होकर गुण-वैषम्य हो जाता है । अव्यक्तरूप से ज्ञान का ग्रहण करने पर उसी रूप से रजोगुण और तमोगुण का अवस्थान है, अतः उस ज्ञान का प्रतिबन्ध भी मानना होगा । 'जानाति' पद से साक्षी चेतन की ज्ञानरूप वृत्ति का अभिधान होता है, अतः 'प्रधानं जानाति'—ऐसा प्रयोग वैसे ही नहीं हो सकता, जैसे 'घटो जानाति', 'पटो जानाति'—ऐसा प्रयोग—"अपि च नासाक्षिका सत्त्ववृत्तिर्ज्ञानातिनाभिधीयते" । यदि सत्त्वोत्कर्ष का 'ज्ञान' पद से ग्रहण नहीं हो सकता, तब योगियों के लिए सर्वज्ञत्व का व्यवहार कैसे होगा ? इस प्रश्न का उत्तर दिया जाता है—"योगिनां तु चेतनत्वात्" । जैसे बाह्य आलोक आँखवालों का ही उपकार कर सकता है, अन्धों का नहीं, वैसे सत्त्वगुण का उत्कर्ष चेतनरूप योगियों का ही उपकारक सिद्ध होता है, प्रधानादि जड़ पदार्थों का नहीं । यदि कपिल-मत को छोड़ कर हिरण्यगर्भ-प्रचारित योग-मत अपनाया जाता है, तब भी उचित नहीं—"अथ पुनः साक्षिनिमित्तमीक्षितृत्वं प्रधानस्य कल्प्यते" । योग-मत के अनुसार भी प्रकृष्टसत्त्व-प्रयुक्त सर्वज्ञत्व क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से रहित चेतन पुरुष ( ईश्वर ) में ही माना गया है,
| प्रधानकारणतावादभङ्गः ] | हन्दीसहितभामतीसंवलितम् | १९७ |
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तृत्वं प्रधानस्य कल्प्येत, यथाऽग्निनिमित्तमयःपिण्डादेर्दग्धृत्वम् ; तथा सति यन्निमित्तमीक्षितृत्वं प्रधानस्य तदेव सर्वज्ञं मुख्यं ब्रह्म जगतः कारणमिति युक्तम् ।
यत्पुनरुक्तं—ब्रह्मणोऽपि न मुख्यं सर्वज्ञत्वमुपपद्यते, नित्यज्ञानक्रियत्वे ज्ञानक्रियां प्रति स्वातन्त्र्यासम्भवादिति । अत्रोच्यते— इदं तावद्भगवान्प्रष्टव्यः, कथं नित्यज्ञानक्रियत्वे सर्वज्ञत्वहानिरिति । यस्य हि सर्वविषयावभासनक्षमं ज्ञानं नित्यमस्ति सोऽसर्वज्ञ इति विप्रतिषिद्धम् । अनित्यत्वे हि ज्ञानस्य कदाचिज्जानाति कदाचिन्न जानातीत्यसर्वज्ञत्वमपि स्यात् । नासौ ज्ञाननित्यत्वे दोषोऽस्ति । ज्ञाननित्यत्वे ज्ञानविषयः स्वातन्त्र्यव्यपदेशो नोपपद्यत इति चेन्न, प्रततौष्ण्यप्रकाशेऽपि सवितरि दहति प्रकाशयतीति स्वातन्त्र्यव्यपदेशदर्शनात् । ननु सवितुर्दाह्यप्रकाश्यसंयोगे सति दहति प्रकाशयतीति व्यपदेशः स्यात्, नतु ब्रह्मणः प्रागुत्पत्तेर्ज्ञानकर्मसंयोगोऽस्तीति विषमो दृष्टान्तः । न; असत्यपि कर्मणि सविता प्रकाशत इति कर्तृत्वव्यपदेशदर्शनात् । एवम-
भामती
चाद्वैतश्रुतिभिरपास्तमिति भावः । पूर्वपक्षबीजमनुभाषते ॐ यत् पुनरुक्तं ब्रह्मणोऽपि इति ॐ । चैतन्यस्य शुद्धस्य नित्यत्वेऽप्युपहितं सदनित्यं, कार्यमाकाशमिव घटावच्छिन्नमित्यभिसन्धाय परिहरति ॐ इदं तावद्भवान् इति ॐ । ॐ प्रततौष्ण्यप्रकाशे सवितरि ॐ । इत्येतदपि विषयावच्छिन्नप्रकाशः कार्यमित्येतदभिप्रायम् । वैषम्यं चोदयति । ॐ ननु सवितुः इति ॐ किं वास्तवं कर्माभावमभिप्रेत्य वैषम्यमाह भवान् ? उत तद्विवक्षाभावम् ? तत्र यदि तद्विवक्षाभावं, तदा प्रकाशयतीत्यनेन मा भूत् साम्यं, प्रकाशत इत्यनेन त्वस्ति । नह्यत्र कर्म विवक्षितम् । अथ च प्रकाशस्वभावं प्रत्यस्ति स्वातन्त्र्यं सवितुरिति परिहरति ॐ नासत्यपि कर्मणि इति ॐ । असत्यपीत्यविवक्षितेऽपीत्यर्थः । अथ वास्तवं कर्माभावमभिसन्धाय
भामती-व्याख्या
अचेतन प्रधान में नहीं। अद्वैत श्रुतियों के द्वारा इस सर्वज्ञत्व का भी खण्डन किया जा चुका है।
पूर्वपक्षोद्भावित दोष का अनुवाद करते हैं—"यत्पुनरुक्तं ब्रह्मणोऽपि न मुख्यं सर्वज्ञत्वमुपपद्यते, नित्यज्ञानक्रियत्वे ज्ञानक्रियां प्रति स्वातन्त्र्यासम्भवात्"। चैतन्यस्वरूप ज्ञान दो प्रकार का है—(१) निरवच्छिन्न और (२) सावच्छिन्न । यद्यपि निरवच्छिन्न या शुद्ध ज्ञान नित्य है, तथापि सावच्छिन्न ज्ञान वैसे ही अनित्य या कार्यरूप माना जाता है, जैसे— घटाद्यवच्छिन्न आकाश । इस आशय से उक्त दोष का उद्धार किया जाता है—"इदं तावद् भवान् प्रष्टव्यः कथं नित्यज्ञानक्रियत्वे सर्वज्ञत्वहानिः ?"
भाष्यकार ने जो कहा है कि "प्रततौष्ण्यप्रकाशे सवितरि दहति प्रकाशयतीति स्वातन्त्र्यव्यपदेशदर्शनात्"। वह भी इसी आशय से कहा है कि यद्यपि वस्त्रादि का दाहक सूर्य-प्रकाश पहले से विद्यमान है, अभी उत्पन्न नहीं हुआ, तथापि सूर्यकांत मणि में प्रतिफलित (सोपाधिक) प्रकाश उत्पन्न हुआ माना जाता है, जिसको लेकर सूर्य में दाह-कर्तृत्व का व्यवहार हो जाता है।
शङ्का—सूर्य में दाह्य और प्रकाश्य पदार्थ के संयोग का जनक व्यापार होने के कारण दहति और प्रकाशयति—ऐसा व्यवहार हो जाता है, किन्तु ब्रह्म में ज्ञान की उत्पत्ति से पहले घटादि कर्म कारण के साथ न तो ब्रह्म का संयोग उत्पन्न होता है और न संयोग-जनक कोई व्यापार ही ब्रह्म में उत्पन्न होता है, 'ब्रह्म सर्वं जानाति'—ऐसा व्यवहार क्योंकर होगा ?
समाधान—दाह्य (दाह क्रिया के कर्मभूत) पटादि के साथ सूर्य का सम्बन्ध होने पर ही सूर्य में 'दहति'—यह व्यवहार होता है—यह आवश्यक नहीं, क्योंकि पटादि पदार्थों के न होने पर भी 'सविता प्रकाशते'—ऐसा व्यवहार देखा जाता है, इसी प्रकार ज्ञान के
१९८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ५
सत्यपि ज्ञानकर्मणि ब्रह्मणः 'तदैक्षत' ( छान्दो० ६।२।३ ) इति कर्तृत्वव्यपदेशोपपत्तेर्न वैषम्यम् । कर्मापेक्षायां तु ब्रह्मणीक्षितृत्वश्रुतयः सुतरामुपपन्नाः । किं पुनस्तत्कर्म, यत्प्रागुत्पत्तेरीश्वरज्ञानस्य विषयो भवतीति ? तत्त्वान्यत्वाभ्यामनिर्वचनीये नामरूपे अव्याकृते व्याचिकीर्षिते इति ब्रूमः । यत्प्रसादाद्धि योगिनामप्यतीतानागतविषयं प्रत्यक्षं ज्ञानमिच्छन्ति योगशास्त्रविदः, किमु वक्तव्यं तस्य नित्यसिद्धस्येश्वरस्य सृष्टि-स्थितिसंहृतिविषयं नित्यज्ञानं भवतीति ।
यदप्युक्तं प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मणः शरीरादिसंबन्धमन्तरेणेक्षितृत्वमनुपपन्नमिति, न तच्चो-
भामती
वैषम्यमुच्यते, तन्न, असिद्धत्वात् कर्माभावस्य, विवक्षितत्वाच्चात्र कर्मण इति परिहरति ॐ कर्मापेक्षायां तु इति ॐ । यासां सति कर्मण्यविवक्षिते श्रुतीनामुपपत्तिस्तासां सति कर्मणि विवक्षिते सुतरामित्यर्थः । ॐ यत्प्रसादात्तु इति ॐ । यस्य भगवत ईश्वरस्य प्रसादात्तस्य नित्यसिद्धस्येश्वरस्य नित्यं ज्ञानं भवतीति किमु वक्तव्यमिति योजना । तथाह्युर्योगशास्त्रकाराः । ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च' इति ।
भामती-व्याख्या
कर्मकारकभूत जगत् के न होने पर भी ब्रह्म में ईक्षण-कर्तृत्व का व्यवहार निभ जाता है । आशय यह है कि शङ्कावादी क्या वास्तविक कर्म और कर्माभाव को लेकर सूर्य और ब्रह्म में वैषम्य सिद्ध करना चाहता है कि सूर्य-प्रकाश का कर्मकारक रूपादि पदार्थ विद्यमान है और ब्रह्म के ज्ञान का कर्मभूत जगत् अपनी उत्पत्ति से पहले नहीं ? अथवा कर्म के अविवक्षितत्व को लेकर वैषम्य दिखाना चाहता है कि सवितृप्रकाश का रूपादि कर्म सत् भी है और विवक्षित भी है, किन्तु ब्रह्म-ज्ञान का कर्मभूत अध्यस्त प्रपञ्च होने पर भी अविवक्षित है । कर्म के विवक्षाभाव को लेकर यदि वैषम्य विवक्षित है, तब 'सविता प्रकाशयति'- ऐसा सकर्मक धातु का प्रयोग ब्रह्म के लिए 'ब्रह्म प्रकाशयति' ऐसा साम्य न होने पर भी 'प्रकाशते'— ऐसे प्रयोग का साम्य है ही, क्योंकि प्रकाशते'— यह अकर्मक धातु का प्रयोग है, कर्म की विवक्षा और विवक्षा के अभाव का प्रसङ्ग ही नहीं उठता । यदि प्रकाशस्वरूप कर्म की अपेक्षा सविता में स्वतन्त्र कर्तृत्व माना जाता है, तो उसका परिहार किया गया है कि "न, असत्यपि कर्मणि" । अर्थात् कर्म के अविवक्षित होने पर भी सविता में कर्तृत्व-व्यवहार होता है— 'सविता प्रकाशते ।' सविता के प्रकाश का वास्तविक कर्मकारक घटादि पदार्थ है, किन्तु ब्रह्म-ज्ञान का वास्तविक कर्म नहीं— इस प्रकार विषमता यदि अभिप्रेत है, तब वह सम्भव नहीं, क्योंकि ब्रह्म-ज्ञान का कर्माभाव ही सिद्ध नहीं, क्योंकि यहाँ कर्म विवक्षित है— "कर्मापेक्षायां तु ब्रह्मणीक्षितृत्वश्रुतयः सुतरामुपपन्नाः" । जिन श्रुतियों की सत् किन्तु अविवक्षित कर्म में उपपत्ति हो जाती है, उन श्रुतियों की अनिर्वचनीय नाम-रूपात्मक प्रपञ्चरूप सत् एवं विवक्षित कर्म में सुतरां ( भली प्रकार ) उपपत्ति हो जाती है । "यत्प्रसादाद्धि" । जिस परमेश्वर की कृपा से योगियों को अतीतानागत विषय का ज्ञान-लाभ माना जाता है, उस नित्य सिद्ध ईश्वर का सर्वविषयक ज्ञान नित्य क्यों न होगा ? ईश्वर की कृपा से योगियों को सर्वविषयक ज्ञान की प्राप्ति योगसूत्रकार ने कही है— "ततः प्रत्यक्चेतनाऽधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च" ( यो. सू. १।२९ ) । इस सूत्र के भाष्य में कहा गया है— "भक्तिविशेषादावर्जित ईश्वरस्तमनुगृह्णाति ज्ञानवैराग्यादिना" । योगी की विशेष ( अनन्य ) भक्ति के द्वारा प्रसादित ईश्वर उस पर ज्ञान और वैराग्य-प्रदान करने का अनुग्रह करता है ।
यह जो आक्षेप किया गया कि प्रपञ्च की उत्पत्ति से पहले शरीरादि साधनों के न होने के कारण ईक्षण और ईक्षण-कर्तृत्व क्योंकर बनेगा ? वह आक्षेप उचित नहीं, क्योंकि
प्रधानकारणतावादभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १९९
द्यमवतरति; सवितृप्रकाशवद्ब्रह्मणो ज्ञानस्वरूपनित्यत्वे ज्ञानसाधनापेक्षानुपपत्तेः। अपि चाऽविद्यादिमतः संसारिणः शरीराद्यपेक्षा ज्ञानोत्पत्तिः स्यात्, न ज्ञानप्रतिबन्धकारणरहितस्येश्वरस्य। मन्त्रौ चेमावीश्वरस्य शरीराद्यनपेक्षतामनावरणज्ञानतां च दर्शयतः—'न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च' (श्वेता० ६।८) इति। 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्' (श्वेता० ३।१९) इति च। ननु नास्ति तावज्ज्ञानप्रतिबन्धकारणवानीश्वरादन्यः संसारी, 'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता' (बृह० ३।७।२३) इति श्रुतेः। तत्र किमिदमुच्यते संसारिणः शरीराद्यपेक्षा ज्ञानोत्पत्तिर्नेश्वरस्येति? अत्रोच्यते—सत्यम्, नेश्वरादन्यः संसारी, तथापि देहादिसंघातोपाधिसंबन्ध इष्यत एव, घटकरकगिरिगुहाद्युपाधिसंबन्ध इव व्योम्नः। तत्कृतश्च शब्दप्रत्ययव्यवहारो लोकस्य दृष्टो घटच्छिद्रं करकादिच्छिद्रमित्यादिराकाशाव्यतिरेकेऽपि, तत्कृता चाकाशे घटाकाशादिभेदमिथ्याबुद्धिर्दृष्टा। तथेहापि देहादिसंघातोपाधिसंबन्धाविवेककृतेश्वरसंसारिभेदमिथ्याबुद्धिः। दृश्यते चात्मन एव सतो
भामती
तद्भाष्यकाराश्च भक्तिविशेषावावर्जित ईश्वरस्तमनुगृह्णाति ज्ञानवैराग्यादिनेति ॐसवितृप्रकाशवद् इति ॐ। वस्तुतो नित्यस्य कारणानपेक्षां स्वरूपेणोक्त्वा व्यतिरेकमुखेनाप्याह ॐ अपि चाविद्यादिमतः ॐ इत्यादि। आदिग्रहणेन कामकर्मादयः संगृह्यन्ते। ॐ न ज्ञानप्रतिबन्धकारणरहितस्य इति ॐ। संसारिणां वस्तुतो नित्यज्ञानत्वेऽप्यविद्यादयः प्रतिबन्धकारणानि सन्ति, न तु ईश्वरस्याविद्यारहितस्य ज्ञानप्रतिबन्धकारणसम्भव इति भावः। न तस्य कार्यमावरणाद्यपगमो विद्यते, अनावृतत्वादिति भावः। ज्ञानबलेन क्रिया। प्रधानस्य त्वचेतनस्य ज्ञानबलाभावान्नजगतो न क्रियेत्यर्थः। अपाणिर्ग्रहीता, अपादो जवनो वेगवान् विहरणवान् अतिरोहितार्थमन्यत्। स्यादेतत्—अनात्मनि व्योम्नि घटाद्युपाधिकृतो भवत्ववच्छेदविभ्रमः, न तु आत्मनि स्वभावसिद्धप्रकाशे स घटत इत्यत आह। ॐ दृश्यते चात्मन एव सतः इति ॐ। ॐ अभि-
भामती-व्याख्या
सूर्य-प्रकाश को जैसे शरीरादि की अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही नित्य ब्रह्मस्वरूप ज्ञान (ईक्षण) को ज्ञान के साधनीभूत शरीरादि की अपेक्षा ही नहीं होती, केवल सूर्यात्मक प्रकाशरूप कर्म के समान ब्रह्मस्वरूप ईक्षणात्मक ज्ञान की अपेक्षा से 'ऐक्षत'—ऐसा व्यवहार हो जाता है। वस्तुतः नित्य पदार्थ को साधन की अपेक्षा नहीं—यह अन्वय-मुखेन दिखाकर व्यतिरेक के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है—"अपि चाविद्यादिमतः संसारिणः शरीराद्यपेक्षा ज्ञानोत्पत्तिः स्यात्, न ज्ञानप्रतिबन्धकारणरहितस्येश्वरस्य"। 'आदि' पद के द्वारा काम और कर्मादि साधनों का ग्रहण किया जाता है, अर्थात् यद्यपि जीव का ज्ञान भी नित्य है, तथापि अविद्यादि प्रतिबन्धक होते हैं, उनकी निवृत्ति के लिए साधनों की अपेक्षा होती है, किन्तु अविद्या, काम और कर्मादि रूप प्रतिबन्धकों से रहित ईश्वर को शरीरादि साधनों की अपेक्षा क्यों होगी?
"न तस्य कार्यं करणं च विद्यते, न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ (श्वेता. ६।८) इस श्रुति में 'कार्यम्' का अर्थ प्रतिबन्धकीभूत आवरण का अभाव है, वह ईश्वर के ज्ञान में नहीं, क्योंकि उसका ज्ञान अनावृत होता है।
"ज्ञानबलेन क्रिया"। अचेतन प्रधान में ज्ञानरूप बल का अभाव होने के कारण जगत् की क्रिया (उत्पत्ति) नहीं होती। "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता" (श्वेता. ३।१९) इस श्रुति में अपाणिर्ग्रहीता, अपादो जवनः—ऐसा अन्वय कर लेना चाहिए, 'जवन' शब्द का अर्थ वेगवान्
| २०० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [अ. १ पा. १ सू. ६ |
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देहादिसंघातेऽनात्मन्यात्मत्वाभिनिवेशो मिथ्याबुद्धिमात्रेण पूर्वेण। सति चैवं संसारित्वे देहाद्यपेक्षमीक्षितृत्वमुपपन्नं संसारिणः। यद्युक्तं प्रधानस्यानेकात्मकत्वान्मृदादिवत्कारणत्वोपपत्तिर्नासंहतस्य ब्रह्मण इति, तत्प्रधानस्याशब्दत्वेनैव प्रत्युक्तम्। यथा तु तर्केणापि ब्रह्मण एव कारणत्वं निर्वोढुं शक्यते, न प्रधानादीनां, तथा प्रपञ्चयिष्यति— ‘न, विलक्षणत्वादस्य-’ (ब्र. २।१।४) इत्येवमादिना॥ ५॥
अत्राह—यदुक्तं नाचेतनं प्रधानं जगत्कारणम्, ईक्षितृत्वश्रवणादिति, तदन्यथाप्युपपद्यते, अचेतनेऽपि चेतनवदुपचारदर्शनात्। यथा प्रत्यासन्नपतनतां नद्याः कूलस्यालक्ष्य कूलं पिपतिषतीत्यचेतनेऽपि कूले चेतनवदुपचारो दृष्टः, तद्वदचेतनेऽपि प्रधाने प्रत्यासन्नसर्गे चेतनवदुपचारो भविष्यति ‘तदैक्षत’ इति। यथा लोके कश्चिच्चेतनः स्नात्वा भुक्त्वा चापराह्णे ग्रामं रथेन गमिष्यामीतीक्षित्वाऽनन्तरं तथैव नियमेन प्रवर्तते, तथा प्रधानमपि महदाद्याकारेण नियमेन प्रवर्तते, तस्मादचेतनवदुपचर्यते। कस्मात्पुनः कारणाद्विहाय मुख्यमीक्षितृत्वमौपचारिकं कल्प्यते? ‘तत्तेज ऐक्षत’, ‘ता आप ऐक्षन्त’ (छान्दो० ६।२।३, ४) इति चाचेतनयोरप्यप्तेजसोश्चेतनवदुपचारदर्शनात्। तस्मात्सत्कर्तृकमपीक्षणमौपचारिकमिति गम्यते, ‘उपचारप्राये वचनात्’ इति। एवं प्राप्त इदं सूत्रमारभ्यते—
गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ॥ ६ ॥
यदुक्तं प्रधानमचेतनं सच्छब्दवाच्यं, तस्मिन्नौपचारिक ईक्षतिः, अप्तेजसोरिवेति। तदसत्, कस्मात्? आत्मशब्दात्। ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्युपक्रम्य ‘तदैक्षत तत्तेजोऽसृजत’ (छान्दो० ६।२।१, ३) इति च तेजोऽबन्नानां सृष्टिमुक्त्वा तदेव प्रकृतं सदीक्षितृ, तानि च तेजोऽबन्नानि, देवताशब्देन परामृश्याह—‘सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’ (छान्दो० ६।३।२) इति। तत्र यदि प्रधानमचेतनं गुणवृत्त्येक्षितृ कल्प्येत, तदेव
भामती
निवेशः ꣸ मिथ्याभिमानः। ꣸ मिथ्याबुद्धिमात्रेण पूर्वेण इति ꣸। अनेनानादिता दर्शिता। मात्रग्रहणेन विचारासङ्गत्वेन निर्वचनीयता निरस्ता। परिशिष्टं निगदव्याख्यातम्॥ ५-६॥
भामती-व्याख्या
या विहरणवान् होता है! शेष अर्थ अत्यन्त स्पष्ट है। 'आकाशादि अनात्म पदार्थों का घटादि उपाधियों के द्वारा अवच्छेदादिभ्रम हो सकता है, किन्तु सहज सिद्धस्वभाव आत्मप्रकाश में वह कैसे घटेगा?' इस प्रश्न का उत्तर है—"दृश्यते चात्मन एव सतो देहादिसंघातेऽनात्मन्यात्मत्वाभिनिवेशो मिथ्याबुद्धिमात्रेण पूर्वेण"। यहाँ अभिनिवेश का अर्थ है—मिथ्याभिमान, वह अपने से पूर्वभावी मिथ्या ज्ञान से प्रयुक्त है—यह अध्यास की अनादिता दिखाते समय पहले कहा जा चुका है। 'मात्र' पद के प्रयोग से मिथ्या ज्ञान की निर्वचनीयता का निरास किया जाता है, क्योंकि वह सदसद्रूपता के विचार की कसौटी पर चढ़ाया नहीं जा सकता। शेष भाष्य सुबोध है एवं "तत्तेज ऐक्षत" (छां. ६।२।३), "ता आप ऐक्षन्त" (छां. ६।२।४) इत्यादि गौण ईक्षण के प्रायपाठ की शङ्का और उसका समाधान पहले ही किया जा चुका है। छठे सूत्र के भाष्य में केवल "सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मना" (छां. ६।३।२) इस श्रुति में प्रयुक्त 'आत्मा' शब्द के बल पर प्रधान के गौण ईक्षण का निरास विशेष रूप किया गया है॥ ५-६॥
प्रधानस्य जगतकारणत्वभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २०१
प्रकृतत्वात्सेयं देवतेति परामृश्येत । न तदा देवता जीवमात्मशब्देनाभिदध्यात् । जीवो हि नाम चेतनः शरीराध्यक्षः प्राणानां धारयिता, तत्प्रसिद्धेर्निर्वचनाच्च । स कथमचेतनस्य प्रधानस्यात्मा भवेत् ? आत्मा हि नाम स्वरूपम्, नाचेतनस्य प्रधानस्य चेतनो जीवः स्वरूपं भवितुमर्हति । अथ तु चेतनं ब्रह्म मुख्यमीक्षितृ परिगृह्यते, तस्य जीवविषय आत्मशब्दप्रयोग उपपद्यते । तथा 'स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' ( छान्दो० ६।१४।३ ) इत्यत्र 'स आत्मा' इति प्रकृतं सदणिमानमात्मानमात्मशब्देनोपदिश्य 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' इति चेतनस्य श्वेतकेतोरात्मत्वेनोपदिशति । अप्तेजसोस्तु विषयत्वादचेतनत्वं, नामरूपव्याकरणादौ च प्रयोक्तृत्वेनैव निर्देशात् । नचात्मशब्दवर्तिकचिन्मुख्यत्वे कारणमस्तीति युक्तं कूलवद् गौणत्वमीक्षितृत्वस्य । तयोरपि च सदधिष्ठितत्वापेक्षमेवेक्षितृत्वम् । सतस्त्वात्मशब्दान्न गौणमीक्षितृत्वमित्युक्तम् ॥ ६ ॥
अथोच्येत-अचेतनेऽपि प्रधाने भवत्यात्मशब्दः, आत्मनः सर्वार्थकारित्वाद्, यथा राज्ञः सर्वार्थकारिणि भृत्ये भवत्यात्मशब्दो ममात्मा भद्रसेन इति । प्रधानं हि पुरुषस्यात्मनो भोगापवर्गौ कुर्वदुपकरोति, राज्ञ इव भृत्यः संधिविग्रहादिषु वर्तमानः । अथवाक एवात्मशब्दश्चेतनाचेतनविषयो भविष्यति, भूतात्मेन्द्रियात्मेति च प्रयोगदर्शनात् । यथैक एव ज्योतिःशब्दः क्रतुज्वलनविषयः । तत्र कुत एतदात्मशब्दादीक्षतेरगौणत्वमिति-अत उत्तरं पठति-
तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ ७ ॥
न प्रधानमचेतनमात्मशब्दालम्बनं भवितुमर्हति, 'स आत्मा' इति प्रकृतं सदणिमानमादाय 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' ( छान्दो० ६।८।७ ) इति चेतनस्य श्वेतकेतोर्मोक्षयितव्यस्य तन्निष्ठामुपदिश्य 'आचार्यवान्पुरुषो वेद, तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये' ( छान्दो० ६।१४।२ ) इति मोक्षोपदेशात् । यदि ह्यचेतनं प्रधानं सच्छब्दवाच्यं तदसीति ग्राहयेन्मुमुक्षुं चेतनं सन्तमचेतनोऽसीति, तदा विपरीतवादि
भामती
❄ तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशाद् ❄ इति शङ्कोत्तरत्वेन वा स्वातन्त्र्येण वा प्रधाननिराकरणार्थं सूत्रम् , शङ्का च भाष्ये उक्ता ॥ ७ ॥
भामती-व्याख्या
"तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात्" ( ब्र. सू. १।१।७ ) इस सिद्धान्त सूत्र का सामञ्जस्य दो प्रकार से किया जा सकता है-( १) "तत्त्वमसि" ( छां. ६।१४।३ ) इस मोक्षोपाय के उपदेश में जो 'तत्' पद से प्रधान के ग्रहण की शङ्का की गई है, उसका यह उत्तर है कि 'आत्मनिष्ठ' का ही मोक्ष होता है, प्रधाननिष्ठ का नहीं । ( २ ) अथवा स्वतन्त्ररूप से प्रधानकारणतावाद का इस सूत्र के द्वारा निराकरण अभिप्रेत है ।
[ 'तन्निष्ठ' शब्द का अर्थ है-तस्मिन् निष्ठा ( आत्मरूपापत्तिः ) यस्य, अर्थात् जगत् के कारणीभूत तत्त्व को जो अपना आत्मा निश्चय कर लेता है, वह मुक्त होता है । मुमुक्षु जीव के लिए प्रधान तत्त्व को अपना आत्मा समझना सम्भव नहीं, क्योंकि आत्मा का अर्थ है-स्वरूप । विजातीय पदार्थं विजातीय पदार्थ का आत्मा या स्वरूप नहीं हो सकता । जो श्रुति अचेतन प्रधान को जीव का स्वरूप बताती है-'तत्त्वमसि', उस श्रुति को विपरीतार्थवादी और अप्रमाण कहा जायगा, किन्तु वेदान्त-श्रुति सर्वथा निर्दोष और स्वतः प्रमाणभूत है, उसमें अप्रामाण्य की कल्पना नहीं कर सकते । यदि शास्त्र भोले-भाले मुमुक्षु को कह देता २६
| २०२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ७ |
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शास्त्रं पुरुषस्यानर्थायेत्यप्रमाणं स्यात्। न तु निर्दोषं शास्त्रमप्रमाणं कल्पयितुं युक्तम्। यदि चाज्ञस्य सतो मुमुक्षोरचेतनमनात्मानमात्मेत्युपदिशेत्प्रमाणभूतं शास्त्रं, स श्रद्दधानतयान्धगोलाङ्गूलन्यायेन तदात्मदृष्टिं न परित्यजेत्, तद्व्यतिरिक्तं चात्मानं न प्रतिपद्येत, तथा सति पुरुषार्थाद्विहन्येतानर्थं च ऋच्छेत्। तस्माद्यथा स्वर्गार्थिनोऽग्निहोत्रादिसाधनं यथाभूतमुपदिशति, तथा मुमुक्षोरपि 'स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' इति यथाभूतमेवात्मानमुपदिशतीति युक्तम्। एवं च सति तप्तपरशुग्रहणमोक्षदृष्टान्तेन सत्याभिसंधस्य मोक्षोपदेश उपपद्यते। अन्यथा ह्यमुख्ये सदात्मतत्त्वोपदेशे 'अहमुक्थमस्मीति विद्यात्' ( ऐ० आर० २।१।२।६) इतिवत्संपन्मात्रमिदमनित्यफलं स्यात्। तत्र मोक्षोपदेशो नोपपद्येत। तस्मान्न सदणिमन्यात्मशब्दस्य गौणत्वम्। भृत्ये तु स्वामिभृत्यभेदस्य प्रत्यक्षत्वादुपपन्नो गौण आत्मशब्दो ममात्मा भद्रसेन इति। अपि च क्वचिद् गौणः शब्दो दृष्ट इति नैतावता शब्दप्रमाणकेऽर्थे गौणी कल्पना न्याय्या, सर्वत्रानाश्वासप्रसङ्गात्। यत्तूक्तं-चेतनाचेतनयोः साधारण आत्मशब्दः क्रतु-ज्वलनयोरिव ज्योतिःशब्द इति,-तन्न, अनेकार्थत्वस्यान्याय्यत्वात्। तस्माच्चेतनविषय एव मुख्य आत्मशब्दश्चेतनत्वोपचाराद् भूतादिषु प्रयुज्यते भूतात्मेन्द्रियात्मेति च। साधारणत्वेऽप्यात्मशब्दस्य न प्रकरणमुपपदं वा किंचिन्निश्चायक मन्तरेणान्यतरवृत्तित्ता निर्धारयितुं शक्यते। नचात्राचेतनस्य निश्चायकं किंचित्कारणमस्ति। प्रकृतं तु सदीक्षितृ, सन्निहितश्चेतनः श्वेतकेतुः। न हि चेतनस्य श्वेतकेतोरचेतन आत्मा संभवतीत्यवोचाम। तस्माच्चेतनविषय इहात्मशब्द इति निश्चीयते। ज्योतिःशब्दोऽपि लौकिकेन प्रयोगेण ज्वलन एव रूढः, अर्थवादकल्पितेन तु ज्वलनसादृश्येन क्रतौ प्रवृत्त इत्यदृष्टान्तः। अथवा—पूर्वसूत्र एवात्मशब्दं निरस्तसमस्तगौणत्वसाधारणत्वाशङ्कतया व्याख्याय ततः स्वतन्त्र एव प्रधानकारणनिराकरणहेतुर्व्याख्येयः—'तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात्' इति। तस्मान्नाचेतनं प्रधानं सच्छब्दवाच्यम् ॥ ७ ॥
भामती-व्याख्या
है कि यह (अचेतन प्रधान) ही तेरा आत्मा है और श्रद्धालु मुमुक्षु उस उपदेश को वैसे ही कस करके पकड़ लेता है, जैसे किसी अन्धे बैल की पूछ कोई अन्धा व्यक्ति पकड़ ले। तब उस बेचारे मुमुक्षु की क्या दुर्गति होगी, यह कल्पना भी नहीं कर सकते। अतः जैसे कर्मकाण्ड अपने स्वर्गार्थी अधिकारी पुरुष को यथावत् स्वर्ग के साधनीभूत अग्निहोत्रादि का उपदेश करता है, वैसे ही वेदान्त-शास्त्र का भी प्रामाण्य और श्रद्धेयता इसी में है कि वह भी अपने मुमुक्षु पुरुष को "स आत्मा तत्त्वमसि"—ऐसा यथाभूत उपदेश करे, तब तो ब्रह्मतत्त्व में ही जगतकारणता और आत्मरूपता उपपन्न होती है, अन्यत्र नहीं। "पुरुष सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत् परशुमस्मै तपतेति स यदि तस्य कर्त्ता भवति सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति, स दह्यते। अथ यदि तस्याकर्ता भवति, तत एव सत्यमात्मानं कुरुते, स सत्याभिसन्धो न दह्यतेऽथ मुच्यते" (छां. ६।१६।१-२) इस प्रकार आत्मा में आत्मत्वावधारण (सत्यभिसन्धि) मोक्ष का सच्चा साधन है, इस साधन को अपनानेवाला पुरुष वैसे ही मुक्त हो जाता है, जैसे सत्यवादी पुरुष तप्त परशु का ग्रहण कर लेने पर भी नहीं जलता और बन्धन से मुक्त हो जाता है। 'आत्मा' शब्द के अनेक अर्थ मानना सर्वथा अनुचित है। जब कहीं जड़ वस्तु के लिए इसका प्रयोग हो जाता है, तब वह गौण प्रयोग है, प्रकृत में मुख्य] ॥ ७॥
प्रधानस्य जगत्कारणत्वभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २०३
कुतश्च न प्रधानं सच्छब्दवाच्यम्—
हेयत्वावचनाच्च ॥ ८ ॥
यद्यनात्मैव प्रधानं सच्छब्दवाच्यं 'स आत्मा तत्त्वमसि' (छान्दो० ६।८।७) इतीहोपदिष्टं स्यात्, स तदुपदेशश्रवणादनात्मज्ञतया तन्निष्ठो मा भूदिति मुख्यमात्मानमुपदिदिक्षुस्तस्य हेयत्वं ब्रूयात्। यथाऽरुन्धतीं दिदर्शयिषुस्तत्समीपस्थां स्थूलां ताराममुख्यां प्रथममरुन्धतीति ग्राहयित्वा तां प्रत्याख्याय पश्चादरुन्धतीमेव ग्राहयति, तद्वन्नायमात्मेति ब्रूयात्, नचैवमवोचत्। सन्मात्र आत्मावगतिनिष्ठतैव हि षष्ठप्रपाठकपरिसमाप्तिरीक्ष्यते। चशब्दः प्रतिज्ञाविरोधाभ्युच्चयप्रदर्शनार्थः। सत्यपि हेयत्ववचने प्रतिज्ञाविरोधः प्रसज्येत। कारणविज्ञानाद्धि सर्वं विज्ञातमिति प्रतिज्ञातम्। 'उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्', 'एवं सोम्य स आदेशो भवति' (छा० ६।१।१, ३) इति वाक्योपक्रमे श्रवणात्। न च सच्छब्दवाच्ये प्रधाने भोग्यवर्गकारणे हेयत्वेनाहेयत्वेन वा विज्ञाते भोक्तृवर्गो विज्ञातो भवति, अप्रधानविकारत्वाद्वोक्तृवर्गस्य। तस्मान्न प्रधानं सच्छब्दवाच्यम् ॥ ८ ॥
कुतश्च न प्रधानं सच्छब्दवाच्यम् —
स्वाप्ययात् ॥ ९ ॥
भामती
स्यादेतद्—ब्रह्मैव ज्ञोप्सितं, तच्च न प्रथमं सूक्ष्मतया शक्यं श्वेतकेतुं ग्राहयितुमिति तत्सम्बद्धं प्रधानमेव स्थूलतयाऽऽत्मत्वेन ग्राह्यते श्वेतकेतुरुन्धतीमिवातीव सूक्ष्मां दर्शयितुं तत्सन्निहितां स्थूलतारकां दर्शयन्तीयमसावरुन्धतीति । अस्यां शङ्कायामुत्तरम् ⁕ हेयत्वावचनाच्च ⁕ इति सूत्रम् । चकारोऽनुक्तसमुच्चयार्थः । तच्चानुक्तं भाष्य उक्तम् ॥ ८ ॥
अपि च जगत्कारणं प्रकृत्य स्वपितीत्यस्य निरुक्तं कुर्वती श्रुतिश्चेतनमेव जगत्कारणं ब्रूते । य...
भामती-व्याख्या
शङ्का—वेदान्तियों की यदि यह बात मान भी ली जाय कि मोक्ष के लिए ब्रह्म का ज्ञान आवश्यक है, तब भी ब्रह्म ऐसा सूक्ष्मतम पदार्थ है कि उसका नितान्त कुशाग्र बुद्धि के मुमुक्षु को भी सहसा दर्शन नहीं कराया जा सकता, अतः जैसे अरुन्धती नाम के अत्यन्त नन्हें तारे को दिखाने के लिए पहले उसके समीप का वसिष्ठनामक स्थूल तारा अरुन्धती के रूप में दिखाकर क्रमशः वास्तविक अरुन्धती का दर्शन कराया जाता है, वैसे ही पहले जगत् के कारणीभूत प्रधान तत्त्व को दिखाकर 'तत्त्वमसि'—ऐसा उपदेश करके क्रमशः उसके साक्षी-भूत आत्मतत्त्व तक मुमुक्षु को पहुँचाया जाय।
समाधान—उक्त शङ्का का समाधान करने के लिए कहा गया है—"हेयत्वावचनाच्च" (ब्र. सू. १।१।८)। सूत्र में चकार का ग्रहण जिस अनुक्तार्थ का संग्रह करने के लिए प्रयुक्त है, वह अनुक्त अर्थ भाष्य में कहा गया है—"चशब्दः प्रतिज्ञाविरोधाभ्युच्चयप्रदर्शनार्थः"। श्रुति में यह प्रतिज्ञा की गई है कि जगत् के कारणीभूत एक तत्त्व के ज्ञान से अनन्त कार्यों का ज्ञान हो जाता है—"यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्" (छां. ६।१।३)। प्रधान को यदि कारण माना जाता है, तब एक प्रधान तत्त्व ज्ञातव्यत्वेन उपादेय होता, उसे अब त्याज्य बताना प्रतिज्ञा-विरुद्ध है ॥ ८ ॥
जगत् के कारणीभूत तत्त्व में ही जीव का अप्यय (तद्रूपतापत्ति) दिखाया गया है—
२०४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [अ. १ पा. १ सू. १०]
तदेव सच्छब्दवाच्यं कारणं प्रकृत्य श्रूयते–‘यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति’ (छा० ६।८।१) इति । एषा श्रुतिः स्वपितीत्येतत्पुरुषस्य लोकप्रसिद्धं नाम निर्वक्ति । स्वशब्देनेहात्मोच्यते । यः प्रकृतः सच्छब्दवाच्यस्तमपीतो भवत्यपि- गतो भवतीत्यर्थः । अपिपूर्वस्यैतेर्लयार्थत्वं प्रसिद्धं, प्रभवाप्ययावित्युत्पत्तिप्रलययोः प्रयोगदर्शनात् । मनःप्रचारोपाधिविशेषसम्बन्धादिन्द्रियार्थान्गृह्णन् तद्विशेषापन्नो जीवो जागर्ति । तद्वासनाविशिष्टः स्वप्नान् पश्यन् मनःशब्दवाच्यो भवति । स उपाधिद्वयो परमे सुषुप्तावस्थायामुपाधिकृतविशेषाभावात्स्वात्मनि प्रलीन इवेति ‘स्वं ह्यपीतो भवति’ इत्युच्यते । यथा हृदयशब्दनिर्वचनं श्रुत्या दर्शितम्–‘स वा एष आत्मा हृदि तस्यैत- देव निरुक्तं हृदयमिति तस्माद् हृदयमिति’ (छा० ८।३।३) इति । यथा वाऽशनायोद- न्याशब्दप्रवृत्तिमूलं दर्शयति श्रुतिः–‘आप एव तदशितं नयन्ते, तेज एव तत्पीतं नयते’ (छा० ६।८।३, ५) इति च, एवं स्वमात्मानं सच्छब्दवाच्यमपीतो भवतीतीममर्थं स्वपितिनामनिर्वचनेन दर्शयति । न च चेतन आत्माऽचेतनं प्रधानं स्वरूपत्वेन प्रति- पद्येत । यदि पुनः प्रधानमेवात्मीयत्वात्स्वशब्देनैवोच्येत, एवमपि चेतनोऽचेतनमप्ये- तीति विरुद्धमापद्येत । श्रुत्यन्तरं च–‘प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम्’ (बृह० ४।३।२१) इति सुषुप्तावस्थायां चेतनेऽप्ययं दर्शयति । अतो यस्मि- न्नप्ययः सर्वेषां चेतनानां तच्चेतनं सच्छब्दवाच्यं जगतः कारणं न प्रधानम् ॥ ९ ॥
कुतश्च न प्रधानं जगतः कारणम्–
गतिसामान्यात् ॥ १० ॥
यदि तार्किकसमय इव वेदान्तेष्वपि भिन्ना कारणावगतिरभविष्यत् क्वचिच्चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं, क्वचिदचेतनं प्रधानं, क्वचिदन्यदेवेति, ततः कदाचित्प्रधान-
भामती स्वशब्द आत्मवचनस्तथापि चेतनस्य पुरुषस्याचेतनप्रधानत्वानुपपत्तिः । अथात्मीयवचनस्तथाप्यचेतने पुरुषार्थतयाऽऽत्मीयेऽपि चेतनस्य प्रलयानुपपत्तिः । न हि मृदात्मा घट आत्मीयेऽपि पाथसि प्रलीयतेऽपि त्वात्मभूतायां मृद्येव । न च रजतमनामभूते हस्तिनि प्रलीयते, किन्त्वात्मभूतायां शुक्तावेवेत्याह ॐ स्वाप्ययात् ॐ ॥ ९ ॥ ॐ गतिसामान्यात् ॐ । गतिरवगतिः । ॐ तार्किकसमय इव इति ॐ । यथा हि तार्किकाणां
भामती-व्याख्या "यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति, स्वमपीतो भवति" (छां. ६।८।१) । स्वपिति का निर्वचन है—‘स्वमपीतो भवति', यहाँ ‘स्व’ शब्द यदि आत्मा का वाचक है, तब जीव का अचेतनभूत प्रधानरूप होना सम्भव नहीं। यदि ‘स्व’ शब्द आत्मीय का बोधक है, तब प्रधान का ‘स्व’ पद से ग्रहण हो जाने पर भी उसमें जीव का प्रलय (अभिभव) नहीं हो सकता, क्योंकि मृन्मय घट आत्मीय (अपने सम्बन्धित जल) पदार्थ में प्रलीन नहीं होता, अपितु स्वात्मभूत मृत्तिका में ही विलीन होता है। रजतादि पदार्थ कभी भी अपने आरोप के अनाधारभूत हस्ती में प्रलीन नहीं होता, अपितु शुक्ति में ही विलीन होता है, अतः जीव का प्रलय ब्रह्म में ही सम्भव होने के कारण वही जगत् का उपादान कारण है, प्रधान नहीं ॥ ९ ॥
सभी वेदान्त-वाक्यों से जगत्कारणत्वेन एकमात्र ब्रह्म की ही गति (अवगति या ज्ञान) होती है, तार्किक (न्याय, वैशेषिक, सांख्यादि) मतवादों के अनुसार विविधता प्रतीत नहीं होती ।
धानस्य जगतकारणत्वभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २०५
कारणवादानुरोधेनापीक्षत्यादिश्रवणमकल्पयिष्यत । नत्वेतदस्ति, समानैव हि सर्वेषु वेदान्तेषु चेतनकारणावगतिः ।' 'यथाऽग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः सर्वे प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः' ( कौ० ३।३ ) इति । 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' ( तै० २।१ ) इति । 'आत्मन एवेदं सर्वम्' ( छा० ७।२६।१ ) इति । 'आत्मन एष प्राणो जायते' ( प्र० ३।३) इति चात्मनः कारणत्वं दर्शयन्ति सर्वे वेदान्ताः । आत्मशब्दस्य चेतनवचन इत्यवोचाम । महच्च प्रामाण्यकारणमेतद्यद्वेदान्तवाक्यानां चेतनकारणत्वे समानगतित्वं, चक्षुरादीनामिव रूपादिषु । अतो गतिसामान्यात्सर्वज्ञं ब्रह्म जगतः कारणम् ॥ १० ॥
कुतश्च सर्वज्ञं ब्रह्म जगतः कारणम्—
श्रुतत्वाच्च ॥ ११ ॥
स्वशब्देनैव च सर्वज्ञ ईश्वरो जगतः कारणमिति श्रूयते श्वेताश्वतराणां मन्त्रोपनिषदि सर्वज्ञमीश्वरं प्रकृत्य—'स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः' ( श्वे० ६।९ ) इति । तस्मात्सर्वज्ञं ब्रह्म जगतः कारणं, नाचेतनं प्रधानमन्यद्वेति सिद्धम् ॥ ११ ॥
भामती
समयभेदेषु परस्परपराहताथेता, नैवं वेदान्तेषु परस्परपराहतिः, अपि तु तेषु सर्वत्र · जगत्कारणचेतन्यावगतिः समानेति । ॐ चक्षुरादीनामिव रूपादिषु इति ॐ । यथा हि सर्वेषां चक्षू रूपमेव ग्राहयति, न पुना रसादिकं कस्यचिद्दर्शयति कस्यचिद्रूपम् । एवं रसनादिष्वपि गतिसामान्यं दर्शनीयम् ॥ १० ॥
ॐ श्रुतत्वाच्च ॐ । तदैक्षतेत्यत्र ईक्षणमात्रं जगत्कारणस्य श्रुतं न तु सर्वविषयम् । जगत्कारणसम्बन्धितया तु तदर्थात् सर्वविषयमवगतं श्वेताश्वतराणां तूपनिषदि सर्वज्ञ ईश्वरो जगत्कारणमिति साक्षादुक्तमिति विशेषः ॥ ११ ॥
भामती-व्याख्या
"चेतनकारणत्वे समानगतित्वं चक्षुरादीनामिव रूपादिषु" । अर्थात् जैसे चक्षु से सभी आँखवाले पुरुषों को समानरूप से रूप और रूपी पदार्थों की ही अवगति होती है, वैसे सभी वेदान्त-वचनों से चेतन-कारणता की ही अवगति होती है, अतः प्रधानादि अचेतन पदार्थों को जगत् का उपादान कारण नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार रसादि दृष्टान्तों में भी रसनादि से समान अवगति दिखाई जा सकती है ॥ १० ॥
प्रधान-कारणता कहीं भी साक्षात् श्रुत नहीं, अपितु "तदैक्षत"—इत्यादि श्रुतियों में जगत्कारणीभूत पदार्थ में ईक्षणमात्र श्रुत है, वह भी सर्वविषयक नहीं। जगत्कारणता का सामञ्जस्य करने के लिए ईक्षण में सर्वविषयत्व की कल्पना ही की जाती है, किन्तु श्वेताश्वतरोपनिषत् में सर्वज्ञ ईश्वर का प्रकरण उठा कर कहा है—'स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः' ( श्वेता० ६।९ ) । वह सर्वज्ञ ईश्वर ही जगत् का कारण, करणाधिपों ( जीवों ) का अन्तर्यामी है, इसका न तो कोई जनक है और न कोई सञ्चालक अतः सर्वज्ञ ईश्वर को छोड़ कर प्रधानादि को जगत् का कारण नहीं माना जा सकता ॥ ११ ॥
| २०६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १२ |
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( ६ आनन्दमयाधिकरणम् । सू० १२-१९ )
'जन्माद्यस्य यतः' इत्यारभ्य 'श्रुतत्वाच्च' इत्येवमन्तैः सूत्रैर्याण्युदाहृतानि वेदान्तवाक्यानि तेषां सर्वज्ञः सर्वशक्तिरीश्वरो जगतो जन्मस्थितिलयकारणमित्येतत्स्यार्थस्य प्रतिपादकत्वं न्यायपूर्वकं प्रतिपादितम्। गतिसामान्योपन्यासेन च सर्वे वेदान्ताश्चेतनकारणवादिन इति व्याख्यातम्, अतः परस्य ग्रन्थस्य किमुत्थानमिति ? उच्यते—द्विरूपं हि ब्रह्मावगम्यते, नामरूपविकारभेदोपाधिविशिष्टं, तद्विपरीतं च सर्वोपाधिविवर्जितम्। 'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्' (बृह० ४।५।१५) 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्' (छान्दो० ७।२४।१) 'सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन् यदास्ते' (तै० आ० ३।१२।७) 'निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्। अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम्' (श्वे० ६।१९) 'नेति नेति' (बृ० २।३।६) इति 'अस्थूलमनणु' (बृ० ३।८।८) 'न्यूनमन्यत्स्थानं संपूर्णमन्यत्' इति चैवं सहस्रशो विद्याविद्याविषयभेदेन ब्रह्मणो द्विरूपतां दर्शयन्ति वाक्यानि । तत्राविद्यावस्थायां ब्रह्मण उपास्योपासकादिलक्षणः सर्वो व्यवहारः। तत्र कानिचिद् ब्रह्मण उपासनान्यभ्युदयार्थानि, कानिचित्क्रममुक्त्यर्थानि, कानिचित्कर्मसमृद्ध्य-
भामती
उत्तरसूत्रसन्दर्भमाक्षिपति ॐ जन्माद्यस्य यत इत्यारभ्य इति ॐ । ब्रह्म जिज्ञासितव्यमिति प्रतिज्ञातं, तच्च शास्त्रैकसमधिगम्यं, शास्त्रञ्च सर्वज्ञे सर्वशक्तौ जगदुत्पत्तिस्थितिप्रलयकारणे ब्रह्मण्येव प्रमाणं न प्रधानादाविति न्यायतो व्युत्पादितम्। न चास्ति कश्चिद्वेदान्तभागो यस्तद्विपरीतमपि बोधयेदिति च गतिसामान्यादित्युक्तम्। तत् किमपरमवशिष्यते यदर्थमुत्तरसूत्रसन्दर्भस्यावतारः स्यादिति। ॐ किमुत्थानमिति ॐ किमाक्षेपे। समाधत्ते ॐ उच्यते, द्विरूपं हि इति ॐ । यद्यपि तत्त्वतो निरस्तसमस्तोपाधिरूपं ब्रह्म तथापि न तेन रूपेण शक्यमुपदेष्टुमित्युपहितेन रूपेणोपदेष्टव्यमिति। तत्र च क्वचिदुपाधिर्विवक्षितः। तदुपासनानि ॐ कानिचिदभ्युदयार्थानि ॐ मनोमात्रसाधनतयात्र पठितानि। ॐ कानिचित्
भामती-व्याख्या
संगति—अग्रिम अधिकरण के सूत्र-सन्दर्भ पर आक्षेप किया जाता है—"जन्माद्यस्य यतः" इत्यारभ्य "श्रुतत्वाच्च" इत्येवमन्तैः सूत्रैः सर्वज्ञ ईश्वरो जगत्कारणमिति प्रतिपादितम्। अतः परस्य ग्रन्थस्य किमुत्थानम् ?" अर्थात् 'ब्रह्म जिज्ञासितव्यम्'—ऐसी प्रतिज्ञा की गई, वह (ब्रह्म) केवल वेदान्त-वेद्य है, वह वेदान्त शास्त्र सर्वज्ञ, सर्वशक्ति-सम्पन्न, जगत्कारणीभूत ब्रह्म में ही प्रमाण है, प्रधानादि में नहीं—ऐसा न्यायों और युक्तियों के द्वारा सिद्ध किया गया। वेदान्त का कोई भी भाग ऐसा नहीं, जो उसके विपरीत कहता हो—यह बात "गतिसामान्यात्"—इस सूत्र से कही गई। अब और क्या शेष रह गया कि जिसके लिए आगे के सूत्रों की रचना की गई, अतः कहा गया—"किमुत्थानम्"। यहाँ 'किम्' शब्द आक्षेपार्थक है।
उक्त आक्षेप का समाधान किया जाता है—"उच्यते द्विरूपं हि ब्रह्मावगम्यते नामरूपविकारभेदोपाधि-विशिष्टम्, तद्विपरीतं च"। यद्यपि ब्रह्म तत्त्व समस्त उपाधियों से रहित है, तथापि उस अनौपाधिक रूप से उसका उपदेश नहीं किया जा सकता, अतः किसी-न-किसी उपाधि से विभूषित कर उसका उपदेश करना होगा। किसी-किसी क्रिया में उपाधि विवक्षित होती है, जैसे उपासना विधि में। कतिपय (प्रतीकादि) उपासनाओं का फल अभ्युदय
प्रधानस्यानन्दमयत्वम् ] हिन्दोसहितभामतीसंवलितम् २०७
र्थानि। तेषां गुणविशेषोपाधिभेदेन भेदः। एक एव तु परमात्मेश्वरस्तैस्तैर्गुणविशेषैर्विशिष्ट उपास्यो यद्यपि भवति, तथापि यथागुणोपासनमेव फलानि भिद्यन्ते। 'तं यथा यथोपासते तदेव भवति' इति श्रुतेः, यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति' (छा० ३।१४।१) इति च। स्मृतेश्च—'यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥' (गी० ८।६) इति। यद्यप्येक आत्मा सर्वभूतेषु स्थावरजङ्गमेषु गूढः, तथापि चित्तोपाधिविशेषतारतम्यादात्मनः
भामती
क्रममुक्त्यर्थानि, कानिचित्कर्मसमृद्ध्यर्थानि ॐ । क्वचित् पुनरुक्तोऽप्युपाधिरविवक्षितः, यथाऽत्रैवान्नमयादय आनन्दमयान्ताः पञ्च कोशाः। तदत्र कस्मिन्नुपाधिर्विवक्षितः कस्मिन्नेति नाद्यापि विवेचितम्। तथा गतिसामान्यमपि सिद्धवदुक्तं, न त्वद्यापि साधितमिति। तदर्थमुत्तरग्रन्थसन्दर्भारम्भ इत्यर्थः। स्यादेतत्—परस्यात्मनस्तत्तदुपाधिभेदविशिष्टस्याप्यभेदात् कथमुपासनाभेदः कथञ्च फलभेद इत्यत आह ॐ एक एव तु इति ॐ । रूपाभेदेऽप्युपाधिभेदादुपहितभेदादुपासनाभेदस्तथा च फलभेद इत्यर्थः। ॐ क्रतुः ॐ सङ्कल्पः। ननु यद्येक आत्मा कूटस्थनित्यो निरतिशयः सर्वभूतेषु गूढः कथमेतस्मिन् भूताश्रये तारतम्यश्रुतय इत्यत आह ॐ यद्यप्येक आत्मा इति ॐ । यद्यपि निरतिशयमेकमेव रूपमात्मन ऐश्वर्यं ज्ञानं चानन्दश्च,
भामती-व्याख्या
(स्वर्गादि) माना जाता है। कर्म-निरपेक्ष केवल मन के द्वारा सम्पादित होने के कारण ऐसी उपासनाओं को कर्मकाण्ड में न पढ़ कर यहाँ (वेदान्त-काण्ड) में स्थान दिया गया है। "कानिचित् क्रममुक्त्यर्थानि, कानिचित् कर्मसमृद्ध्यर्थानि"। कहीं-कहीं ब्रह्म की कथित उपाधि भी अविवक्षित होती है, जैसे—यहाँ [आनन्द ब्रह्म के प्रसङ्ग में] ही 'अन्नमय', 'प्राणमय', 'मनोमय', 'विज्ञानमय' और 'आनन्दमय'—ये पाँच कोश। कहाँ उपाधि विवक्षित है और कहाँ नहीं ? ऐसा विचार अभी तक नहीं किया गया। उसी प्रकार 'गतिसामन्य' का भी उपदेश मात्र कर दिया गया, अभी तक उसकी सिद्धि नहीं की गई, इसके लिए अग्रिम सूत्र-ग्रन्थ की रचना की गई है।
विविध उपाधियों से विशिष्ट भी परमात्मा तो एक अभिन्न ही है, तब उसकी उपासनाओं का भेद क्योंकर होगा? उपासना-भेद न होने पर फल-भेद क्यों होगा? ऐसी शङ्का का समाधान है—"एक एव तु परमात्मेश्वरः तैस्तैर्गुणविशेषैर्विशिष्ट उपास्यो यद्यपि भवति, तथापि यथागुणोपासनमेव फलानि भिद्यन्ते "तं यथा यथोपासते, तदेव भवति" (मुद्गलो. ३।३) इति श्रुतेः। "यथाक्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति" (छां. ३।१४।१) इति च"। आशय यह है कि उपधेय का अभेद होने पर भी उपाधियों का भेद होने के कारण उपासना का भेद हो जाता है। उपासना का भेद होने से फल-भेद हो जाता है। उक्त श्रुति में 'क्रतु' शब्द का अर्थ है—'सङ्कल्प। भाष्यकार ने भी इस मन्त्र की व्याख्या में कहा है—"क्रतुर्निश्चयोऽध्यवसायः याहङ् निश्चयोऽस्मिँल्लोके पुरुषो भवति, तथेतां मृत्वा भवति"। जीव का निश्चय अपने कर्मों पर निर्भर है और उस निश्चय पर भावी जन्म।
यदि एक ही आत्मा कूटस्थ, नित्य और निरतिशय सभी भूतो में व्याप्त है, तब उसके उपास्य-उपासकादिरूप तारतम्य का प्रतिपादन श्रुतियाँ क्यों करती हैं? इस प्रश्न का उत्तर है—"यद्यप्येक आत्मा सर्वभूतेषु स्थावरजङ्गमेषु गूढः, तथापि चित्तोपाधिविशेषतारतम्या-दात्मनः कूटस्थनित्यस्यैकरूपस्याप्युत्तरोत्तराविकृतस्य तारतम्यम्"। अर्थात् आत्मा का रूप, ऐश्वर्य और ज्ञान एक ही प्रकार का है, तथापि अनादि अविद्यारूप अन्धकार से आवृत्त होकर किसी (स्थावरादि) शरीर में असत्-जैसा (नहीं के बराबर), कहीं अत्यन्त
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कूटस्थनित्यस्यैकरूपस्याप्युत्तरोत्तरमाविष्कृतस्य तारतम्यमैश्वर्यशक्तिविशेषैः श्रूयते—'तस्य य आत्मानमाविस्तरां वेद' (ऐ० आ० २।३।२।१) इत्यत्र। स्मृतावपि—'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽंशसंभवम्॥' (गी० १०।४१) इति। यत्र यत्र विभूत्याद्यतिशयः स स ईश्वर इत्युपास्यतया चोद्यते। एवमिहाप्यादित्यमण्डले हिरण्मयः पुरुषः सर्वपाप्मोदयलिङ्गात्पर एवेति वक्ष्यति। एवं 'आकाशस्तल्लिङ्गात्' (ब्र० १।१।२२) इत्यादिषु द्रष्टव्यम्। एवं सद्योमुक्तिकारणमध्यात्मज्ञानमुपाधिविशेषद्वारेणोपदिश्यमानमप्यविवक्षितोपाधिसंबन्धविशेषं परापरविषयत्वेन संदिह्यमानं वाक्यगतिपर्यालोचनया निर्णतव्यं भवति। यथैहैव तावद् 'आनन्दमयोऽभ्यासाद्' इति, एवमेकमपि ब्रह्मापेक्षितोपाधिसम्बन्धं निरस्तोपाधिसंबन्धं चोपास्यत्वेन ज्ञेयत्वेन च वेदान्तेषूपदिश्यत इति प्रदर्शयितुं परो ग्रन्थ आरभ्यते। यच्च 'गतिसामान्याद्' इत्यचेतनकारणनिराकरणमुक्तं, तदपि वाक्यान्तराणि ब्रह्मविषयाणि व्याचक्षाणेन ब्रह्मविपरीतकारणनिषेधेन प्रपञ्च्यते—
आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १२ ॥
तैत्तिरीयकेऽन्नमयं, प्राणमयं, मनोमयं, विज्ञानमयं, चानुक्रम्याम्नायते—'तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात्। अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः' (तै० २।५) इति। तत्र संशयः—किमिहानन्दमयशब्देन परमेव ब्रह्मोच्यते यत्प्रकृतम् 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तै० २।१) इति, किंवाऽन्नमयादिवद् ब्रह्मणोऽर्थान्तरमिति ? किं तावत्प्राप्तं ? ब्रह्मणोऽर्थान्तरममुख्य
भामती
तथाप्यनाद्यविद्यातमःसमावृतं तेषु तेषु प्राणभृद्भेदेषु क्वचिदसदिव क्वचित्सदिव क्वचिदत्यन्तापकृष्टमिव क्वचित्सत्तु क्वचित् प्रकर्षवत् क्वचिदत्यन्तप्रकर्षवदिव भासते, तत् कस्य हेतोः ? अविद्यातमसः प्रकर्षनिकर्षतारतम्यादिति। यथोत्तमप्रकाशः सविता दिङ्मण्डलमेकरूपेणैव प्रकाशेनापूरयन्नपि वर्षासु निकृष्टप्रकाश इव शरदि तु प्रकृष्टप्रकाश इव प्रथते, तथेदमपीति। अपेक्षितोपाधिसम्बन्धम् उपास्यत्वेन, 'निरस्तोपाधिसम्बन्धं ज्ञेयत्वेन इति।
तत्र तावत्प्रथममेकदेशिमतेनाधिकरणमारचयति। ॐ तैत्तिरीयकेऽन्नमयम् ॐ इत्यादि।
गौणप्रवाहपातेऽपि युज्यते मुख्यमीक्षणम्। मुख्यत्वे तूभयोस्तुल्ये प्रायदृष्टिविशेषिका॥
भामती-व्याख्या
अपकृष्ट, कहीं अपकृष्टतर, कहीं सत्, कहीं प्रकृष्ट और कहीं अत्यन्तोत्कृष्ट प्रतीत होता है। ऐसा किस कारण से हुआ ? इसका उत्तर इतना ही है कि उसकी उपाधिभूत अविद्या के उत्कर्षापकर्षतारतम्य के कारण वैसे ही वह वैसा हो जाता है, जैसे कि भगवान् सूर्य एकविध अपने उत्तमरूप से सभी दिशाओं को पूरित और अवभासित करता है, किन्तु वर्षा काल में उसका प्रकाश मन्द और शरत् काल में प्रखर होता है। भाष्य में "अपेक्षितोपाधिसम्बन्धं" का "उपास्यत्वेन" और "निरस्तोपाधिसम्बन्धं" का "ज्ञेयत्वेन" के साथ अन्वय विवक्षित है। अर्थात् उपास्य और ज्ञेय ब्रह्म का श्रौत उपदेश प्रशस्त करने या ब्रह्म में सद्रूपता और चिद्रूपता सिद्ध करने के अनन्तर आनन्दरूपता सिद्ध करने के लिए अग्रिम सूत्र-सन्दर्भ प्रस्तुत किया जाता है।
एकदेशी के मत से अधिकरण-रचना
संशय— "अन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमय" (तै. उ. २।५)। यहाँ 'आनन्दमय' शब्द से ब्रह्म का ग्रहण किया जाय? अथवा अन्य पदार्थ का ? इस संशय के अनुसार पहले एकदेशि-मत के अनुसार अधिकरण की रचना की जा रही है—
आनन्दमयस्य जीवत्वाशङ्काः ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् २०९
आत्मानन्दमयः स्यात् । कस्मात् ? अन्नमयाद्यमुख्यात्मप्रवाहपतितत्वात् । अथापि स्यात्सर्वान्तरत्वादानन्दमयो मुख्य एवात्मेति, न स्यात्प्रियाद्यवयवयोगाच्छारीरत्वश्र-
भामती
आनन्दमय इति हि विकारे प्राचुर्ये च मयटस्तुल्यं मुख्यार्थत्वमिति विकारार्थान्न मयादिपद-प्रायपाठादानन्दमयपदमपि विकारार्थमेवेति युक्तम् । न च प्राणमयादिषु विकारार्थत्वायोगात् स्वार्थिको मयडिति युक्तम् । प्राणाद्युपाध्यवच्छिन्नो ह्यात्मा भवति प्राणादिविकारो घटाकाशमिव घटविकारः । न च सत्यर्थे स्वार्थिकत्वमुचितम् ,
भामती-व्याख्या
गौणप्रवाहपातेऽपि युज्यते मुख्यमीक्षणम् ।
मुख्यत्वे तूभयोस्तुल्ये प्रायदृष्टिविशेषिका ॥
पूर्व अधिकरण से गौण ईक्षण का ग्रहण किया जाय ? अथवा मुख्य ईक्षण का ? इस प्रकार के संशय का निर्णायक प्राय-पाठ गौण ईक्षण के पक्ष में था, उसकी उपेक्षा करके मुख्य ईक्षण का ग्रहण किया गया। किन्तु इस अधिकरण में 'मयट्' प्रत्यय के दो मुख्यार्थ प्रसिद्ध हैं—
(१) विकार [ "मयड्वैतयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः" (पा. सू. ४।३।१४३) इस सूत्र से विकारार्थक मयट् विहित है ] । (२) प्राचुर्य [ "तत्प्रकृतवचने मयट्" (पा. सू. ५।४।२१) इस सूत्र में प्राचुर्येण प्रस्तुत पदार्थ का 'प्रकृत' शब्द से ग्रहण कर प्राचुर्यार्थक मयट् विहित है ] । इन दोनों मुख्यार्थों में से यहाँ किस अर्थ का ग्रहण किया जाय ? इस संशय का निरास करने के लिए प्राय-पाठ का अनुशासन मानते हुए प्राचुर्य अर्थ का ही ग्रहण किया गया है।
पूर्वपक्ष - 'आनन्दमय' शब्द यद्यपि 'विकार' और 'प्राचुर्य'—इन दोनों अर्थों में विहित है, तथापि “तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमय” (तै. उ. २।२), “तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयादन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः” (तै. उ. २।३ ), “तस्माद्वा एतस्मान्मनोमया-दन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः” (तै. उ. २।४), “तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमयः” (तै. उ. २।५) इन श्रुतियों में अन्नमयकोशादि का जो प्रतिपादन है, वह अन्न का विकार मात्र है, अतः विकारार्थक अन्नमयादि पदों के प्राय में पठित 'विज्ञानमय' पद भी गौण आत्मा का उपस्थापक है, मुख्य आत्मा (ब्रह्म) का नहीं ।
शङ्का—जैसे अन्नमय (स्थूल) शरीर तो अन्न का विकार है, वैसे प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय शरीर अर्थात् सूक्ष्म शरीर प्राणादि का विकार नहीं, अपितु इन तीन कोशों से घटित एक निकाय है, अतः वहाँ 'मयट्' विकारार्थक नहीं माना जा सकता, अतः प्राय-पाठ विघटित हो जाने के कारण 'आनन्दमय' शब्द में 'मयट्' की विकारार्थता का सन्देह नहीं उठाया जा सकता।
समाधान—यह पहले ही कहा जा चुका है कि नित्य निरवच्छिन्न पदार्थ सावच्छिन्न होकर कार्य या विकार माना जाता है, अतः प्राणादि उपाधियों से अवच्छिन्न आत्मा वैसे ही प्राणादि का विकार माना जाता है, जैसे घटावच्छिन्न आकाश घट का विकार, अतः विकारार्थक 'मयट्' का प्राय-पाठ सुरक्षित है, उसके बल पर 'आनन्दमय' भी आनन्द का विकार कहा जा सकता है। यद्यपि 'आनन्द एव आनन्दमय'—इस प्रकार स्वार्थ में मयट् प्रत्यय वैसे ही माना जा सकता है, जैसे 'देव एव देवता'—इत्यादि स्थलों पर 'तल' होता है। तथापि स्वार्थक प्रत्यय एक प्रकार से निरर्थक-सा ही माना जाता है, अतः जहाँ तक कोई विशेष अर्थ सुलभ होता है, वहाँ तक स्वार्थक प्रत्यय नहीं माना जाता, प्रकृत में जब विकारार्थ का लाभ हो रहा है, तब प्रत्यय को स्वार्थपरक नहीं माना जा सकता ।
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