भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १९
'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' (बृ० ३।७।२३) इत्यादिना । परमेश्वरस्त्वविद्याकल्पिताच्छा- रीरात्कर्तुर्भोक्तुर्विज्ञानात्माख्यादन्यः । यथा मायाविनश्चर्मखङ्गधरात्सूत्रेणाकाशमधिरो- हतः स एव मायावी परमार्थरूपो भूमिष्ठोऽन्यः । यथा वा घटाकाशादुपाधिपरिच्छि- न्नादनुपाधिरपरिच्छिन्न आकाशोऽन्यः । ईदृशं च विज्ञानात्मपरमात्मभेदमाश्रित्य 'नेतरोऽनुपपत्तेः', 'भेदव्यपदेशाच्च' इत्युक्तम् ॥ १७ ॥
कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥ १८ ॥
आनन्दमयाधिकारे च 'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' (तै० २।६) इति काम- यितृत्वनिर्देशान्नानुमानिकमपि सांख्यपरिकल्पितमचेतनं प्रधानमानन्दमयत्वेन कारण- त्वेन वाऽपेक्षितव्यम् । 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' (ब्र० सू० १।१।५) इति निराकृतमपि प्रधानं पूर्व- सूत्रोदाहृतां कामयितृत्वश्रुतिमाश्रित्य प्रसङ्गात्पुनर्निराक्रियते गतिसामान्यप्रपञ्च- नाय ॥ १८ ॥
अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १९ ॥
इतश्च न प्रधाने जीवे वानन्दमयशब्दः । यस्मादस्मिन्नानन्दमये प्रकृत आत्मनि प्रतिबुद्धस्याऽस्य जीवस्य तद्योगं शास्ति । तदात्मना योगस्तद्योगः, तद्भावापत्तिः ।
भामती
निर्वाच्यत्वे परमेश्वरोऽप्यनिर्वाच्यः स्यात् तथा च न वस्तु सन्नियत आह ॐ परमेश्वरस्त्वविद्याकल्पि- ताद् इति ॐ । रजतं हि समारोपितं न शुक्तितो भिद्यते । नहि तद्भेद्रेनाभेदेन वा शक्यं निर्वक्तुं, शुक्तिस्तु परमार्थसती निर्वचनीयानिवर्चनीयाद्रजताद्विविक्त एव । अत्रैव सरूपमात्रं दृष्टान्तमाह ॐ यथा मायाविन इति ॐ । एतदपरितोषेणात्यन्तरूपं दृष्टान्तमाह ॐ यथा वा घटाकाशाद् इति ॐ । शेषमति- रोहितार्थम् ॥ १७-१९ ॥
भामती-व्याख्या
जायगा । अनिर्वाच्य होने पर परमार्थसत् क्योंकर रह सकेगा ?
समाधान — उक्त शङ्का का समाधान करते हुए भाष्यकार ने कहा है— "परमेश्वरस्तु अविद्याकल्पितात् शारीरात् कर्तुर्भोंक्तुर्विज्ञानात्माख्यादन्यः" । जैसे शुक्ति में समारोपित रजत की सत्ता शुक्ति की सत्ता से भिन्न नहीं, किन्तु शुक्ति की सत्ता रजत की सत्ता से भिन्न होती है, वैसे ही जीवरूप अध्यस्त पदार्थ अपने अधिष्ठानभूत परमेश्वर से भिन्न नहीं, किन्तु परमेश्वर अपने में अध्यस्त जीव से भिन्न पारमार्थिक है । इसके अनुरूप दृष्टांत प्रस्तुत किया जाता हैं—"यथा माया- विनः चर्मखङ्गधरात् सूत्रेणाकाशमधिरोहतः स एव मायावी परमार्थरूपो भूमिष्ठोऽन्यः" । जैसे एक ही ऐन्द्रजालिक अपने वास्तविक रूप में भूमि पर खड़ा है और काल्पनिकरूप के द्वारा आकाश में लटक रहे एक सूत पर चढ़ रहा है । वहाँ उसके काल्पनिक रूप से उसका भूमि पर अवस्थित वास्तविक रूप भिन्न होता है, वैसे ही जीव से ब्रह्म भिन्न होता है । अन्य अनुरूप दृष्टान्त दिखाया जाता है— "यथा वा घटाकाशाद् उपाधिपरिच्छिन्नाद् अनुपाधिरपरि- च्छिन्न आकाशोऽन्यः" । जैसे घटादि उपाधियों से परिच्छिन्न आकाश की अपेक्षा अनवच्छिन्न आकाश भिन्न होता है, वैसे ही जीवरूप अवच्छिन्न चेतन की अपेक्षा ब्रह्मरूप अनवच्छिन्न चेतन भिन्न होता है । शेष भाष्य अत्यन्त सुबोध है । ["कामाच्च नानुमानापेक्षा"—इस सूत्र के द्वारा "सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय" (तै. उ. २।६) इस श्रुति में निर्दिष्ट कामयितृत्वा- नुपपत्ति दिखाकर प्रधान तत्त्व की आनन्दमयता का खण्डन किया गया । "अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति"—यह सूत्र कहता है कि मोक्षावस्था में जीव आनन्दमय तत्त्व से तादात्म्य स्थापित कर लेता है, अतः तादात्म्य के अनुयोगी का अपने प्रतियोगी से भिन्न होना स्वाभा-