भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२१२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १३

आनन्दमयस्य सर्वान्तरत्वात् । मुख्यमेव ह्यात्मानमुपदिदिक्षु शास्त्रं लोकबुद्धिमनुसरत्, अन्नमयं शरीरमनात्मानमत्यन्तमूढानामात्मत्वेन प्रसिद्धमनूद्य मूषानिषिक्तद्रुतताम्रादिप्रतिमावत्ततोऽन्तरं ततोऽन्तरमित्येवं पूर्वेण पूर्वेण समानमुत्तरमुत्तरमनात्मानमात्मेति ग्राहयत्, प्रतिपत्तिसौकर्यापेक्षया सर्वान्तरं मुख्यमानन्दमयमात्मानमुपदिदेशेति श्लिष्टतरम् । यथारुन्धतीनिदर्शने बह्वीष्वपि तारास्वमुख्यास्वरुन्धतीषु दर्शितासु याऽन्त्या प्रदर्श्यते सा मुख्यैवारुन्धती भवति, एवमिहाप्यानन्दमयस्य सर्वान्तरत्वान्मुख्यमात्मत्वम् । यत्तु ब्रूषे—प्रियादीनां शिरस्त्वादिकल्पनाऽनुपपन्ना मुख्यस्यात्मन इति, अतीतानन्तरोपाधिजनिता सा, न स्वाभाविकीत्यदोषः । शारीरत्वमप्यानन्दमयस्यान्नमयादिशरीरपरम्परया प्रदर्श्यमानत्वात्, न पुनः साक्षादेव शारीरत्वं संसारिवत्, तस्मादानन्दमयः पर एवात्मा ॥ १२ ॥

विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥ १३ ॥

**अत्राह—**नानन्दमयः पर आत्मा भवितुमर्हति । कस्मात् ? विकारशब्दात् । प्रकृतिवचनादयमन्नमयः शब्दो विकारवचनः समधिगतः, आनन्दमय इति मयटो विका-


भामती

इति ॐ । न हि मुख्यारुन्धतीदर्शनं तत्तदमुख्यारुन्धतीदर्शनप्रायपठितमप्यमुख्यारुन्धतीदर्शनं भवति । तादर्थ्यात्पूर्वदर्शनानामन्त्यदर्शनानुगुण्यं न तु तद्विरोधितेति चेद्, इहाप्यानन्दमयादान्तरस्यान्यस्याश्रवणात् । तस्य त्वन्नमयादिसर्वान्तरत्वश्रुतेस्तत्पर्यवसानात्तादर्थ्यं तुल्यम् । प्रियाद्यवयवयोगशारीरत्वे च निगदव्याख्यातेन भाष्येण समाहिते । प्रियाद्यवयवयोगवद् दुःखलवयोगोऽपि परमात्मन औपाधिक उपपादितः । तथाऽऽनन्दमय इति प्राचुर्यार्थता मयट उपपादितेति ॥ १२-१४ ॥


भामती-व्याख्या

आनन्दमय का अभ्यास प्रस्तुत नहीं किया गया, अपितु साक्षात् 'आनन्दमय' पद के माध्यम से भी आनन्दमय का अभ्यास उपलब्ध होता है—"एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति" ( तै. उ. २।८ ) ।

पूर्वपक्ष की युक्तियों का अनुवाद करके खण्डन किया जाता है—'यत्तूक्तमन्नमयाद्यमुख्यात्मप्रवाहपतितत्वादानन्दमयस्यामुख्यत्वम्, नासौ दोषः, आनन्दमयस्य सर्वान्तरत्वात्'। जैसे मुख्य अरुन्धती तारे का दर्शन कहीं अमुख्य अरुन्धती-दर्शन के प्राय में पठित अमुख्य अरुन्धती का दर्शन नहीं होता, वैसे ही मुख्य आनन्दमय अन्नमयादि अमुख्यात्म-प्रवाह में पड़ कर भी अमुख्य नहीं हो सकता । 'पूर्व-पूर्व दर्शन जब उत्तरोत्तर दर्शन की उपपत्ति के लिए है, तब अन्तिम दर्शन पूर्व दर्शनों से विपरीत क्यों ?' इस शङ्का का समाधान यह है कि आनन्दमय के अभ्यन्तर अन्य किसी पदार्थ का निर्देश न होने के कारण अन्नमयादि कोशों एवं समस्त प्रपञ्च की अभ्यन्तरता आनन्दमय में सिद्ध हो जाती है, सर्वान्तर एक मात्र ब्रह्म है। उसकी अवगति के साधनभूत अन्नमयादि कोशों की समानता कदापि सम्भव नहीं । प्रियादि अवयवों के निर्देश से जो शारीर आत्मा का पूर्व पक्ष उठाया गया था, उसका निरास भी भाष्यकार ने कर दिया है—"यत्तु ब्रूषे प्रियादीनां शिरस्त्वादिकल्पनाऽनुपपन्ना मुख्यस्यात्मन इति, अतीतानन्तरोपाधिजनिता सा, न स्वाभाविकीत्यदोषः।" आनन्दमय में सावयवत्व और शारीरत्व का व्यवहार जो देखा जाता है, वह स्वाभाविक नहीं, अपितु अन्नमय शरीरादि अतीत उपाधियों एवं जीव से अनन्तरता ( अनौपाधिक एकता ) को लेकर हो जाता है, अतः आनन्दमय की ब्रह्मरूपता में किसी प्रकार का दोष नहीं रह जाता ।

'मयट्' प्रत्यय विकारार्थक नहीं, अपितु प्रचुरार्थक है, क्योंकि "तत्प्रकृतवचने मयट्"