भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

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२१४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १६

अन्यथा हि प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रिये स्याताम् । न चान्नमयादिभ्य इवानन्दमयादन्योऽन्तर आत्माऽभिधीयते । एतन्निष्ठैव च 'सैषा भार्गवी वारुणी विद्या' ( तै० २।६ ) तस्मादानन्दमयः पर एवात्मा ॥ १५ ॥

नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १६ ॥

इतश्चानन्दमयः पर एवात्मा । नेतरः । इतर ईश्वरादन्यः संसारी जीव इत्यर्थः । न जीव आनन्दमयशब्देनाभिधीयते । कस्मात् ? अनुपपत्तेः । आनन्दमयं हि प्रकृत्य श्रूयते—'सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । इदं सर्वमसृजत , यदिदं किंच' ( तै० २।६ ) इति । तत्र प्राक्शरीराद्युत्पत्तेरभिध्यानं, सृज्यमानानां च विकाराणां स्रष्टुरव्यतिरेकः, सर्वविकारसृष्टिश्च न परस्मादात्मनोऽन्यत्रोपपद्यते ॥ १६ ॥

भामती

परब्रह्मैवानन्दमयमित्याह सूत्रकारः ॐ मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॐ । मान्त्रवर्णिकमेव परं ब्रह्म ब्राह्मणेऽप्यानन्दमय इति गीयते इति ॥ १५ ॥

अपि चानन्दमयं प्रकृत्य शरीराद्युत्पत्तेः प्राक् स्रष्टृत्वश्रवणाद् बहु स्यामिति च सृज्यमानानां स्रष्टुरानन्दमयादभेदश्रवणादानन्दमयः पर एवेत्याह सूत्रम् ॐ नेतरोऽनुपपत्तेः ॐ । नेतरो जीव आनन्दमयः, तस्यानुपपत्तेरिति ॥ १६ ॥

भामती-व्याख्या

कहा करते हैं, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”—यह वाक्य तो ऐसे ब्रह्म का प्रतिपादक है, जो धर्मानुष्ठानादि का उपयोगी नहीं, प्रत्युत विरोधी माना गया है। फलतः “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”—इस वाक्य को गौणरूप से ही 'मन्त्र' कहना होगा। जब सूत्र-घटक 'मन्त्रवर्ण' पद औपचारिक या गौणार्थक है, तब अन्नमयादि चार कोशों के प्रतिपादक वाक्य-समूह का 'मन्त्रवर्ण' पद से ग्रहण करना ही उचिततर है और “अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः”—इस वाक्य को तो ब्राह्मण वाक्य कहा ही गया है। इन दोनों में परस्पर उपायोपेयभाव और एकार्थपरत्व निश्चित है, जैसे ब्राह्मण वाक्य मन्त्रार्थ का निर्णायक या उपाय होता है, वैसे ही 'कोश-वाक्य' भी 'आनन्दमय-वाक्य' की अर्थावगति में उपकारक है, दोनों की प्रतिपाद्य वस्तु में प्रत्यभिज्ञा भी स्पष्ट है—इस आशय को लेकर श्री वाचस्पति मिश्र कहते हैं—] मन्त्र-वाक्य उपेय ( निर्णय ) और ब्राह्मण वाक्य उपाय ( निर्णायक होता है। प्रकृत में दोनों वाक्यों की एकार्थ-प्रतिपत्ति को ध्यान में रखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आनन्दमय ब्रह्म ही है, क्योंकि 'तस्माद्वा एतस्मादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः' इत्यादि चारों वाक्य-खण्डरूपी मन्त्र में प्रयुक्त 'अन्य' और 'अन्तर' पद परब्रह्म के ही समर्पक हैं, उसी ब्रह्म की 'अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः'—इस ब्राह्मण में प्रत्यभिज्ञा हो रही है, अतः 'आनन्दमय' शब्द से परब्रह्म का ही ग्रहण करना चाहिए, ऐसा सूत्रकार का कहना है—“मन्त्रवर्णिकमेव च गीयते” अर्थात् मान्त्रवर्णिक परब्रह्म ही उक्त ब्राह्मण वाक्य में 'आनन्दमय' पद के द्वारा अभिहित होता है। [ मिश्रजी के मन्त्र भाग में ब्राह्मण की सन्निधि और सन्निधि-प्रयुक्त प्रत्यभिज्ञा का जैसा सामञ्जस्य है, वैसा सच्चिदानन्दात्मक ब्रह्म का उद्बोधकत्व स्पष्ट नहीं, जैसा कि भाष्यकार का मन्त्रवर्ण है ] ॥ १५ ॥

'आनन्दमय' का प्रकरण आरम्भ करके जीव के शरीरादि की उत्पत्ति से पहले ही कामना, ईक्षण और स्रष्टृत्व का प्रतिपादन किया गया है—'सोऽकामयत, बहु स्याम् प्रजायेय, स तपोऽतप्यत, स तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत” (तै. उ. २।६)। सृष्टि के रचयिता का आनन्द-