भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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आनन्दमयस्य जीवत्वाशङ्काः ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् २०९

आत्मानन्दमयः स्यात् । कस्मात् ? अन्नमयाद्यमुख्यात्मप्रवाहपतितत्वात् । अथापि स्यात्सर्वान्तरत्वादानन्दमयो मुख्य एवात्मेति, न स्यात्प्रियाद्यवयवयोगाच्छारीरत्वश्र-

भामती

आनन्दमय इति हि विकारे प्राचुर्ये च मयटस्तुल्यं मुख्यार्थत्वमिति विकारार्थान्न मयादिपद-प्रायपाठादानन्दमयपदमपि विकारार्थमेवेति युक्तम् । न च प्राणमयादिषु विकारार्थत्वायोगात् स्वार्थिको मयडिति युक्तम् । प्राणाद्युपाध्यवच्छिन्नो ह्यात्मा भवति प्राणादिविकारो घटाकाशमिव घटविकारः । न च सत्यर्थे स्वार्थिकत्वमुचितम् ,

भामती-व्याख्या

गौणप्रवाहपातेऽपि युज्यते मुख्यमीक्षणम् ।
मुख्यत्वे तूभयोस्तुल्ये प्रायदृष्टिविशेषिका ॥

पूर्व अधिकरण से गौण ईक्षण का ग्रहण किया जाय ? अथवा मुख्य ईक्षण का ? इस प्रकार के संशय का निर्णायक प्राय-पाठ गौण ईक्षण के पक्ष में था, उसकी उपेक्षा करके मुख्य ईक्षण का ग्रहण किया गया। किन्तु इस अधिकरण में 'मयट्' प्रत्यय के दो मुख्यार्थ प्रसिद्ध हैं—
(१) विकार [ "मयड्वैतयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः" (पा. सू. ४।३।१४३) इस सूत्र से विकारार्थक मयट् विहित है ] । (२) प्राचुर्य [ "तत्प्रकृतवचने मयट्" (पा. सू. ५।४।२१) इस सूत्र में प्राचुर्येण प्रस्तुत पदार्थ का 'प्रकृत' शब्द से ग्रहण कर प्राचुर्यार्थक मयट् विहित है ] । इन दोनों मुख्यार्थों में से यहाँ किस अर्थ का ग्रहण किया जाय ? इस संशय का निरास करने के लिए प्राय-पाठ का अनुशासन मानते हुए प्राचुर्य अर्थ का ही ग्रहण किया गया है।

पूर्वपक्ष - 'आनन्दमय' शब्द यद्यपि 'विकार' और 'प्राचुर्य'—इन दोनों अर्थों में विहित है, तथापि “तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमय” (तै. उ. २।२), “तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयादन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः” (तै. उ. २।३ ), “तस्माद्वा एतस्मान्मनोमया-दन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः” (तै. उ. २।४), “तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमयः” (तै. उ. २।५) इन श्रुतियों में अन्नमयकोशादि का जो प्रतिपादन है, वह अन्न का विकार मात्र है, अतः विकारार्थक अन्नमयादि पदों के प्राय में पठित 'विज्ञानमय' पद भी गौण आत्मा का उपस्थापक है, मुख्य आत्मा (ब्रह्म) का नहीं ।

शङ्का—जैसे अन्नमय (स्थूल) शरीर तो अन्न का विकार है, वैसे प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय शरीर अर्थात् सूक्ष्म शरीर प्राणादि का विकार नहीं, अपितु इन तीन कोशों से घटित एक निकाय है, अतः वहाँ 'मयट्' विकारार्थक नहीं माना जा सकता, अतः प्राय-पाठ विघटित हो जाने के कारण 'आनन्दमय' शब्द में 'मयट्' की विकारार्थता का सन्देह नहीं उठाया जा सकता।

समाधान—यह पहले ही कहा जा चुका है कि नित्य निरवच्छिन्न पदार्थ सावच्छिन्न होकर कार्य या विकार माना जाता है, अतः प्राणादि उपाधियों से अवच्छिन्न आत्मा वैसे ही प्राणादि का विकार माना जाता है, जैसे घटावच्छिन्न आकाश घट का विकार, अतः विकारार्थक 'मयट्' का प्राय-पाठ सुरक्षित है, उसके बल पर 'आनन्दमय' भी आनन्द का विकार कहा जा सकता है। यद्यपि 'आनन्द एव आनन्दमय'—इस प्रकार स्वार्थ में मयट् प्रत्यय वैसे ही माना जा सकता है, जैसे 'देव एव देवता'—इत्यादि स्थलों पर 'तल' होता है। तथापि स्वार्थक प्रत्यय एक प्रकार से निरर्थक-सा ही माना जाता है, अतः जहाँ तक कोई विशेष अर्थ सुलभ होता है, वहाँ तक स्वार्थक प्रत्यय नहीं माना जाता, प्रकृत में जब विकारार्थ का लाभ हो रहा है, तब प्रत्यय को स्वार्थपरक नहीं माना जा सकता ।

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