भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 231, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंआनन्दमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २१३
रार्थत्वात् । तस्मादन्नमयादिशब्दवद्विकारविषय एवानन्दमयशब्द इति चेत्, न, प्राचुर्यार्थेऽपि मयटः स्मरणात् । 'तत्प्रकृतवचने मयट्' (पा० ५।४।२१) इति हि प्रचुरतायामपि मयट् स्मर्यते । यथा 'अन्नमयो यज्ञः' इत्यन्नप्रचुर उच्यते, एवमानन्दप्रचुरं ब्रह्मानन्दमय उच्यते । आनन्दप्रचुरत्वं च ब्रह्मणो मनुष्यत्वादारभ्योत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन्स्थाने शतगुण आनन्द इत्युक्त्वा ब्रह्मानन्दस्य निरतिशयत्वावधारणात् । तस्मात्प्राचुर्यार्थे मयट् ॥ १३ ॥
तद्धेतुव्यपदेशाच्च ॥ १४ ॥
इतश्च प्राचुर्यार्थे मयट्, यस्मादानन्दहेतुत्वं ब्रह्मणो व्यपदिशति श्रुतिः—'एष ह्येवानन्दयाति' इति । आनन्दयतीत्यर्थः । यो ह्यन्यानानन्दयति स प्रचुरानन्द इति प्रसिद्धं भवति । यथा लोके योऽन्येषां धनिकत्वमापादयति स प्रचुरधन इति गम्यते, तद्वत् । तस्मात्प्राचुर्यार्थेऽपि मयटः संभवादानन्दमयः पर एवात्मा ॥ १४ ॥
मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १५ ॥
इतश्चानन्दमयः पर एवात्मा । यस्मात् 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' इत्युपक्रम्य 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तै० २।१) इत्यस्मिन्मन्त्रे यत्प्रकृतं ब्रह्म सत्यज्ञानानन्तविशेषणैर्निर्धारितम्, यस्मादाकाशादिक्रमेण स्थावरजङ्गमानि भूतान्यजायन्त, यच्च भूतानि सृष्ट्वा तान्यनुप्रविश्य गुहायामवस्थितं सर्वान्तरं, यस्य विज्ञानाय 'अन्योऽन्तर आत्माऽन्योऽन्तर आत्मा' इति प्रक्रान्तं, तन्मान्त्रवर्णिकमेव ब्रह्मेह गीयते 'अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः' (तै० २।५) इति । मन्त्रब्राह्मणयोश्चैकार्थत्वं युक्तम्, अविरोधात् ।
भामती अपि च मन्त्रब्राह्मणयोरुपेष्योपायभूतयोः सम्प्रतिपत्तेर्ब्रह्मैवानन्दमयपदार्थः, मन्त्रे हि पुनःपुनरन्योऽन्तर आत्मेति पर ब्रह्मण्यान्तरत्वश्रवणात्तस्यैव चान्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमय इति ब्राह्मणे प्रत्यभिज्ञानात्
भामती-व्याख्या
(पा. सू. ५।४।२१) इस सूत्र के द्वारा प्राचुर्यार्थ में भी मयट् विहित है, जैसे 'अन्नमयो यज्ञः"—ऐसा व्यवहार उसी यज्ञ के लिए होता है, जिसमें अन्न की प्रचुरता होती है। उसी प्रकार मनुष्यादि के आनन्द से उत्तरोत्तर शतगुण आनन्द बढ़ता-बढ़ता ब्रह्मानन्द में पूर्ण हो जाता है।
'मयट्' की प्रचुरार्थता श्रुति के उस व्यपदेश से भी सिद्ध होती है, जिसमें ब्रह्म को आनन्द का हेतु कहा गया है—"एष ह्येवानन्दयाति" (तै. उ. २।७)। जो पदार्थ अपने योग से औरों को भी मधुर बनाता है, वह स्वयं माधुर्यमय होता है, जो दूसरों को धनी बनाता है, वह 'प्रचुरधनः' कहा जाता है, उसी प्रकार जो दुःखमय प्रपञ्च को भी अपने सम्बन्ध से आनन्दित करता है, वह आनन्दप्रचुर या आनन्दमय क्यों न होगा ? ॥ १२-१४ ॥
[ 'मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते'—इस सूत्र की व्याख्या में भाष्यकार ने 'मन्त्र' पद से "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै. उ. २।१) इस वाक्य का ग्रहण करके कहा है कि इस मन्त्र के द्वारा प्रतिपादित सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म की ही प्रत्यभिज्ञा "अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः" (तै. उ. २।५) इस ब्राह्मण वाक्य में हो रही है, अतः आनन्दमय और सच्चिदानन्द ब्रह्म की एकता निश्चित है, क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मण की एकार्थपरता होती है—"मन्त्रब्राह्मणयोश्चैकार्थत्वं युक्तम्" । 'मन्त्र' का लक्षण है—"तच्चोदकेषु मन्त्राख्या" (जै. सू. २।१।३२) और उससे भिन्न वाक्यों को ब्राह्मण कहा जाता है—"शेषे ब्राह्मणशब्दः" (जै. सू. २।१।३३) । इन लक्षणों के अनुसार "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म"—इस वाक्य को 'मन्त्र' कहना दुष्कर है, क्योंकि अनुष्ठानोपयोगी पदार्थों के प्रतिपादक या स्मारक वाक्यों को ही याज्ञिकगण मन्त्र