भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रधानस्यानन्दमयत्वम् ] हिन्दोसहितभामतीसंवलितम् २०७
र्थानि। तेषां गुणविशेषोपाधिभेदेन भेदः। एक एव तु परमात्मेश्वरस्तैस्तैर्गुणविशेषैर्विशिष्ट उपास्यो यद्यपि भवति, तथापि यथागुणोपासनमेव फलानि भिद्यन्ते। 'तं यथा यथोपासते तदेव भवति' इति श्रुतेः, यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति' (छा० ३।१४।१) इति च। स्मृतेश्च—'यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥' (गी० ८।६) इति। यद्यप्येक आत्मा सर्वभूतेषु स्थावरजङ्गमेषु गूढः, तथापि चित्तोपाधिविशेषतारतम्यादात्मनः
भामती
क्रममुक्त्यर्थानि, कानिचित्कर्मसमृद्ध्यर्थानि ॐ । क्वचित् पुनरुक्तोऽप्युपाधिरविवक्षितः, यथाऽत्रैवान्नमयादय आनन्दमयान्ताः पञ्च कोशाः। तदत्र कस्मिन्नुपाधिर्विवक्षितः कस्मिन्नेति नाद्यापि विवेचितम्। तथा गतिसामान्यमपि सिद्धवदुक्तं, न त्वद्यापि साधितमिति। तदर्थमुत्तरग्रन्थसन्दर्भारम्भ इत्यर्थः। स्यादेतत्—परस्यात्मनस्तत्तदुपाधिभेदविशिष्टस्याप्यभेदात् कथमुपासनाभेदः कथञ्च फलभेद इत्यत आह ॐ एक एव तु इति ॐ । रूपाभेदेऽप्युपाधिभेदादुपहितभेदादुपासनाभेदस्तथा च फलभेद इत्यर्थः। ॐ क्रतुः ॐ सङ्कल्पः। ननु यद्येक आत्मा कूटस्थनित्यो निरतिशयः सर्वभूतेषु गूढः कथमेतस्मिन् भूताश्रये तारतम्यश्रुतय इत्यत आह ॐ यद्यप्येक आत्मा इति ॐ । यद्यपि निरतिशयमेकमेव रूपमात्मन ऐश्वर्यं ज्ञानं चानन्दश्च,
भामती-व्याख्या
(स्वर्गादि) माना जाता है। कर्म-निरपेक्ष केवल मन के द्वारा सम्पादित होने के कारण ऐसी उपासनाओं को कर्मकाण्ड में न पढ़ कर यहाँ (वेदान्त-काण्ड) में स्थान दिया गया है। "कानिचित् क्रममुक्त्यर्थानि, कानिचित् कर्मसमृद्ध्यर्थानि"। कहीं-कहीं ब्रह्म की कथित उपाधि भी अविवक्षित होती है, जैसे—यहाँ [आनन्द ब्रह्म के प्रसङ्ग में] ही 'अन्नमय', 'प्राणमय', 'मनोमय', 'विज्ञानमय' और 'आनन्दमय'—ये पाँच कोश। कहाँ उपाधि विवक्षित है और कहाँ नहीं ? ऐसा विचार अभी तक नहीं किया गया। उसी प्रकार 'गतिसामन्य' का भी उपदेश मात्र कर दिया गया, अभी तक उसकी सिद्धि नहीं की गई, इसके लिए अग्रिम सूत्र-ग्रन्थ की रचना की गई है।
विविध उपाधियों से विशिष्ट भी परमात्मा तो एक अभिन्न ही है, तब उसकी उपासनाओं का भेद क्योंकर होगा? उपासना-भेद न होने पर फल-भेद क्यों होगा? ऐसी शङ्का का समाधान है—"एक एव तु परमात्मेश्वरः तैस्तैर्गुणविशेषैर्विशिष्ट उपास्यो यद्यपि भवति, तथापि यथागुणोपासनमेव फलानि भिद्यन्ते "तं यथा यथोपासते, तदेव भवति" (मुद्गलो. ३।३) इति श्रुतेः। "यथाक्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति" (छां. ३।१४।१) इति च"। आशय यह है कि उपधेय का अभेद होने पर भी उपाधियों का भेद होने के कारण उपासना का भेद हो जाता है। उपासना का भेद होने से फल-भेद हो जाता है। उक्त श्रुति में 'क्रतु' शब्द का अर्थ है—'सङ्कल्प। भाष्यकार ने भी इस मन्त्र की व्याख्या में कहा है—"क्रतुर्निश्चयोऽध्यवसायः याहङ् निश्चयोऽस्मिँल्लोके पुरुषो भवति, तथेतां मृत्वा भवति"। जीव का निश्चय अपने कर्मों पर निर्भर है और उस निश्चय पर भावी जन्म।
यदि एक ही आत्मा कूटस्थ, नित्य और निरतिशय सभी भूतो में व्याप्त है, तब उसके उपास्य-उपासकादिरूप तारतम्य का प्रतिपादन श्रुतियाँ क्यों करती हैं? इस प्रश्न का उत्तर है—"यद्यप्येक आत्मा सर्वभूतेषु स्थावरजङ्गमेषु गूढः, तथापि चित्तोपाधिविशेषतारतम्या-दात्मनः कूटस्थनित्यस्यैकरूपस्याप्युत्तरोत्तराविकृतस्य तारतम्यम्"। अर्थात् आत्मा का रूप, ऐश्वर्य और ज्ञान एक ही प्रकार का है, तथापि अनादि अविद्यारूप अन्धकार से आवृत्त होकर किसी (स्थावरादि) शरीर में असत्-जैसा (नहीं के बराबर), कहीं अत्यन्त