भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

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२१० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १२

वणाच्च । मुख्यश्चेदात्मानन्दमयः स्यात्, न प्रियादिसंस्पर्शः स्यात् । इह तु ‘तस्य प्रियमेव शिरः’ इत्यादि श्रूयते । शारीरत्वं च श्रूयते—‘तस्यैष एव शारीर आत्मा, यः पूर्वस्य’ इति । तस्य पूर्वस्य विज्ञानमयस्यैष एव शारीर आत्मा य एष आनन्दमय इत्यर्थः । न च सशरीरस्य सतः प्रियाप्रियसंस्पर्शो वारयितुं शक्यः । तस्मात्संसार्येवानन्दमय आत्मेत्येवं प्राप्ते इदमुच्यते—

भामती चतुष्कोशान्तरत्वेन न सर्वान्तरतोचिता ।
प्रियादिभागी शारीरो जीवो न ब्रह्म युज्यते ॥

न च सर्वान्तरतया ब्रह्मैवानन्दमयं न जीव इति साम्प्रतम् , नहीयं श्रुतिरानन्दमयस्य सर्वान्तरतां ब्रूतेऽपि त्वन्नमयादिकोशचतुष्टयान्तरतामानन्दमयकोशस्य । न चास्मादन्यस्यान्तरस्याश्रवणादयमेव सर्वान्तर इति युक्तम् , यदपेक्षं यस्यान्तरत्वं श्रुतं तत्तस्मादेवान्तरं भवति । न हि देवदत्तो बलवानित्युक्ते सर्वान् सिंहशार्दूलादीनपि प्रति बलवान् प्रतीयतेऽपि तु समानजातीयान्तरमपेक्ष्य । एवमानन्दमयोऽप्यन्नमयादिभ्योऽन्तरो न तु सर्वस्मात् । न च निष्कलस्य ब्रह्मणः प्रियाद्यवयवयोगः, नापि शारीरत्वं युज्यत इति संसार्येवानन्दमयः । तस्मादुपहितमेवात्रोपास्यत्वेन विवक्षितं, न तु ब्रह्मरूपं ज्ञेयत्वेनेति पूर्वः पक्षः । अपि च यदि प्राचुर्यार्थोऽपि मयट् , तथापि संसार्येवानन्दमयः, न तु ब्रह्म, आनन्दप्राचुर्यं हि तद्विपरीतदुःखलवसम्भवे भवति, न तु तदत्यन्तासम्भवे । न च परमात्मनो मनागपि दुःखलवसम्भवः, आनन्दैकरसत्वादित्याह ॐ न च सशरीरस्य सतः इति ॐ । अशरीरस्य पुनरप्रियसम्बन्धो मनागपि नास्तीति

भामती-व्याख्या
शङ्का—अन्नमयादि चार कोशों की प्रस्तुति के अनन्तर श्रुति उन चारों के अन्तर ( मध्य ) में व्याप्त पदार्थ को 'आनन्दमय' कह रही है, चार कोशों की अन्तर-व्याप्ति सर्वान्तरत्व का उपलक्षक है, सर्वान्तर एकमात्र ब्रह्म है, अतः इस सर्वान्तरता के निर्देश से प्राय-पाठ का बाध हो जाता है।

समाधान—यहाँ सर्वान्तरता का उल्लेख नहीं और न चतुष्कोशान्तरता मात्र के उल्लेख से सर्वान्तरता का उन्नयन ही हो सकता है—

चतुष्कोशान्तरत्वेन न सर्वान्तरतोचिता ।
प्रियादिभागी शारीरो जीवो न ब्रह्म युज्यते ॥

'सर्वान्तर ब्रह्म ही है, अतः सर्वान्तरता के संकीर्तन से ब्रह्म की ही अवगति होती है, जीव की नहीं'—ऐसी शङ्का यहाँ नहीं की जा सकती, क्योंकि यहाँ केवल अन्नमयादि चार कोशों के अन्तर ही आनन्दमय बताया गया है, सर्वान्तर नहीं। आनन्दमय के अन्तर किसी अन्य का निर्देश न होने के कारण भी आनन्दमय को सर्वान्तर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जिसकी अपेक्षा से जो पदार्थ अन्तर कहा जाता है, उसी की अन्तरता अवगत होती है, जैसे यज्ञदत्ताद् देवदत्तो बलवान्—ऐसा कहने से देवदत्त में सभी सिंह, शार्दूल ( तेन्दुआ ) आदि से बलवत्ता का लाभ नहीं होता, अपितु यज्ञदत्तादि अपने सजातीय व्यक्तियों की अपेक्षा ही बलवत्ता अधिगत होती है। उसी प्रकार आनन्दमय में अन्नमयादि चार की ही अभ्यन्तरता प्राप्त होती है, सर्वान्तरता नहीं, प्रत्यूत उसके भी अन्तर कोई अन्य हो सकता है।

‘तस्य प्रियमेव शिरः, मोदो दक्षिणः पक्षः, प्रमोद उत्तरः पक्षः, आनन्द आत्मा, ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा’ ( तै. उ. २।५ ) इस वाक्य के द्वारा प्रियादि पदार्थों को आनन्दमय का अवयव कहा गया है, निरवयव ब्रह्म के अवयव सम्भव नहीं। परिशेषतः 'आनन्दमय' शब्द के द्वारा संसारी आत्मा का ही उपास्यत्वेन निर्देश मानना उचित है, ब्रह्मस्वरूप का प्रतिपादन कथमपि सम्भावित नहीं।