भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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आनन्दमयस्थ ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २१५

भेदव्यपदेशाच्च ॥ १७ ॥

इतश्च नानन्दमयः संसारी। यस्मादानन्दमयाधिकारे—'रसो वै सः। रसं ह्ये- वायं लब्ध्वानन्दीभवति' ( तै० २।७ ) इति जीवानन्दमयौ भेदेन व्यपदिशति। नहि लब्धैव लब्धव्यो भवति। कथं तर्हि 'आत्माऽन्वेष्टव्यः', 'आत्मलाभान्न परं विद्यते' इति श्रुतिस्मृती ? यावता न लब्धैव लब्धव्यो भवतीत्युक्तम्। बाढम्, तथाप्यात्मनो- ऽप्रच्युतात्मभावस्यैव सतस्तत्त्वानवबोधनिमित्तो मिथ्यैव देहादिष्वनात्मस्वात्मत्व- निश्चयो लौकिको दृष्टः। तेन देहादिभूतस्यात्मनोऽप्यात्माऽनन्विष्टोऽन्वेष्टव्योऽलब्धो लब्धव्योऽश्रुतः श्रोतव्योऽमतो मन्तव्योऽविज्ञातो विज्ञातव्य इत्यादिभेदव्यपदेश उपपद्यते। प्रतिषिध्यत एव तु परमार्थतः सर्वज्ञात्परमेश्वरादन्यो द्रष्टा श्रोता वा

भामती

ॐ भेदव्यपदेशाच्च ॐ । रसः सारो ह्ययमानन्दमय आत्मा रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दीभवतीति । सोऽयं जीवात्मनो लब्धृभाव आनन्दमयस्य च लभ्यता नाभेद उपपद्यते । तस्मादानन्दमयस्य जीवात्मनो भेदे परब्रह्मत्वं सिद्धं भवति । चोदयति ॐ कथं तर्हि इति ॐ । यदि लब्धा न लब्धव्यः, कथं तर्हि परमात्मनो वस्तुतोऽभिन्नेन जीवात्मना परमात्मा लभ्यत इत्यर्थः । परिहरति ॐ बाढं तथापि इति ॐ । सत्यं परमार्थतोऽभेदेऽप्यविद्यारोपितं भेदमपाश्रित्य लब्धृलब्धव्यभाव उपपद्यते । जीवो ह्यविद्यया परब्रह्मणो भिन्नो दर्शितः, न तु जीवादपि । तथा चानन्दमयश्चेज्जीवो न जीवस्याविद्ययापि स्वतो भेदो दर्शित इति न च लब्धृलब्धव्यभाव इत्यर्थः । भेदाभेदौ च न जीवपरब्रह्मणोरित्युक्तमधस्तात् । स्यादेतत् — यथा परमेश्वरादभिन्नो जीवात्मा द्रष्टा न भवत्येवं जीवात्मनोऽपि द्रष्टुर्न भिन्नः परमेश्वर इति जीवस्या-

भामती-व्याख्या

मयात्मा से अभेद-प्रतिपादन यह सिद्ध करता है कि "नेतरोऽनुपपत्तेः"। इतर अर्थात् ब्रह्म से भिन्न जीव को आनन्दमय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि शरीरादि की उत्पत्ति से पहले उसमें अभिध्यान और सृष्टि-कर्तृत्व की उपपत्ति नहीं हो सकती ॥ १६ ॥

आनन्दमय को अभिलक्ष्य करके कहा गया है—"रसो वै सः, रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी- भवति" ( तै. उ. २।७ ) अर्थात् आनन्दमयात्मा वह आनन्दरस है, जिसको प्राप्त करके यह ( जीव ) आनन्दित हो जाता है। जीवात्मा जब उस आनन्दमय का लब्धा ( प्रापक ) और आनन्दमय लब्धव्य है, इस प्रकार जीव और आनन्दमय का भेद-प्रतिपादन यह सिद्ध करता है कि आनन्दमय जीव नहीं।

शङ्का—यदि लब्धा लब्धव्य नहीं होता, तब श्रुति और स्मृति में जीव के लिए अभिन्न- स्वरूप परमात्मा को अन्वेष्टव्य ( गवेषणीय ) क्यों कहा है ?

समाधान -- यद्यपि जीवात्मा और परमात्मा का वस्तुतः अभेद है, तथापि अविद्या के द्वारा आपादित भेद को लेकर लब्धृत्व और लब्धव्यत्व की उपपत्ति हो जाती है अर्थात् देहादि-तादात्म्यापन्न आत्मा प्रापक और सर्वोपाधि-रहित आत्मा लब्धव्य हो जाता है। आशय यह है कि अविद्या के द्वारा जीव को ब्रह्म से ही भिन्न दर्शाया गया है, जीव से जीव को भिन्न नहीं कहा गया है, यदि आनन्दमय को जीव कहा जाता है, तब जीव की अविद्या के द्वारा वह स्वयं अपने से भिन्न क्योंकर सिद्ध होगा? भेद के विना जीव में लब्धृत्व और आनन्दमय में लब्धव्यत्व नहीं बन सकता। जीव और ब्रह्म का भेदाभेद पहले ही खण्डित हो चुका है।

शङ्का —जैसे परमात्मा से भिन्न जीवात्मा द्रष्टा नहीं होता, वैसे ही जीवात्मारूप द्रष्टा से परमेश्वर भिन्न नहीं, अतः जीव यदि अनिर्वाच्य है, तब परमेश्वर भी अनिर्वाच्य ही हो

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