भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ५
सत्यपि ज्ञानकर्मणि ब्रह्मणः 'तदैक्षत' ( छान्दो० ६।२।३ ) इति कर्तृत्वव्यपदेशोपपत्तेर्न वैषम्यम् । कर्मापेक्षायां तु ब्रह्मणीक्षितृत्वश्रुतयः सुतरामुपपन्नाः । किं पुनस्तत्कर्म, यत्प्रागुत्पत्तेरीश्वरज्ञानस्य विषयो भवतीति ? तत्त्वान्यत्वाभ्यामनिर्वचनीये नामरूपे अव्याकृते व्याचिकीर्षिते इति ब्रूमः । यत्प्रसादाद्धि योगिनामप्यतीतानागतविषयं प्रत्यक्षं ज्ञानमिच्छन्ति योगशास्त्रविदः, किमु वक्तव्यं तस्य नित्यसिद्धस्येश्वरस्य सृष्टि-स्थितिसंहृतिविषयं नित्यज्ञानं भवतीति ।
यदप्युक्तं प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मणः शरीरादिसंबन्धमन्तरेणेक्षितृत्वमनुपपन्नमिति, न तच्चो-
भामती
वैषम्यमुच्यते, तन्न, असिद्धत्वात् कर्माभावस्य, विवक्षितत्वाच्चात्र कर्मण इति परिहरति ॐ कर्मापेक्षायां तु इति ॐ । यासां सति कर्मण्यविवक्षिते श्रुतीनामुपपत्तिस्तासां सति कर्मणि विवक्षिते सुतरामित्यर्थः । ॐ यत्प्रसादात्तु इति ॐ । यस्य भगवत ईश्वरस्य प्रसादात्तस्य नित्यसिद्धस्येश्वरस्य नित्यं ज्ञानं भवतीति किमु वक्तव्यमिति योजना । तथाह्युर्योगशास्त्रकाराः । ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च' इति ।
भामती-व्याख्या
कर्मकारकभूत जगत् के न होने पर भी ब्रह्म में ईक्षण-कर्तृत्व का व्यवहार निभ जाता है । आशय यह है कि शङ्कावादी क्या वास्तविक कर्म और कर्माभाव को लेकर सूर्य और ब्रह्म में वैषम्य सिद्ध करना चाहता है कि सूर्य-प्रकाश का कर्मकारक रूपादि पदार्थ विद्यमान है और ब्रह्म के ज्ञान का कर्मभूत जगत् अपनी उत्पत्ति से पहले नहीं ? अथवा कर्म के अविवक्षितत्व को लेकर वैषम्य दिखाना चाहता है कि सवितृप्रकाश का रूपादि कर्म सत् भी है और विवक्षित भी है, किन्तु ब्रह्म-ज्ञान का कर्मभूत अध्यस्त प्रपञ्च होने पर भी अविवक्षित है । कर्म के विवक्षाभाव को लेकर यदि वैषम्य विवक्षित है, तब 'सविता प्रकाशयति'- ऐसा सकर्मक धातु का प्रयोग ब्रह्म के लिए 'ब्रह्म प्रकाशयति' ऐसा साम्य न होने पर भी 'प्रकाशते'— ऐसे प्रयोग का साम्य है ही, क्योंकि प्रकाशते'— यह अकर्मक धातु का प्रयोग है, कर्म की विवक्षा और विवक्षा के अभाव का प्रसङ्ग ही नहीं उठता । यदि प्रकाशस्वरूप कर्म की अपेक्षा सविता में स्वतन्त्र कर्तृत्व माना जाता है, तो उसका परिहार किया गया है कि "न, असत्यपि कर्मणि" । अर्थात् कर्म के अविवक्षित होने पर भी सविता में कर्तृत्व-व्यवहार होता है— 'सविता प्रकाशते ।' सविता के प्रकाश का वास्तविक कर्मकारक घटादि पदार्थ है, किन्तु ब्रह्म-ज्ञान का वास्तविक कर्म नहीं— इस प्रकार विषमता यदि अभिप्रेत है, तब वह सम्भव नहीं, क्योंकि ब्रह्म-ज्ञान का कर्माभाव ही सिद्ध नहीं, क्योंकि यहाँ कर्म विवक्षित है— "कर्मापेक्षायां तु ब्रह्मणीक्षितृत्वश्रुतयः सुतरामुपपन्नाः" । जिन श्रुतियों की सत् किन्तु अविवक्षित कर्म में उपपत्ति हो जाती है, उन श्रुतियों की अनिर्वचनीय नाम-रूपात्मक प्रपञ्चरूप सत् एवं विवक्षित कर्म में सुतरां ( भली प्रकार ) उपपत्ति हो जाती है । "यत्प्रसादाद्धि" । जिस परमेश्वर की कृपा से योगियों को अतीतानागत विषय का ज्ञान-लाभ माना जाता है, उस नित्य सिद्ध ईश्वर का सर्वविषयक ज्ञान नित्य क्यों न होगा ? ईश्वर की कृपा से योगियों को सर्वविषयक ज्ञान की प्राप्ति योगसूत्रकार ने कही है— "ततः प्रत्यक्चेतनाऽधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च" ( यो. सू. १।२९ ) । इस सूत्र के भाष्य में कहा गया है— "भक्तिविशेषादावर्जित ईश्वरस्तमनुगृह्णाति ज्ञानवैराग्यादिना" । योगी की विशेष ( अनन्य ) भक्ति के द्वारा प्रसादित ईश्वर उस पर ज्ञान और वैराग्य-प्रदान करने का अनुग्रह करता है ।
यह जो आक्षेप किया गया कि प्रपञ्च की उत्पत्ति से पहले शरीरादि साधनों के न होने के कारण ईक्षण और ईक्षण-कर्तृत्व क्योंकर बनेगा ? वह आक्षेप उचित नहीं, क्योंकि